अवैध वाहन नीलामी रद्द, मुआवज़ा आदेशित — पटना उच्च न्यायालय, 2025

एक वाहन स्वामी ने मुज़फ्फरपुर के उत्पाद व पुलिस अधिकारियों द्वारा अपनी स्कॉर्पियो की ज़ब्ती, जब्ती (कन्फिस्केशन) और नीलामी को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि प्राधिकारियों ने हर स्तर पर बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 का उल्लंघन किया। न्यायालय ने जब्ती व नीलामी रद्द कर दी, राज्य को पूर्ण बीमित मूल्य ब्याज व लागत सहित अदा करने का आदेश दिया, और दोषी अधिकारियों से वसूली के लिए निर्देश दिए। न्यायालय ने आर्थिक अपराध इकाई को प्राथमिकी दर्ज कर बड़े वाहन नीलामी रैकेट की जांच करने का भी आदेश दिया।

वाद की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता नवंबर 2018 निर्मित महिंद्रा स्कॉर्पियो S9 के पंजीकृत स्वामी हैं, जिसका बीमित मूल्य रुपये 12,12,517/- की अवधि जनवरी 2019 से जनवरी 2022 तक था। दिनांक 25.12.2020 को उक्त वाहन को सकरा थाना, मुज़फ्फरपुर के प्रभारी पदाधिकारी ने जब्त किया, जिन्होंने ही सूचक के रूप में प्राथमिकी भी दर्ज की।

यह जब्ती सकरा थाना कांड संख्या 722 of 2020 से संबंधित थी, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 414/34 तथा बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 30(क), 41, 56(बी) और 56(डी) के अंतर्गत दर्ज थी। आरोप था कि स्कॉर्पियो से 3.750 लीटर विदेशी शराब बरामद हुई।

कानूनी सलाह पर, याचिकाकर्ता ने उस अदालत के समक्ष वाहन रिहाई के लिए अर्जी दी जहाँ आपराधिक वाद लंबित था, अर्थात् विशिष्ट विशेष उत्पाद न्यायाधीश-1, मुज़फ्फरपुर की अदालत में। दिनांक 11.01.2023 को उक्त अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में वाहन रिहाई का आदेश पारित किया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, इस स्पष्ट रिहाई आदेश के बावजूद वाहन कभी वापस नहीं किया गया। उनका आरोप था कि तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक (पूर्व), मुज़फ्फरपुर, स्कॉर्पियो को सरकारी वाहन के रूप में उपयोग कर रहे थे। उन्होंने परीक्षण न्यायालय को एक आवेदन (अनुलग्नक-पी/2) के माध्यम से यह जानकारी दी कि गाड़ी डी.एस.पी. ईस्ट के उपयोग में है।

दिनांक 07.10.2023 को याचिकाकर्ता ने परीक्षण न्यायालय में एक और आवेदन दायर कर यह जानना चाहा कि रिहाई आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया। अदालत ने सकरा थाना प्रभारी तथा जिला पदाधिकारी, मुज़फ्फरपुर से प्रतिवेदन तलब किए। इस बार सूचित किया गया कि याचिकाकर्ता का वाहन 31.03.2023 को पहले ही नीलाम कर दिया गया है और प्रतिवादी संख्या 9, भोला साह ने उसे खरीदा है।

याचिकाकर्ता ने जब्ती आदेश को उत्पाद आयुक्त के समक्ष उत्पाद अपील वाद संख्या 30 of 2024 में चुनौती दी, और तत्पश्चात बिहार सरकार के सचिव (मद्यनिषेध एवं उत्पाद) के समक्ष पुनरीक्षण (उत्पाद पुनरीक्षण वाद संख्या 11 of 2025) दायर किया। अपील और पुनरीक्षण दोनों खारिज कर दिए गए और जब्ती आदेश को बरकरार रखा गया।

इसके बाद उन्होंने पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 13123 of 2025 दाखिल कर अपनी स्कॉर्पियो की नीलामी को रद्द करने, अथवा वैकल्पिक रूप से वाहन के बीमित मूल्य के बराबर मुआवज़ा दिलाने की प्रार्थना की। उन्होंने मुज़फ्फरपुर में उत्पाद वाहनों की नीलामी में कथित रैकेट की न्यायिक जांच भी मांगी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय की खंडपीठ ने पहले 14.11.2025 को विस्तृत अंतरिम आदेश पारित किया। राज्य के प्रति-शपथपत्र का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने कई कमी और चिंताजनक पहलुओं पर ध्यान दिया।

