लंबित भूमि वाद के दौरान क्रेता सह-अपीलकर्ता के रूप में जोड़े जा सकते हैं — पटना उच्च न्यायालय, 2024

पटना उच्च न्यायालय ने यह examined किया कि विवादित भूमि के वे खरीदार, जिन्होंने भूमि को उस समय खरीदा जब उस पर टाइटल वाद पहले से लंबित था, क्या अपील में सह-अपीलकर्ता के रूप में शामिल हो सकते हैं। न्यायालय ने निचली अपीलीय अदालत के इंकार को निरस्त करते हुए उनके प्रतिवाद पक्षकार (इम्प्लीडमेंट) की अनुमति दे दी। खरीदारों को पहले प्रतिवादी-विरोधी को 25,000 रुपये लागत के रूप में चुकाने होंगे। अब टाइटल अपील प्रथम अपीलीय न्यायालय के समक्ष आगे बढ़ेगी, जहां खरीदार मामला आगे बढ़ा सकते हैं, परंतु वे मूल वादकारियों के कृत्यों से बाध्य रहेंगे।

मामले की पृष्ठभूमि

खाता संख्या 144, सर्वे प्लॉट संख्या 363 (आंशिक), थाना संख्या 23, मौजा सगुना, दानापुर, पटना, के तहत 8 कठ्ठा 3 धुर भूमि संबंधी स्वामित्व विवाद से एक लंबी न्यायिक कार्यवाही की श्रृंखला उत्पन्न हुई।

वर्ष 2011 में मूल वादकारियों ने उपन्यायाधीश, दानापुर के समक्ष टाइटल सूट संख्या 112/2011 (स्म्ट. सुधा देवी एवं अन्य बनाम श्री जुगेश्वर नाथ श्रीवास्तव) दायर किया। उन्होंने अपने स्वामित्व की घोषणा, लगभग 1.5 कठ्ठा के कथित अतिक्रमण को हटाने तथा वाद भूमि पर एकमात्र प्रतिवादी द्वारा बनाए गए बताए गए मकान/दुकानों के निर्माण को ध्वस्त कराने की मांग की।

प्रतिवादी हाजिर हुआ और लिखित बयान दाखिल कर दावे का विरोध किया तथा वाद की खारिजी की प्रार्थना की। परीक्षण (ट्रायल) के पश्चात, माननीय उपन्यायाधीश ने 03.08.2019 को वादकारियों को सभी राहतें देने से इनकार करते हुए वाद को खारिज कर दिया।

आहत होकर, वादकारियों ने जिला न्यायाधीश, पटना के समक्ष टाइटल अपील संख्या 79/2019 दायर की, जिसे बाद में निस्तारण हेतु अतिरिक्त जिला न्यायाधीश–6, दानापुर के समक्ष रखा गया। यह अपील अभी भी लंबित है।

इसी बीच, स्वयं टाइटल सूट की लंबितावस्था के दौरान ही वादकारियों ने लगभग पूरी वाद भूमि को एक समूह खरीदारों को बेच दिया — जो बाद में पटना उच्च न्यायालय में हस्तक्षेप याचिकाकर्ता बने। 25.07.2011 से 10.07.2012 के बीच इन खरीदारों और उनके निकट संबंधियों के पक्ष में पांच पंजीकृत बिक्री विलेख निष्पादित किए गए।

इन बिक्री के बावजूद, वादकारियों ने न तो इन लेनदेन की जानकारी ट्रायल कोर्ट को दी और न ही खरीदारों को वाद में पक्षकार के रूप में प्रतिरोपित/प्रतिस्थापित कराने के लिए कोई कदम उठाया। यहां तक कि 2019 में प्रथम अपील दायर करते समय भी, उन्होंने इन खरीदारों को अभिलेख पर नहीं लाया।

दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 में, खरीदारों ने अंततः ऑर्डर I रूल 10(2) तथा संहिता दीवानी वाद (CPC) की धारा 151 के अंतर्गत दो हस्तक्षेप याचिकाओं के माध्यम से प्रथम अपीलीय न्यायालय से संपर्क किया और लंबित अपील में स्वयं को सह-अपीलकर्ता के रूप में जोड़े जाने की मांग की। एकमात्र प्रतिवादी ने इन याचिकाओं का विरोध किया। 17.01.2023 को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश–6, दानापुर ने दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।

