मामले की पृष्ठभूमि
मामला तीन वर्ष के लड़के ज्योति कुमार के गायब होने से शुरू हुआ, जो ग्राम नरहंदीह, थाना सिकरौल, जिला बक्सर का निवासी था।
अभियोजन के अनुसार, 27.03.2013 को लगभग दोपहर 2.00 बजे बच्चा अपने घर के पास खेलने गया और वापस नहीं लौटा। उसके पिता मंगल चौधरी और अन्य ग्रामीणों ने उसी दिन और अगले दिन उसकी खोज की, जिसमें गांव के पोखर और आसपास के स्थानों में खोज शामिल थी, परंतु बच्चा नहीं मिला। पहले दो दिनों में पुलिस को कोई सूचना नहीं दी गई।
सूचनाकर्ता और एक पड़ोसी तुन्ना चौधरी तथा उसके परिवार के बीच पहले से पुराना विवाद था। इसी दुश्मनी के कारण गांव में संदेह तुन्ना और उसके रिश्तेदारों की ओर मुड़ गया।
29.03.2013 को, मंगल चौधरी के फर्दबयान के अनुसार, ग्रामीणों ने तुन्ना को बुलाया और उससे पूछताछ की। कुछ ग्रामीणों ने कथित रूप से उसकी पिटाई भी की। कहा गया कि इस दबाव में उसने बताया कि बच्चे की हत्या कर दी गई है और लाश ग्रामवासी हीरालाल चौधरी के बांस के बेढ़ में छिपाई गई है।
ग्रामीण बांस के बेढ़ में गए और फर्दबयान के अनुसार, वहां बच्चे की मृत देह पाई। आगे यह भी आरोप लगाया गया कि जब शव मिला तो तुन्ना का पिता, बाबन चौधरी, भागने लगा परंतु ग्रामीणों ने उसे पकड़ कर पीटा। कहा गया कि तुन्ना की पत्नी पहले ही भाग चुकी थी। इस बीच सिकरौल थाना की पुलिस पहुंची, घायल अभियुक्तों को अपनी अभिरक्षा में लिया और शव को ज़ब्त कर लिया।
29.03.2013 को 17:15 बजे गांव नरहंदीह में एस.आई. रविकांत (पी.डब्ल्यू. 6) द्वारा दर्ज किए गए फर्दबयान के आधार पर सिकरौल थाना कांड संख्या 18/2013 भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 201 और 34 के तहत पंजीकृत किया गया।
जांच अधिकारी ने प्रारंभ में दो अभियुक्तों, तुन्ना चौधरी और बाबन चौधरी, के विरुद्ध आरोपपत्र दायर किया। हालांकि, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, बक्सर ने तीन व्यक्तियों – तुन्ना, बाबन और सुनीता देवी (तुन्ना की पत्नी) – के विरुद्ध संज्ञान लिया और 25.11.2013 को मामला सत्र न्यायालय के लिए प्रतिबद्ध कर दिया।
06.01.2014 को इन तीन मूल अभियुक्तों के विरुद्ध धारा 302/34 और 201 भादसं के तहत आरोप तय किए गए और सत्र वाद शुरू हुआ। अभियोजन ने अपने साक्षियों का परीक्षण आरंभ किया।
चार साक्षियों के परीक्षण के बाद अभियोजन ने 10.04.2015 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत एक परिवाद दायर कर तीन और व्यक्तियों – राजेंद्र चौधरी, अशोक चौधरी और सुकारी देवी – को अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में तलब करने का अनुरोध किया। परिवाद स्वीकार कर लिया गया, 04.01.2016 को उनके विरुद्ध आरोप तय किए गए और देनोवो ट्रायल का आदेश दिया गया। सभी छह अभियुक्तों के विरुद्ध साक्ष्य को पुनः एक साथ दर्ज किया गया।
18.11.2017 के निर्णय एवं आदेश से सत्र वाद संख्या 388/2013 में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश VI, बक्सर ने:
- तुन्ना चौधरी और बाबन चौधरी को धारा 302 भादसं तथा धारा 201 भादसं के तहत; और
- सभी छह अभियुक्तों को धारा 201 भादसं के तहत दोषी ठहराया।
24.11.2017 को, सत्र न्यायालय ने तुन्ना और बाबन को धारा 302 भादसं के तहत आजीवन कारावास एवं प्रत्येक को ₹25,000 जुर्माना, तथा धारा 201 भादसं के तहत सात वर्ष का कठोर कारावास एवं प्रत्येक को ₹5,000 जुर्माना दिया, दोनों सजाओं को साथ-साथ चलने का निर्देश दिया गया। अन्य अभियुक्तों को धारा 201 भादसं के तहत विभिन्न अवधियों की कारावास की सज़ा दी गई।
