मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता नालंदा में सहायक निदेशक, खान एवं भू-विज्ञान के पद पर कार्यरत थे। दिनांक 13.11.2009 को उन्हें गया के सहायक निदेशक, खान एवं भू-विज्ञान का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया।
दिनांक 27.12.2009 को, जब क्षेत्र में मुख्यमंत्री का दौरा प्रस्तावित था, उस समय जिला पदाधिकारी, नालंदा ने याचिकाकर्ता को एक नोटिस जारी किया। उनसे 24 घंटे के भीतर यह स्पष्टीकरण मांगा गया कि मुख्यमंत्री के दौरे के समय वे अपने मुख्यालय पर उपस्थित क्यों नहीं थे और वे राजगीर क्यों चले गए, जहां उन्हें विधि-व्यवस्था ड्यूटी पर तैनात किया गया था।
इसके बाद 28.12.2009 को दूसरा कारण-पत्र जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। याचिकाकर्ता ने 28.12.2009 को अपना जवाब दाखिल कर आरोपों का खंडन किया। उन्होंने 2.1.2010 को एक और जवाब प्रस्तुत किया, जिसमें अवैध रूप से संचालित ईंट भट्ठे से संबंधित आरोपों का विशेष रूप से उत्तर दिया गया।
उसके बाद जिला पदाधिकारी, नालंदा ने 14.1.2010 को खान एवं भू-विज्ञान विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखा। उस पत्र में जिला पदाधिकारी ने कहा कि याचिकाकर्ता का जवाब संतोषजनक नहीं है और याचिकाकर्ता ने ईंट भट्ठे के संबंध में जांच प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं कराया है। जिला पदाधिकारी ने अनुरोध किया कि उपयुक्त विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की जाए।
इसके आधार पर 30.7.2010 को याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोपपत्र जारी किया गया। इसमें चार आरोप थे: पहला, कि उन्हें प्रखंड विकास पदाधिकारी, गिरियक तथा थाना प्रभारी, गिरियक के साथ समन्वय कर अवैध ईंट भट्ठे की जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था; दूसरा, कि उन्होंने वह प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया; तीसरा, कि मुख्यमंत्री के दौरे के समय सभी अधिकारियों को मुख्यालय पर रहने का निर्देश होने के बावजूद वे मुख्यालय छोड़कर चले गए; और चौथा, कि उनकी अनुपस्थिति में अवैध ईंट भट्ठे की जांच अंचल पदाधिकारी, पुलिस निरीक्षक एवं थाना प्रभारी, गिरियक द्वारा करवाई गई।
याचिकाकर्ता ने 14.9.2010 को प्रस्तुतिकरण पदाधिकारी के समक्ष प्रत्येक आरोप के संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल किया। प्रस्तुतिकरण पदाधिकारी ने 25.10.2010 को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उसने पाया कि प्राधिकार के निर्देशों का पालन न करने का आरोप आंशिक रूप से सिद्ध है। उसने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को मुख्यालय छोड़ने से पूर्व अनुमति लेनी चाहिए थी और ऐसे अनुभवी अधिकारी द्वारा की गई इस प्रकार की चूक सराहनीय नहीं है। चौथे आरोप पर उसने यह मत व्यक्त किया कि याचिकाकर्ता की ओर से सतर्कता में कमी रही।
याचिकाकर्ता को 23.12.2010 को निलंबित कर दिया गया। 14.6.2011 को उन्हें जांच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराई गई और पंद्रह दिन के भीतर उत्तर देने को कहा गया। उन्होंने 11.8.2011 को जांच प्रतिवेदन के संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल किया।
इसके बाद, खान एवं भू-विज्ञान विभाग, बिहार शासन के अवर सचिव के हस्ताक्षर से जारी मेमो संख्या 278, दिनांक 30.1.2012 द्वारा तीन दंड आरोपित किए गए: (i) वर्ष 2009-10 के लिए उनके गोपनीय अभिलेख में निंदा (censure) दर्ज करना; (ii) तीन वेतन-वृद्धियों की संचयी प्रभाव सहित रोक; तथा (iii) निलंबन अवधि 23.12.2010 से 29.1.2012 तक का पूर्ण वेतन एवं भत्ते न देना और केवल निर्वाह भत्ता देना।