तत्पश्चात खरीदारों ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल मिसलेनियस संख्या 578/2023 दायर कर 17.01.2023 की उक्त आदेश को चुनौती दी और टाइटल अपील में सह-अपीलकर्ता के रूप में अपने इम्प्लीडमेंट की मांग की।

न्यायालय ने क्या examined किया और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा के माध्यम से मामले को एडमिशन पर सुना और याचिका का अंतिम निस्तारण करने का निर्णय लिया।

हस्तक्षेप याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्होंने टाइटल सूट संख्या 112/2011 की लंबितावस्था के दौरान पंजीकृत बिक्री विलेखों के माध्यम से वादकारियों से वाद भूमि के 8 कठ्ठा 3 धुर का विधिवत क्रय किया। इन विलेखों के आधार पर उनके नाम पर अलग-अलग जमाबंदी खोली गई और उन्होंने बिहार राज्य को किराया (रेंट) अदा किया।

उन्होंने दलील दी कि लंबित वाद के दौरान हस्तांतरित होने वाले (transferees pendente lite) तथा वादकारियों के हित में प्रतिनिधि (representatives-in-interest) के रूप में, उन्होंने वाद संपत्ति पर अधिकार, स्वामित्व, हित और कब्जा प्राप्त कर लिया। अतः वे लंबित अपील में आवश्यक पक्षकार हैं, क्योंकि किसी भी निर्णय से उनके अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

उन्होंने आगे कहा कि यदि उन्हें सह-अपीलकर्ता के रूप में इम्प्लीड नहीं किया गया, तो उन्हें अपूरणीय क्षति होगी। उनका आरोप था कि निचली अपीलीय अदालत ने तुच्छ एवं अस्थिर (unsustainable) आधारों पर उनकी इम्प्लीडमेंट याचिकाओं को खारिज करते हुए वाद भूमि पर उनके हितों की रक्षा करने में विफलता दिखाई। उन्होंने यह भी इंगित किया कि मूल वादकारी बिहार के बाहर रह रहे हैं और अपील लड़ने में उन्हें कठिनाई हो रही है, जिससे खरीदारों की भागीदारी व्यवहारिक रूप से आवश्यक है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी-विरोधी (मूल प्रतिवादी) ने गंभीर आपत्तियां उठाईं। उन्होंने बिक्री लेनदेन का विस्तार से विवरण दिया:

  • 25.07.2011 को, मूल वादकारी संख्या 1 ने एक याचिकाकर्ता (शांति सिंह) को 10 धुर बेचा।
  • 14.09.2011 को, उन्होंने तीन याचिकाकर्ताओं (शांति देवी, सुरेंद्र सिंह और राम बहादुर सिंह) को 3 कठ्ठा 11 धुर 10 धुरकी बेचा, जिससे कुल 4 कठ्ठा 1 धुर 10 धुरकी का हस्तांतरण हुआ।
  • 10.07.2012 को, मूल वादकारी संख्या 2 ने भूमि का एक भाग याचिकाकर्ता संख्या 4 के ससुर को बेचा, तथा अन्य 11 धुर 10 धुरकी याचिकाकर्ता संख्या 2, 3 एवं 4 को बेची।
  • उन्होंने याचिकाकर्ता संख्या 6 को तथा याचिकाकर्ता संख्या 5 एवं याचिकाकर्ता संख्या 4 के एक अन्य पुत्र को 1 कठ्ठा 10 धुर भी बेचा, जिससे उनके द्वारा कुल विक्रय 3 कठ्ठा 11 धुर 10 धुरकी हुआ।

प्रतिवादी के अनुसार, वादकारियों ने 8 कठ्ठा 3 धुर में से 7 कठ्ठा 13 धुर बेच दिए, और केवल लगभग 10 धुर बचा। फिर भी टाइटल सूट संख्या 112/2011 में अपनी वाद-पत्र (प्लेंट) में उन्होंने 1.5 कठ्ठा पर अतिक्रमण का दावा किया और बिक्री के संबंध में मौन रहे।

प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि वादकारी, उनके वैधानिक वारिस और मुख्य खरीदार–याचिकाकर्ता (जो वादकारियों का सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी धारक भी था) ने जानबूझकर बिक्री विलेखों को ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत से छिपाया। यह, उनके अनुसार, छल (फ्रॉड) और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान है। उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी धारक, जंग बहादुर सिंह, वाद को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहे थे, कई तिथियों पर गवाह के रूप में गवाही दे रहे थे, फिर भी उन्होंने अपने या अपने परिवार के खरीद लेनदेन को कभी उजागर नहीं किया।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि:

