सेवा लाभ विवाद में जबरन जमा राशि की वापसी का आदेश — पटना उच्च न्यायालय, 2025

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न आया कि क्या एक विधवा को अपने दिवंगत पति द्वारा कथित रूप से लिए गए पुराने अग्रिम की ज़िम्मेदारी उठानी होगी। न्यायालय ने माना कि उसने अपनी सेवा संबंधी सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए यह राशि दबाव में आकर जमा की थी। न्यायालय ने शासकीय प्राधिकारियों को यह राशि दो माह के भीतर वापस करने का आदेश दिया। वे भविष्य में भी इसकी वसूली का प्रयास कर सकते हैं, परंतु केवल विधि के अनुसार।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता एक कॉलेज शिक्षक की विधवा हैं, जो मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज, मोतिहारी में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। उनके पति की मृत्यु 01.08.2020 को सेवा के दौरान ही कॉलेज में कार्यरत रहते हुए हुई।

वर्ष 2009 से 2012 के बीच, याचिकाकर्ता के पति को राज्य तकनीकी शिक्षा परिषद द्वारा 4,78,715/- रुपये का अग्रिम दिया गया था। यह अग्रिम मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज केंद्र में डिप्लोमा परीक्षाओं के आयोजन हेतु केंद्र व्यय के लिए दिया गया था।

अभिलेखों पर उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, यह अग्रिम राशि याचिकाकर्ता के पति के जीवनकाल तथा सेवा के दौरान कभी समायोजित नहीं की गई। 2012 से लेकर उनकी मृत्यु वर्ष 2020 तक उनके विरुद्ध किसी प्रकार की वसूली की कार्रवाई नहीं की गई।

उनकी मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता अपने दिवंगत पति द्वारा दी गई सेवाओं से उत्पन्न देयों जैसे सेवा संबंधी लाभ पाने की हकदार बनीं। तथापि, ये लाभ उन्हें जारी नहीं किए जा रहे थे। इसके विपरीत, 2021 में विभिन्न प्राधिकारियों के बीच 4,78,715/- रुपये के अपसमायोजित अग्रिम के संबंध में पत्राचार प्रारंभ हो गया।

दिनांक 24.02.2021 को मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य ने सचिव, राज्य तकनीकी शिक्षा परिषद को पत्र लिखा (संलग्नक – 1)। दिनांक 02.03.2021 को राज्य तकनीकी शिक्षा परिषद, बिहार के सचिव ने मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य को पत्र लिखा (संलग्नक – 2)। दिनांक 06.03.2021 को प्राचार्य ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, बिहार के निदेशक को पत्र लिखा (संलग्नक – 3)। तत्पश्चात, दिनांक 27.03.2021 को प्राचार्य ने बकाया प्रमाण पत्र (संलग्नक – 4) जारी किया, जिसमें यह उल्लेख था कि डिप्लोमा परीक्षाओं के लिए लिए गए अग्रिम के रूप में 4,78,715/- रुपये की राशि बकाया है।

ऐसी स्थिति में, याचिकाकर्ता ने 05.10.2021 को मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य के पास 4,78,715/- रुपये जमा कर दिए। केवल इस भुगतान के पश्चात ही प्राचार्य ने कोई बकाया न होने का प्रमाणपत्र (संलग्नक – 6) जारी किया, जो उनकी सेवा संबंधी लाभों के प्रसंस्करण एवं निर्गमन के लिए आवश्यक था।

अपने आप को पीड़ित महसूस करते हुए, याचिकाकर्ता ने सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत CWJC सं. 5928/2023 में पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने प्रतिवादियों को निर्देश देने की प्रार्थना की कि वे 4,78,715/- रुपये की वह राशि वापस करें, जो उन्होंने दबाव में आकर जमा की थी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

यह मामला माननीय श्री न्यायमूर्ति नानी तागिया के समक्ष आया। न्यायालय ने याचिकाकर्ता तथा राज्य पक्ष के अधिवक्ताओं को सुना और दलीलों व अभिलेखों का परीक्षण किया।

याचिकाकर्ता का मूल पक्ष सरल था। उन्होंने यह तर्क दिया कि:

1. 4,78,715/- रुपये की राशि उनके दिवंगत पति को 2009 से 2012 के बीच मोतिहारी इंजीनियरिंग परीक्षा केंद्र में डिप्लोमा परीक्षाओं के आयोजन हेतु अग्रिम के रूप में दी गई थी।

2. प्रतिवादी प्राधिकारियों ने उनके पति की जीवनावस्था में, जबकि वे 01.08.2020 तक सेवा में रहे, इस अग्रिम की वसूली या समायोजन के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

3. उनकी मृत्यु के बाद, उनके विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाय प्राधिकारियों ने 2021 में आंतरिक पत्राचार शुरू किया और प्रभावी रूप से यह स्थिति बना दी कि जब तक याचिकाकर्ता यह राशि अदा न करें, तब तक उन्हें उनके वैध सेवा संबंधी लाभ न मिलें।

