पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की APO परीक्षा विवाद – 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) द्वारा निकाली गई सहायक अभियोजन अधिकारी (APO) की भर्ती परीक्षा से जुड़ा था, जिसे विज्ञापन संख्या 01/2020 के तहत जारी किया गया था। दो याचिकाएँ एक साथ सुनी गईं। याचिकाकर्ताओं ने 27 अप्रैल 2021 को घोषित प्रारंभिक परीक्षा परिणाम को रद्द करने और नया परिणाम प्रकाशित करने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क दो थे –

  1. कि आयोग को मुख्य परीक्षा के लिए उम्मीदवारों का चयन 1:10 अनुपात में करना चाहिए था, यानी हर पद के लिए दस अभ्यर्थियों को बुलाना चाहिए था।
  2. कि प्रश्न-पत्र (Paper-II, कानून विषय) में कुछ मॉडल उत्तर (Answer Key) गलत थे, जिससे उनके अंक घटे और वे मेरिट सूची से बाहर रह गए।

वाद के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने अपनी आपत्ति केवल पाँच प्रश्नों तक सीमित कर दी – प्रश्न संख्या 63, 90, 93, 94, और 97। दूसरी याचिका में अन्य पाँच प्रश्नों (सेट-C के प्रश्न 19, 21, 22, 25 और 89) पर विवाद था। उनका कहना था कि अगर सही उत्तरों पर मूल्यांकन होता, तो वे कट-ऑफ पार कर लेते और मुख्य परीक्षा में शामिल हो जाते।

BPSC की ओर से कहा गया कि उत्तर कुंजी विशेषज्ञ समिति द्वारा जांची गई थी और अदालत को परीक्षा प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, क्योंकि मुख्य परीक्षा जल्द ही आयोजित होने वाली थी। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय रन विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018) 2 SCC 357 का हवाला दिया और कहा कि अदालत को उत्तर कुंजी की पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया में दखल नहीं देना चाहिए।

पटना उच्च न्यायालय ने दोनों याचिकाएँ खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में न्यायालय का दखल केवल अपवाद स्वरूप ही हो सकता है, जब गलती स्पष्ट और निर्विवाद हो। अदालत ने कहा –

  • सुप्रीम कोर्ट ने Ran Vijay Singh केस में स्पष्ट किया है कि उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन केवल दुर्लभ परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
  • जब तक कोई गंभीर और प्रत्यक्ष गलती न हो, अदालतों को विशेषज्ञों के निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
  • अदालत ने यह भी माना कि इस स्तर पर परीक्षा रोकने या परिणाम रद्द करने से हजारों उम्मीदवार प्रभावित होंगे, जिससे सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचेगा।

इसके अलावा अदालत ने यह भी बताया कि यह याचिका आवश्यक पक्षकारों को शामिल किए बिना दायर की गई थी। पहले ही एक समन्वय पीठ ने कहा था कि परिणाम रद्द करने से पहले चयनित अभ्यर्थियों को पक्षकार बनाना आवश्यक है, अन्यथा न्यायालय ऐसा आदेश नहीं दे सकता।

मामले की पृष्ठभूमि में यह भी महत्वपूर्ण था कि एक अन्य केस (CWJC No. 10649/2021) में एकल पीठ ने पहले ही आयोग को संशोधित परिणाम प्रकाशित करने का निर्देश दिया था। उस आदेश के खिलाफ अपील (LPA No. 664/2021) भी खारिज कर दी गई थी। इसके बाद आयोग ने 15 सितम्बर 2022 को संशोधित प्रारंभिक परिणाम जारी किया, जिसमें 1475 नए उम्मीदवारों को शामिल किया गया। लेकिन इन याचिकाकर्ताओं का नाम फिर भी सफल सूची में नहीं आया, और उन्होंने इस संशोधित परिणाम को चुनौती भी नहीं दी।

इन सभी कारणों से अदालत ने माना कि याचिकाओं में कोई दम नहीं है और भर्ती प्रक्रिया को बाधित करना जनहित के खिलाफ होगा। इस आधार पर दोनों याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि न्यायालय भर्ती परीक्षाओं में हस्तक्षेप करने से पहले बहुत सावधानी बरतते हैं। केवल इसलिए कि किसी उम्मीदवार को कुछ प्रश्नों में गलती लगती है, अदालत परीक्षा परिणाम रद्द नहीं कर सकती।

आयोगों जैसे BPSC के लिए यह निर्णय महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि—

  • भर्ती विज्ञापन में लिखी शर्तों को बाद में नहीं बदला जा सकता, और
  • परीक्षा परिणाम प्रकाशित करने में पारदर्शिता आवश्यक है।

जनहित के दृष्टिकोण से यह निर्णय इसलिए भी अहम है क्योंकि अगर हर उम्मीदवार अपने उत्तरों पर विवाद लेकर अदालत पहुँच जाए, तो भर्ती प्रक्रिया अनिश्चित काल तक लटकी रह जाएगी। इसलिए अदालत ने “प्रणालीगत निष्पक्षता” (systemic fairness) को व्यक्तिगत शिकायतों पर प्राथमिकता दी।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या अदालत उत्तर कुंजी में बताई गई गलतियों की जाँच कर सकती है?
    🔹 नहीं। जब तक गलती स्पष्ट और निर्विवाद न हो, अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी।
  • क्या आयोग को 1:10 अनुपात में उम्मीदवारों को मुख्य परीक्षा के लिए बुलाना चाहिए था?
    🔹 इस पर पहले ही अपीलीय आदेश के अनुसार संशोधित परिणाम जारी हो चुका था, जिसमें याचिकाकर्ता फिर भी सफल नहीं हुए।
  • क्या याचिका आवश्यक पक्षकारों के बिना सुनवाई योग्य थी?
    🔹 नहीं। चयनित अभ्यर्थियों को पक्षकार बनाए बिना परिणाम रद्द नहीं किया जा सकता।
  • क्या परीक्षा रोकना या पुनर्मूल्यांकन जनहित में था?
    🔹 नहीं। परीक्षा की अगली प्रक्रिया तय समय में पूरी करना ही जनहित में था।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • High Court of Tripura v. Tirtha Sarathi Mukherjee, 2019 (2) PLJR 114 (SC)
  • Richal v. Rajasthan Public Service Commission, (2018) 8 SCC 81

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Ran Vijay Singh v. State of Uttar Pradesh, (2018) 2 SCC 357
  • Prakash Chandra v. State of Bihar, 2019 (3) PLJR 983
  • BPSC v. Ashish Kumar Pathak, 2021 (1) BLJ 673
  • LPA No. 664 of 2021, आदेश दिनांक 27.07.2022

मामले का शीर्षक

याचिकाकर्ता बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (APO भर्ती – BPSC)

केस नंबर

CWJC No. 11556 of 2021 और CWJC No. 16181 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 116

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री निरंजन कुमार, श्री गौरव बिहारी, अधिवक्ता
  • बिहार लोक सेवा आयोग की ओर से: श्री ललित किशोर (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री संजय पांडे
  • राज्य की ओर से: श्री प्रशांत प्रताप (G.P.-2), श्री मोहम्मद नदीम सिराज (G.P.-5)
  • अन्य याचिका में: श्री मृगांक मौली (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री कुमार निखिल

निर्णय का लिंक

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