आहत होकर, तुन्ना और बाबन ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील (डीबी) संख्या 108/2018 दायर की, तथा सुकारी देवी, सुनीता देवी, राजेंद्र चौधरी और अशोक चौधरी ने आपराधिक अपील (डीबी) संख्या 11/2018 दायर की। दोनों अपीलों की एक साथ सुनवाई की गई और 08.12.2023 को द्वैध पीठ द्वारा समान निर्णय के माध्यम से निपटारा किया गया।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या तय किया
पटना उच्च न्यायालय ने पूरे अभिलेख – गवाहों की गवाही, कागजात, चिकित्सकीय साक्ष्य और सत्र न्यायालय के तर्क – का सावधानी से पुनर्मूल्यांकन किया।
न्यायालय ने पहले यह नोट किया कि बच्चे की वास्तविक हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था, विशेषकर कुछ अभियुक्तों के कथित अतिरिक्त-न्यायिक इकबालिया बयान और मृत देह की बरामदगी पर।
न्यायालय ने प्रमुख अभियोजन साक्षियों का सार प्रस्तुत किया।
पी.डब्ल्यू. 1, मंगल चौधरी (सूचनाकर्ता और मृतक का पिता), ने कहा कि 27.03.2013 को उसका पुत्र गांव के चंवर पर खेल रहा था, जब वह गायब हो गया। खोज के दौरान तुन्ना ने उसे बताया कि किसी ने बच्चे को साइकिल से पश्चिम दिशा की ओर ले गया है। उस रात लगभग 8.00 बजे तुन्ना, बाबन, राजेंद्र और अशोक सूचनाकर्ता के घर आए और बच्चे की खोज में लग जाने की बात कही।
पी.डब्ल्यू. 1 के अनुसार, 28.03.2013 को गांव में एक पंचायत हुई जिसमें इन अभियुक्तों को बुलाया गया, परंतु राजेंद्र और अशोक नहीं आए। कथित रूप से तुन्ना और बाबन ने आश्वासन दिया कि वे शाम तक बच्चे को ला देंगे, लेकिन वे विफल रहे। 29.03.2013 को दूसरी पंचायत हुई, जहां, पी.डब्ल्यू. 1 के अनुसार, तुन्ना और बाबन ने स्वीकार किया कि सभी छह अभियुक्तों ने मिलकर बच्चे की हत्या की है।
पी.डब्ल्यू. 1 ने आगे कहा कि जब पुलिस पहुंची तो तुन्ना और बाबन भागने लगे, लेकिन पकड़ लिए गए। तब उन्होंने पुलिस से कहा कि मृत देह अशोक चौधरी के घर रखे धान के चूरे में छुपाई गई है। पुलिस उन्हें साथ लेकर वहां गई और वहां खून तो मिला पर शव नहीं मिला। फिर, उसके अनुसार, अभियुक्तों ने कहा कि सुकारी देवी ने शायद लाश छिपा दी हो। कथित रूप से सुकारी ने खुलासा किया कि लाश हीरालाल चौधरी के बांस के बेढ़ में छुपाई गई है, जहां से पुलिस ने उसे बरामद किया।
जिरह में पी.डब्ल्यू. 1 ने लम्बे समय से चली आ रही दुश्मनी स्वीकार की: 2009 से उसका तुन्ना और बाबन से विवाद था क्योंकि उसके अनुसार, उन्होंने कभी उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया था। तब कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया, क्योंकि मामला सुलझा लिया गया था और उसकी पत्नी 12 घंटे के भीतर मिल गई थी।
उच्च न्यायालय ने नोट किया कि पी.डब्ल्यू. 1 ने अपनी गवाही में कहा कि उसने अपने फर्दबयान में ही अशोक, राजेंद्र और सुकारी के नाम भी लिए थे, और यह सुझाव नकार दिया कि उसने प्रारंभ में उन्हें छोड़ दिया था। न्यायालय ने बाद में जांच अधिकारी की गवाही से इसकी तुलना कर सुसंगति परखी।
पी.डब्ल्यू. 2, दिनेश सिंह, ने बयान दिया कि उसे बच्चे के गायब होने की जानकारी मिली और वह खोज में शामिल हुआ। उसने कहा कि 28.03.2013 को संदेह तुन्ना पर गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। 29.03.2013 को, जब थाना प्रभारी आए, तुन्ना ने कहा कि उसकी मां को घटना की जानकारी है और पूछने पर सुकारी ने बताया कि मृत देह बांस के बेढ़ में है, जहां से उसे बरामद किया गया।
