पटना उच्च न्यायालय का निर्णय (CWJC No. 10283 of 2019)
मामला: एस.एम.
जहीर आलम
शिक्षक प्रशिक्षण
कॉलेज बनाम
राष्ट्रीय शिक्षक
शिक्षा परिषद
(NCTE) व अन्य।
तारीख: 14 जनवरी 2020
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति
शिवाजी पांडेय
और माननीय
न्यायमूर्ति पार्थ
सारथी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका
दरभंगा स्थित
एस.एम. जहीर आलम शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज ने
दायर की
थी, जो
कि एक
अल्पसंख्यक शैक्षणिक
संस्थान है।
याचिका का
उद्देश्य ललित
नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) द्वारा
जारी किए
गए पत्र
(27 अप्रैल 2019) को चुनौती देना
था। इस
पत्र में
विश्वविद्यालय ने
कॉलेज द्वारा
प्रस्तुत शिक्षकों
की सूची
पर सहमति
देने से
इनकार कर
दिया था
और चयन
समिति के
गठन की
प्रक्रिया और
शिक्षकों के
चयन के
तरीकों की
जानकारी मांगी
थी।
कॉलेज ने
दावा किया
कि यह
हस्तक्षेप अल्पसंख्यक
संस्थानों के
संवैधानिक अधिकारों
के खिलाफ
है, जो
कि संविधान
के अनुच्छेद
29 और 30 में
दिए गए
हैं। याचिकाकर्ता
ने विश्वविद्यालय
के इस
कदम को
गैरकानूनी बताया
और अदालत
से हस्तक्षेप
की मांग
की।
मामले के मुख्य बिंदु
1. कॉलेज की स्थापना और मान्यता:
- कॉलेज अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और प्रबंधित है।
- इसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) द्वारा 16 अगस्त 2016 को अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।
- बिहार सरकार ने इसे 1994 में स्थायी स्वीकृति प्रदान की थी।
- राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) ने बी.एड. पाठ्यक्रम के लिए मान्यता प्रदान की थी, जिसमें 2015 से दो वर्षीय पाठ्यक्रम के लिए 150 छात्रों का वार्षिक प्रवेश स्वीकृत किया गया था।
2. विश्वविद्यालय का पक्ष:
- विश्वविद्यालय का दावा था कि वह सुनिश्चित करना चाहता है कि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया विश्वविद्यालय अधिनियम और NCTE के नियमों के अनुसार हो।
- बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 57B के तहत शिक्षकों की नियुक्ति के लिए चयन समिति का गठन आवश्यक है।
- विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक संस्थान होने के बावजूद शैक्षणिक मानकों को बनाए रखना आवश्यक है।
3. कॉलेज का पक्ष:
- कॉलेज ने तर्क दिया कि अल्पसंख्यक संस्थान होने के कारण, उसे शिक्षकों और प्रबंधन का चयन करने का पूर्ण अधिकार है।
- विश्वविद्यालय द्वारा चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत दिए गए अल्पसंख्यकों के अधिकार का उल्लंघन है।
- कॉलेज ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय केवल नियामक भूमिका निभा सकता है, न कि प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।
न्यायालय का विश्लेषण और निष्कर्ष
1. संवैधानिक अधिकार और अल्पसंख्यक संस्थान:
- न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 का हवाला दिया, जिसमें अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार दिया गया है।
- अदालत ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों के प्रशासनिक अधिकारों में सरकार या विश्वविद्यालय का अनावश्यक हस्तक्षेप अवैध है।
2. प्रशासनिक स्वायत्तता बनाम शैक्षणिक मानक:
- न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन यह स्वायत्तता “कुप्रशासन” का पर्याय नहीं हो सकती।
- शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालय यह सुनिश्चित कर सकता है कि चयन समिति और शिक्षक आवश्यक योग्यताओं को पूरा करते हों।
3. शिक्षकों का चयन और नियामक भूमिका:
- न्यायालय ने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थान अपने शिक्षकों और प्रबंधन का चयन करने के लिए स्वतंत्र हैं।
- हालांकि, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष हो और शिक्षकों के पास विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित आवश्यक योग्यताएं हों।
- बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 57B को इस संदर्भ में “नियामक” माना जाएगा, न कि हस्तक्षेपकारी।
4. प्रासंगिक न्यायिक मिसालें:
न्यायालय ने
विभिन्न सुप्रीम
कोर्ट के
फैसलों का
हवाला दिया:
- टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002): अल्पसंख्यक संस्थानों के प्रशासनिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया गया।
- अहमदाबाद सेंट जेवियर्स कॉलेज बनाम गुजरात राज्य (1974): संस्थानों के प्रशासन और चयन में न्यूनतम हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई गई।
- केरला एजुकेशन बिल केस (1958): अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों और सरकार की नियामक शक्तियों के बीच संतुलन पर ध्यान केंद्रित किया गया।
5. विश्वविद्यालय के अधिकार सीमित किए गए:
- विश्वविद्यालय शिक्षकों और चयन समिति की योग्यता की जांच कर सकता है।
- हालांकि, विश्वविद्यालय प्रबंधन के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- अल्पसंख्यक संस्थान अपनी चयन प्रक्रिया और प्रबंधन के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
निर्णय और आदेश:
- विश्वविद्यालय द्वारा जारी पत्र (27 अप्रैल 2019) को संशोधित किया गया।
- कॉलेज को यह प्रमाणित करना होगा कि:
- चयन समिति के सदस्य और शिक्षक आवश्यक योग्यताएं रखते हैं।
- चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और कानूनन सही है।
- विश्वविद्यालय केवल नियामक भूमिका निभाएगा और प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
- यह आदेश शैक्षणिक मानकों और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों के बीच संतुलन सुनिश्चित करता है।
महत्वपूर्ण अवलोकन:
- संवैधानिक संतुलन:
- न्यायालय ने अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों और शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखने के उद्देश्य से नियामक शक्तियों के बीच संतुलन की वकालत की।
- प्रबंधन का अधिकार:
- अल्पसंख्यक संस्थान अपने शिक्षकों और प्रबंधन का चयन करने में स्वतंत्र हैं।
- विश्वविद्यालय केवल यह सुनिश्चित कर सकता है कि चयन प्रक्रिया उचित और मानकों के अनुसार हो।
- संवेदनशील मुद्दों पर निर्णय:
- यह मामला इस बात का एक उदाहरण है कि संवैधानिक अधिकारों और सरकारी नियामक शक्तियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है।
- भविष्य के लिए दृष्टिकोण:
- यह निर्णय अल्पसंख्यक संस्थानों और नियामक निकायों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा।
निष्कर्ष:
यह निर्णय
स्पष्ट रूप
से अल्पसंख्यक
संस्थानों के
संवैधानिक अधिकारों
की रक्षा
करता है,
लेकिन साथ
ही यह
सुनिश्चित करता
है कि
शैक्षणिक मानकों
को बनाए
रखा जाए।
न्यायालय ने
यह स्पष्ट
किया कि
अल्पसंख्यक संस्थानों
को प्रशासनिक
स्वतंत्रता प्राप्त
है, लेकिन
यह स्वतंत्रता
शैक्षणिक गुणवत्ता
को प्रभावित
नहीं कर
सकती।
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