पटना उच्च न्यायालय के माध्यम से मध्यस्थ की नियुक्ति कैसे प्राप्त करें (मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11)

बिहार में न्यायालयों के समक्ष मामलों की बढ़ती लंबितता के साथ, मध्यस्थता वाणिज्यिक और संविदात्मक विवादों के समाधान के लिए एक प्रभावी तंत्र के रूप में कार्य करती है। समझौतों में प्रवेश करने वाले पक्ष अक्सर एक मध्यस्थता धारा शामिल करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विवादों का समाधान नियमित न्यायालय प्रणाली के बाहर किया जाए।

मध्यस्थता का उद्देश्य एक त्वरित और किफायती उपाय प्रदान करना है। हालांकि, प्रक्रिया तब तक शुरू नहीं हो सकती जब तक एक मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया जाता। व्यवहार में, इस चरण पर अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं, जहाँ एक पक्ष सहयोग नहीं करता, संचार का उत्तर नहीं देता, या मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया में विलंब करता है। इसके परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ सहमत विवाद समाधान तंत्र प्रारंभ भी नहीं हो पाता।

ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 उच्च न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह एक मध्यस्थ नियुक्त करे जब सहमत प्रक्रिया विफल हो जाती है।

धारा 11 कब लागू होती है?

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 तब लागू होती है जब एक वैध मध्यस्थता समझौता मौजूद हो और एक विवाद उत्पन्न हो चुका हो, लेकिन मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाती हो।

यह सामान्यतः तब होता है जब नियुक्ति की सहमत विधि काम नहीं करती। उदाहरण के लिए, जहाँ समझौते में दोनों पक्षों को मिलकर एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त करना होता है और एक पक्ष सहमत नहीं होता या उत्तर नहीं देता, या जहाँ प्रत्येक पक्ष को एक-एक मध्यस्थ नियुक्त करना होता है और कोई पक्ष ऐसा करने में विफल रहता है, या जहाँ नियुक्त मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति करने में विफल रहते हैं। यह स्थिति तब भी उत्पन्न हो सकती है जहाँ समझौते में मध्यस्थता धारा तो हो, लेकिन नियुक्ति की कोई स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित न हो।

धारा 11(2) के तहत, पक्षकारों को मध्यस्थ की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने की स्वतंत्रता है। हालांकि, जहाँ ऐसी प्रक्रिया विफल हो जाती है, या जहाँ कोई प्रक्रिया मौजूद नहीं है, अधिनियम एक डिफॉल्ट तंत्र प्रदान करता है। धारा 11(3), (4) और (5) यह निर्धारित करती हैं कि तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण में, प्रत्येक पक्ष एक मध्यस्थ नियुक्त करता है और नियुक्त मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति करते हैं। यदि कोई पक्ष अनुरोध प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर मध्यस्थ नियुक्त करने में विफल रहता है, या यदि दोनों मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ पर तीस दिनों के भीतर सहमत नहीं होते, तो धारा 11(4) के तहत किसी पक्ष के अनुरोध पर उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति की जाती है। एकमात्र मध्यस्थ के मामले में, यदि पक्षकार अनुरोध प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर सहमत नहीं होते, तो धारा 11(5) के तहत किसी पक्ष के अनुरोध पर उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति की जाती है।

इसके अतिरिक्त, धारा 11(6) के तहत, कोई पक्ष उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है जहाँ कोई पक्ष सहमत प्रक्रिया के अनुसार कार्य करने में विफल रहता है, जहाँ पक्षकार या मध्यस्थ सहमति तक नहीं पहुँचते, या जहाँ नियुक्ति के लिए जिम्मेदार कोई व्यक्ति या संस्था अपना कार्य करने में विफल रहती है।

ऐसी परिस्थितियों में, उच्च न्यायालय एक मध्यस्थ नियुक्त करता है ताकि मध्यस्थता प्रक्रिया प्रारंभ हो सके।

पूर्व-शर्त: संविदात्मक प्रक्रिया का पालन

धारा 11 के तहत पटना उच्च न्यायालय का रुख करने से पहले, नियुक्ति चाहने वाले पक्ष को यह दिखाना आवश्यक है कि मध्यस्थता समझौते में प्रदान की गई प्रक्रिया का पालन किया गया है और वह विफल रही है।

इसके लिए सामान्यतः विपक्षी पक्ष को एक नोटिस जारी करना होता है जिसमें विवाद की जानकारी दी जाती है और उसे एक मध्यस्थ नियुक्त करने या प्रस्तावित मध्यस्थ पर सहमति देने के लिए कहा जाता है। यदि विपक्षी पक्ष ऐसे अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिनों के भीतर कार्य नहीं करता, तो न्यायालय जाने का अधिकार उत्पन्न होता है।