4. चूँकि उनकी सेवा संबंधी सुविधाएँ रोकी जा रही थीं, वे 05.10.2021 को कॉलेज के प्राचार्य के पास 4,78,715/- रुपये जमा करने के लिए विवश हुईं। उन्होंने इस जमा राशि को दबाव या तनाव (coercion/duress) में किया गया बताया, क्योंकि अपने पति की सेवा से वैध रूप से देय रकम प्राप्त करने का उनके पास अन्य कोई व्यावहारिक मार्ग नहीं था।

5. केवल यह राशि जमा करने के बाद ही उन्हें कोई बकाया न होने का प्रमाणपत्र (संलग्नक – 6) दिया गया, जिससे उन्हें अपने दिवंगत पति की सेवा से अर्जित सेवा लाभ प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

दूसरी ओर, प्रतिवादी सं. 1 से 4 (राज्य एवं संबद्ध प्राधिकारी) ने प्रतिकथन हलफनामा दाखिल किया। उन्होंने कुछ प्रमुख तथ्यों को विवादित नहीं किया:

1. यह स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्ता के पति ने मोतिहारी इंजीनियरिंग परीक्षा केंद्र में डिप्लोमा परीक्षाओं के संचालन हेतु अपनी सेवा अवधि के दौरान 4,78,715/- रुपये का अग्रिम लिया था।

2. यह भी नकारा नहीं गया कि यह अग्रिम उनकी सेवा अवधि के दौरान अपसमायोजित ही रहा।

3. प्राधिकारियों ने यह कहा कि यह राशि अब भी बकाया है और उसकी वसूली के लिए उन्होंने विभिन्न पत्राचार किए हैं।

महत्त्वपूर्ण यह कि अपने प्रतिकथन में प्रतिवादियों ने निम्न बातों से इनकार नहीं किया:

1. अग्रिम वर्ष 2009 से 2012 के बीच दिया गया था।

2. याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु 01.08.2020 को एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवा के दौरान हुई।

3. याचिकाकर्ता द्वारा 05.10.2021 को प्राचार्य के पास 4,78,715/- रुपये जमा करना, 2021 के पत्राचार (संलग्नक 1-4) तथा सेवा लाभ रोके जाने से जुड़ा हुआ था।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने समय-रेखा तथा प्राधिकारियों के आचरण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया।

न्यायालय ने उल्लेख किया कि अग्रिम वर्ष 2009-2012 के बीच दिया गया था और 01.08.2020 को याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु तक अपसमायोजित ही रहा। किंतु 2012 से 2020 के बीच, अर्थात उनके जीवनकाल के दौरान, अग्रिम की वसूली हेतु कोई कदम उठाया गया प्रतीत नहीं होता। यह चूक निर्णायक थी।

न्यायालय ने आगे देखा कि इस अपसमायोजित राशि के संबंध में प्राधिकारियों के बीच पत्राचार केवल याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु के बाद ही शुरू हुआ। वर्ष 2021 के विभिन्न संचार (संलग्नक 1-4) के परिणामस्वरूप बकाया प्रमाण पत्र जारी हुआ और अंततः याचिकाकर्ता से यह राशि जमा कराने की स्थिति बनी।

न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता ने 05.10.2021 को प्राचार्य के पास 4,78,715/- रुपये इन पत्राचारों के आलोक में जमा किए, और उनके देय सेवा लाभ रोके जा रहे थे। इन लाभों के रोके जाने ने उन पर भुगतान करने के लिए दबाव डाला।

निर्णय के अनुच्छेद 9 में, न्यायालय ने अपनी निष्कर्षात्मक टिप्पणियाँ स्पष्ट रूप से दर्ज कीं:

1. प्राधिकारियों ने याचिकाकर्ता के दिवंगत पति से, जब वे सेवा में जीवित थे, विशेषकर 2012 से 2020 के बीच, उक्त अग्रिम की वसूली हेतु कोई कदम नहीं उठाया।

2. याचिकाकर्ता ने 05.10.2021 को यह राशि दबाव में आकर जमा की, क्योंकि उनके दिवंगत पति के सेवा से उन्हें प्राप्त होने वाले सेवा लाभ 2021 के विभिन्न पत्राचार (संलग्नक 1 से 4) के कारण रोके जा रहे थे।

इन वास्तविक तथ्यों के आधार पर, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि रिट याचिका को स्पष्ट निर्देशों के साथ निपटाया जा सकता है।

प्रथम, न्यायालय ने प्रतिवादियों को निर्देशित किया कि वे 05.10.2021 को याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई 4,78,715/- रुपये की राशि वापस करें। यह वापसी न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से दो माह के भीतर की जानी है।

द्वितीय, न्यायालय ने इस राहत को राज्य के अधिकारों के साथ संतुलित करते हुए उसे यह स्वतंत्रता दी कि, यदि विधि के अधीन ऐसी वसूली अनुमेय हो और यदि प्रतिवादी ऐसा करना उचित समझें, तो वे याचिकाकर्ता के विरुद्ध वसूली की कार्यवाही प्रारंभ कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, न्यायालय ने यह अंतिम निर्णय नहीं दिया कि यह राशि उनसे वसूल की जा सकती है या नहीं; उसने केवल यह कहा कि यदि कानून अनुमति देता है, तो राज्य विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाकर वसूली कर सकता है।

