“चुनावी आचार संहिता उल्लंघन और न्यायिक प्रक्रिया: पटना उच्च न्यायालय का निर्णय”

 

यह मामला पटना उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने एक एफआईआर को चुनौती दी थी। यह एफआईआर धारा 130 और 133, रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1951 (RP Act), और धारा 188 आईपीसी के तहत दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह एफआईआर कानूनन आधारहीन है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि:

  1. यह एफआईआर 12 मई 2019 को दर्ज की गई थी। इसमें आरोप था कि एक वाहन (पंजीकरण संख्या BR-01BG-0007) को चुनाव प्रचार के लिए उपयोग किया जा रहा था, जो कि आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का उल्लंघन था।
  2. एफआईआर में कहा गया कि वाहन पर बैनर और पोस्टर लगाए गए थे, लेकिन इसकी अनुमति नहीं थी। यह वाहन धाका पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में पाया गया था और जब्त कर लिया गया था।

याचिकाकर्ताओं का पक्ष:

  1. कानूनी आधार पर तर्क:
    • याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि एफआईआर में लगाए गए आरोप किसी भी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के तहत नहीं आते।
    • धारा 130 के तहत केवल तब अपराध माना जाएगा जब चुनाव प्रचार 100 मीटर के भीतर हो रहा हो। लेकिन एफआईआर में ऐसा कोई तथ्य नहीं था।
    • धारा 133 के तहत यह आरोप लगाया गया कि वाहन का चुनावी कार्य के लिए अवैध उपयोग हो रहा था। याचिकाकर्ताओं ने इसे खारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई स्पष्ट सबूत या आरोप नहीं है।
  2. धारा 188 आईपीसी के तहत आपत्ति:
    • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस धारा के तहत अपराध दर्ज करने के लिए एक सार्वजनिक अधिकारी की लिखित शिकायत अनिवार्य है। एफआईआर दर्ज करने से पहले ऐसा कोई लिखित प्रमाण नहीं था।
    • उन्होंने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195 का हवाला देते हुए कहा कि यह एफआईआर प्रक्रिया का उल्लंघन है।
  3. अन्य तर्क:
    • याचिकाकर्ताओं में से एक वाहन का मालिक था और दूसरा उसका चालक। उन्होंने कहा कि वाहन का उपयोग वैध कार्यों के लिए हो रहा था और इसे जब्त करना गैर-कानूनी था।
    • याचिकाकर्ताओं ने पूर्ववर्ती मामलों (जैसे धर्मेश प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य और परवीन अमानुल्लाह बनाम बिहार राज्य) का हवाला दिया, जिनमें इसी प्रकार की एफआईआर रद्द की गई थीं।

राज्य का पक्ष:

  1. राज्य सरकार ने तर्क दिया कि एफआईआर पूरी तरह वैध है क्योंकि चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन हुआ था।
  2. उन्होंने कहा कि:
    • धारा 130 और 133 RP Act तथा धारा 188 आईपीसी संज्ञेय अपराध हैं।
    • जहां एक से अधिक अपराध होते हैं और उनमें से एक संज्ञेय है, वहां एफआईआर दर्ज करना वैध है (CrPC की धारा 155(4) के तहत)।
    • चुनाव प्रचार के लिए वाहन का उपयोग स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित था, और यह नियम सभी को पता था।

न्यायालय का अवलोकन और निर्णय:

न्यायालय ने सभी तथ्यों और तर्कों पर विचार करते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर अपना निर्णय दिया:

  1. धारा 130 RP Act (चुनाव स्थल के 100 मीटर के भीतर प्रचार पर रोक):

    • न्यायालय ने पाया कि एफआईआर में यह स्पष्ट नहीं था कि वाहन चुनाव स्थल के 100 मीटर के भीतर पाया गया था।
    • इस आधार पर, न्यायालय ने कहा कि धारा 130 लागू नहीं होती
  2. धारा 133 RP Act (अवैध वाहन उपयोग):

    • इस धारा के तहत आरोप तभी टिकाऊ होंगे, जब यह साबित हो कि वाहन चुनाव प्रचार के लिए अवैध रूप से किराए पर लिया गया या उपयोग किया गया।
    • एफआईआर में ऐसा कोई साक्ष्य या विवरण नहीं था।
    • न्यायालय ने यह भी कहा कि यह धारा गैर-संज्ञेय अपराध है और इसके लिए मजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक होता है।
  3. धारा 188 आईपीसी (सार्वजनिक अधिकारी के आदेश का उल्लंघन):

    • न्यायालय ने कहा कि CrPC की धारा 195(1) के तहत, इस धारा के तहत कार्रवाई केवल तभी हो सकती है, जब सार्वजनिक अधिकारी खुद मजिस्ट्रेट को शिकायत दर्ज कराए।
    • पुलिस इस धारा के तहत एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती।
  4. एफआईआर की प्रक्रिया पर सवाल:

    • न्यायालय ने पाया कि जब्त किए गए वाहन के बारे में अधिकारियों के बयानों में स्पष्टता नहीं थी।
    • एफआईआर में कोई ठोस साक्ष्य नहीं था कि वाहन ने वास्तव में आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया।
    • अदालत ने इसे “न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” कहा।

अंतिम निर्णय:

  1. न्यायालय ने एफआईआर को रद्द कर दिया।
  2. यह पाया गया कि एफआईआर दर्ज करना न केवल कानून का उल्लंघन था, बल्कि यह प्रक्रिया के दुरुपयोग का भी उदाहरण था।
  3. अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 188 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज करना वैधानिक रूप से अनुचित है।

इस निर्णय का महत्व:

  1. यह मामला पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया में कानून के पालन के महत्व को रेखांकित करता है।
  2. यह स्पष्ट करता है कि धारा 188 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज करने का अधिकार केवल मजिस्ट्रेट के आदेश से होता है।
  3. अदालत ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में निष्पक्ष और सटीक कार्रवाई के महत्व पर जोर दिया।

यह निर्णय न केवल कानून की व्याख्या करता है, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि नागरिक अधिकारों का संरक्षण हो और प्रशासनिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTYjOTcyIzIwMTkjMSNO-pP2kb4jxKP4=

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