मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 200 से अधिक याचिकाकर्ताओं से संबंधित है, जो बिहार के विभिन्न जिलों में मिड डे मील (MDM) योजना के अंतर्गत डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन के रूप में संलग्न थे।
उनकी नियुक्ति आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से हुई, जो शिक्षा विभाग (मिड डे मील) द्वारा पत्र संख्या 1573 दिनांक 11.07.2023 के तहत जारी एक सामान्य नोटिस के बाद की गई थी। इस नोटिस में विभिन्न एजेंसियों को सभी जिलों के सभी प्रखंडों में डेटा एंट्री ऑपरेटरों की तैनाती हेतु जनशक्ति उपलब्ध कराने के लिए आमंत्रित किया गया था।
पंद्रह एजेंसियों का विभिन्न जिलों के लिए चयन किया गया। इन एजेंसियों ने पहले टाइपिंग दक्षता परीक्षा आयोजित की और सफल अभ्यर्थियों की अनुशंसा निदेशालय, मिड डे मील, बिहार, पटना को की। निदेशालय ने स्वयं एक अन्य दक्षता परीक्षा आयोजित की। केवल वे अभ्यर्थी, जो इसमें उत्तीर्ण हुए, उन्हें डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन के रूप में संलग्न करने की अनुशंसा की गई।
विभिन्न जिलों में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO), मिड डे मील ने 2023 में इन अभ्यर्थियों की ज्वाइनिंग स्वीकार की। कुछ याचिकाकर्ताओं को संबंधित DPO के हस्ताक्षर से जारी कार्यालय आदेशों के माध्यम से आगे विशिष्ट प्रखंडों में पदस्थापित किया गया।
इसके बाद आउटसोर्सिंग एजेंसियों ने अगस्त से अक्तूबर 2023 के बीच शिक्षा विभाग (MDM) के साथ औपचारिक समझौते निष्पादित किए। ये समझौते प्रारंभ में तीन वर्ष के लिए थे, जिसमें कार्य संतोषजनक होने पर दो वर्ष के विस्तार की संभावना थी।
याचिकाकर्ताओं को सितंबर, अक्तूबर और 2023 के अन्य महीनों में संलग्न किया गया। उनके विरुद्ध या उनकी एजेंसियों के विरुद्ध कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं की गई। सेवा का एक वर्ष पूर्ण होने के बाद निदेशक, मिड डे मील, बिहार, पटना ने पत्र संख्या 3115 दिनांक 17.10.2024 जारी कर डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन्स की संविदात्मक संलग्नता को एक वर्ष और, अर्थात लगभग सितंबर–अक्तूबर 2025 तक, के लिए बढ़ा दिया।
राज्य परियोजना निदेशक, बिहार शिक्षा परियोजना परिषद, पटना ने भी पत्र संख्या 315 दिनांक 17.01.2025 जारी कर यह संकेत दिया कि सक्षम प्राधिकरण द्वारा जिन डेटा एंट्री ऑपरेटरों की सेवा अवधि पहले ही बढ़ा दी गई है, उनकी सेवाओं में बाधा नहीं डाली जाएगी।
किन्तु 24.02.2025 को निदेशक, मिड डे मील ने एक अन्य पत्र (पत्र संख्या 491) जारी कर सभी DPOs को बजट की कमी का हवाला देते हुए 31.03.2025 के बाद डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन्स की सेवाओं का उपयोग नहीं करने का निर्देश दिया। इसके आधार पर DPOs ने व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं को 31.03.2025 को शाम 5:00 बजे तक कार्यभार सौंप देने के लिए संचार भेजे।
याचिकाकर्ताओं ने 25.02.2025 को निदेशक, मिड डे मील (प्रतिवादी संख्या 2) को एक विस्तृत अभ्यावेदन दिया, किन्तु उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसके बाद उन्होंने 24.02.2025 दिनांकित पत्र और उसके फलस्वरूप जारी आदेशों को चुनौती देते हुए यह रिट याचिका दायर की।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या मिड डे मील योजना के अंतर्गत आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन के रूप में संलग्न याचिकाकर्ता यह आधार लेकर कि उनके अनुबंध पहले ही 2025 के उत्तरार्ध तक बढ़ाए जा चुके थे, 31.03.2025 से उनकी सेवाएँ समाप्त किए जाने को चुनौती दे सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीखे हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने पहले यह स्पष्ट किया कि वे रिट याचिका की प्रार्थना संख्या (iii) पर जोर नहीं दे रहे हैं और उसे विलोपित करने की अनुमति मांगी, जिसे न्यायालय ने स्वीकृत कर लिया।