यह आवश्यकता मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(4) और 11(5) में परिलक्षित होती है, जो यह प्रावधान करती हैं कि यदि कोई पक्ष मध्यस्थ नियुक्त करने में विफल रहता है, या पक्षकार नियुक्ति पर सहमत नहीं होते, तो ऐसे अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिनों के भीतर किसी पक्ष के अनुरोध पर उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति की जा सकती है।

तदनुसार, न्यायालय यह जांच करता है कि क्या सहमत तंत्र को लागू किया गया था और क्या वह विफल हुआ, उसके बाद ही वह धारा 11 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करता है।

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 11 का आवेदन दाखिल करना

सहमति से निर्धारित प्रक्रिया के विफल होने पर, पीड़ित पक्ष मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत एक आवेदन दाखिल करके पटना उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है, जिसे सामान्यतः पटना उच्च न्यायालय में एक रिक्वेस्ट केस के रूप में पंजीकृत किया जाता है।

यह आवेदन एक अधिवक्ता के माध्यम से दाखिल किया जाता है और इसके साथ वकालतनामा तथा एक हलफनामा संलग्न होता है। इसमें मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व, विवाद की प्रकृति, नियुक्ति के लिए उठाए गए कदमों तथा सहमत प्रक्रिया की विफलता को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए।

इस चरण पर, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(6A) के अनुसार, न्यायालय अपनी जांच को केवल मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व तक सीमित रखता है। विवाद के गुण-दोषों पर विचार नहीं किया जाता।

यह आवेदन पटना उच्च न्यायालय के ओरिजिनल साइड रजिस्ट्री के समक्ष, ई-फाइलिंग के माध्यम से तथा हार्ड कॉपी प्रस्तुत करके दाखिल किया जाता है। दाखिल होने पर, रजिस्ट्री ट्रैकिंग के लिए एक केस संख्या या डायरी संख्या प्रदान करती है।

दाखिल करने के समय ‘The Registrar General, Patna High Court, Patna’ के पक्ष में ₹500 का डिमांड ड्राफ्ट भी आवश्यक होता है।

पटना उच्च न्यायालय में दाखिला हेतु आवश्यक दस्तावेज

धारा 11 के तहत आवेदन मुख्यतः दस्तावेजों पर आधारित होता है और इसे संबंधित अभिलेखों द्वारा समर्थित होना चाहिए। इनमें अनुबंध का वह भाग शामिल होता है जिसमें मध्यस्थता समझौता निहित है, विपक्षी पक्ष को मध्यस्थ नियुक्त करने के लिए जारी नोटिस का प्रमाण, तथा विवाद को दर्शाने वाले दस्तावेज।

आवेदक को अपना पहचान प्रमाण, अधिवक्ता को अधिकृत करने हेतु वकालतनामा, तथा आवेदन में वर्णित तथ्यों का सत्यापन करने वाला हलफनामा भी दाखिल करना होता है। विवाद से संबंधित अन्य दस्तावेज या नियुक्ति के लिए उठाए गए कदमों को दर्शाने वाले दस्तावेज भी संलग्न किए जा सकते हैं।

सभी दस्तावेजों को विधिवत व्यवस्थित, अनुक्रमित और संलग्नकों के रूप में चिह्नित किया जाना चाहिए ताकि न्यायालय के समक्ष संदर्भ में आसानी हो। अनुक्रमण और संलग्नकों को चिह्नित करने का प्रारूप पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल करने के समान होना चाहिए। विस्तृत जानकारी के लिए “पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका कैसे दायर करें (एक सरल और पूर्ण मार्गदर्शिका)” शीर्षक लेख देखें।

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सुनवाई

धारा 11 के तहत आवेदन की सुनवाई माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा निर्धारित रोस्टर के अनुसार एकल न्यायाधीश द्वारा की जाती है।

मामले की सूचीकरण के पश्चात, न्यायालय विपक्षी पक्ष को नोटिस जारी करता है और उसे प्रत्युत्तर दाखिल करने का अवसर प्रदान करता है। इस चरण पर जांच का दायरा सीमित होता है। मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(6A) के अनुसार, न्यायालय केवल मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व तक ही विचार करता है।

न्यायालय विवाद के गुण-दोषों का निर्णय नहीं करता और न ही उन मुद्दों की जांच करता है जिनका निर्णय मध्यस्थता कार्यवाही में किया जाना है।

यदि ये शर्तें संतुष्ट हो जाती हैं, तो न्यायालय मध्यस्थ की नियुक्ति की कार्यवाही आगे बढ़ाता है।

नियुक्ति की समय-सीमा

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 यह अपेक्षा करती है कि मामलों का निपटारा शीघ्रता से किया जाए ताकि मध्यस्थता कार्यवाही में देरी न हो। धारा 11(13) के अनुसार, इस धारा के तहत आवेदन का निपटारा यथासंभव शीघ्र किया जाना चाहिए और प्रयास किया जाना चाहिए कि विपक्षी पक्ष को नोटिस की सेवा की तिथि से साठ दिनों के भीतर मामले का निर्णय किया जाए।