यह स्पष्ट अभिलेख नहीं था कि जब्ती की कोई सूचना याचिकाकर्ता, जो कि पहचाने गए पंजीकृत स्वामी थे, को दी गई हो। राज्य के प्रति-शपथपत्र के साथ कथित एकपक्षीय जब्ती आदेश की प्रति संलग्न नहीं थी। 11.01.2023 के परीक्षण न्यायालय के रिहाई आदेश के बाद भी वाहन तत्कालीन डी.एस.पी. ईस्ट के कब्जे में सरकारी वाहन के रूप में उपयोग में रहने के संबंध में याचिकाकर्ता के विशेष आरोप का भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

राज्य यह नहीं दिखा सका कि नीलामी की तारीख की सूचना याचिकाकर्ता को दी गई हो, अथवा उन्हें रिहाई हेतु आवेदन करने या नीलामी में भाग लेने का अवसर दिया गया हो। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि केवल लगभग दो वर्ष पुराने तथा रुपये 12,12,517/- बीमित मूल्य वाले वाहन को प्रतिवादी संख्या 9 को रुपये 3,85,000/- में—यानी बीमित मूल्य के लगभग 30% पर—बेचा गया।

इन तथ्यों ने न्यायालय को प्रारंभिक स्तर पर ही यह टिप्पणी करने के लिए प्रेरित किया कि जब्ती से लेकर नीलामी तक संपूर्ण अधिकार प्रयोग “कपटपूर्ण, मनमाना और दुर्भावनापूर्ण” प्रतीत होता है। न्यायालय ने प्रतिवादी 1 से 8 को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा कि क्यों न impugned आदेशों को निरस्त कर दिया जाए और क्यों न राज्य को बीमित मूल्य ब्याज सहित अदा करने तथा दोषी अधिकारियों से वसूली करने का निर्देश दिया जाए। नीलामी क्रेता को प्रतिवादी संख्या 9 के रूप में जोड़ा गया और उसे वाहन हस्तांतरित करने से रोका गया।

न्यायालय ने एक समाचार रिपोर्ट पर भी संज्ञान लिया कि 490 वाहनों की सामूहिक नीलामी की गई थी, और जिला पदाधिकारी, मुज़फ्फरपुर से यह प्रतिवेदन मांगा कि क्या बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 के नियम 12A तथा अन्य लागू नीलामी नियमों का पालन किया गया था। इस रिट याचिका को सीडब्ल्यूजेसी संख्या 4697 of 2025 के साथ जोड़ा गया, जिसमें गोपालगंज में भी समान मुद्दे उठे थे।

दिनांक 17.12.2025 को, अतिरिक्त जिला पदाधिकारी एवं उत्पाद अधीक्षक, मुज़फ्फरपुर की दलीलें सुनने के बाद, न्यायालय ने और भी चिंताजनक तथ्य दर्ज किए। प्रारंभ में, याचिकाकर्ता के वाहन के लिए जब्ती वाद संख्या 79 of 2021–22 संस्थित किया गया था। यद्यपि अभिलेख में नोटिस का प्रारूप उपलब्ध था, परंतु याचिकाकर्ता को प्रेषण या सेवा का कोई प्रमाण नहीं था।

बाद में, इस व्यक्तिगत वाद को छोड़कर 527 वाहनों के लिए एक सामूहिक जब्ती वाद संख्या 03 of 2022–23 आरंभ किया गया। इस सामूहिक वाद में न तो याचिकाकर्ता और न ही अन्य वाहन स्वामियों को कोई व्यक्तिगत नोटिस जारी किया गया। एक ही आदेश (स्मरण-पत्र संख्या 723 दिनांक 15.03.2023) द्वारा तत्कालीन उप विकास आयुक्त, मुज़फ्फरपुर ने 490 वाहनों, जिनमें याचिकाकर्ता की स्कॉर्पियो भी शामिल थी, की सामूहिक जब्ती कर दी।