  • ये बिक्री संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 52 (lis pendens का सिद्धांत) का उल्लंघन हैं क्योंकि न्यायालय से कोई अनुमति नहीं ली गई।
  • खरीदार, जो पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के निकट संबंधी हैं, प्रारंभ से ही मुकदमे की जानकारी रखते थे।
  • दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 में दायर इम्प्लीडमेंट याचिकाएं, पहली बिक्री के लगभग 11 वर्ष बाद दायर की गईं, जो अत्यधिक विलंबित हैं और सीमाबंधन अधिनियम की अनुच्छेद 137 के तहत बाधित हैं।
  • लंबित वाद के दौरान के हस्तांतरित (transferees pendente lite) होने के नाते, वे आवश्यक पक्षकार नहीं हैं; वादकारी स्वयं उनके किसी भी संभावित हित का पर्याप्त प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

प्रतिवादी ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें Chennai Metropolitan Water Supply & Sewerage Board v. T.T. Murali Babu (AIR 2014 SC 1141) शामिल है, जिसमें विलंब एवं लाचेस के सिद्धांत को और उनके अन्य के अधिकारों पर प्रभाव को रेखांकित किया गया, तथा पटना उच्च न्यायालय के सेकंड अपील संख्या 73/2021 के निर्णय पर भी, जिसमें पूर्व ज्ञान रखने वाले हस्तक्षेपकर्ताओं की विलंबित इम्प्लीडमेंट याचिका को अस्वीकृत किया गया था।

जवाब में, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जहां हित का उत्तराधिकार (devolution of interest) हो, वहां पक्षकारों को जोड़ने के लिए कोई कठोर सीमाबंधन नहीं है। उन्होंने CPC के ऑर्डर XXII रूल 10 का हवाला दिया, जो वाद की लंबितावस्था के दौरान हित के असाइनमेंट या उत्तराधिकार से संबंधित है, और सर्वोच्च न्यायालय के Devendra Kumar Sarewgee & Ors. v. Purbanchal Estates (P) Ltd. & Ors. (2006) 9 SCC 199 तथा Mumbai International Airport Pvt. Ltd. v. Regency Convention Centre & Hotels Pvt. Ltd. (2010) 7 SCC 417 के निर्णयों का उल्लेख किया।

उन्होंने यह भी दोहराया कि टाइटल सूट में कोई निषेधाज्ञा (injunction) नहीं थी, इसलिए वादकारी संपत्ति बेचने से निषिद्ध नहीं थे। उनका कहना था कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के अलावा अन्य याचिकाकर्ताओं को स्वतः मुकदमे की जानकारी वाला नहीं माना जा सकता और प्रतिवादी ने यह नहीं दिखाया कि उनके इम्प्लीडमेंट से उसके अधिकारों को कैसे क्षति पहुँचेगी।

इसके बाद पटना उच्च न्यायालय ने मुख्य कानूनी प्रश्न पर विचार किया: क्या याचिकाकर्ता लंबित टाइटल अपील में उचित (proper) एवं आवश्यक (necessary) पक्षकार हैं, और क्या अपीलीय अदालत उन्हें CPC के ऑर्डर I रूल 10(2) के अंतर्गत जोड़ सकती है?

न्यायालय ने ऑर्डर I रूल 10(2) को उद्धृत करते हुए रेखांकित किया कि न्यायालय किसी भी अवस्था में उन पक्षकारों को हटाने या जोड़ने का आदेश दे सकता है, जिनकी उपस्थिति वाद में उठे समस्त प्रश्नों का प्रभावी और पूर्ण रूप से निपटारा करने के लिए आवश्यक हो। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि अपील वाद की निरंतरता है। इसने सीमाबंधन अधिनियम की अनुच्छेद 137 और सर्वोच्च न्यायालय के Kerala State Electricity Board, Trivandrum v. T.P. Kunhaliumma (AIR 1977 SC 282) के निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें माना गया कि अनुच्छेद 137 CPC और अन्य अधिनियमों के अंतर्गत दायर आवेदनों पर लागू होता है।

उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के आचरण की समीक्षा की, विशेष रूप से याचिकाकर्ता संख्या 4, जो सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी धारक है। न्यायालय ने पाया:

  • याचिकाकर्ता संख्या 4 मूल वादकारियों का सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी धारक था और उनकी ओर से टाइटल सूट का संचालन कर रहा था।
  • वाद की लंबितावस्था के दौरान, वादकारियों ने लगभग पूरी वाद भूमि याचिकाकर्ताओं को बेच दी।
  • इसके बावजूद, याचिकाकर्ता संख्या 4 ने अपने तथा अपने परिवार के सदस्यों की खरीद को उजागर नहीं किया और पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के रूप में कार्य जारी रखा।
  • अन्य याचिकाकर्ता उसकी पत्नी, पुत्र, पुत्री तथा भाई हैं, अतः वे बिना सूचना के bona fide खरीददार होने का दावा नहीं कर सकते।

न्यायालय ने प्रथम अपीलीय अदालत से सहमति व्यक्त की कि याचिकाकर्ताओं का आचरण निंदनीय है और वे लंबित वाद की जानकारी से रहित निर्दोष (innocent) खरीदार नहीं हैं। न्यायालय ने माना कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के रूप में याचिकाकर्ता संख्या 4 के कृत्य बाद के खरीदारों पर बाध्यकारी होंगे और वे कार्यवाही से अनभिज्ञता का बहाना नहीं कर सकते।

हालांकि, न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक वास्तविकता को भी स्वीकार किया: याचिकाकर्ताओं ने लगभग पूरी वाद संपत्ति खरीद ली, जिससे मूल वादकारियों के पास केवल लगभग 10 धुर बचा। अपनी संपूर्ण रुचि बेच डालने के बाद वादकारी के पास अपील को गंभीरता से आगे बढ़ाने की न तो कोई विशेष प्रेरणा बची और न ही व्यावहारिक सुविधा, विशेष रूप से जब यह कहा गया कि वे बिहार के बाहर निवास कर रहे हैं।

न्यायालय ने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को प्रथम अपील में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाती, तो संपत्ति पर उनके अधिकार गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। जबकि ऑर्डर I रूल 10(2) गैर-पक्षकार को इम्प्लीड होने का स्वतः अधिकार नहीं देता, यह न्यायालय को ऐसे पक्षकार को जोड़ने का विवेकाधिकार देता है, जिसकी उपस्थिति प्रभावी निर्णय के लिए आवश्यक हो।

न्यायालय ने जोर दिया कि pendente lite खरीदार के रूप में याचिकाकर्ता अपने विक्रेताओं से अधिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते और वे lis pendens के सिद्धांत से बाध्य हैं। वाद में पारित डिक्री उन सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी होगी, जो वाद पक्षकारों के माध्यम से दावा करते हैं या वाद की लंबितावस्था के दौरान उनसे शीर्षक प्राप्त करते हैं।

इन सभी कारकों में संतुलन स्थापित करते हुए न्यायालय ने माना कि, यद्यपि याचिकाकर्ताओं का आचरण निंदनीय है और उन्हें मुकदमे की जानकारी थी, फिर भी विवादित संपत्ति में उनका महत्वपूर्ण हित है और अपील के परिणाम का उनके अधिकारों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने की संभावना है। इसलिए, उनके हितों की रक्षा हेतु उन्हें सह-अपीलकर्ता के रूप में इम्प्लीड किया जाना चाहिए।

साथ ही, न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि यह लाभ कड़े शर्तों के साथ ही दिया जा सकता है। Kasturi v. Iyyamperumal & Ors. (2005) 6 SCC 733 तथा Mumbai International Airport Pvt. Ltd. v. Regency Convention Centre & Hotels Pvt. Ltd. (2010) 7 SCC 417 पर पुनः भरोसा करते हुए, न्यायालय ने माना कि उनका इम्प्लीडमेंट निम्न शर्तों पर होगा:

  • प्रथम अपीलीय न्यायालय के समक्ष पहली सुनवाई की तिथि पर प्रतिवादी संख्या 1 को 25,000 रुपये की भारी लागत का भुगतान; और
  • यह शर्त कि वे किसी भी प्रकार से अपील के निस्तारण में बाधा नहीं डालेंगे।

इस प्रकार पटना उच्च न्यायालय ने 06.12.2022 और 06.01.2023 दिनांकित दोनों हस्तक्षेप याचिकाओं को स्वीकृत किया, निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को टाइटल अपील संख्या 79/2019 में सह-अपीलकर्ता के रूप में इम्प्लीड किया जाए, और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश–6, दानापुर के 17.01.2023 के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया।

न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि प्रथम अपीलीय न्यायालय, उच्च न्यायालय के निर्णय की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने से तीन माह के भीतर टाइटल अपील के निस्तारण के लिए हर संभव प्रयास करेगा।

महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि pendente lite खरीदारों के रूप में याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट के समक्ष मूल वादकारियों के कृत्यों से बाध्य हैं और वे उन कृत्यों को अपील में चुनौती नहीं दे सकते। उनका इम्प्लीडमेंट केवल पहले से दायर अपील को आगे बढ़ाने के लिए है, न कि सूट के संचालन को पुनः खोलने के लिए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो ऐसी भूमि खरीदते हैं, जिस पर पहले से न्यायालय में वाद लंबित हो।

पहला, यह पुष्टि करता है कि ऐसे खरीदार, भले ही वे lis pendens के सिद्धांत के तहत परिणाम से बाध्य हों, यदि उन्होंने विवादित संपत्ति का अधिकांश भाग खरीद लिया हो और अपील के परिणाम से उनके अधिकार सीधे प्रभावित होने वाले हों, तो उन्हें अपील में पक्षकार के रूप में जोड़ा जा सकता है। न्यायालय ने यह वास्तविकता देखी कि मूल मालिकों ने लगभग पूरी भूमि बेच दी थी और संभव है कि वे मुकदमा गंभीरता से न लड़ें।

दूसरा, न्यायालय ने न्यायिक कार्यवाही में ईमानदारी के महत्व पर कड़ा संदेश दिया। इसने पावर ऑफ अटॉर्नी धारक और खरीदारों द्वारा बिक्री विलेखों को छिपाने और वाद को पुराने नामों से जारी रखने के आचरण की खुलकर आलोचना की। हालांकि अंततः उसने इम्प्लीडमेंट की अनुमति दी, किंतु यह तभी किया जब लागत लगाई और यह स्पष्ट कर दिया कि वे ट्रायल में मूल वादकारियों द्वारा किए गए कार्यों को उलट नहीं सकते।

तीसरा, साधारण भूमि खरीदारों, विशेषकर बिहार के लिए, यह निर्णय यह दर्शाता है कि:

  • लंबित मुकदमे के दौरान भूमि खरीदना जोखिम भरा है; आप विक्रेता की ही स्थिति में आ जाते हैं और परिणाम से पूरी तरह बाध्य रहते हैं।
  • यदि आप ऐसी भूमि खरीदते हैं, तो आपको तुरंत न्यायालय को सूचित कर पक्षकार के रूप में जोड़े जाने का आग्रह करना चाहिए; कई वर्षों की देरी गंभीर आलोचना और लागत आमंत्रित कर सकती है।
  • कभी-कभी, भारी देरी के बावजूद, यदि अन्यथा आपके अधिकार गंभीर रूप से प्रभावित होंगे तो न्यायालय आपकी भागीदारी की अनुमति दे सकता है, परंतु यह कड़े शर्तों के साथ होगा।