इस दंडादेश से आहत होकर याचिकाकर्ता ने वर्तमान रिट याचिका के माध्यम से पटना उच्च न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पार्थ सारथी ने इस वाद की सुनवाई की। दोनों पक्षों की ओर से अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा — याचिकाकर्ता की ओर से उनके अधिवक्ता तथा राज्य और खनन विभाग की ओर से उनके अधिवक्ता उपस्थित थे।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि दिनांक 30.1.2012 का दंडादेश पहले ही विभागीय मंत्री एवं मुख्यमंत्री द्वारा अनुमोदित हो चुका था, जैसा कि सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेजों से स्पष्ट होता है। अतः उनके समक्ष किसी भी विभागीय पुनर्विचार या अपील का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता ने प्रत्येक आरोप के संबंध में विस्तृत उत्तर दिया, इसके बावजूद प्राधिकारियों ने उनके द्वारा प्रस्तुत सामग्री की सराहना नहीं की। केंद्रीय बिंदु यह उठाया गया कि अवैध ईंट भट्ठे के संबंध में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने वाले स्वयं याचिकाकर्ता ही थे।
विशेष रूप से, 27.12.2009 को लगभग शाम 5 बजे, याचिकाकर्ता ने अवैध ईंट भट्ठे के संबंध में गिरियक थाना कांड संख्या 196/2009 दर्ज कराई। प्राथमिकी में स्पष्ट दर्ज है कि स्थल का निरीक्षण उसी दिन दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक किया गया और निरीक्षण प्रखंड विकास पदाधिकारी, पुलिस निरीक्षक, गिरियक थाना प्रभारी तथा अन्य के साथ मिलकर किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार यह दर्शाता है कि उन्होंने ईंट भट्ठे से संबंधित निर्देशों का पालन किया था।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि स्वयं जांच प्रतिवेदन ही दोषपूर्ण है क्योंकि विभाग द्वारा जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया, उन्हें किसी गवाह की परीक्षा द्वारा औपचारिक रूप से सिद्ध ही नहीं किया गया। समर्थन में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय Roop Singh Negi vs. Punjab National Bank & Ors. (2009) 2 SCC 570 तथा पटना उच्च न्यायालय के दो निर्णयों — Ashwini Kumar vs. State of Bihar & Ors. 2017 (3) PLJR 500 और Obaidur Rahman vs. State of Bihar & Ors. 2009 (4) PLJR 451 — पर भरोसा किया।
दूसरी ओर, राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही विधिसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप चलाई गई। प्रत्येक चरण पर कारण-पत्र दिए गए और अवसर प्रदान किए गए। याचिकाकर्ता को जांच प्रतिवेदन दिया गया और जवाब देने का अवसर दिया गया। उनका जवाब विचार में लेने के बाद ही दंडादेश पारित किया गया। प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि तीन सदस्यीय प्रतिवेदन (परिशिष्ट-5) पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर केवल इस कारण नहीं हैं कि निरीक्षण के समय वे उपस्थित नहीं थे, और दंडादेश में कोई अवैधता नहीं है।
न्यायालय ने तब तथ्यों एवं अभिलेखों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। इसने प्रत्येक आरोप के संबंध में याचिकाकर्ता की स्थिति पर ध्यान दिया। आरोप 1 और 2 के लिए, याचिकाकर्ता का पक्ष था कि उन्होंने 27.12.2009 को ही जिला पदाधिकारी के निर्देशों का अनुपालन कर लिया था — स्थानीय अधिकारियों के साथ समन्वय कर, दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक निरीक्षण में भाग लेकर तथा उसी संध्या प्राथमिकी दर्ज कराकर। आरोप 3 के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि गया का अतिरिक्त प्रभार होने के कारण उन्हें वहां जाना पड़ा ताकि बालू घाटों की समय पर नीलामी सुनिश्चित हो सके, जो राज्य के व्यापक हित में था। आरोप 4 के लिए उन्होंने कहा कि 27.12.2009 की प्रतिवेदन रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर का न होना अवज्ञा नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि वे स्वयं प्राथमिकी में सूचक (informant) हैं।