इस जब्ती आदेश से पहले 18.02.2023 को प्रभात खबर में एक सूचना प्रकाशित हुई, जिसमें वाहन स्वामियों को बताया गया कि वे 2021 नियमावली के नियम 12A के तहत “नवीनतम बीमित मूल्य” का 50% जमा कर रिहाई हेतु आवेदन कर सकते हैं और 25.02.2023 को, तथा आवश्यकता होने पर 04.03.2023 को, सुनवाई हेतु उपस्थित हों। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि यही दो तिथियाँ सभी 527 वाहनों के लिए तय की गई थीं, और यह कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत समन की सेवा की जो प्रक्रिया नियम 13A(3) में अपेक्षित है, उसका पालन नहीं किया गया।

उत्पाद अधीक्षक ने 20.02.2023 को मोटर वाहन निरीक्षक (एमवीआई), मुज़फ्फरपुर को पत्र लिखकर 22 थानों में रखे सभी 527 वाहनों का मूल्यांकन मांगा। मात्र दो दिन के भीतर, 22.02.2023 को तत्कालीन एमवीआई ने सभी वाहनों के लिए एक ही मूल्यांकन प्रतिवेदन भेज दिया। वर्तमान एमवीआई, जो न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए, ने स्पष्ट रूप से कहा कि इतने कम समय में 22 थानों में रखे 527 वाहनों का भौतिक निरीक्षण करना संभव नहीं था। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि अभिलेख में मूल्यांकन का कोई आधार नहीं है—न तो फ़ोटो, न भौतिक सत्यापन टिप्पणियाँ, न ही यह व्याख्या कि विशिष्ट मूल्य कैसे तय किए गए।

इसके बाद न्यायालय ने नीलामी की प्रक्रिया की जांच की। 25.02.2023 की अल्पावधि नीलामी सूचना में 01.03.2023 और 23.03.2023 को नीलामी तय की गई, तथा शेष वाहनों की नीलामी 28.03.2023 को होनी थी। पीठ ने प्रश्न उठाया कि जब्ती आदेश तो बाद में, 15.03.2023 को पारित हुआ था तथा जब्ती कार्यवाही में दूसरी सुनवाई की तिथि (04.03.2023) भी अभी आनी बाकी थी, तो 25.02.2023 को नीलामी की घोषणा कैसे की जा सकती थी।

अधिकारियों के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था। यह तथ्य निर्विवाद रहा कि पहली नीलामी सूचना जब्ती आदेश से पूर्व की थी, और 01.03.2023 को नीलामी, अखबारी सूचना में तय दूसरी सुनवाई तिथि से भी पहले हो जाती।

25.03.2023 की दूसरी अल्पावधि नीलामी सूचना में 28.03.2023 से 31.03.2023 तक नीलामी तय की गई। इसी सूचना के तहत याचिकाकर्ता की स्कॉर्पियो की नीलामी हुई, जिसका न्यूनतम मूल्य विवादित मूल्यांकन प्रतिवेदन के अनुसार रुपये 3,80,000/- तय था, और अंततः प्रतिवादी संख्या 9 को रुपये 3,85,000/- में बेचा गया।

न्यायालय ने पूछा कि क्या इन नीलामी सूचनाओं को 2021 नियमावली के नियम 14(3) के अनुसार किसी व्यापक प्रसार वाले समाचारपत्र में प्रकाशित किया गया था। सहायक आयुक्त (मद्यनिषेध), मुज़फ्फरपुर ने कहा कि पहली नीलामी सूचना के लिए जनसंपर्क विभाग को प्रकाशन हेतु पत्र भेजा गया था, लेकिन दूसरी सूचना—जिसके तहत याचिकाकर्ता की कार बेची गई—के लिए न तो किसी अनुरोध का और न ही किसी प्रकाशन का अभिलेख उपलब्ध है। इस प्रकार यह स्वीकार किया गया कि दूसरी नीलामी के लिए किसी समाचारपत्र में सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं हुआ।

