यह मामला पटना उच्च न्यायालय का है, जिसमें राहुल सिद्धार्थ और प्रत्युष कुमार नामक याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनके खिलाफ दर्ज शिकायतों और सम्मनों को खारिज किया जाए। यह मामला क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 49848 और 30534 (2018) के तहत दर्ज था।
मामले के मुख्य तथ्य:
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पृष्ठभूमि:
- शिकायतकर्ता नीरज कुमार, जो M/s Wintrust Solutions कंपनी के मालिक हैं, ने दावा किया कि उन्होंने M/s Punj Lloyd Pvt. Ltd. कंपनी के साथ सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने का अनुबंध किया था।
- शिकायत के अनुसार, काम पूरा होने के बाद, उन्हें कुल 16,75,000 रुपये में से केवल 6,00,000 रुपये का भुगतान किया गया और 10,75,000 रुपये की राशि बकाया रह गई।
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शिकायत और पुलिस रिपोर्ट:
- शिकायतकर्ता ने शिकायत दर्ज कराई, जिसे बाद में पुलिस को भेज दिया गया।
- पुलिस जांच के बाद मामला बंद कर दिया गया, इसे “गलत तथ्य” का मामला बताते हुए।
- इसके बाद, शिकायतकर्ता ने विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पेटिशन) दाखिल की, जिससे मामला न्यायालय में सुनवाई के लिए पहुंचा।
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याचिकाकर्ताओं की भूमिका:
- याचिकाकर्ता कंपनी के कर्मचारी थे:
- राहुल सिद्धार्थ उस समय कंपनी में मैनेजर के रूप में कार्यरत थे।
- प्रत्युष कुमार प्रोजेक्ट मैनेजर थे।
- दोनों ने बाद में कंपनी से इस्तीफा दे दिया और अन्य संस्थानों में काम करने लगे।
- याचिकाकर्ता कंपनी के कर्मचारी थे:
अदालत का निष्कर्ष:
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शिकायत के आरोप:
- अदालत ने पाया कि शिकायत में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि याचिकाकर्ताओं ने अनुबंध के पैसे का गबन किया।
- धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत आरोप लगाने के लिए आवश्यक तथ्य और परिस्थितियाँ अनुपस्थित थीं।
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कानूनी प्रावधान:
- भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 405 और 406 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले में किसी भी प्रकार का आपराधिक विश्वासघात सिद्ध नहीं होता।
- यह स्पष्ट किया गया कि इस तरह के विवादों का समाधान दीवानी अदालत (Civil Court) में किया जाना चाहिए न कि आपराधिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करके।
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महत्वपूर्ण अदालती टिप्पणियाँ:
- केवल पैसे की वसूली के लिए आपराधिक मामला दर्ज करना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
- व्यवसायिक विवादों को आपराधिक मामला बनाकर पेश करना, केवल दबाव बनाने के लिए किया जाता है, जो अनुचित है।
- अदालत ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 का उपयोग करते हुए मामले को खारिज कर दिया।
अंतिम निर्णय:
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अधिसूचना रद्द:
- 17 सितंबर 2016 को एसीजेएम द्वारा जारी किए गए समन और प्राथमिकी खारिज कर दी गई।
- 20 जनवरी 2018 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश को भी रद्द कर दिया गया।
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याचिकाएँ स्वीकार की गईं:
- दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की गई।
निष्कर्ष:
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि व्यावसायिक विवादों को आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति को अदालतें किस प्रकार रोकती हैं। पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले में उचित निर्णय देते हुए कहा कि दीवानी और आपराधिक न्याय के बीच का अंतर स्पष्ट रहना चाहिए।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NiM0OTg0OCMyMDE4IzEjTg==-5ZPjIUaBVDw=


