निर्णय की सरल व्याख्या
यह मामला बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा जारी एक सरकारी टेंडर से जुड़ा हुआ है। इस टेंडर का उद्देश्य था बिहार के विभिन्न जिलों में स्थित बाल देखभाल संस्थानों (Child Care Institutions) में लगे CCTV कैमरों की Annual Maintenance Contract (AMC) यानी वार्षिक रख-रखाव की व्यवस्था करना। साथ ही, पटना स्थित केंद्रीय सर्वर के रख-रखाव का काम भी इसी टेंडर में शामिल था।
इस टेंडर को 6 मार्च 2023 को जारी किया गया था। इसमें एक निजी फर्म (जिसे यहां याचिकाकर्ता कहा गया है) ने भाग लिया और तकनीकी व वित्तीय प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे L1 बिडर घोषित किया गया। आमतौर पर L1 बिडर का मतलब होता है कि उसने सबसे कम कीमत की बोली लगाई है और वही काम पाने का प्रमुख दावेदार होता है।
लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
25 अप्रैल 2023 को समाज कल्याण विभाग ने एक ऑफिस मेमो जारी कर इस पूरे टेंडर को रद्द कर दिया। इस मेमो में स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि टेंडर क्यों रद्द किया गया। इसी बात से नाराज़ होकर याचिकाकर्ता पटना हाईकोर्ट पहुंचा।
याचिकाकर्ता का कहना था कि:
- वह सभी योग्यताओं पर खरा उतरा था
- उसे L1 बिडर घोषित किया गया था
- सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी थीं
- फिर भी बिना कोई कारण बताए टेंडर रद्द कर दिया गया
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि टेंडर रद्द करने के बाद जो नया टेंडर निकाला गया, उसका उद्देश्य सिर्फ उसे काम से बाहर करना था।
इस बीच, सरकार ने 22 मई 2023 को एक नया टेंडर भी निकाला। इस नए टेंडर में याचिकाकर्ता ने भाग नहीं लिया। केवल एक ही बिडर के भाग लेने के कारण यह दूसरा टेंडर भी रद्द हो गया। सरकार ने संकेत दिया कि अब वह फिर से नया टेंडर जारी करेगी।
सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि याचिकाकर्ता द्वारा जो कीमत (लगभग ₹2.34 करोड़) कोट की गई थी, वह बहुत ज्यादा थी। सरकार ने यह भी बताया कि 14 अप्रैल 2023 को टेंडर कमेटी की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि इतनी अधिक राशि पर टेंडर को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। यानी कारण पहले से दर्ज थे, लेकिन ऑफिस मेमो में उनका उल्लेख नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने सरकारी रिकॉर्ड मंगवाकर देखा और पाया कि:
- वर्ष 2019 में यही याचिकाकर्ता CCTV कैमरों की सप्लाई + इंस्टॉलेशन + 3 साल की मेंटेनेंस का काम लगभग ₹2.49 करोड़ में कर चुका था
- जबकि 2023 में सिर्फ एक साल की मेंटेनेंस के लिए ₹2.51 करोड़ (GST के बिना) की बोली लगाई गई
अदालत ने इसे अत्यधिक और असंगत मूल्य (astronomical price) माना।
कोर्ट ने कहा कि:
- सरकारी पैसे की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है
- यदि कीमत अनुचित रूप से अधिक हो, तो टेंडर रद्द किया जा सकता है
- भले ही आदेश में कारण न लिखे गए हों, लेकिन यदि फाइल में पहले से कारण मौजूद हों, तो निर्णय वैध माना जाएगा
इसी आधार पर पटना हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला आम जनता और सरकारी व्यवस्था—दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
आम जनता के लिए:
- यह निर्णय दिखाता है कि अदालतें यह सुनिश्चित करती हैं कि सरकारी धन का दुरुपयोग न हो
- सिर्फ सबसे कम बोली लगाने से ही किसी को काम पाने का अधिकार नहीं मिल जाता
- यदि कीमत तर्कसंगत नहीं है, तो सरकार उसे अस्वीकार कर सकती है
सरकार और प्रशासन के लिए:
- टेंडर रद्द करने के निर्णय को अदालत का समर्थन मिला
- यह स्पष्ट हुआ कि यदि फाइल में कारण दर्ज हैं, तो आदेश वैध रहेगा
- भविष्य में विभागों को यह सीख मिलती है कि कारणों को स्पष्ट रूप से आदेश में भी लिखना बेहतर होता है
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या L1 बिडर को काम मिलना अनिवार्य है?
➤ नहीं। अदालत ने कहा कि L1 बिडर होना कोई स्थायी अधिकार नहीं देता। - क्या बिना कारण लिखे टेंडर रद्द किया जा सकता है?
➤ यदि कारण फाइल में पहले से दर्ज हों, तो हाँ। - क्या अदालत सरकारी रिकॉर्ड देख सकती है?
➤ हाँ। अदालत रिकॉर्ड मंगवाकर कारणों की जांच कर सकती है। - क्या अधिक कीमत टेंडर रद्द करने का वैध आधार है?
➤ बिल्कुल। सार्वजनिक धन की सुरक्षा सर्वोपरि है।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Commissioner of Police, Bombay v. Gordhandas Bhanji, 1951 SCC 1088
- Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner, (1978) 1 SCC 405
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Governing Council of Kidwai Memorial Institute of Oncology v. Pandurang Godwalkar (Dr.), (1992) 4 SCC 719
मामले का शीर्षक
M/s INATSG (International Advance Technology and Service Group) बनाम State of Bihar एवं अन्य
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 9448 of 2023
न्यायमूर्ति गण का नाम
- माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजन्थरी
- माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- श्री संजय श्रीवास्तव – याचिकाकर्ता की ओर से
- श्री पी. के. वर्मा (सीनियर एडवोकेट, AAG-3),
श्रीमती कुमारी अमृता (GP-3),
श्री मिथिलेश कुमार उपाध्याय – राज्य सरकार की ओर से
निर्णय का लिंक
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