यह साक्ष्य भी सामने आया कि कुछ व्यक्तियों ने एक साथ अनेक वाहन खरीदे। एक रोहित कुमार ने लगभग 28 लाख रुपये में आठ वाहन खरीदे; दूसरे, अच्छेलाल राय ने चार वाहन, जिनमें टाटा ट्रक और एक टेम्पो शामिल थे, खरीदे; एक अन्य, कैलाश राय ने लगभग रुपये 1,90,000/- में नौ वाहन खरीदे। प्रतिवादी संख्या 9 ने खुलासा किया कि उसने स्वयं नीलामी में 12 वाहन रुपये 10,65,000/- में खरीदे, बाद में उनमें से छह को बिना किसी आधिकारिक अनुमति या पंजीयन समर्पण के कबाड़ के रूप में बेच दिया, और याचिकाकर्ता के वाहन को एक अन्य डीलर के माध्यम से तीसरे पक्ष को बेच दिया।

इस पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने अपने निर्णय में बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 के नियम 13A और नियम 14 को उद्धृत किया, जो जब्ती और नीलामी की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं। खंडपीठ ने अनेक चरणों पर स्पष्ट उल्लंघन पाए:

प्रथम, नियम 13A(2) और (3) के अनुसार अपेक्षित वैध व्यक्तिगत कारण बताओ नोटिस याचिकाकर्ता को सेवा नहीं की गई। द्वितीय, प्रभात खबर की सूचना में, जब्ती प्राधिकारी ने यह अवैध और असंगत शर्त लगा दी कि वाहन स्वामी पहले “दंड” राशि का 50% जमा करें—जबकि कोई दंड अभी निर्धारित ही नहीं हुआ था—तब ही उनके रिहाई आवेदन पर विचार होगा। तृतीय, 527 वाहनों के लिए एक ही दो दिन की सुनवाई तय करना न्यायालय ने “खोखली औपचारिकता” बताया जो वास्तविक सुनवाई का अवसर प्रदान करने में अक्षम था।

चतुर्थ, नीलामी सूचनाएँ जब्ती आदेश से पहले जारी की गईं, और जब्ती कार्यवाही में दूसरी सुनवाई की तिथि से पहले ही नीलामी तिथियाँ तय कर दी गईं, जिससे स्वामियों के वैधानिक अपील और पुनरीक्षण अधिकारों को पूर्वग्रहित कर दिया गया। पंचम, न्यायालय के मतानुसार 527 वाहनों का मूल्यांकन महज़ “दफ्तरी कागज़ी काम” था, जो कार्यालय से बिना भौतिक निरीक्षण के किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मनमाने और अत्यंत कम मूल्य निर्धारित हुए। याचिकाकर्ता की दो वर्ष पुरानी स्कॉर्पियो, जिसका बीमित मूल्य 12 लाख रुपये से अधिक था, को रुपये 3,80,000/- आंका गया।

षष्ठ, नियम 14(3) के तहत कम-से-कम एक स्थानीय या प्रादेशिक भाषा के समाचारपत्र में सार्वजनिक विज्ञापन द्वारा बोली आमंत्रित करने की अनिवार्य शर्त, कम से कम उस दूसरी नीलामी सूचना में तो पूरी तरह नज़रअंदाज़ की गई, जिसके तहत याचिकाकर्ता का वाहन बेचा गया। न्यायालय ने इसे नियमों का “सुस्पष्ट उल्लंघन” माना।

इन परिस्थितियों में खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि जब्ती और नीलामी में शामिल अधिकारियों ने “कानून के शासन के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया”। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यह मानना कठिन है कि वरिष्ठ अधिकारी स्पष्ट कानूनी प्रावधानों का बार-बार उल्लंघन बिना किसी बाह्य लाभ या दबाव के करेंगे। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि गोपालगंज ज़िले में वाहनों की नीलामी में समान अनियमितताएँ पहले से ही आर्थिक अपराध इकाई (EOU) द्वारा ई.ओ.यू. थाना कांड संख्या 42 of 2025 में जांचाधीन हैं।

कथित भ्रष्टाचार और गुप्त सौदों के पैमाने को देखते हुए, न्यायालय ने आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना को प्रतिवादी संख्या 10 के रूप में जोड़े जाने का निर्देश दिया और EOU को इस मामले में मूल्यांकन निर्धारण और नीलामी संचालन के संबंध में प्रथम सूचना प्रतिवेदन दर्ज कर, अधिकारियों एवं नीलामी क्रेताओं की भूमिकाओं, जिसमें बाद के वाहन हस्तांतरण भी शामिल हैं, की जांच करने का आदेश दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जांच स्वतंत्र रूप से हो और उसके अवलोकनों से प्रभावित न हो।

याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत शिकायत के संदर्भ में, न्यायालय ने जब्ती आदेश को रद्द कर दिया और यह घोषित किया कि उसके वाहन की नीलामी विधि-विरुद्ध है। चूँकि वाहन पहले ही नीलाम होकर तीसरे पक्ष को हस्तांतरित हो चुका था, न्यायालय ने वाहन वापसी के बजाय याचिकाकर्ता को वैकल्पिक प्रार्थना के अनुरूप मुआवज़ा प्रदान किया।

बिहार राज्य को, उत्पाद विभाग के प्रधान सचिव के माध्यम से, निर्देशित किया गया कि याचिकाकर्ता को रुपये 12,12,517/- (बीमित मूल्य) तीन माह की जब्ती अवधि के बाद की तिथि से भुगतान तक 6% वार्षिक ब्याज सहित, आदेश की प्रति प्राप्ति के एक माह के भीतर अदा करे। न्यायालय ने नोट किया कि जब्ती के तीन माह के भीतर जब्ती आदेश पारित करने की वैधानिक अवधि है, अतः ब्याज उसी बाद की तिथि से दिया गया।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता को वाद व्यय के रूप में रुपये 10,000/- भी प्रदान किए।

पटना उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णय K.K. Pathak @ Keshav Kumar Pathak बनाम Ravi Shankar Prasad एवं अन्य, 2019 (1) PLJR 1051—जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अप्रभावित रहने दिया गया—पर निर्भर करते हुए खंडपीठ ने माना कि जब अधिकारियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग या अति-उपयोग के कारण राज्य को मुआवज़ा देना पड़ता है, तो वह राशि दोषी अधिकारियों से वसूल की जानी चाहिए। तदनुसार, राज्य को निर्देशित किया गया कि बीमित मूल्य और नीलामी मूल्य के बीच का अंतर, अर्थात् रुपये 12,12,517/- घटा रुपये 3,85,000/- = रुपये 8,27,517/-, साथ ही ब्याज और लागत, याचिकाकर्ता को भुगतान की तिथि से छह माह के भीतर, विधि के अनुसार दोषी अधिकारियों से वसूल करे।

न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि उत्पाद विभाग दोषी अधिकारियों के विरुद्ध उपयुक्त विभागीय कार्रवाई करे और जब्ती व नीलामी से संबंधित सभी अधिकारियों को यह निर्देशित करे कि वे 2021 नियमावली का निर्धारित समय सीमा के भीतर कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करें।

अंततः, संदिग्ध अनियमितताओं की गंभीरता और व्यापकता को देखते हुए, खंडपीठ ने अपेक्षा व्यक्त की कि EOU एक विशेष अन्वेषण दल गठित कर समयबद्ध जांच करे। न्यायालय ने जांच की निगरानी (परंतु पर्यवेक्षण नहीं) करने का निर्णय लिया और इस मामले को सीडब्ल्यूजेसी संख्या 4697 of 2025 एवं 12075 of 2025 के साथ जोड़ते हुए 27.01.2026 को आगे के आदेशों के लिए सूचीबद्ध किया। अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी गई।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन सामान्य वाहन स्वामियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी कार, मोटरसाइकिल या ट्रक इत्यादि बिहार में मद्यनिषेध या अन्य कानूनों के तहत जब्त किए जाते हैं। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना और आपको वास्तविक सुनवाई का अवसर दिए बिना चुपचाप आपके वाहन की जब्ती और नीलामी नहीं कर सकती।

न्यायालय ने केवल औपचारिक कागज़ी कार्यवाही पर नहीं, बल्कि वास्तविक अभिलेखों पर नज़र डाली और यह उजागर किया कि किस प्रकार सामूहिक आदेशों और जल्दबाज़ी में किए गए मूल्यांकन के माध्यम से बड़े पैमाने पर नीलामियाँ कराई जा सकती हैं। न्यायालय ने यह भी माना कि एक-दो खरीदारों द्वारा बहुत कम कीमत पर बार-बार अनेक वाहन खरीदना गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।