न्यायालय ने 27.12.2009 की निरीक्षण रिपोर्ट और प्राथमिकी के बीच गंभीर विसंगति पर गौर किया। 27.12.2009 दिनांकित वह रिपोर्ट, जो अंचल पदाधिकारी, गिरियक द्वारा प्रस्तुत की गई थी, पर गिरियक थाना प्रभारी, गिरियक सर्किल के पुलिस निरीक्षक तथा अंचल पदाधिकारी के हस्ताक्षर थे। उस रिपोर्ट में गलत रूप से यह उल्लेख था कि गिरियक थाना कांड संख्या 196/2009 जिला खनन पदाधिकारी, नालंदा द्वारा दर्ज कराया गया।
जबकि परिशिष्ट-4 के रूप में प्रस्तुत स्वयं प्राथमिकी से स्पष्ट था कि सूचक याचिकाकर्ता हैं, जो सहायक निदेशक, खान एवं भू-विज्ञान, नालंदा के रूप में कार्यरत थे। यह विरोधाभास निरीक्षण रिपोर्ट के उस संस्करण को कमज़ोर करता है, जो याचिकाकर्ता को प्राथमिकी से अलग दिखाने की कोशिश कर रहा था।
इसके बाद न्यायालय ने आरोपपत्र की संरचना पर ध्यान दिया। कॉलम 2 में चारों आरोप दर्ज थे। कॉलम 3, जो साक्ष्य से संबंधित था, में केवल दो दस्तावेजों का उल्लेख था: नालंदा कलेक्टरेट, बिहार शरीफ द्वारा जारी पत्र संख्या 6671, दिनांक 27.12.2009 तथा उसी कार्यालय से जारी पत्र संख्या 360, दिनांक 14.1.2010।
जांच प्रतिवेदन का अवलोकन करने पर न्यायालय ने पाया कि प्रस्तुतिकरण पदाधिकारी द्वारा कोई अन्य साक्ष्य प्रस्तुत ही नहीं किया गया। यद्यपि प्रतिवेदन में अस्पष्ट रूप से कुछ मौखिक साक्ष्य का उल्लेख था, परंतु यह नहीं बताया गया कि किसे परीक्षित किया गया और उसने क्या कहा। किसी गवाह के परीक्षा की कोई स्पष्ट अभिलेख नहीं थी, न ही आरोपों अथवा दस्तावेजों को सिद्ध करने के लिए किसी साक्षी की गवाही दर्ज थी।
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि न तो किसी गवाह की परीक्षा कर आरोपों का समर्थन किया गया और न ही आरोपपत्र में सूचीबद्ध दोनों दस्तावेजों को किसी साक्ष्य के माध्यम से सिद्ध किया गया। इसके बावजूद, जांच प्रतिवेदन में एक अन्य दस्तावेज — पत्र संख्या 12, दिनांक 27.12.2009 — का उल्लेख किया गया, जिसे आरोपपत्र में साक्ष्य के रूप में सूचीबद्ध तक नहीं किया गया था। इससे यह और स्पष्ट हुआ कि जांच अत्यंत ढीले-ढाले तरीके से की गई।
इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने माना कि यह याचिकाकर्ता के विरुद्ध “कोई साक्ष्य न होने” का मामला है। अनुशासनात्मक निष्कर्ष विधिसम्मत प्रमाण से समर्थित नहीं थे।
न्यायालय ने तत्पश्चात सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Roop Singh Negi का हवाला दिया। वहां सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि अनुशासनात्मक कार्यवाही अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) प्रकृति की होती है। जांच अधिकारी को अपने निष्कर्ष ऐसे साक्ष्य पर आधारित करने होते हैं जो विधिसम्मत रूप से अभिलेख पर लाए गए हों। जांच के दौरान संग्रहित दस्तावेज स्वयं में साक्ष्य नहीं माने जा सकते जब तक कि उन्हें गवाहों की गवाही से सिद्ध न किया जाए। बिना उसमें निहित तथ्यों के प्रमाण के, केवल प्राथमिकी (FIR) अपने आप में विभागीय जांच के लिए साक्ष्य नहीं होती।
न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के खंडपीठ के निर्णय Devendra Prasad vs. The State of Bihar & Ors. (LPA No. 1302 of 2017, निर्णय दिनांक 19.10.2023) का भी संदर्भ दिया। Roop Singh Negi का अनुसरण करते हुए उस निर्णय में दोहराया गया कि विभागीय जांच में दस्तावेजों को गवाहों द्वारा सिद्ध करना अनिवार्य है; पुलिस के समक्ष दिए गए कथित स्वीकारोक्ति या बयान भी बिना समर्थक साक्ष्य के पर्याप्त नहीं; और यह कि कितनी भी प्रबल शंका हो, वह विधिसम्मत प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकती।
इन स्थापित सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध की गई जांच विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है। आरोप सिद्ध करने के लिए कोई स्वीकृत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, कोई गवाह परीक्षित नहीं हुआ, और दस्तावेज सिद्ध नहीं किए गए। जांच प्रतिवेदन विधिसम्मत प्रमाण के स्थान पर केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित था।