जिरह में पी.डब्ल्यू. 2 ने माना कि पुलिस ने उसका बयान दर्ज नहीं किया था और कोई पंचायत संबंधी कागज़ (पंचायती पेपर) तैयार नहीं किया गया।
पी.डब्ल्यू. 3, विजय चौधरी, ने कहा कि तुन्ना और बाबन ने ग्रामीणों को बताया था कि बच्चे की हत्या कर दी गई है और जब पुलिस आई तो तुन्ना ने कहा कि उसकी मां बताएगी कि लाश कहां है। कथित रूप से तब सुकारी ने उस बांस के बेढ़ की ओर इशारा किया, जहां से मृत देह बरामद हुई। उसने यह भी बताया कि घटना के 20‑25 दिन बाद कृष्ण यादव द्वारा एक पंचनामा (प्रदर्श 2) तैयार किया गया था।
पी.डब्ल्यू. 4, मनोज चौधरी, शत्रुतापूर्ण हो गया। उसने कहा कि पुलिस ने उसका बयान नहीं लिया और उसे यह नहीं पता कि ज्योति की मौत कैसे हुई।
पी.डब्ल्यू. 5, डॉ. राम कुमार गुप्ता, ने 30.03.2013 को पोस्टमार्टम किया। उन्होंने राय दी कि मृत्यु का कारण गला घोंटने से उत्पन्न श्वासावरोध (एस्फिक्सिया) था, और मृत्यु के पश्चात समय 6 से 24 घंटे के बीच था। बचाव पक्ष ने मृत्यु के कारण पर विवाद नहीं किया।
पी.डब्ल्यू. 6, एस.आई. रवि कांत, जांच अधिकारी, ने कहा कि 29.03.2013 को उसने यह अफवाह सुनी कि एक बच्चे की हत्या कर दी गई है और उसकी लाश ग्राम नरहंदीह में फेंक दी गई है। वह सशस्त्र बल लेकर वहां पहुंचा और हीरालाल चौधरी के बांस के बेढ़ से एक बच्चे की मृत देह बरामद की। उसने पी.डब्ल्यू. 1 का फर्दबयान दर्ज किया, पंचनामा (इनक्वेस्ट रिपोर्ट) तैयार की और जांच अपने हाथ में ली।
उसने गवाही दी कि जांच के दौरान उसने कई ग्रामीणों के बयान दर्ज किए और घटना को सही पाते हुए केवल बाबन और तुन्ना के विरुद्ध धारा 302 और 201/34 भादसं के तहत आरोपपत्र दायर किया। जिरह में उसने स्पष्ट कहा कि फर्दबयान में केवल तीन नाम थे – तुन्ना, बाबन और तुन्ना की पत्नी। उसकी केस डायरी में भी केवल इन्हीं तीन के नाम दर्ज थे; किसी अन्य अभियुक्त का नाम नहीं था।
इस साक्ष्य से उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले।
पहला, अभियोजन का मामला पूर्णत: परिस्थितिजन्य था। पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Ramanand @ Nandlal Bharti v. State of Uttar Pradesh (2022 SCC OnLine SC 1396) का हवाला दिया, जिसमें प्रतिपादित है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मुकदमे में सभी परिस्थितियां दृढ़ रूप से सिद्ध होनी चाहिए, वे केवल अभियुक्त के दोष की ओर संकेत करें, और ऐसा पूर्ण शृंखला बनाएं जिसमें कोई युक्तिसंगत संदेह या वैकल्पिक परिकल्पना न बचे।
न्यायालय ने Sarwan Singh Rattan Singh v. State of Punjab (AIR 1957 SC 637) का भी उद्धरण दिया, जिसमें यह रेखांकित किया गया है कि “हो सकता है सच हो” और “जरूर सच है” के बीच लम्बी दूरी है, जिसे अभियुक्त को दोषसिद्ध करने से पहले विश्वसनीय साक्ष्य द्वारा पाटा जाना आवश्यक है।
दूसरा, उद्देश्य (मोटिव) के संदर्भ में, द्वैध पीठ ने Inderjit Das v. State of Bihar (2023 LiveLaw (SC) 152), Kuna @ Sanjaya Behera v. State of Odisha (2018) 1 SCC 296 तथा Ranganayaki v. State (2004) 12 SCC 521 का हवाला दिया। न्यायालय ने माना कि विशेष रूप से परिस्थितिजन्य मामलों में उद्देश्य एक महत्वपूर्ण कड़ी होता है। यहां, पूर्व के झगड़ों और सूचनाकर्ता की पत्नी के पुराने अपहरण के आरोप के अतिरिक्त, अभियुक्तों द्वारा तीन वर्ष के बच्चे की हत्या करने का कोई स्पष्ट उद्देश्य सामने नहीं आया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि पुरानी दुश्मनी, अभियुक्तों को झूठा फंसाने का कारण भी समान रूप से हो सकती है।
