समझौते के बाद दहेज‑क्रूरता मामला निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2026

पटना उच्च न्यायालय ने पति के रिश्तेदारों के विरुद्ध लंबित दहेज‑क्रूरता संबंधी आपराधिक मामला निरस्त कर दिया। पत्नी तथा उसके ससुरालीजनों ने न्यायालय को बताया कि उन्होंने अपना विवाद सुलझा लिया है। अब वे शांतिपूर्वक एक साथ रह रहे हैं। मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक कार्यवाही याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध आगे नहीं चलेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

वर्ष 2005 में पश्चिम चम्पारण में एक शिकायत वाद दायर किया गया (शिकायत वाद सं. 712(C) वर्ष 2005, सत्र वाद सं. 423 वर्ष 2018)। शिकायतकर्ता, जो पत्नी है, ने आरोप लगाया कि उसके ससुरालीजनों ने उसे क्रूरता का शिकार बनाया और दहेज की मांग की। इस आधार पर, माननीय अवर प्रभागीय न्यायिक दंडाधिकारी (एस.डी.जे.एम.), पश्चिम चम्पारण, बेतिया ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के अंतर्गत संज्ञान लिया।

दिनांक 06.02.2006 के आदेश द्वारा एस.डी.जे.एम. ने कई अभियुक्तों के विरुद्ध, जिनमें वर्तमान याचिकाकर्ता भी शामिल हैं, समन जारी किया। याचिकाकर्ता, शिकायतकर्ता के पति की ननद तथा दो जेठ/देवर हैं।

समय के साथ‑साथ पक्षकारों के मध्य संबंधों में परिवर्तन आ गया। दिनांक 31.07.2019 को एस.डी.जे.एम., पश्चिम चम्पारण, बेतिया के समक्ष एक संयुक्त समझौता याचिका दाखिल की गई। उस दस्तावेज में दोनों पक्षों ने मजिस्ट्रेट को सूचित किया कि शुभचिंतकों के हस्तक्षेप से उन्होंने अपना विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटा लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि समझौता स्वेच्छापूर्वक, बिना किसी धमकी या दबाव के किया गया है और शिकायतकर्ता अब आगे मामला नहीं चलाना चाहती।

बाद में यह समझौता पटना उच्च न्यायालय के समक्ष पुनः पुष्टि किया गया। विपक्षी पक्ष संख्या 2 (शिकायतकर्ता) ने प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल कर विशेष रूप से अनुच्छेद 4 और 5 में यह कहा कि पक्षकारों के बीच सभी विवाद सुलझ चुके हैं, उसने 31.07.2019 को समझौता याचिका पर हस्ताक्षर किए थे, और वह अब आपराधिक मामला जारी नहीं रखना चाहती।

यह भी संकेत दिया गया कि समझौते के बाद शिकायतकर्ता और उसके पति का परिवार संयुक्त परिवार के घर में मिलजुलकर शांति से रह रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में, ननद और जेठ/देवरों ने 06.02.2006 के संज्ञान आदेश तथा शिकायत वाद सं. 712(C) वर्ष 2005 से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने के लिए, आपराधिक प्रत्यर्थी सं. 35893 वर्ष 2021 दाखिल कर पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

मामले की सुनवाई 13.01.2026 को माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती सोनी श्रीवास्तव द्वारा की गई। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता श्री राजेश मोहन, राज्य बिहार की ओर से माननीय ए.पी.पी., तथा विपक्षी पक्ष संख्या 2 की ओर से अधिवक्ता श्री संजन कुमार शरण की दलीलें सुनीं।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने यह जोर देकर कहा कि जिस विवाद के कारण शिकायत दायर हुई थी, वह पहले ही सुलझ चुका है। उन्होंने एस.डी.जे.एम. के समक्ष दायर 31.07.2019 की संयुक्त समझौता याचिका तथा शिकायतकर्ता के इस रुख पर भरोसा किया कि वह अब मामला आगे नहीं बढ़ाना चाहती। उनका तर्क था कि ऐसी स्थिति में, ससुरालीजनों के विरुद्ध धारा 498A IPC के तहत आपराधिक मामला जारी रखना निरर्थक होगा और केवल कटुता को लंबा खींचेगा।

विपक्षी पक्ष संख्या 2 के अधिवक्ता ने भी इस पक्ष का समर्थन किया। अपने प्रत्युत्तर हलफनामे में विपक्षी पक्ष संख्या 2 ने पुष्टि की कि उसने 31.07.2019 को समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और अब पक्षकार संयुक्त परिवार के घर में शांतिपूर्वक रह रहे हैं। उसने स्पष्ट रूप से कहा कि बदली हुई परिस्थिति में याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक मामला जारी रखने का कोई उचित आधार नहीं है।