याचिकाकर्ताओं ने निदेशक, मिड डे मील द्वारा 24.02.2025 को जारी पत्र को चुनौती दी, जिसमें बजट की कमी के कारण 31.03.2025 से डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन्स की सेवाओं को समाप्त करने का आदेश दिया गया था। उन्होंने उसी पत्र के आधार पर जारी जिला कार्यक्रम पदाधिकारियों के फलस्वरूप आदेशों को भी निरस्त करने की मांग की।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क इस प्रकार थे:
- उन्हें विधिवत चयन प्रक्रिया के बाद, जिसमें एजेंसियों तथा निदेशालय द्वारा दक्षता परीक्षाएँ शामिल थीं, डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-ब्लॉक/बिहार रिसोर्स पर्सन के स्वीकृत रिक्त पदों के विरुद्ध नियुक्त किया गया था।
- आउटसोर्सिंग एजेंसियों ने शिक्षा विभाग के साथ तीन वर्ष के (दो वर्ष बढ़ाए जा सकने वाले) समझौते किए थे, जिनके तहत याचिकाकर्ता बिना किसी प्रतिकूल टिप्पणी के कार्य कर रहे थे।
- उनकी सेवाएँ पहले ही पत्र संख्या 3115 दिनांक 17.10.2024 के माध्यम से एक अतिरिक्त वर्ष के लिए बढ़ा दी गई थीं, अतः उनकी संलग्नता लगभग सितंबर–नवंबर 2025 तक जारी रहनी थी।
- राज्य परियोजना निदेशक के 17.01.2025 दिनांकित पत्र संख्या 315 से यह संकेत मिलता है कि जिन डेटा एंट्री ऑपरेटरों की सेवाएँ बढ़ा दी गई हैं, उन्हें बाधित नहीं किया जाएगा।
- केवल बजट की कमी के आधार पर 31.03.2025 से अचानक उनकी सेवाएँ रोक देना मनमाना और अवैध है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मिड डे मील योजना 60% केंद्र सरकार और 40% राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित है। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि क्या सिंगल नोडल एजेंसी के पास अप्रयुक्त धनराशि उपलब्ध थी या वित्त विभाग को किसी संशोधित बजट प्रस्ताव को भेजा गया था। उनका कहना था कि इन पहलुओं का खुलासा नहीं किया गया और निदेशक, मिड डे मील केवल बजट की कमी का हवाला देकर बीच में ही उनका कार्य समाप्त नहीं कर सकते थे।
प्रत्यर्थ्यता के मुद्दे पर, याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Shripal and Another vs. Nagar Nigam, Ghaziabad, 2025 SCC OnLine SC 221 पर भरोसा किया। उनका तर्क था कि यद्यपि उनकी भर्ती आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से हुई, वास्तविक कार्य मिड डे मील योजना के अंतर्गत सरकारी नीति को क्रियान्वित करना था। अतः राज्य ही वास्तविक नियोक्ता है और राज्य के विरुद्ध रिट याचिका पोषणीय है।
उन्होंने Jaggo vs. Union of India & Ors., 2024 SCC OnLine SC 3826 पर भी भरोसा किया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए अस्थायी अनुबंधों के दुरुपयोग की निंदा करने और लंबे समय तक मुख्य कार्यों के लिए अस्थायी रूप से काम लेने पर की गई टिप्पणियों का हवाला दिया। उनका कहना था कि, विस्तार के बावजूद, उनकी संलग्नता को अचानक समाप्त करना, उस निर्णय में रेखांकित निष्पक्षता और रोजगार स्थिरता के मानकों का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, मिड डे मील निदेशालय के अधिवक्ता ने प्रत्यर्थ्यता पर एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई। उनका तर्क था कि:
- याचिकाकर्ता राज्य के नहीं, बल्कि निजी आउटसोर्सिंग एजेंसियों के कर्मचारी हैं। उनके ऑफर-कम-अपॉइंटमेंट लेटर्स (जो रिट याचिका के पेज 96 से संलग्न हैं) से स्पष्ट है कि एजेंसियों ने, न कि सरकार ने, उनकी नियुक्ति की है।
- नियुक्तियाँ पूरी तरह 11 माह की संविदात्मक थीं, जिनमें स्पष्ट प्रावधान था कि अनुबंध कभी भी समाप्त किया जा सकता है, विशेषकर तब, जब परियोजना अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण समाप्त हो जाए।
- याचिकाकर्ताओं द्वारा दावा किए गए मौलिक अधिकार या सुरक्षा केवल उनकी एजेंसियों के साथ हुए अनुबंधों से उत्पन्न होते हैं, न कि राज्य द्वारा किसी वैधानिक नियुक्ति से।