तीसरा, धारा 34 भादसं के तहत साझा उद्देश्य (कॉमन इंटेंशन) पर, न्यायालय को ऐसा कोई भरोसेमंद सामग्री नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि सभी अभियुक्तों के बीच कोई साझा योजना थी या उन्होंने अपराध में सहभागिता की। साझा उद्देश्य और सहभागिता का स्पष्ट साक्ष्य न होने पर धारा 34 की सहायता से दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं मानी जा सकती।
चौथा, कथित अतिरिक्त‑न्यायिक इकबालिया बयान की गहन जांच की गई। न्यायालय ने न्यायिक एवं अतिरिक्त‑न्यायिक इकबालिया बयानों से संबंधित विधि की व्याख्या की, और पुनः Ramanand @ Nandlal Bharti का हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अतिरिक्त‑न्यायिक इकबालिया बयान कमजोर साक्ष्य है, जिसे तभी स्वीकार किया जा सकता है जब वह स्वैच्छिक, विश्वसनीय और पुष्ट (कॉर्रोबोरेटेड) हो।
यहां परिस्थितियां चिंताजनक थीं। स्वयं पी.डब्ल्यू. 1 के संस्करण के अनुसार ग्रामीणों ने पंचायत से पहले तुन्ना और बाबन की पिटाई की थी, जिसके बाद ही उन्होंने कथित रूप से स्वीकारोक्ति की। वहां मौजूद लोगों की संख्या, अभियुक्तों पर डाला गया दबाव और गवाहों के बीच अंतरविरोध, स्वैच्छिकता पर गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त, जांच अधिकारी ने कहा कि उसके समक्ष अपीलार्थियों ने कोई इकबालिया बयान नहीं दिया।
पांचवां, कथित इकबालिया बयानों और शव की बरामदगी के बीच संबंध अस्पष्ट था। पी.डब्ल्यू. 1 के अनुसार, तुन्ना और बाबन ने पहले कहा कि लाश अशोक के घर धान के चूरे में रखी गई है, पर वहां शव नहीं मिला। जबकि जांच अधिकारी की गवाही थी कि वह 29.03.2013 को जब गांव पहुंचा तो मृत देह पहले से ही हीरालाल चौधरी के बांस के बेढ़ में पड़ी थी। उसने यह बात समर्थन नहीं की कि सुकारी के खुलासे से शव बरामद हुआ।
न्यायालय ने इन विरोधाभासों पर प्रकाश डाला: यदि जांच अधिकारी के गांव पहुंचने तक लाश पहले से बांस के बेढ़ में थी, तो यह दावा कि वह पहले धान के चूरे में थी और बाद में हटाई गई, असिद्ध रह गया। इसके अतिरिक्त, अशोक के घर से खून से सना धान का चूरा या मिट्टी ज़ब्त नहीं की गई।
इसी कारण पीठ ने माना कि सुकारी द्वारा कथित खुलासा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत “खोजा गया तथ्य” की श्रेणी में नहीं आता। अभियोजन यह स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं कर पाया कि अभियुक्तों ने पुलिस अभिरक्षा में वास्तव में क्या कहा और उस कथन से कोई नया तथा प्रासंगिक तथ्य कैसे खोजा गया।
छठा, न्यायालय ने पंचनामा (प्रदर्श 2) का परीक्षण किया, जिस पर सत्र न्यायालय ने भरोसा किया था। पी.डब्ल्यू. 3 ने कहा कि यह घटना के 20‑25 दिन बाद कृष्ण यादव द्वारा तैयार किया गया था, जिन्हें साक्ष्य के रूप में बुलाया ही नहीं गया। पी.डब्ल्यू. 2 ने तो यह भी स्वीकार किया कि कोई पंचायती पेपर तैयार नहीं हुआ था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचनामा स्वयं में स्वतंत्र (सबस्टेंटिव) साक्ष्य नहीं है; यह अधिकतम उचित रूप से सिद्ध होने पर मौखिक साक्ष्य की पुष्टि कर सकता है। यहां इसकी सामग्री को कथित इकबालिया बयानों या अभियुक्तों की संलिप्तता के प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता।
