सारांश
यह मामला पटना उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुआ, जिसमें याचिकाकर्ता प्रेमचंद्र प्रसाद ने अपनी अवैध हिरासत और जमानत याचिका पर निर्णय को चुनौती दी। याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत मामला दर्ज था। मुख्य तर्क यह था कि जांच एजेंसी ने निर्धारित 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं की, जिससे याचिकाकर्ता को स्वत: जमानत का अधिकार प्राप्त हो गया।
मामले की पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ता को 20 दिसंबर 2018 को गिरफ्तार किया गया और अगले दिन न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
- 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर जांच पूरी नहीं हुई, जिससे याचिकाकर्ता को सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत जमानत का अधिकार प्राप्त हो गया।
- 23 मार्च 2019 को याचिकाकर्ता ने जमानत याचिका दाखिल की, लेकिन उसी दिन पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी।
याचिकाकर्ता के तर्क
- अवैध हिरासत: चार्जशीट दाखिल न होने की स्थिति में 90 दिनों के बाद याचिकाकर्ता की हिरासत अवैध हो गई।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला: याचिकाकर्ता ने “संजय दत्त बनाम राज्य” और “उदय मोहनलाल आचार्य बनाम महाराष्ट्र राज्य” मामलों का संदर्भ दिया, जिसमें यह स्पष्ट है कि 90 दिनों के बाद जमानत का अधिकार स्वचालित हो जाता है।
- पुलिस की देरी: याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनकी जमानत याचिका को निष्क्रिय करने के लिए जानबूझकर चार्जशीट दाखिल की।
राज्य का पक्ष
राज्य के वकील ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, इसलिए याचिकाकर्ता को जमानत का अधिकार नहीं है।
न्यायालय का निर्णय
- जमानत का अधिकार स्वचालित: न्यायालय ने कहा कि अगर 90 दिनों में जांच पूरी नहीं होती और चार्जशीट दाखिल नहीं होती, तो आरोपी को जमानत का अधिकार स्वत: मिल जाता है।
- चार्जशीट का समय: चार्जशीट जमानत याचिका दाखिल होने के बाद दाखिल की गई, इसलिए याचिकाकर्ता का अधिकार बरकरार है।
- निचली अदालत का अवैध कार्य: निचली अदालत द्वारा जमानत याचिका पर निर्णय को टालना और रिपोर्ट मंगवाना अवैध था।
महत्वपूर्ण निर्देश
न्यायमूर्ति बीरेंद्र कुमार ने निचली अदालत के आदेश को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को तुरंत जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
न्यायालय का संदेश
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा और जांच एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित करता है। यह उन मामलों के लिए एक मिसाल है जहां जांच एजेंसियां निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं करतीं।
निष्कर्ष:
यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में समय की पाबंदी और अभियुक्त के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के महत्व को दर्शाता है। न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया कि कानून का पालन सख्ती से हो और अभियुक्त को उसका वैधानिक अधिकार मिले।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NiM0Mzc2OSMyMDE5IzEjTg==-KwEKGNlrVZ8=


