निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सेवा संबंधी मामले में यह स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति या वरिष्ठता से जुड़े विवादों को समय पर उठाना चाहिए, नहीं तो उन्हें न्यायिक राहत नहीं मिलेगी।
यह मामला दो सरकारी चालकों से जुड़ा था, जो केंद्रीय उत्पाद एवं सेवा कर विभाग (Central Excise and Service Tax Department), पटना में कार्यरत थे। दोनों ने यह मांग की थी कि उन्हें Driver Grade-II पद पर 1 अप्रैल 2013 से पदोन्नत माना जाए, जबकि विभाग ने उन्हें 24 जुलाई 2014 को पदोन्नति दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों कर्मचारियों का कहना था कि विभाग को 2013 में ही उनकी पदोन्नति पर विचार करना चाहिए था। लेकिन उन्हें एक साल बाद प्रमोशन दिया गया। उन्होंने 2015 और 2016 में दो बार आवेदन देकर अपने पदोन्नति की तारीख संशोधित करने का अनुरोध किया। विभाग ने उनके आवेदन क्रमशः 22 जनवरी 2016 और 16 अगस्त 2016 को खारिज कर दिए।
इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), पटना बेंच में याचिका (O.A. No. 642/2016) दायर की, जिसे 30 जनवरी 2020 को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि मामला काफी देर से उठाया गया है।
इसके बाद दोनों चालकों ने पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका (CWJC No. 14811/2021) दायर की।
अदालत की टिप्पणियाँ
माननीय न्यायमूर्ति पी.बी. बाजंथरी और माननीय न्यायमूर्ति पूर्णेन्दु सिंह की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला पूरी तरह देरी (delay) और लापरवाही (laches) का है।
न्यायालय ने कहा कि कर्मचारियों को प्रमोशन पर विचार 1 अप्रैल 2013 को होना था, और उन्हें प्रमोशन 24 जुलाई 2014 को मिला। यदि उन्हें कोई आपत्ति थी, तो उन्हें उसी समय या छह महीने के भीतर कानूनी कदम उठाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया:
- P.S. Sadasivaswamy vs. State of Tamil Nadu (AIR 1974 SC 2271), जिसमें कहा गया कि यदि कोई कर्मचारी पदोन्नति या वरिष्ठता से असंतुष्ट है, तो उसे छह महीने के भीतर अदालत का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए।
- इस सिद्धांत को बाद में Vijay Kumar Kaul vs. Union of India (2012) 7 SCC 610 में दोहराया गया।
न्यायालय ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं ने उन अन्य कर्मचारियों को पक्षकार नहीं बनाया जिन्हें 2013 से 2014 के बीच पदोन्नति मिली थी। यदि याचिकाकर्ताओं को पीछे की तारीख से प्रमोशन दिया जाता, तो इससे उन अन्य कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होते। अदालत ने कहा कि ऐसा आदेश “प्रशासनिक अराजकता (administrative chaos)” पैदा कर सकता है।
अदालत का निर्णय
न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि –
- याचिकाकर्ताओं ने अत्यधिक देरी से मामला उठाया,
- उन्होंने आवश्यक पक्षकारों को शामिल नहीं किया,
- और ऐसा कोई असाधारण कारण नहीं था जिससे देरी को माफ किया जा सके।
इस प्रकार, न्यायालय ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के निर्णय को बरकरार रखते हुए, चालकों की याचिका खारिज कर दी।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव
- सेवा विवादों में समयबद्धता अनिवार्य: इस फैसले ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति, वरिष्ठता या सेवा लाभ से जुड़े विवादों को देर से उठाने पर अदालत राहत नहीं देगी।
- प्रशासनिक स्थिरता का संरक्षण: पुराने प्रमोशन मामलों को फिर से खोलने से विभागों में भ्रम और असंतोष फैलता है। अदालत ने कहा कि यह स्थायी प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ है।
- सरकारी कर्मचारियों के लिए चेतावनी: यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी अपने अधिकार को लेकर असंतुष्ट है, तो उसे छह महीने के भीतर कार्यवाही करनी चाहिए।
- न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता: यदि किसी आदेश से अन्य कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, तो उन्हें भी सुनवाई में शामिल करना आवश्यक है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या याचिकाकर्ता 1 अप्रैल 2013 से पदोन्नति के पात्र थे?
➤ नहीं। उन्हें 24 जुलाई 2014 को सही रूप से पदोन्नत किया गया और उन्होंने समय पर आपत्ति नहीं की। - क्या देरी से दायर याचिका पर विचार किया जा सकता है?
➤ नहीं। न्यायालय ने कहा कि इतनी देर से दायर याचिका कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। - क्या बिना अन्य प्रभावित कर्मचारियों को पक्षकार बनाए राहत दी जा सकती है?
➤ नहीं। ऐसा करना प्रशासनिक अव्यवस्था पैदा करेगा।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- P.S. Sadasivaswamy vs. State of Tamil Nadu (AIR 1974 SC 2271)
- Vijay Kumar Kaul & Ors. vs. Union of India (2012) 7 SCC 610
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- P.S. Sadasivaswamy vs. State of Tamil Nadu (AIR 1974 SC 2271)
- Vijay Kumar Kaul & Ors. vs. Union of India (2012) 7 SCC 610
मामले का शीर्षक
सरकारी चालकगण (याचिकाकर्ता) बनाम भारत संघ एवं अन्य
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 14811 of 2021
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 217
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बाजंथरी
माननीय श्री न्यायमूर्ति पूर्णेन्दु सिंह
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री एम.पी. दीक्षित, श्री एस.के. दीक्षित, श्री एस.के. चौबे, श्रीमती स्वस्तिका
- प्रतिवादियों की ओर से: श्री अंशय बहादुर माथुर, अधिवक्ता
निर्णय का लिंक
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