पटना उच्च न्यायालय का फैसला: मदरसा शिक्षकों को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ का अधिकार नहीं (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 28 नवम्बर 2022 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि गैर सरकारी मान्यता प्राप्त सहायता प्राप्त मदरसों (aided Madarsas) के शिक्षकों को पेंशन, ग्रेच्युटी या अन्य सेवानिवृत्ति लाभ (retiral benefits) का अधिकार नहीं है, भले ही उनकी तनख्वाह राज्य सरकार द्वारा दी जाती हो।

यह फैसला चार अलग-अलग याचिकाओं पर दिया गया जिन्हें एक साथ सुना गया क्योंकि सभी में एक जैसी कानूनी माँग थी — मदरसा शिक्षकों को सरकारी शिक्षकों की तरह सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ दिए जाएँ।

याचिकाकर्ता ऐसे शिक्षक थे जो राज्य के विभिन्न मान्यता प्राप्त मदरसों में कार्यरत थे और सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनका कहना था कि बिहार मदरसा शिक्षा बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों के शिक्षकों को सरकार से नियमित वेतन मिलता है, इसलिए उन्हें सरकारी स्कूल के शिक्षकों के समान待遇 मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार सरकार के परिपत्र संख्या 237 दिनांक 20 फरवरी 1990 के अनुसार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों (minority institutions), मदरसों और संस्कृत विद्यालयों को वेतन और भत्ते उसी प्रकार मिलने चाहिए जैसे सरकारी विद्यालयों को मिलते हैं।

राज्य सरकार ने इसका विरोध किया और स्पष्ट किया कि उक्त परिपत्र संख्या 237 को बाद में परिपत्र संख्या 893 दिनांक 8 नवम्बर 1990 से संशोधित कर दिया गया था। संशोधित परिपत्र के अनुसार वेतन और अन्य लाभ केवल अल्पसंख्यक संस्थानों तक सीमित रखे गए थे, मदरसों और संस्कृत विद्यालयों तक नहीं। राज्य ने कहा कि मदरसे संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत आने वाले अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हैं, इसलिए उन्हें सेवानिवृत्ति लाभ नहीं दिया जा सकता।

राज्य ने अपने पक्ष में बैद्यनाथ झा बनाम बिहार राज्य (LPA No. 43 of 2016) नामक उच्च न्यायालय के दो-न्यायाधीशों वाले पीठ (Division Bench) के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें पहले ही यह तय किया जा चुका था कि मदरसा और संस्कृत विद्यालयों के शिक्षक सरकारी कर्मचारी नहीं माने जाएंगे, इसलिए उन्हें पेंशन या ग्रेच्युटी जैसे लाभ नहीं मिलेंगे।

याचिकाकर्ताओं ने कुछ पुराने फैसलों का हवाला दिया, जिनमें एकल पीठ ने मदरसा शिक्षकों को लाभ दिया था। लेकिन न्यायालय ने पाया कि वे आदेश बिना राज्य सरकार की जवाबी दलील के और बिना परिपत्र संख्या 893 या बैद्यनाथ झा के फैसले पर विचार किए हुए दिए गए थे। इस कारण वे आदेश कानूनी रूप से प्रभावी नहीं माने जा सकते।

माननीय न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक विद्यालय और सहायता प्राप्त मदरसे दो अलग संस्थागत श्रेणियाँ हैं। अल्पसंख्यक विद्यालय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत धार्मिक या भाषायी अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा स्थापित किए जाते हैं और बिहार गैर सरकारी माध्यमिक विद्यालय (प्रबंधन ग्रहण) अधिनियम, 1981 के अधीन आते हैं। इसके विपरीत मदरसे निजी प्रबंधन समितियों द्वारा संचालित होते हैं जिन्हें सरकार से केवल आर्थिक सहायता मिलती है।