अधिवक्ता ने आगे स्पष्ट किया कि मिड डे मील योजना एक नीतिनिर्धारित कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य विद्यालयी बच्चों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराकर पोषण, उपस्थिति और सामाजिक समानता में सुधार करना है। यह योजना केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित है और केवल तब तक चलती है जब तक धनराशि उपलब्ध रहती है। यह कोई स्थायी संवर्ग आधारित प्रतिष्ठान नहीं है।
उन्होंने यह प्रस्तुत किया कि निदेशालय को धनराशि की कमी की सूचना मिलने के बाद, निदेशक ने केवल यह स्पष्ट करने के लिए 24.02.2025 का पत्र जारी किया कि 31.03.2025 के बाद भुगतान नहीं किया जा सकेगा। अतः उस तिथि के बाद सेवाओं का उपयोग बंद करने का निर्णय एक नीति तथा वित्तीय निर्णय था, कोई मनमाना कदम नहीं।
उन्होंने आउटसोर्सिंग समझौते (परिशिष्ट P/4) की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें विवाद निपटान की व्यवस्था है। क्लॉज 1.3.1 में सुलह और क्लॉज 1.3.3 में विभाग और एजेंसी के बीच विवाद की स्थिति में मध्यस्थता का प्रावधान है।
इसके प्रत्युत्तर में, याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि राज्य और एजेंसी के बीच हुए समझौते में मध्यस्थता का प्रावधान याचिकाकर्ताओं पर लागू नहीं होता, क्योंकि वर्तमान विवाद नागरिकों (याचिकाकर्ताओं) और राज्य प्राधिकारियों के बीच शक्ति के दुरुपयोग के संबंध में है, न कि राज्य और आउटसोर्सिंग एजेंसी के बीच किसी संविदात्मक विवाद के रूप में।
मिड डे मील के अधिवक्ता ने आगे पटना उच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णयों CWJC संख्या 10761/2013 (Asha Kumari & Ors. vs. State of Bihar & Ors.) तथा CWJC संख्या 22252/2012 (Anju Kumari & Ors. vs. State of Bihar & Ors.) का उल्लेख किया। उन मामलों में, बिहार शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा संचालित नीतियों के अंतर्गत बाल दीदी/लोक दीदी के रूप में संलग्न व्यक्तियों ने न्यायालय का रुख किया था। उच्च न्यायालय ने उनकी संलग्नता को नीतिगत मानते हुए उनकी शिकायतों पर विचार करने से इनकार कर दिया था और उन्हें प्रवर्तनीय सेवा अधिकार नहीं माना था।
उन्होंने याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में अंतर स्पष्ट किया। Shripal में पुनर्नियुक्ति और बकाया वेतन से संबंधित लेबर कोर्ट के परस्पर विरोधी अवार्ड्स को उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी। Jaggo में अपीलकर्ताओं ने केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के निर्णय से उत्पन्न सेवा नियमितीकरण की मांग की थी। दोनों ही मामले पृथक वैधानिक व्यवस्थाओं (लेबर कोर्ट/सीएटी) से उत्पन्न थे और तथ्यात्मक रूप से भी भिन्न थे।
दोनों पक्षों को सुनने और अभिलेखों की जाँच करने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने प्रमुख निष्कर्ष दर्ज किए।
प्रथम, न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि राज्य और एजेंसियों के बीच हुए समझौते में सुलह और मध्यस्थता के प्रावधान इस रिट में प्रत्यक्ष रूप से याचिकाकर्ताओं पर बाध्यकारी नहीं हैं। इस सीमित बिंदु पर न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता से सहमति व्यक्त की।
हालाँकि, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ताओं के अधिकार स्वयं केवल आउटसोर्सिंग एजेंसियों के साथ उनके अनुबंधों से ही उत्पन्न होते हैं। अतः वे उन अनुबंधों की शर्तों से बाध्य हैं।
न्यायालय ने विशेष रूप से नियुक्ति की शर्तों के क्लॉज 12 का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था:
“12. Your Services may be terminated with one month notice and /or without assigning any reason thereof depending on the seriousness as decided by the Client. Failing to serve the notice period of 30 (thirty) days from your side, you will be recovered the losses, damages, expenses incurred on your training and any other penalty/fine as fixed by the agency. You will not claim for any rights or employer employee relationship with the client/agency.”