व्यवहार में, रिक्वेस्ट केस सामान्यतः सप्ताह में एक बार सूचीबद्ध होते हैं, प्रायः दिन के दूसरे भाग में, और प्रारंभिक सुनवाई एक ही दिन में हो सकती है जब नोटिस जारी किया जाता है। नियुक्ति में लगने वाला समय विपक्षी पक्ष की प्रतिक्रिया और न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या पर निर्भर करता है, और यह कई महीनों तक बढ़ सकता है।

न्यायालय शुल्क और खर्च

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 11 का आवेदन दाखिल करने के लिए निम्नलिखित शुल्क देय होते हैं:

याचिका पर ₹20,
वकालतनामा पर ₹15,
हलफनामा पर ₹20, और
₹50 कल्याण शुल्क के रूप में।

इसके अतिरिक्त, दाखिल करते समय ‘The Registrar General, Patna High Court, Patna’ के पक्ष में ₹500 का डिमांड ड्राफ्ट आवश्यक होता है।

ये शुल्क पटना उच्च न्यायालय के नियमों और अधिसूचनाओं के अनुसार परिवर्तन के अधीन हैं।

धारा 11 के तहत न्यायालय की शक्ति का दायरा

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत न्यायालय की भूमिका केवल मध्यस्थ की नियुक्ति को सुगम बनाने तक सीमित है। न्यायालय पक्षकारों के बीच विवाद का निर्णय नहीं करता।

धारा 11(6A) के अनुसार, धारा 11(4), (5) या (6) के तहत आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय अपनी जांच को केवल मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व तक सीमित रखता है। न्यायालय विवाद के गुण-दोषों या उन मुद्दों की जांच नहीं करता जिनका निर्णय मध्यस्थता कार्यवाही में किया जाना है।

इसका कार्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि जहाँ सहमत प्रक्रिया लागू नहीं हो पा रही है, वहाँ मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू हो सके। विवाद से संबंधित सभी प्रश्न मध्यस्थ द्वारा तय किए जाते हैं।

नियुक्ति आदेश की अंतिमता

जब पटना उच्च न्यायालय द्वारा धारा 11 के तहत मध्यस्थ नियुक्त कर दिया जाता है, तो मध्यस्थता कार्यवाही प्रारंभ करने के उद्देश्य से यह आदेश अंतिम होता है।

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(7) के अनुसार, उप-धारा (4), (5) या (6) के तहत उच्च न्यायालय या उसके द्वारा नामित व्यक्ति या संस्था का निर्णय अंतिम होता है, और ऐसे निर्णय के विरुद्ध कोई अपील, जिसमें लेटर्स पेटेंट अपील (इंट्रा कोर्ट अपील) भी शामिल है, स्वीकार्य नहीं है।

यह सुनिश्चित करता है कि नियुक्ति के चरण पर मध्यस्थता में देरी न हो और विवाद बिना अतिरिक्त वाद-विवाद के मध्यस्थ द्वारा तय किया जा सके।

निष्कर्ष

जहाँ पक्षकार अपने समझौते के अनुसार मध्यस्थ नियुक्त करने में असमर्थ होते हैं, वहाँ मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत पटना उच्च न्यायालय का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है।

मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व को स्थापित करके और यह दिखाकर कि नियुक्ति की सहमत प्रक्रिया विफल हो चुकी है, कोई पक्ष धारा 11(4), (5) या (6) के तहत न्यायालय के माध्यम से मध्यस्थ की नियुक्ति का अनुरोध कर सकता है। ऐसे मामलों में न्यायालय केवल मध्यस्थ न्यायाधिकरण के गठन को सुगम बनाने के सीमित उद्देश्य से हस्तक्षेप करता है।

यह सुनिश्चित करता है कि मध्यस्थता कार्यवाही बिना अनावश्यक देरी के प्रारंभ हो सके और विवाद का निपटारा पक्षकारों के बीच हुए समझौते के अनुसार मध्यस्थ द्वारा किया जाए, जिससे सहमत विवाद समाधान पद्धति को प्रभावी बनाया जा सके।

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Shambhawi Jha is a legal intern at Samvida Law Associates, where she actively contributes to both litigation support and legal research work. She assists the litigation team in drafting pleadings, preparing case briefs, organizing court records, and tracking procedural compliance in matters before the Patna High Court and subordinate courts.
Her work focuses on understanding court procedures, writ jurisdiction, appellate remedies, and filing practices, which helps ensure accuracy and efficiency in day-to-day litigation. She also supports legal awareness initiatives of Samvida by helping convert complex legal processes into simple, reader-friendly guides for litigants and the general public.
Through her internship, she is gaining practical exposure to court functioning, client interaction, and legal documentation, while contributing meaningfully to Samvida’s mission of improving access to legal information and justice in Bihar.

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