सातवां, न्यायालय ने पाया कि सत्र न्यायालय द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अभियुक्तों से किया गया बयान अत्यंत सतही था। पूछे गए प्रश्न सामान्य और समष्टि रूप (ओम्निबस) के थे, जिनमें प्रत्येक अभियुक्त के विरुद्ध विशिष्ट दोषसिद्ध परिस्थितियों का उल्लेख नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Jai Prakash Tiwary v. State of Madhya Pradesh (2022 SCC OnLine SC 966) पर भरोसा करते हुए पीठ ने माना कि इससे अभियुक्तों को उनके विरुद्ध परिस्थितियों का समुचित उत्तर देने का उचित अवसर नहीं मिला।
सभी सामग्रियों से गुजरने के बाद उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि:
- परिस्थितिजन्य साक्ष्य की मूल कड़ियां – उद्देश्य, अंतिम बार साथ देखा जाना, बरामदगी, विश्वसनीय स्वीकारोक्ति – या तो अनुपस्थित थीं या गंभीर संदेह के घेरे में थीं।
- सूचनाकर्ता की गवाही में महत्वपूर्ण सुधार और असंगतियां थीं, विशेषकर इस संबंध में कि किसने क्या खुलासा किया और शव कहां से मिला।
- जांच प्रारंभ में केवल दो अभियुक्तों के विरुद्ध ही आगे बढ़ी, और बाद में पूरे परिवार को फंसाने का प्रयास मुकदमे के दौरान किए गए सुधारित बयानों पर आधारित प्रतीत हुआ।
ऐसी स्थिति में न्यायालय ने माना कि दोषसिद्धि को बरकरार रखना असुरक्षित होगा। आपराधिक कानून केवल संदेह, चाहे वह कितना भी प्रबल हो, के आधार पर, बिना स्पष्ट, ठोस और निर्णायक साक्ष्य के दोषसिद्धि की अनुमति नहीं देता।
अत: संदेह का लाभ देते हुए द्वैध पीठ ने दोनों अपीलों को स्वीकार किया, 18.11.2017 और 24.11.2017 की दोषसिद्धि एवं सज़ा आदेश को निरस्त कर दिया, और सभी छह अपीलार्थियों को धारा 302 तथा 201/34 भादसं के आरोपों से बरी कर दिया। अभिरक्षा में रहे तुन्ना चौधरी को यदि किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो तत्काल रिहा करने का आदेश दिया गया। अन्य अभियुक्त, जो ज़मानत पर थे, को उनकी ज़मानत बंधपत्रों से मुक्त कर दिया गया और उनके द्वारा जमा जुर्माने की राशि वापस करने का निर्देश दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार और उसके बाहर के उन ग्रामीणों और परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जो भावनात्मक रूप से उग्र परिस्थितियों में आपराधिक आरोपों का सामना कर सकते हैं।
पहला, यह दिखाता है कि छोटे बच्चे की मृत्यु जैसे दुखद मामले में भी पटना उच्च न्यायालय सख्त प्रमाणों पर ही जोर देता है। गांव की भावनात्मक नाराज़गी, पुराने झगड़े या अफवाहें, विधिसम्मत साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकतीं।
दूसरा, यह रेखांकित करता है कि मारपीट या भीड़ के गुस्से के दबाव में दिए गए अतिरिक्त‑न्यायिक इकबालिया बयानों को बहुत सतर्कता से देखा जाता है। न्यायालय ऐसे कथित बयानों को तभी स्वीकार करेगा जब वे स्पष्ट रूप से स्वैच्छिक हों और अन्य विश्वसनीय तथ्यों से समर्थित हों।
तीसरा, यह निर्णय स्पष्ट करता है कि केवल पुरानी दुश्मनी के कारण या केवल इसलिए कि नाम बाद में मुकदमे के दौरान सामने आए, पूरे परिवार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन को ठोस साक्ष्य से यह दिखाना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति ने क्या भूमिका निभाई।
चौथा, यह निचली अदालतों को याद दिलाता है कि उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अभियुक्तों से सुव्यवस्थित और प्रश्न-दर-प्रश्न पूछताछ करनी चाहिए, ताकि अभियुक्त प्रत्येक आरोप को समझ सकें और उसका उत्तर दे सकें। इस बिंदु पर की गई लापरवाही मुकदमे की निष्पक्षता को नुकसान पहुंचा सकती है।
