“टोला सेवक नियुक्ति विवाद: क्षेत्राधिकार को लेकर पटना हाई कोर्ट का अहम फैसला”

पटना उच्च न्यायालय में दायर सिविल रिट याचिका संख्या 14334/2017 एक महत्वपूर्ण मामला है, जो टोला सेवक की नियुक्ति और विवादों के निपटारे के लिए उचित प्राधिकार से संबंधित है। इस मामले में कमल कुमार रजक (याचिकाकर्ता) और अभिजीत कुमार रजक (प्रतिवादी संख्या 12) के बीच टोला सेवक पद की नियुक्ति को लेकर विवाद था।

मामले की शुरुआत तब हुई जब कमल कुमार रजक को टोला सेवक के पद पर नियुक्त किया गया। इस नियुक्ति को अभिजीत कुमार रजक ने चुनौती दी। शिकायत के आधार पर जिला कार्यक्रम पदाधिकारी ने याचिकाकर्ता की नियुक्ति रद्द कर दी। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार के समक्ष अपील संख्या 38/2016 के माध्यम से चुनौती दी। जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार ने नियुक्ति रद्द करने का आदेश निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ता की टोला सेवक पद पर नियुक्ति को बहाल कर दिया।

जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार के इस आदेश के विरुद्ध प्रतिवादी संख्या 12 ने राज्य अपीलीय प्राधिकार के समक्ष अपील दायर की। राज्य अपीलीय प्राधिकार ने 12 जुलाई 2017 को अपने आदेश में जिला प्राधिकार के आदेश को निरस्त कर दिया। राज्य अपीलीय प्राधिकार ने यह माना कि जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार को टोला सेवकों की नियुक्ति से संबंधित किसी भी विवाद पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र नहीं था।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अधिकार क्षेत्र का मुद्दा जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार के समक्ष उठाया गया था, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने बिहार राज्य विद्यालय शिक्षक एवं कर्मचारी (विवाद निवारण) नियमावली, 2015 का विश्लेषण किया। यह नियमावली भारतीय संविधान के अनुच्छेद 162, 243 और बिहार राज्य पंचायती राज अधिनियम, 2006 की धारा 47 एवं 146, बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 की धारा 46, 47 एवं 419 तथा नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 38 के तहत बनाई गई थी।

न्यायालय ने पाया कि ये नियम प्राथमिक विद्यालयों और उच्च माध्यमिक विद्यालयों (सरकारी सहायता प्राप्त और अल्पसंख्यक विद्यालयों सहित) में नियत वेतन पर शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित शिकायतों और अपीलों के निवारण के लिए बनाए गए थे। टोला सेवक इस श्रेणी में नहीं आते हैं।

नियमों में नियोजित कर्मी को भी परिभाषित किया गया है, जिसमें पुस्तकालयाध्यक्ष, लिपिक, चपरासी और प्राथमिक/उच्च एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों के अन्य कर्मचारी शामिल हैं। टोला सेवकों की नियुक्ति 2018 के नियमों के तहत होती है, जो टोला सेवकों और स्वयं सेवकों की नियुक्ति से संबंधित है। यह नियुक्ति संबंधित वार्ड के सदस्य की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा की जाती है।

इन नियमों में स्पष्ट किया गया है कि टोला सेवकों की नियुक्ति से संबंधित किसी भी विवाद में, पहली अपील नियुक्ति के 15 दिनों के भीतर जिला शिक्षा अधिकारी के समक्ष और दूसरी अपील उसके 15 दिनों के भीतर जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर की जा सकती है।

इस प्रकार, टोला सेवकों की नियुक्ति और उसकी चुनौती के लिए विशेष प्रावधान होने के कारण, जिला शिक्षक अपीलीय प्राधिकार को याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 12 के बीच नियुक्ति विवाद में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं था। इसी कारण से राज्य अपीलीय प्राधिकार का आदेश कानून की दृष्टि से उचित था।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राज्य अपीलीय प्राधिकार के आदेश में हस्तक्षेप के लिए कोई ठोस कारण नहीं दे पाए। अतः उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ता को उचित प्राधिकार के समक्ष जाने की स्वतंत्रता प्रदान की।

यह मामला प्रशासनिक कानून के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को रेखांकित करता है, विशेष रूप से अधिकार क्षेत्र के महत्व को। यह दर्शाता है कि विभिन्न प्राधिकारों की शक्तियां और सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित होनी चाहिए, और प्रत्येक प्राधिकार को अपने अधिकार क्षेत्र में ही कार्य करना चाहिए। यह निर्णय विशेष रूप से टोला सेवकों की नियुक्ति से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए उचित मार्ग प्रशस्त करता है।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTQzMzQjMjAxNyMxI04=-3dxT0ki5Uws=

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