पति को एकतरफा आदेश मिलने पर पत्नी की अपील सफल — पटना हाईकोर्ट ने मामले को पुनः सुनवाई के लिए भेजा

पटना उच्च न्यायालय ने एक पारिवारिक विवाद में अहम फैसला सुनाया है जिसमें पत्नी की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में पारित एकतरफा आदेश को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने पाया कि पत्नी को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला था और उसने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया।

निर्णय की सरल व्याख्या

यह अपील उस निर्णय के विरुद्ध थी जो फैमिली कोर्ट, नवादा ने 20 जुलाई 2017 को पारित किया था। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत दांपत्य अधिकारों की पुनः स्थापना (restitution of conjugal rights) के लिए मुकदमा दायर किया था।

पति का कहना था कि 5 मई 2009 को हिंदू रीति-रिवाज से विवाह हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद एक संतान हुई, जिसकी मृत्यु हो गई। जुलाई 2011 में पत्नी फिर गर्भवती हुई, लेकिन इसके बाद वह उसे छोड़कर अपने मायके चली गई और फिर लौटकर नहीं आई। पति ने आरोप लगाया कि उसने कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। 3 नवंबर 2013 को जब वह पत्नी को वापस लाने गया तो उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ।

इस मुकदमे में पत्नी ने 12 जनवरी 2015 को अदालत में अपने वकील के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन कोई लिखित जवाब (written statement) दाखिल नहीं किया गया। इसके कारण उसे बाद में जवाब दाखिल करने से वंचित कर दिया गया और मामला एकतरफा रूप से पति के पक्ष में तय कर दिया गया।

हाईकोर्ट में अपील करते हुए पत्नी ने कहा कि उसने मुकदमे की पैरवी अपने वकील पर छोड़ी थी, लेकिन वकील ने न तो ठीक से पैरवी की और न ही मामले की जानकारी दी। इस कारण वह अपना पक्ष नहीं रख सकी।

कोर्ट ने यह माना कि पत्नी को न्यायिक प्रक्रिया में उचित अवसर नहीं मिला। चूंकि मामला व्यक्तिगत और पारिवारिक अधिकारों से जुड़ा था, अतः यह आवश्यक था कि पत्नी को सुनवाई का पूरा अवसर मिले।

अंततः हाईकोर्ट ने एकतरफा निर्णय को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट फिर से नोटिस जारी कर दोनों पक्षों को बुलाए और पत्नी को लिखित उत्तर दाखिल करने का अवसर दे। इसके बाद पूरा मामला कानून के अनुसार निपटाया जाए। साथ ही, कोर्ट ने सुझाव दिया कि मामले की सुनवाई से पहले सुलह की संभावना भी तलाशी जाए।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि किसी भी व्यक्ति को उसके वकील की लापरवाही के कारण न्याय से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। खासकर पारिवारिक विवादों में जहां संबंध, भावनाएं और अधिकार जुड़े होते हैं, वहां निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिलना आवश्यक है।

यह फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि अदालतें सिर्फ कानून के पालन तक सीमित नहीं होतीं बल्कि न्याय की भावना का भी ध्यान रखती हैं। पति-पत्नी के मामलों में अदालतें सिर्फ आदेश नहीं देतीं बल्कि दोनों पक्षों को समझौते का अवसर भी देना चाहती हैं।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • मुद्दा: क्या वकील की लापरवाही के कारण पत्नी को सुनवाई का अवसर नहीं मिलना न्यायसंगत है?
    • निर्णय: नहीं, एकतरफा आदेश रद्द किया गया।
  • मुद्दा: क्या पत्नी को फिर से मुकदमे में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए?
    • निर्णय: हां, मामला दोबारा फैमिली कोर्ट को भेजा गया।
  • तर्क:
    • पत्नी ने प्रारंभ में उपस्थिति दर्ज कराई थी।
    • वकील की लापरवाही से कोई लिखित जवाब दाखिल नहीं हुआ।
    • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार सुनवाई का अधिकार जरूरी है।
    • फैमिली कोर्ट को पहले समझौते की कोशिश करनी चाहिए।

मामले का शीर्षक

कुमारी रिंकु बनाम डॉ. विक्रम कुमार

केस नंबर

Miscellaneous Appeal No. 960 of 2017

उद्धरण (Citation)

2020 (3) PLJR 28

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति हेमंत कुमार श्रीवास्तव
माननीय श्री न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

अपीलकर्ता की ओर से: श्री रविंद्र कुमार प्रियदर्शी, अधिवक्ता
प्रतिवादी की ओर से: श्री देवेंद्र प्रसाद सिंह, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MiM5NjAjMjAxNyMxI04=-xPG4TcxTjW8=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News