अदालत ने कहा कि बैद्यनाथ झा मामले में पहले ही यह तय किया जा चुका है कि मदरसा शिक्षकों को केवल वेतन संशोधन (pay revision) और महँगाई भत्ता (DA) सरकारी शिक्षकों के बराबर मिल सकता है, लेकिन वे पेंशन या ग्रेच्युटी के पात्र नहीं हैं क्योंकि वे निजी संस्थानों के कर्मचारी हैं, न कि सरकारी कर्मचारी।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि बैद्यनाथ झा के निर्णय के खिलाफ किसी ने अपील नहीं की थी, इसलिए वह फैसला अंतिम और बाध्यकारी है। इसी आधार पर न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने कहा कि अब यह मुद्दा पूरी तरह तय हो चुका है और मदरसा शिक्षकों की याचिकाएँ निराधार हैं।

इस प्रकार, न्यायालय ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और मदरसा शिक्षकों को सेवानिवृत्ति या पेंशन लाभ देने से इनकार कर दिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला बिहार के हजारों मदरसा और संस्कृत विद्यालय के शिक्षकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे शिक्षक भले ही सरकारी अनुदान से वेतन पाते हों, वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और उन्हें पेंशन या अन्य सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिलेंगे।

सरकार के लिए यह निर्णय नीतिगत दृष्टि से राहत देने वाला है क्योंकि इससे वित्तीय भार बढ़ने से बचा। साथ ही, यह फैसला नीति के स्तर पर एकरूपता (uniformity) लाता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल उन्हीं कर्मचारियों को पेंशन दी जाए जो सीधे सरकारी सेवा में हैं या जिन संस्थानों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

यह फैसला निजी प्रबंधन समितियों द्वारा संचालित मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के लिए भी मार्गदर्शन देता है। उन्हें अपने कर्मचारियों को नियुक्ति के समय यह स्पष्ट करना होगा कि सरकारी पेंशन या ग्रेच्युटी के लाभ उपलब्ध नहीं होंगे।

कानूनी दृष्टि से यह निर्णय यह स्थापित करता है कि “अनुदान प्राप्त संस्था” (grant-in-aid institution) के कर्मचारी निजी ही माने जाएंगे; केवल अनुदान लेने से कोई संस्था सरकारी नहीं बन जाती।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या मदरसा शिक्षक सरकारी शिक्षकों की तरह पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ पाने के पात्र हैं?
    ✔ नहीं। वे निजी संस्थान के कर्मचारी हैं, सरकारी नहीं।
  • क्या परिपत्र संख्या 237 (20.02.1990) मदरसों को भी लाभ देता है?
    ✔ नहीं। बाद में परिपत्र संख्या 893 (08.11.1990) से इसे संशोधित कर लाभ केवल अल्पसंख्यक संस्थानों तक सीमित कर दिया गया।
  • क्या पहले के कुछ फैसले जिनमें लाभ दिया गया था, आज भी मान्य हैं?
    ✔ नहीं। वे फैसले बिना आवश्यक तथ्यों और दस्तावेज़ों पर विचार किए दिए गए थे।
  • क्या मदरसे और अल्पसंख्यक विद्यालय समान माने जा सकते हैं?
    ✔ नहीं। मदरसे निजी संस्था हैं जबकि अल्पसंख्यक विद्यालयों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है।
  • अंतिम निर्णय: सभी याचिकाएँ खारिज की गईं, मदरसा शिक्षकों को सेवानिवृत्ति या पेंशन लाभ नहीं मिलेगा।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Minority Secondary Teachers Association v. State of Bihar, CWJC No. 2897 of 2005
  • Md. Rustam Ali v. State of Bihar, CWJC No. 11015 of 2016
  • Neyaz Ahmad v. State of Bihar, CWJC No. 4145 of 2019

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Baidyanath Jha v. State of Bihar, LPA No. 43 of 2016 (Division Bench, Patna High Court)

मामले का शीर्षक
Syed Neyaz Ahmad & Ors. v. State of Bihar & Ors.

केस नंबर
CWJC No. 8071 of 2021, CWJC No. 9197 of 2021, CWJC No. 9758 of 2021, CWJC No. 11870 of 2021

उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 240

न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री राज नंदन प्रसाद, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री संजय कुमार (AC to GP-17), श्री अरविंद कुमार (AC to GP-23), श्री ललित किशोर (महाधिवक्ता), श्री मदनजीत कुमार (GP-20)

निर्णय की तिथि
28 नवम्बर 2022

निर्णय का लिंक
MTUjODA3MSMyMDIxIzEjTg==-y0PNB05bPUM=

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