न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि इस क्लॉज के अंतर्गत सेवाएँ एक माह के नोटिस के साथ समाप्त की जा सकती थीं और यह कि याचिकाकर्ताओं ने पहले ही यह सहमति दी हुई थी कि वे अनुबंध से परे क्लाइंट (अर्थात विभाग) या एजेंसी के साथ किसी प्रकार के नियोक्ता–कर्मचारी संबंध का दावा नहीं करेंगे।
नीति और बजट के पहलुओं पर, न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि 24.02.2025 के पत्र के अनुसार, परियोजना निदेशक ने यह महसूस करने के बाद कि कार्य जारी रखने के लिए पर्याप्त बजट नहीं है, नीतिगत रूप से यह निर्णय लिया कि 31.03.2025 के बाद सेवाएँ जारी नहीं रखी जा सकतीं।
न्यायालय ने माना कि वह निदेशक या सरकार को अपने नीतिगत निर्णयों—विशेषकर वे, जो बजट की उपलब्धता या अनुपलब्धता से जुड़े हों—में परिवर्तन करने का निर्देश नहीं दे सकता। धनराशि उपलब्ध है या नहीं और उसका आवंटन किस प्रकार होना चाहिए, यह नीतिनिर्माता प्रशासनिक प्राधिकारी के दायरे में आता है, न कि इस प्रकार की संविदात्मक व्यवस्थाओं में न्यायिक पुनरावलोकन के अंतर्गत।
तदनुसार, न्यायालय ने 24.02.2025 दिनांकित निदेशक के पत्र या उसके फलस्वरूप जारी आदेशों में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। टर्मिनेशन निर्देशों को निरस्त करने की प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई और रिट याचिका खारिज कर दी गई।
हालाँकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को एक महत्त्वपूर्ण संरक्षण प्रदान किया। उसने माना कि क्लॉज 12 के आलोक में, याचिकाकर्ता कम-से-कम एक माह के नोटिस के लाभ के हकदार हैं। अतः यदि टर्मिनेशन एक माह का नोटिस दिए बिना किया गया हो, तो याचिकाकर्ता ऐसे नोटिस के बदले एक माह के वेतन के अधिकारी होंगे।
इस प्रकार, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की सेवाएँ तो बहाल नहीं कीं, किंतु यह सुनिश्चित किया कि नोटिस अवधि से संबंधित संविदात्मक सुरक्षा का पालन किया जाए।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के हजारों संविदात्मक कर्मियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मिड डे मील जैसी सरकारी योजनाओं के अंतर्गत एजेंसियों के माध्यम से कार्यरत हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे कर्मियों को नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं माना जाएगा। उनके अधिकार मुख्यतः उन अनुबंधों से आते हैं, जिन्हें वे आउटसोर्सिंग एजेंसियों के साथ हस्ताक्षर करते हैं। भले ही वे सरकारी कार्यालयों में बैठकर योजना से संबंधित मुख्य कार्य करें, फिर भी जब परियोजना बजट संकट से जूझती है, उनकी संलग्नता अनुबंध की शर्तों के अनुपालन के अधीन समाप्त की जा सकती है।
कर्मचारियों के लिए इसका अर्थ यह है कि:
- न्यायालय सरकार को किसी योजना को जारी रखने या उन्हें अनुबंध पर बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, विशेषकर तब जब धन समाप्त हो गया हो या नीति बदल गई हो।
- परंतु यदि अनुबंध में एक माह के नोटिस की शर्त है, तो नोटिस न दिए जाने की स्थिति में वे कम-से-कम उस अवधि के वेतन के हकदार होंगे।
प्रशासन के लिए, यह निर्णय पुष्टि करता है कि मिड डे मील जैसी योजनाओं पर नीति और बजट से संबंधित निर्णय मुख्यतः कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में रहते हैं। किंतु जब एजेंसियों और कर्मियों के साथ लिखित अनुबंध किए जाते हैं, तो राज्य और एजेंसियों को नोटिस अवधि जैसी बुनियादी संविदात्मक सुरक्षा का पालन अवश्य करना होगा।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: क्या मिड डे मील योजना के अंतर्गत आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से संलग्न डेटा एंट्री ऑपरेटर-कम-बिहार रिसोर्स पर्सन्स रिट याचिका के माध्यम से अपनी सेवाओं की समाप्ति को चुनौती देकर विस्तारित अवधि की समाप्ति तक निरंतरता की मांग कर सकते हैं?