समग्र रूप से, यह निर्णय आपराधिक कानून की एक मूल सुरक्षा को पुनः पुष्ट करता है: जब संदेह हो, तो लाभ अभियुक्त को मिलना चाहिए। यह संदेह, सामुदायिक दबाव या अपूर्ण जांच पर आधारित गलत दोषसिद्धि के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या परिस्थितिजन्य साक्ष्य, कथित अतिरिक्त‑न्यायिक इकबालिया बयान और शव की बरामदगी के आधार पर हत्या एवं साक्ष्य मिटाने की दोषसिद्धि कायम रह सकती थी?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि परिस्थितियों की शृंखला अधूरी और असंगत थी, अतिरिक्त‑न्यायिक इकबालिया बयान कमजोर व संदिग्ध था, और कथित बरामदगी साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 की कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरी। अतः दोषसिद्धि असुरक्षित थी।
प्रश्न: क्या सभी छह अभियुक्तों के बीच धारा 302/34 और 201/34 भादसं के तहत दायित्व आकर्षित करने हेतु साझा उद्देश्य का पर्याप्त प्रमाण था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय को ऐसा कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला कि सभी अभियुक्तों का साझा उद्देश्य था या वे अपराध में सहभागी थे। धारा 34 भादसं की सहायता से की गई दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती थी।
प्रश्न: क्या सत्र न्यायालय द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अभियुक्तों से की गई पूछताछ कानूनी मानकों पर खरी उतरी?
उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने पाया कि पूछे गए प्रश्न सामान्य और सतही थे, जिनमें प्रत्येक अभियुक्त के विरुद्ध विशिष्ट दोषसिद्ध परिस्थितियों का उल्लेख नहीं था। यह भी दोषसिद्धि को कायम न रखने का एक अतिरिक्त कारण बना।
न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद
- Ramanand @ Nandlal Bharti v. State of Uttar Pradesh, 2022 SCC OnLine SC 1396.
- Sarwan Singh Rattan Singh v. State of Punjab, AIR 1957 SC 637.
- Inderjit Das v. State of Bihar, (2023) LiveLaw (SC) 152.
- Kuna @ Sanjaya Behera v. State of Odisha, (2018) 1 SCC 296.
- Ranganayaki v. State by Inspector of Police, (2004) 12 SCC 521.
- Jai Prakash Tiwary v. State of Madhya Pradesh, 2022 SCC OnLine SC 966.
- Ramashish Rai v. Jagdish Singh, (2005) 10 SCC 498.
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 108 of 2018 with Criminal Appeal (DB) No. 11 of 2018; arising out of Sikraul P.S. Case No. 18 of 2013, District Buxar.
मामले का शीर्षक: Tunna Choudhary & Anr v. State of Bihar; Sukari Devi & Ors v. State of Bihar.
उद्धरण: 2024 (1) PLJR 437.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna.
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Arvind Srivastava और Hon’ble Mr. Justice Sunil Dutta Mishra.
निर्णय की तिथि: 08.12.2023.
अधिवक्ता:
- अपीलार्थियों की ओर से (दोनों अपीलों में): Mr. Bachan Jee Ojha, Advocate.
- सूचनाकर्ता की ओर से: Mr. Anil Kumar Roy, Advocate.
- राज्य की ओर से (Cr. Appeal (DB) No. 108 of 2018): Mrs. Shashi Bala Verma, APP.
- राज्य की ओर से (Cr. Appeal (DB) No. 11 of 2018): Mr. Ashwani Kumar Sinha, APP.
मामले का स्वरूप: भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201/34 के तहत सत्र वाद में दी गई दोषसिद्धि एवं सज़ा के विरुद्ध आपराधिक अपीलें (द्वैध पीठ के समक्ष)।
पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment
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