इस प्रकार, निर्णय का तात्कालिक प्रभाव यह है कि याचिकाकर्ता अपनी जमा राशि वापस पाने की अधिकारी हैं और भविष्य में किसी भी प्रकार की वसूली केवल विधिसम्मत उपायों से ही की जा सकेगी, न कि उनके सेवा लाभ रोककर एवं उन्हें भुगतान के लिए मजबूर करके।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय उन सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त कर्मचारियों के परिजनों के लिए महत्त्वपूर्ण है, जिनकी सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है। यह उस स्थिति को संबोधित करता है जिसमें किसी पुराने कथित “बकाये” को केवल कर्मचारी की मृत्यु के बाद उठाया जाता है और परिवार को मिलने वाले लाभों की रोकथाम के औजार के रूप में प्रयोग किया जाता है।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि:

1. प्राधिकारी केवल इस उद्देश्य से किसी विधवा या अन्य वैधानिक उत्तराधिकारी के सेवा संबंधी लाभों को रोक नहीं सकते कि पुराने अग्रिम की राशि की वसूली की जाए, विशेषकर तब जब कर्मचारी के जीवनकाल और सेवा के दौरान वसूली का कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया गया हो।

2. यदि कोई परिवार सदस्य केवल बुनियादी सेवा लाभों की प्रक्रिया पूरी करवाने के लिए ही ऐसी राशि चुका देता है, तो उस भुगतान को स्वेच्छा से देयता स्वीकार करने के बजाय दबाव में किया गया भुगतान माना जा सकता है।

3. वसूली, यदि विधिक रूप से अनुमेय हो, तो विधि द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया के माध्यम से की जानी चाहिए, न कि निर्भर परिजनों पर दमनकारी प्रशासनिक दबाव डालकर।

बिहार तथा अन्यत्र की विधवाओं और वैधानिक उत्तराधिकारियों के लिए यह निर्णय पेंशन, ग्रेच्युटी या अन्य देयों जैसे लाभों की मनमानी रोकथाम के विरुद्ध एक प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है, जब पुराने कथित अग्रिमों या अपसमायोजित राशियों का हवाला दिया जाता है। यह सरकारी विभागों को भी इस ओर प्रेरित करता है कि वे कर्मचारी के जीवनकाल में ही समयबद्ध व विधिसम्मत तरीके से कार्य करें, बजाय इसके कि मृत्यु के बाद पूरा बोझ परिवार पर डाल दें।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या प्रतिवादीगण किसी दिवंगत कर्मचारी की विधवा के सेवा संबंधी लाभों को रोककर, उसे कर्मचारी द्वारा लिए गए पुराने अपसमायोजित अग्रिम की राशि जमा करने के लिए बाध्य कर सकते हैं और उस राशि को अपने पास रख सकते हैं?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने यह राशि इस कारण दबाव में आकर जमा की कि उनके सेवा लाभ रोके गए थे, और प्रतिवादियों को यह राशि दो माह के भीतर वापस करने का निर्देश दिया।
  • प्रश्न: क्या जमा राशि वापस करने के बाद प्रतिवादीगण अग्रिम राशि की वसूली का प्रयास करने से पूर्णतः वंचित हो जाते हैं?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने प्रतिवादियों को यह स्वतंत्रता दी कि यदि ऐसी वसूली विधि के अधीन अनुमेय हो और वे ऐसा करना उचित समझें, तो वे याचिकाकर्ता के विरुद्ध वसूली की कार्यवाही प्रारंभ कर सकते हैं।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय या न्यायिक दृष्टांत का उल्लेख अथवा उस पर भरोसा नहीं किया गया है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: सिविल रिट क्षेत्राधिकार मामला सं. 5928/2023

मामले का शीर्षक: मंजू कुमारी बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य

न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति नानी तागिया

निर्णय की तिथि: 12-09-2025

उद्धरण: 2025(4) PLJR 348

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: डॉ. हरेंद्र कुमार सिंह, अधिवक्ता
  • प्रतिवादियों की ओर से: श्री अजय (Ga5)

प्रतिवादी: बिहार राज्य, प्रधान सचिव, बिहार राज्य तकनीकी शिक्षा परिषद; सचिव, बिहार राज्य तकनीकी शिक्षा परिषद; निदेशक, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, बिहार सरकार; प्राचार्य, मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज, मोतिहारी; महालेखाकार, बिहार

मामले का स्वरूप: रिट याचिका, जिसमें दिवंगत कर्मचारी की विधवा द्वारा जमा की गई राशि की वापसी की मांग की गई, जो कथित रूप से दिवंगत द्वारा डिप्लोमा परीक्षाओं के संचालन के लिए अग्रिम के रूप में ली गई थी और जिसे सेवा संबंधी लाभों की रिहाई से जोड़ा गया था।

पूर्ण निर्णय का लिंक:MTUjNTkyOCMyMDIzIzEjTg==-pKQTAtHdnfs=

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