न्यायालय ने पहले यह ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ता पति नहीं, बल्कि उसके निकट संबंधी हैं — शिकायतकर्ता की ननद तथा दो जेठ/देवर। शिकायत में लगाए गए आरोप दहेज की मांग और क्रूरता से संबंधित थे, जो धारा 498A IPC के अंतर्गत उन पर तथा अन्य अभियुक्तों पर लगाए गए थे।

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि, जबकि अपराध असंज्ञेय (non‑compoundable) है, क्या उसे दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के अंतर्गत अपनी निहित शक्तियों का प्रयोग कर कार्यवाही को निरस्त कर देना चाहिए, जब स्वयं पक्षकारों ने वैवाहिक विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया हो और आगे बढ़ना चाहें।

न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि धारा 498A IPC के अंतर्गत पति के रिश्तेदारों से संबंधित मामलों में, यदि पक्षों ने समझौता कर लिया हो और वे शांतिपूर्ण ढंग से साथ रह रहे हों, तो आपराधिक अभियोजन को जारी रखना किसी उपयोगी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता। न्यायालय ने बल देकर कहा कि अनेक न्यायिक निर्णयों में यह माना गया है कि जहाँ शिकायतकर्ता मामला आगे नहीं बढ़ाना चाहता और विवाद मूलत: निजी हो तथा सुलझ चुका हो, वहाँ असंज्ञेय अपराधों में भी कार्यवाही को निरस्त किया गया है।

इसे पुष्ट करने के लिए न्यायालय ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हाल के तथा पूर्ववर्ती निर्णयों पर भरोसा किया। उसने Mange Ram Vs. State of Madhya Pradesh and Anr. [2025 INSC 962] का उल्लेख किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों में पति के अनेक पारिवारिक सदस्यों को फँसा देने की प्रवृत्ति पर चर्चा की और यह माना कि जहाँ ऐसे मामलों में समझौता हो चुका हो, वहाँ असंज्ञेय अपराधों में भी आपराधिक कार्यवाही जारी रखना निरर्थक अभ्यास होगा। न्याय का तकाज़ा है कि जब पक्षकार अपने मतभेद सुलझा लें तो आपराधिक विवाद का अंत हो और शांति बहाल की जाए।

पटना उच्च न्यायालय ने Gian Singh Vs. State of Punjab, (2012) 10 SCC 303 का भी हवाला दिया। उस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि उच्च न्यायालय, धारा 482 Cr.P.C. के अंतर्गत अपनी निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए, यदि यह प्रतीत हो कि वास्तविक समझौते के कारण दोषसिद्धि की संभावना न के बराबर है और मुकदमे को जारी रखना न्याय के हितों के प्रतिकूल होगा, तो आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर सकता है।

आगे, न्यायालय ने Naushey Ali vs. State of U.P., (2025) 4 SCC 78 पर भी भरोसा किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब पक्षकारों ने अपना विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया हो, तब आपराधिक विचारण को जारी रखना व्यर्थ होगा। न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऐसे समझौतों का सम्मान करते हुए कार्यवाही निरस्त की जानी चाहिए; अन्यथा यह न्यायालय की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग होगा।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने अपने समक्ष उपस्थित विशिष्ट तथ्यों का परीक्षण किया। उसने निम्न बिंदु नोट किए:

  • मामला दहेज तथा क्रूरता से संबंधित वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था, जो धारा 498A IPC के तहत दर्ज था।
  • याचिकाकर्ता पति के पारिवारिक सदस्य (ननद और जेठ/देवर) थे, न कि स्वयं मुख्य अभियुक्त पति।
  • 31.07.2019 को एस.डी.जे.एम. के समक्ष बहुत पहले ही एक संयुक्त समझौता याचिका दायर की जा चुकी थी, जिसमें कहा गया था कि समझौता स्वेच्छा से हुआ है और शिकायतकर्ता अब आगे कार्यवाही नहीं चाहती।
  • विपक्षी पक्ष संख्या 2 ने अपने अधिवक्ता और प्रत्युत्तर हलफनामे के माध्यम से उच्च न्यायालय के समक्ष उस स्थिति की पुनः पुष्टि की और यह भी बताया कि पक्षकार संयुक्त परिवार में शांतिपूर्वक साथ रह रहे हैं।
  • न्यायालय के संज्ञान में ऐसे कोई विशिष्ट आरोप नहीं लाए गए जो समझौते के बावजूद याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक मामला जारी रखने को उचित ठहरा सकें।

इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने पाया कि पति के रिश्तेदारों के विरुद्ध आपराधिक मामला जीवित रखना किसी वैध उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा। इसके बजाय, यह केवल पक्षकारों के बीच कटुता को लंबा खींचेगा और न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालेगा, विशेषकर तब जब विवाद अब “जीवित” नहीं रह गया है।

न्यायालय ने जोर देकर कहा कि वास्तविक रूप से सुलझ चुके निजी विवादों में उच्च न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह मुकदमेबाज़ी को समाप्ति (quietus) तक पहुँचाए, अर्थात् वाद‑विवाद का अंत कर दे। धारा 482 Cr.P.C. के अंतर्गत अपनी निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे सुलझे हुए वैवाहिक मामले में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने एस.डी.जे.एम., पश्चिम चम्पारण, बेतिया द्वारा शिकायत वाद सं. 712(C) वर्ष 2005 (सत्र वाद सं. 423 वर्ष 2018) में पारित दिनांक 06.02.2006 के विवादित आदेश को, जहाँ तक वह याचिकाकर्ताओं से संबंधित था, निरस्त कर दिया। साथ ही, उस शिकायत वाद से उत्पन्न याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन को भी निरस्त कर दिया गया। आपराधिक प्रत्यर्थी याचिका स्वीकृत की गई।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय वैवाहिक विवादों में फँसे लोगों के लिए, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहाँ दहेज‑क्रूरता के आरोपों के तहत धारा 498A IPC के अंतर्गत अनेक ससुरालीजन नामज़द किए जाते हैं, अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जब पति का परिवार और शिकायतकर्ता पत्नी अपनी आपसी शिकायतें सच्चे मन से सुलझा लें और पुनः शांतिपूर्वक साथ रहने लगें, तो न्यायालय रिश्तेदारों के विरुद्ध आपराधिक मामलों को रोकने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है, भले ही अपराध तकनीकी रूप से असंज्ञेय हो।

बिहार तथा अन्य स्थानों के परिवारों के लिए यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि आपराधिक कानून का उद्देश्य पुरानी कलह को जीवित रखना नहीं है, जब दोनों पक्ष आगे बढ़ने का निर्णय ले चुके हों। यह भी स्पष्ट करता है कि उच्च न्यायालय सावधानी से यह देखेगा कि क्या मामला अब भी किसी उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है या केवल पक्षकारों तथा न्याय‑तंत्र पर अनावश्यक उत्पीड़न और दबाव डाल रहा है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय, जब पक्षकार सौहार्दपूर्ण ढंग से अपना वैवाहिक विवाद सुलझा चुके हों और साथ रह रहे हों, तब भी असंज्ञेय अपराध होने के बावजूद, पति के रिश्तेदारों के विरुद्ध लंबित धारा 498A IPC का मामला निरस्त कर सकता है?
    उत्तर: हाँ। धारा 482 Cr.P.C. के अंतर्गत अपनी निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्यायालय ने माना कि सुलझे हुए वैवाहिक विवाद में, जो पति के रिश्तेदारों से संबंधित हो, आपराधिक कार्यवाही जारी रखना निरर्थक और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा; अतः याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध संज्ञान आदेश तथा अभियोजन को निरस्त कर दिया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Mange Ram Vs. State of Madhya Pradesh and Anr., 2025 INSC 962
  • Gian Singh Vs. State of Punjab, (2012) 10 SCC 303
  • Naushey Ali vs. State of U.P., (2025) 4 SCC 78

मामले का विवरण

मामला संख्या: आपराधिक प्रत्यर्थी सं. 35893 वर्ष 2021

जिससे उत्पन्न: शिकायत वाद सं. 712(C) वर्ष 2005 (सत्र वाद सं. 423 वर्ष 2018), थाना कांड सं. 712 वर्ष 2005, थाना पश्चिम चम्पारण शिकायत, जिला पश्चिम चम्पारण

मामले का शीर्षक: बेबी नाज़ एवं अन्य बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य

उद्धरण: 2026(2) PLJR 184

पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती सोनी श्रीवास्तव

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री राजेश मोहन, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्रीमती उषा कुमारी, ए.पी.पी.
  • विपक्षी पक्ष संख्या 2 की ओर से: श्री संजन कुमार शरण, अधिवक्ता

मामले का स्वरूप: धारा 482 Cr.P.C. के अंतर्गत याचिका, जिसमें समझौते के आधार पर वैवाहिक विवाद से उत्पन्न धारा 498A IPC के तहत संज्ञान आदेश तथा आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने का अनुरोध किया गया।

निर्णय की तिथि: 13.01.2026

न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर मूल निर्णय देखें


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