पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: वृद्ध माता-पिता को अपने घर से उत्पीड़न करने वाले बेटे-बहू को निकालने का अधिकार – 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया कि बिहार में रहने वाले वृद्ध माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक अपने बेटा-बहू के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, यदि वे उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं या मानसिक प्रताड़ना देते हैं।
यह मामला Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 (माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम) के तहत दायर किया गया था।

इस मामले में वृद्ध दंपति ने जिला के उप-समाहर्ता (Sub-Divisional Officer), पटना सदर-cum-Maintenance Tribunal के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी कि उनका बेटा और बहू उनके साथ लगातार गाली-गलौज करते हैं, घर में झगड़ा करते हैं और मानसिक शांति भंग करते हैं।
दोनों वृद्ध माता-पिता की उम्र 70 वर्ष से अधिक थी। पिता ने अपनी नौकरी या व्यवसाय से कमाए पैसे से पटना के लोहनिपुर इलाके में तीन मंजिला मकान खरीदा और बनवाया था। इसके अलावा, उनके पास जगनपुरा (थाना-रामकृष्ण नगर) में भी एक और मकान था।

वृद्ध दंपति का कहना था कि उन्होंने अपने बेटे-बहू को मकान में रहने दिया, बच्चों की पढ़ाई में मदद की और यहां तक कि बहू के नाम पर एक जमीन भी खरीदी, फिर भी वे लोग उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं। बार-बार समझाने के बावजूद बेटे-बहू घर छोड़ने को तैयार नहीं थे।

शिकायत पर सुनवाई करते हुए Maintenance Tribunal ने दोनों पक्षों को बुलाया। बेटे-बहू ने जवाब में कहा कि उन्हें बच्चों की परीक्षा (मैट्रिक) के कारण मार्च 2018 तक रहने की अनुमति दी जाए, उसके बाद वे घर खाली कर देंगे।

Tribunal ने 22 दिसंबर 2017 को आदेश दिया कि बेटा-बहू एक महीने के भीतर लोहनिपुर वाला मकान खाली करें और माता-पिता के दूसरे मकान (जगनपुरा) में चले जाएँ। यह आदेश 2007 के अधिनियम के तहत माता-पिता की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए दिया गया था।

लेकिन बेटे-बहू ने यह आदेश मानने के बजाय पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर की (Civil Writ Jurisdiction Case No. 1586 of 2018)। उनका तर्क था कि अब “समझौता” हो गया है, इसलिए आदेश रद्द किया जाए।
वृद्ध माता-पिता ने कोर्ट में कहा कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है और बेटा-बहू अभी भी उन्हें परेशान कर रहे हैं।

माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह की एकल पीठ ने सारे दस्तावेज़ और ट्रिब्यूनल के आदेश को ध्यान से देखा। कोर्ट ने पाया कि दोनों मकान पूरी तरह से माता-पिता की स्व-अर्जित संपत्ति हैं और ट्रिब्यूनल ने बेटा-बहू को बेघर नहीं किया है, बल्कि केवल एक मकान से दूसरे मकान में जाने को कहा है।

कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल का आदेश सही है, क्योंकि कानून (2007 का अधिनियम) का मकसद है कि वृद्ध लोगों को अपने ही बच्चों से संरक्षण मिले, अगर वे दुर्व्यवहार या उत्पीड़न करें।

कोर्ट ने यह भी माना कि बेटा-बहू पहले ही ट्रिब्यूनल के सामने यह कह चुके थे कि वे मार्च 2018 के बाद घर खाली कर देंगे। ऐसे में अब पीछे हटना उचित नहीं है।

इसलिए, 29 अगस्त 2022 को पटना उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया और ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार रखा।
अब बेटा-बहू को लोहनिपुर वाला मकान खाली कर जगनपुरा वाले घर में रहना होगा।

यह निर्णय न केवल वृद्ध माता-पिता के अधिकार की रक्षा करता है बल्कि समाज को यह संदेश देता है कि यदि बच्चे माता-पिता के साथ गलत व्यवहार करें तो वे भी कानूनी संरक्षण पा सकते हैं।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • यह फैसला यह दिखाता है कि बिहार में अदालतें वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए दृढ़ हैं।
  • माता-पिता के स्व-अर्जित मकान में बेटा या बहू का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता, जब तक माता-पिता स्वयं अनुमति दें।
  • यदि माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार होता है, तो वे न केवल भरण-पोषण बल्कि घर से निकाले जाने (eviction) का आदेश भी प्राप्त कर सकते हैं।
  • यह आदेश सरकारी अधिकारियों के लिए भी उदाहरण है कि Maintenance Tribunal द्वारा दिया गया कोई भी उचित आदेश उच्च न्यायालय में सुरक्षित रहेगा।
  • समाज के लिए यह एक सकारात्मक संदेश है कि वृद्ध लोग अब डर के बिना अपने अधिकार मांग सकते हैं।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या Maintenance Tribunal को बेटा-बहू को घर खाली कराने का अधिकार था?
    ✅ हाँ, अधिनियम 2007 के तहत ट्रिब्यूनल को यह अधिकार है कि वह वृद्ध माता-पिता की सुरक्षा के लिए ऐसा आदेश दे सके।
  • क्या उच्च न्यायालय को ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप करना चाहिए था?
    ❌ नहीं, क्योंकि आदेश वैध था और किसी प्रकार की प्रक्रिया-गत गलती नहीं हुई थी।
  • क्या “समझौते” की बात सही थी?
    ❌ नहीं, क्योंकि माता-पिता ने ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं किया था।
  • क्या यह आदेश कठोर था क्योंकि बेटा-बहू को मकान छोड़ना पड़ा?
    ❌ नहीं, क्योंकि उन्हें माता-पिता के दूसरे मकान में रहने की अनुमति दी गई थी।
  • क्या बेटा-बहू अपने पुराने वादे से मुकर सकते हैं?
    ❌ नहीं, उन्होंने खुद कहा था कि परीक्षा के बाद मकान खाली करेंगे।

मामले का शीर्षक

याचिकाकर्ता (बेटा और बहू) बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 1586 of 2018

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 66

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री नंद किशोर प्रसाद सिन्हा, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री साजिद सलीम खान, स्थायी अधिवक्ता (SC-25)
  • निजी प्रतिवादी (वृद्ध माता-पिता): राज्य के माध्यम से प्रस्तुत

निर्णय का लिंक

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTU4NiMyMDE4IzEjTg==-CbG9eFczvg0=

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