व्यावहारिक रूप से, यह निर्णय तीन मजबूत संदेश देता है। प्रथम, यदि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों का पालन नहीं किया जाता, तो जब्ती और नीलामी को निरस्त किया जा सकता है। द्वितीय, जब सरकार की अवैध कार्रवाइयों के कारण किसी नागरिक को क्षति होती है, तो राज्य को पूर्ण मुआवज़ा ब्याज और व्यय सहित देना पड़ सकता है। तृतीय, वह राशि सामान्य करदाताओं से नहीं, बल्कि उन अधिकारियों से वसूल की जानी चाहिए जिन्होंने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया।

आर्थिक अपराध इकाई को प्राथमिकी दर्ज कर संपूर्ण नीलामी प्रक्रिया की जांच का निर्देश देकर, न्यायालय ने अन्य वाहन स्वामियों की भी रक्षा करने का प्रयास किया है, जो संभवतः मुज़फ्फरपुर और अन्य स्थानों पर इसी तरह की अवैध नीलामियों के शिकार हुए होंगे।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या मुज़फ्फरपुर के उत्पाद एवं जिला प्राधिकारियों द्वारा याचिकाकर्ता के वाहन की जब्ती और नीलामी बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 के नियम 13A और नियम 14 के अनुरूप थी?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि नोटिस, सुनवाई, मूल्यांकन और सार्वजनिक नीलामी की अनिवार्य प्रक्रियाओं का पूर्णतः उल्लंघन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप जब्ती और नीलामी, दोनों, अवैध हो गए।
  • प्रश्न: जब अवैध रूप से नीलाम किया गया वाहन पहले ही किसी तीसरे पक्ष के क्रेता के हाथों में चला गया हो, तब याचिकाकर्ता को क्या राहत दी जानी चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने जब्ती को रद्द कर नीलामी को विधि-विरुद्ध घोषित किया, परंतु वाहन वापसी का आदेश देने के बजाय राज्य को निर्देशित किया कि वह याचिकाकर्ता को वाहन का पूर्ण बीमित मूल्य ब्याज सहित तथा वाद व्यय के साथ अदा करे।
  • प्रश्न: क्या अधिकारियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग या अति-उपयोग से हुई आर्थिक क्षति की ज़िम्मेदारी केवल राज्य पर होनी चाहिए या व्यक्तिगत अधिकारियों पर भी?
    उत्तर: K.K. Pathak के पूर्व निर्णय का अनुसरण करते हुए, न्यायालय ने निर्देश दिया कि बीमित मूल्य और नीलामी मूल्य के अंतर की राशि, साथ ही ब्याज और लागत, दोषी अधिकारियों से विधि अनुसार वसूल की जाए।

न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद

  • K.K. Pathak @ Keshav Kumar Pathak बनाम Ravi Shankar Prasad एवं अन्य, 2019 (1) PLJR 1051; इस संबंध में दायर Special Leave Petition (Cri) No. 003566 of 2019 पर सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप नहीं किया।

मामले का विवरण

वाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 13123 of 2025

वाद शीर्षक: Sushil Kumar Singh बनाम The State of Bihar एवं अन्य

उद्धरण: 2026 (1) PLJR 439

अदालत: उच्च न्यायालय, पटना

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति Rajeev Ranjan Prasad; माननीय श्री न्यायमूर्ति Sourendra Pandey

निर्णय की तिथि: 18.12.2025 (19.12.2025 को अपलोड)

पक्षकारों के अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री Hari Kishore Thakur, अधिवक्ता; श्री Aditya Dev, अधिवक्ता
  • बिहार राज्य की ओर से: श्री Sumant Kumar Singh, AC to GA-2
  • प्रतिवादी संख्या 9 (नीलामी क्रेता) की ओर से: श्री Alok Kumar Alok, अधिवक्ता; श्री Vivek Kumar Pandey, अधिवक्ता
  • आर्थिक अपराध इकाई (प्रतिवादी संख्या 10) की ओर से: श्री V.N.P. Sinha, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री Vijay Anand, अधिवक्ता

वाद का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर सिविल रिट याचिका, जिसमें बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 और उसके तहत बने नियमों के अंतर्गत जब्त वाहन की जब्ती और नीलामी को चुनौती दी गई, साथ ही मुआवज़ा और कथित नीलामी रैकेट की जांच हेतु अतिरिक्त प्रार्थनाएँ की गईं।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखें

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