निर्णय की सरल व्याख्या
9 मई 2025 को पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार के स्वामित्व वाली एक निर्माण कंपनी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। यह कंपनी राज्य में पुल और सड़क निर्माण करती है। इस मामले में सवाल था कि क्या यह कंपनी 2015-16 से जून 2017 तक के दौरान सेवा कर (Service Tax) देने के लिए बाध्य थी या नहीं।
कंपनी ने दावा किया कि:
- वह पूरी तरह राज्य सरकार के स्वामित्व में है और सरकार के निर्देश पर कार्य करती है।
- उसे जो “सेंटेज” (centage) नाम की राशि मिलती है, वह केवल खर्च की भरपाई होती है, न कि कोई सेवा शुल्क।
- टोल टैक्स वसूली का काम वह सरकार की तरफ से करती है, और उसमें से सिर्फ 15% रखती है।
- उसका कार्य नगर पालिका जैसे होता है, इसलिए उसे छूट मिलनी चाहिए।
वहीं, कर विभाग का तर्क था कि:
- कंपनी खुद निर्माण नहीं करती, बल्कि प्राइवेट ठेकेदारों से काम करवाती है।
- सेंटेज दरअसल सेवा शुल्क है, ना कि सिर्फ खर्च की भरपाई।
- टोल वसूली का काम भी वह ठेकेदारों को देती है और उस पर उसे कमीशन मिलता है, जो टैक्स के दायरे में आता है।
- कंपनी न तो “सरकार” है, न “स्थानीय निकाय” और न ही “शासनिक प्राधिकरण” के कानूनी परिभाषा में आती है।
कोर्ट ने जांच कर यह पाया कि:
- यह कंपनी भले ही सरकार की हो, लेकिन यह एक पंजीकृत कंपनी है और उसे “गवर्नमेंटल अथॉरिटी” नहीं माना जा सकता।
- इसके द्वारा ली गई सेंटेज और टोल वसूली पर मिलने वाला कमीशन सेवा कर के अंतर्गत आता है।
- छूट केवल उन्हीं संस्थाओं को मिलती है जो संविधान के अनुच्छेद 243W के तहत नगर निकाय की तरह कार्य करती हैं — जो इस मामले में लागू नहीं था।
हालांकि, कोर्ट ने एक राहत यह दी कि ठेकेदारों से काटे गए जुर्माने (penalty) की राशि पर सेवा कर नहीं लगेगा क्योंकि वह नुकसान की भरपाई है, सेवा नहीं।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह निर्णय उन सभी सरकारी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है जो निर्माण या अन्य सेवाएं सरकारी योजनाओं के तहत करती हैं। यह स्पष्ट हो गया कि सिर्फ सरकार की स्वामित्व वाली संस्था होने से सेवा कर से छूट नहीं मिलती। अगर कंपनी सेवा देती है और बदले में पैसा लेती है — भले ही सरकार से ही — तब वह टैक्स के दायरे में आ सकती है।
राज्य सरकारों और उनके उपक्रमों को अपने ढांचे और कार्यशैली की कानूनी समीक्षा करनी चाहिए ताकि टैक्स से जुड़े मामलों में भविष्य में विवाद न हो।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या याचिकाकर्ता सरकार या सरकारी प्राधिकरण है?
❌ नहीं — यह कंपनी कानून के तहत पंजीकृत है, किसी अधिनियम के तहत स्थापित नहीं। - क्या सेंटेज सेवा कर के दायरे में आता है?
✅ हां — यह एक सेवा शुल्क है, न कि सिर्फ खर्च की वापसी। - क्या टोल वसूली पर मिली राशि कर के दायरे में है?
✅ हां — कंपनी को इसके बदले कमीशन मिलता है, जो सेवाओं में गिना जाएगा। - क्या ठेकेदारों से वसूली गई पेनल्टी पर टैक्स लगेगा?
❌ नहीं — यह नुकसान की भरपाई है, सेवा नहीं। - क्या विभाग ने टैक्स मांगने में देरी का सही कारण दिखाया?
✅ हां — याचिकाकर्ता ने सेवाओं की घोषणा नहीं की थी, जिससे तथ्यों को दबाने की मंशा दिखती है।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Shapoorji Paloonji and Co. Pvt. Ltd. बनाम Commissioner, Customs, Central Excise and Service Tax (2016)
- Hindustan Steel Ltd. बनाम State of Orissa, (1969) 2 SCC 627
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Union of India बनाम Rajasthan Spinning and Weaving Mills, (2009) 13 SCC 448
- CESTAT Final Order No. 50898/2023 दिनांक 06.07.2023
मामले का शीर्षक
Bihar Rajya Pul Nirman Nigam Ltd. बनाम Union of India एवं अन्य
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 9979 of 2024
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
माननीय श्री न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री डी.वी. पाठी (वरिष्ठ अधिवक्ता); श्री सदाशिव तिवारी, श्री हिरेश करण, सुश्री शिवानी देवला, श्री प्राची पल्लवी
- प्रतिवादी की ओर से: डॉ. के.एन. सिंह (वरिष्ठ अधिवक्ता व अपर सॉलिसिटर जनरल), श्री अंशुमान सिंह (वरिष्ठ अधिवक्ता, CGST), श्री शिवादित्य धारी सिन्हा
निर्णय का लिंक
e52d218c-ed9b-44d9-81f2-7e82a6b8cc2f.pdf
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