वकीलों और न्यायालयों के लिए, यह निर्णय दो चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है — एक ओर धोखाधड़ी और महत्वपूर्ण तथ्यों के दमन को हतोत्साहित करना, और दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना कि जिनके पास अब वास्तव में संपत्ति में हित है उन्हें अंतिम डिक्री से पहले सुना जा सके।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या लगभग पूरी वाद संपत्ति के pendente lite खरीदार, न्यायालय से संपर्क करने में देरी और मुकदमे की जानकारी होने के बावजूद, लंबित टाइटल अपील में सह‑अपीलकर्ता के रूप में इम्प्लीड किए जा सकते हैं?
    उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि संपत्ति में उनके महत्वपूर्ण हित और अपील के परिणाम का उनके अधिकारों पर संभावित प्रभाव देखते हुए, उन्हें CPC के ऑर्डर I रूल 10(2) के तहत सह-अपीलकर्ता के रूप में जोड़ा जाना चाहिए, बशर्ते वे लागत का भुगतान करें और अपील में देरी न करें तथा मूल वादकारियों के कृत्यों से बाध्य रहें।
  • प्रश्न: क्या pendente lite हस्तांतरित होने से खरीदार को उस मुकदमे में मूल वादकारी से कोई उच्चतर अधिकार मिलता है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने दोहराया कि ऐसे खरीदार अपने विक्रेताओं से अधिक कोई विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते। वे lis pendens के सिद्धांत और ट्रायल कोर्ट के समक्ष मूल वादकारियों के समस्त कृत्यों से पूर्णत: बाध्य हैं, जिन्हें वे अपील में चुनौती नहीं दे सकते।
  • प्रश्न: जब प्रस्तावित पक्षकारों का आचरण निंदनीय हो और उनके द्वारा काफी विलंब हो, तो न्यायालय को CPC के ऑर्डर I रूल 10(2) के अंतर्गत अपने विवेक का प्रयोग कैसे करना चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने माना कि आचरण और विलंब प्रासंगिक हैं और इन पर लागत लग सकती है, परंतु प्राथमिक विचार यह है कि क्या उनकी उपस्थिति प्रभावी एवं पूर्ण निर्णय और उनके वास्तविक (substantive) अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। यहां न्यायालय ने इम्प्लीडमेंट की अनुमति दी, किंतु भारी लागत और कड़ी शर्तों के साथ।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Yashoda v. Sukhwinder Singh and Others, Civil Appeal No. 8247 of 2009 (Supreme Court) – छल एवं महत्वपूर्ण तथ्यों के दमन के प्रभाव पर उद्धृत।
  • Chennai Metropolitan Water Supply & Sewerage Board and Others v. T.T. Murali Babu, AIR 2014 SC 1141 – विलंब, लाचेस और उनके अन्य के अधिकारों पर प्रभाव के संबंध में उद्धृत।
  • Kerala State Electricity Board, Trivandrum v. T.P. Kunhaliumma, AIR 1977 SC 282 – CPC और अन्य अधिनियमों के अंतर्गत दायर आवेदनों पर सीमाबंधन अधिनियम की अनुच्छेद 137 की प्रयोज्यता पर उद्धृत।
  • Devendra Kumar Sarewgee and Others v. Purbanchal Estates (P) Ltd. and Others, (2006) 9 SCC 199 – हित के उत्तराधिकार (devolution of interest) के संबंध में याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत।
  • Mumbai International Airport Pvt. Ltd. v. Regency Convention Centre & Hotels Pvt. Ltd. and Others, (2010) 7 SCC 417 – ऑर्डर I रूल 10 CPC के क्षेत्र (scope) पर उद्धृत और भरोसा किया गया।
  • Kasturi v. Iyyamperumal and Others, (2005) 6 SCC 733 – सिविल वाद में आवश्यक और उचित पक्षकारों के संबंध में भरोसा किया गया।
  • पटना उच्च न्यायालय का सेकंड अपील संख्या 73/2021 में निर्णय – पूर्व ज्ञान रखने वाले हस्तक्षेपकर्ताओं की विलंबित इम्प्लीडमेंट याचिका पर संदर्भित (विवरण इस निर्णय में नहीं दिए गए हैं)।

मामले का विवरण

केस नंबर: Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 578 of 2023 (Patna High Court)

केस शीर्षक: Shanti Singh & Ors. v. Jugeshwar Nath Srivastava & Ors.

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Arun Kumar Jha

प्रतिवेदन: 2024 (1) PLJR 493

वकील:
याचिकाकर्ताओं (हस्तक्षेपकर्ताओं) की ओर से: Mr. Shashi Nath Jha, Advocate; Mr. Sunny Kumar, Advocate.
प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Amit Shrivastava, Senior Advocate; Mr. Girish Pandey, Advocate.

मामले का प्रकार: अनुच्छेद 227 / पर्यवेक्षी अधिकारिता (civil miscellaneous jurisdiction) के अंतर्गत सिविल मिसलेनियस याचिका, जिसमें प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा लंबित टाइटल अपील में हस्तक्षेप/इम्प्लीडमेंट याचिकाओं को खारिज करने वाले आदेश को चुनौती दी गई।

अपहृत आदेश: 17.01.2023 का आदेश, जो अतिरिक्त जिला न्यायाधीश–6, दानापुर, पटना द्वारा टाइटल अपील संख्या 79/2019 में पारित किया गया।

पटना उच्च न्यायालय में अंतिम परिणाम: Civil Miscellaneous No. 578 of 2023 स्वीकृत; अपहृत आदेश आंशिक रूप से निरस्त; याचिकाकर्ताओं को टाइटल अपील संख्या 79/2019 में सह-अपीलकर्ता के रूप में इम्प्लीड करने का निर्देश, बशर्ते वे 25,000 रुपये लागत के रूप में अदा करें; अपीलीय अदालत को तीन माह के भीतर अपील निपटाने का निर्देश; याचिकाकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट के समक्ष मूल वादकारियों के कृत्यों से बाध्य माना गया।


यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि
बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप आगे की जानकारियों के लिए Samvida Law Associates को फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News