“पटना उच्च न्यायालय: पुलिस कांस्टेबल की सेवा समाप्ति पर न्यायिक समीक्षा”

 

 

संक्षेप:

यह मामला हरि यादव बनाम बिहार सरकार का है, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को चुनौती दी। याचिकाकर्ता, जो एक कांस्टेबल थे, ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई में पुनर्विचार किया जाए क्योंकि संबंधित आपराधिक मामले में उन्हें बरी कर दिया गया था।


मामले के प्रमुख तथ्य:

  1. घटना का विवरण:

    • 17 सितंबर 1998 को, गया जिले के प्रीतशिला पर्वत पुलिस पोस्ट पर नक्सलियों ने हमला कर दिया था। इस हमले में दो कांस्टेबल मारे गए और 16 राइफल और 640 कारतूस लूट लिए गए।
    • याचिकाकर्ता घटना के समय अपने पोस्ट से अनुपस्थित पाए गए। उन्होंने दावा किया कि उनकी पत्नी की गंभीर बीमारी की सूचना मिलने के कारण वह 16 सितंबर 1998 को ड्यूटी छोड़कर गए थे और 18 सितंबर 1998 को वापस लौटे थे।
  2. अनुशासनात्मक कार्रवाई:

    • याचिकाकर्ता के खिलाफ 26 सितंबर 1998 को चार्जशीट जारी की गई, जिसमें उन पर बिना अनुमति के पोस्ट छोड़ने का आरोप लगाया गया।
    • जांच अधिकारी ने आरोपों को साबित पाया, और गया के पुलिस अधीक्षक ने 28 सितंबर 1999 को याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
    • याचिकाकर्ता की अपील 16 अगस्त 2000 को उप महानिरीक्षक द्वारा खारिज कर दी गई।
  3. आपराधिक मामला:

    • संबंधित घटना के आधार पर एक एफआईआर दर्ज की गई थी।
    • हालांकि, याचिकाकर्ता का नाम एफआईआर में नहीं था, लेकिन जांच के दौरान उन्हें आरोपी बनाया गया।
    • 7 मई 2019 को फास्ट ट्रैक कोर्ट- II, गया ने उन्हें इस आपराधिक मामले में बरी कर दिया।

अदालत का निर्णय:

  1. पिछले आदेशों का आधार:

    • अदालत ने पाया कि 2012 में, इसी विषय पर एक याचिका (CWJC No. 15687 of 2005) पहले ही खारिज की जा चुकी है।
    • अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई और आपराधिक मामले का आधार और मानदंड अलग-अलग होते हैं।
  2. अनुशासनात्मक कार्रवाई पर पुनर्विचार की मांग:

    • अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई उपलब्ध सबूतों और विभागीय जांच के आधार पर की गई थी।
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में बरी होना विभागीय कार्रवाई को अमान्य नहीं करता।
  3. याचिका खारिज:

    • अदालत ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी कि अनुशासनात्मक कार्रवाई को फिर से जांचने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष:

  • यह मामला स्पष्ट करता है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई और आपराधिक मामले दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
  • आपराधिक अदालत में बरी होना, अनुशासनात्मक कार्रवाई को स्वचालित रूप से खारिज नहीं करता।
  • विभागीय जांच का उद्देश्य सेवा नियमों और आचरण के उल्लंघन को देखना है, जो आपराधिक मामले से भिन्न है।

अंतिम निर्णय:

अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए यह सुनिश्चित किया कि विभागीय कार्रवाई कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार की गई थी।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTkxODgjMjAxOSMxI04=-Mkk2Y0J2e2Y=

 

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