अतः, उपरोक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों में न्यायालय ने यह घोषित किया कि मेमो संख्या 278, दिनांक 30.1.2012, जिसके माध्यम से दंडादेश पारित किया गया था, विधि की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है। इसे निरस्त कर दिया गया।
रिट याचिका सभी परिणामी राहतों सहित स्वीकार कर ली गई। इसका अर्थ यह है कि याचिकाकर्ता उन समस्त लाभों की बहाली के हकदार हैं, जो निंदा, वेतन-वृद्धियों की रोक तथा निलंबन अवधि के दौरान वेतन न दिए जाने के कारण प्रभावित हुए थे, बशर्ते कि विभाग न्यायालय के आदेश को लागू करे।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय उन सरकारी कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो विभागीय जांच का सामना कर रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि केवल शंका, अनुमान या असिद्ध दस्तावेजों के आधार पर किसी कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने पुनः स्थापित किया कि विभागीय कार्यवाही, भले ही आपराधिक मुकदमे की तुलना में कम औपचारिक हो, फिर भी बुनियादी न्यायसंगतता के नियम वहाँ भी लागू होते हैं। जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया जा रहा है, उन्हें गवाहों के माध्यम से सिद्ध किया जाना आवश्यक है। जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए कि कौन-कौन से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए और वे आरोपों का समर्थन किस प्रकार करते हैं।
कर्मचारियों, विशेषकर बिहार में कार्यरत कर्मचारियों के लिए, यह निर्णय यह भरोसा देता है कि यदि अनुशासनात्मक कार्रवाई “कोई साक्ष्य न होने” की स्थिति में की गई हो, तो उसे पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। विभागों के लिए यह संदेश है कि जांच सावधानीपूर्वक, विधिवत साक्ष्य संकलन के साथ की जानी चाहिए, न कि केवल पहले से तय दंड को उचित ठहराने के लिए।
यह मामला यह भी दर्शाता है कि जब कोई अधिकारी स्वयं प्राथमिकी दर्ज कराने और निरीक्षण में भाग लेने जैसे कदम उठाता है, तो ऐसी कार्रवाइयों की उपेक्षा नहीं की जा सकती और न ही विभागीय अभिलेखों में उन्हें तोड़-मरोड़ कर लापरवाही या अवज्ञा के आरोप गठित किए जा सकते हैं।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: जब किसी विभागीय जांच में कोई गवाह परीक्षित न किया गया हो और साक्ष्य के रूप में सूचीबद्ध दस्तावेज सिद्ध न किए गए हों, तब क्या याचिकाकर्ता पर लगाया गया विभागीय दंड टिकाऊ है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि यह “कोई साक्ष्य न होने” का मामला है। मेमो संख्या 278, दिनांक 30.1.2012 में निहित दंडादेश को विधिक रूप से अस्थिर पाते हुए रद्द कर दिया गया और रिट याचिका को परिणामी राहतों सहित स्वीकार कर लिया गया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय
- Roop Singh Negi vs. Punjab National Bank & Ors.; (2009) 2 SCC 570
- Devendra Prasad vs. The State of Bihar & Ors., LPA No. 1302 of 2017, judgment dated 19.10.2023 (Patna High Court, Division Bench)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 11966 of 2012
मामले का शीर्षक: Biswajit Dan vs. The State of Bihar & Ors.
पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति पार्थ सारथी
उद्धरण: 2025 (4) PLJR 266
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री संजीव कुमार, अधिवक्ता
प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: श्री विश्व मोहन कुमार सिन्हा, अधिवक्ता
खनन विभाग की ओर से: श्री नरेश दीक्षित, Spl. P.P.; सुश्री कल्पना, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: खान एवं भू-विज्ञान विभाग, बिहार सरकार द्वारा जारी विभागीय दंडादेश को चुनौती देते हुए दायर नागरिक रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत रिट याचिका।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
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