पटना उच्च न्यायालय 2021 : सेवानिवृत्ति से पहले शुरू की गई विभागीय कार्यवाही पर रोक, लंबे विलंब को अदालत ने माना अनुचित

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला एक सरकारी अभियंता (याचिकाकर्ता) से जुड़ा है। वे 30 जून 2020 को सेवानिवृत्त होने वाले थे। ठीक उससे पहले, 17 जून 2020 को विभाग ने उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्णय लिया।

आरोप 2008 से 2011 की अवधि से जुड़े थे, जब वे गया में लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) में कार्यरत थे। शिकायत मिली थी कि उस समय जो हैंडपंप लगाए गए, वे निम्न गुणवत्ता के थे और अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं हुआ। एक तीन-सदस्यीय समिति ने 2012 में जांच की और कहा कि गैर-ISI हैंडपंप लगाए गए। समिति ने अभियंता पर लापरवाही और निगरानी में कमी का आरोप लगाया।

याचिकाकर्ता ने जुलाई 2013 में अपना स्पष्टीकरण दे दिया था। लेकिन उसके बाद पांच साल तक विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। फरवरी 2018 में चार्जशीट दी गई, जिसका जवाब नवंबर 2018 में दे दिया गया। फिर भी विभाग ने कोई निर्णय नहीं लिया और अचानक जून 2020 में—सिर्फ दो हफ्ते पहले—उनके सेवानिवृत्त होने से पहले विभागीय कार्यवाही का आदेश जारी कर दिया।

याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि 8–10 साल पुराने मामले को सेवानिवृत्ति से ठीक पहले उठाना अनुचित है और इससे उन्हें मानसिक पीड़ा हुई। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर भरोसा किया:

  • P.V. Mahadevan v. Managing Director, T.N. Housing Board (2005)
  • State of A.P. v. N. Radhakrishnan (1998)

इनमें कहा गया था कि विभागीय कार्यवाही में अनुचित देरी सरकारी कर्मचारी के लिए मानसिक यंत्रणा का कारण बनती है और ऐसी कार्यवाही रोक दी जानी चाहिए।

राज्य सरकार का तर्क था कि केवल देरी होने से कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कर्मचारी यह साबित न करे कि उसे नुकसान हुआ है। इसके लिए उन्होंने State of Bihar v. Kusheshwar Das (2017) पर भरोसा किया।

पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि:

  • आरोप सिर्फ “लापरवाही” और “निगरानी की कमी” तक सीमित थे, भ्रष्टाचार या अनियमितता का कोई विशेष आरोप नहीं था।
  • 2013 में जवाब मिलने के बाद इतने सालों तक विभाग ने कार्रवाई क्यों नहीं की, इसका कोई कारण नहीं बताया गया।
  • आरोप अस्पष्ट थे, यह नहीं बताया गया कि अभियंता ने कौन-सी जिम्मेदारी नहीं निभाई।
  • सेवानिवृत्ति से दो हफ्ते पहले कार्यवाही शुरू करना अनुचित और पक्षपातपूर्ण है।

अदालत ने कहा कि इस परिस्थिति में विभागीय कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत नहीं होगा। इसलिए 17 जून 2020 का आदेश रद्द कर दिया गया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • सरकारी कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित : विभाग बिना उचित कारण के कई साल बाद अचानक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता।
  • विभागीय जवाबदेही : यदि जांच रिपोर्ट मिल चुकी है और कर्मचारी ने स्पष्टीकरण दे दिया है, तो समय पर कार्रवाई करनी होगी।
  • जनता का विश्वास : अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि अधिकारियों को अनिश्चितता और मानसिक उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
  • भविष्य के लिए मार्गदर्शन : अब सरकारी विभागों को पता है कि अनुचित विलंब खुद ही कार्यवाही को अवैध बना सकता है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या 8–10 साल बाद शुरू की गई विभागीय कार्यवाही जारी रह सकती है?
    – नहीं। इतना लंबा विलंब अनुचित और हानिकारक है।
  • क्या सेवानिवृत्ति के समय कार्यवाही शुरू करना वैध है?
    – नहीं। सेवानिवृत्ति से ठीक पहले शुरू करना पक्षपातपूर्ण और अनुचित है।
  • क्या केवल लापरवाही के आरोप इतने वर्षों बाद कार्यवाही को सही ठहराते हैं?
    – नहीं। खासकर जब भ्रष्टाचार का कोई ठोस आरोप न हो।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • P.V. Mahadevan v. Managing Director, T.N. Housing Board, (2005) 6 SCC 636
  • State of A.P. v. N. Radhakrishnan, (1998) 4 SCC 154

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • P.V. Mahadevan v. Managing Director, T.N. Housing Board (2005)
  • State of A.P. v. N. Radhakrishnan (1998)
  • State of Bihar v. Kusheshwar Das (2017) (अदालत ने कहा कि यह मामला भिन्न था और यहां लागू नहीं होता)

मामले का शीर्षक

Ajoy Kumar Sinha v. State of Bihar & Ors.

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 7332 of 2020

उद्धरण (Citation)

2021(1) PLJR 629

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से : श्री सौरव सुमन, श्री संजय श्रीवास्तव, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से : श्री अरविंद उज्ज्वल, स्टैंडिंग काउंसल-4

निर्णय का लिंक

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNzMzMiMyMDIwIzEjTg==-z7jh8imhT8M=

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