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि उनकी संलग्नता पूरी तरह संविदात्मक है, उनके अधिकार आउटसोर्सिंग एजेंसियों के साथ हुए अनुबंधों से ही उत्पन्न होते हैं और योजना के बजट व नीति संबंधी निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने उनकी सेवाओं को जारी रखने से इनकार किया, परंतु एक माह के नोटिस या उसके बदले वेतन के सीमित संविदात्मक अधिकार को लागू किया। - प्रश्न: क्या निदेशक, मिड डे मील द्वारा धनराशि की कमी के कारण उनकी सेवाओं के उपयोग को समाप्त करने का नीतिगत निर्णय कथित मनमानी के आधार पर न्यायिक समीक्षा योग्य है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने इस निर्णय को बजट संबंधी बाधाओं से जुड़ा नीतिगत निर्णय माना, जो प्रशासनिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है। उसने 24.02.2025 दिनांकित पत्र में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। - प्रश्न: क्या श्रम और सेवा विवादों से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय जैसे Shripal और Jaggo, योजना के अंतर्गत आउटसोर्स्ड संविदात्मक कर्मियों के इस मामले पर लागू होते हैं?
उत्तर: न्यायालय ने प्रतिवादी का यह तर्क स्वीकार किया कि वे निर्णय पृथक वैधानिक ढाँचों और तथ्यात्मक परिस्थितियों (लेबर कोर्ट और सीएटी से उत्पन्न, पुनर्नियुक्ति या नियमितीकरण की मांग वाले मामले) से जुड़े थे और वर्तमान मामले, जो पूरी तरह संविदात्मक, योजना-आधारित आउटसोर्सिंग का है, पर लागू नहीं होते।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में याचिकाकर्ताओं द्वारा जिन पर भरोसा किया गया, उनका उल्लेख है:
- Shripal and Another vs. Nagar Nigam, Ghaziabad, 2025 SCC OnLine SC 221
- Jaggo vs. Union of India & Ors., 2024 SCC OnLine SC 3826
न्यायालय ने अंततः माना कि ये निर्णय वर्तमान तथ्यों पर लागू नहीं होते।
- प्रतिवादियों ने पटना उच्च न्यायालय के निम्नलिखित निर्णयों पर भरोसा किया:
- CWJC No. 10761 of 2013, Asha Kumari & Ors. vs. State of Bihar & Ors.
- CWJC No. 22252 of 2012, Anju Kumari & Ors. vs. State of Bihar & Ors.
इनका उल्लेख उन उदाहरणों के रूप में किया गया, जहाँ नीतिगत योजनाओं के अंतर्गत संलग्न कर्मियों (बाल दीदी/लोक दीदी) को नियमित सेवा जैसी राहतें देने से इनकार किया गया था।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता मामला संख्या 4556, 2025
मामले का शीर्षक: Ravi Kumar & Ors. vs. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2025 (2) PLJR 787
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति डॉ. अंशुमान
निर्णय की तिथि: 25.03.2025
बहस में उपस्थिति:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री Y. V. Giri, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री Dhananjaya Nath Tiwari, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से: श्री Kumar Pankaj, AC to SC-5
- मिड डे मील निदेशालय की ओर से: श्री Girijish Kumar, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: मिड डे मील योजना के अंतर्गत संविदात्मक संलग्नता की समाप्ति को चुनौती देते हुए सिविल रिट अधिकारिता के तहत रिट याचिका।
Link to the judgement ; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNDU1NiMyMDI1IzEjTg==-LmaIEsGKzpc=
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बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप आगे की जानकारी के लिए Samvida Law Associates को फ़ॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।


