बलात्कार के प्रयास की सज़ा को शीलभंग में बदला गया – पटना उच्च न्यायालय, 2025

इस अपील में, 14 वर्षीया लड़की के साथ बलात्कार के प्रयास के दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति ने अपनी 10 वर्ष की कारावास की सज़ा को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि तथ्यों से “बलात्कार का प्रयास” सिद्ध नहीं होता, लेकिन शीलभंग स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है। उसकी सज़ा भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 से बदलकर धारा 354 आईपीसी कर दी गई, और उसकी सज़ा को पहले से भोगी गई अवधि तक सीमित कर दिया गया। इस प्रकार अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 21.03.2002 की रात दरभंगा ज़िले के एक गांव में हुई घटना से संबंधित है। लगभग रात 8 बजे सूचक की नाबालिग पुत्री, जिसकी आयु लगभग 14 वर्ष थी, शौच के लिए घर से बाहर गई थी।

उसके पिता द्वारा दिए गए लिखित प्रतिवेदन (फर्दबयान) के अनुसार, अभियुक्त, जो उसी गांव का रहने वाला है, ताड़ी पीकर नशे की हालत में लौट रहा था। लड़की को अकेला देखकर उसने कथित रूप से उसे पकड़ लिया और बलात्कार करने का प्रयास किया। जब लड़की चिल्लाने लगी तो उसका छोटा भाई हाशिम वहां पहुंच गया और अभियुक्त भाग गया। लड़की घर आई और उसने घटना की जानकारी ग्रामीणों को दी।

इसी आधार पर सिंहवाड़ा थाना कांड संख्या 18/2002 भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत दर्ज किया गया। जांच के बाद 31.07.2002 को पुलिस ने इन्हीं धाराओं के तहत आरोपपत्र (चार्जशीट) समर्पित किया।

मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने संज्ञान लेकर मामला दरभंगा के ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में समर्पित किया। इसे सत्रवाद संख्या 218/2003 के रूप में दर्ज किया गया और बाद में विचारण हेतु अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या 4, दरभंगा को हस्तांतरित कर दिया गया।

दिनांक 16.01.2008 के निर्णय द्वारा, विचारण न्यायालय ने अभियुक्त को धारा 376/511 आईपीसी (बलात्कार करने के प्रयास) के तहत दोषी ठहराया और उसे दस वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई।

अभियुक्त ने इसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374(2) के तहत पटना उच्च न्यायालय में यह आपराधिक अपील (एसजे) संख्या 153/2008 दायर की, जिसमें उसने दोषसिद्धि और सज़ा – दोनों को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने इस बात का निर्णय करने के लिए कि सिद्ध आचरण “बलात्कार के प्रयास” की श्रेणी में आता है या केवल “शीलभंग” की, अभियोजन पक्ष के नौ गवाहों, बचाव पक्ष के छह गवाहों तथा चिकित्सीय साक्ष्य का विस्तार से परीक्षण किया।

अभियोजन के प्रमुख साक्ष्य

पीडब्ल्यू-1, जो सूचक का रिश्तेदार एवं ग्रामीण है, ने कहा कि घटना की तिथि को लगभग रात 8 बजे उसे पीड़िता की चीख सुनाई दी। जब वह वहां पहुंचा तो उसने पीड़िता को घास/झाड़-झंखाड़ पर गिरी हुई और अभियुक्त को उसके ऊपर देखा। उसने कहा कि उसकी सलवार खुली हुई थी और अभियुक्त उसके साथ बलात्कार करने का प्रयास कर रहा था; वह रो रही थी। इतने में कई लोग पहुंच गए, तब तक अभियुक्त भाग गया।

पीडब्ल्यू-2, एक अन्य ग्रामीण, ने कहा कि उसने चीख-पुकार सुनी और देखा कि अभियुक्त भाग रहा था जबकि पीड़िता रो रही थी। जब उसने उससे पूछा तो उसने बताया कि अभियुक्त ने उसे ज़बरदस्ती ज़मीन पर फेंक दिया और उसकी सलवार की नाड़ खोलने की कोशिश की। जिरह में उसने स्पष्ट किया कि उसे घटना की जानकारी पीड़िता से ही हुई और उसने अभियुक्त को रोकने की कोशिश नहीं की क्योंकि तब तक वह नहीं जानता था कि क्या हुआ है।

पीडब्ल्यू-3, जो पीड़िता का भाई है, ने बयान दिया कि वह अपने घर के आंगन में था जब उसने बहन की चीख सुनी। वह रामजनी के घर की ओर दौड़ा और देखा कि अभियुक्त उत्तर दिशा की ओर भाग रहा है। उसकी बहन पत्तों पर गिरी हुई थी और उसकी सलवार की नाड़ खुली हुई थी। उसने उसे बताया कि अभियुक्त ने ज़बरदस्ती सलवार की नाड़ खोलने की कोशिश की और बलात्कार करने का प्रयास किया। उसने कहा कि उस समय उसकी बहन की उम्र लगभग 14 वर्ष थी।

पीडब्ल्यू-4, पीड़िता का चचेरा भाई, ने कहा कि जब उसने पीड़िता की चीख सुनी और वहां पहुंचा तो उसने अभियुक्त को उसके ऊपर चढ़ा हुआ देखा। उसे देखते ही अभियुक्त भाग गया। उसने कहा कि अन्य ग्रामीण, जिनमें पीडब्ल्यू-1 भी शामिल थे, वहां उपस्थित थे और बाद में सूचक भी आया। जिरह में उसने स्वीकार किया कि उसने मौके पर पीड़िता से कोई बात नहीं की।

पीडब्ल्यू-5, जो पीड़िता की मां है, ने कहा कि उसकी बेटी शौच के लिए गई थी और लौटते समय अभियुक्त ने उसे ज़बरदस्ती घास/झाड़ पर फेंक दिया और बलात्कार करने के इरादे से उसकी सलवार की नाड़ खोल दी। उसकी चीख सुनकर वह और अन्य लोग दौड़े और उन्होंने पीड़िता को रोते हुए तथा अभियुक्त को भागते हुए देखा। पीड़िता ने उन्हें बताया कि अभियुक्त ने बलात्कार करने की कोशिश की। उसने कहा कि उस समय पीड़िता की उम्र 14 वर्ष थी। हालांकि, जिरह में उसने स्वीकार किया कि उसने स्वयं अपनी आंखों से फेंकने या सलवार की नाड़ खोलने की वास्तविक क्रिया नहीं देखी।

पीडब्ल्यू-6, पीड़िता, ने प्रत्यक्ष विवरण दिया। उसने कहा कि जब वह शौच से लौट रही थी और रामजनी शाह के दरवाजे के पास पहुंची, तो अभियुक्त ने उसे पकड़ लिया, खींचकर पत्तों के ढेर पर फेंक दिया। बलात्कार के इरादे से उसने उसका मुंह ज़ोर से बंद कर दिया, सलवार की नाड़ खोलने की कोशिश की, नाड़ खोल दी और उसके ऊपर चढ़ गया। उसने कहा कि उसने उसे धक्का देकर अपना मुंह छुड़ाया और चिल्लाने लगी। उसकी चीख सुनकर क़ासिम, नसीम और उसकी मां आए; तब अभियुक्त भाग गया। बाद में अन्य ग्रामीण भी आए और उसने पूरी घटना बताई।

जिरह में उसने माना कि पुलिस ने घटना के लगभग एक महीने बाद उसका चिकित्सीय परीक्षण कराया और उसके शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं था। उसने यह भी कहा कि विवाद निपटाने के लिए उसके पिता ने पंचायत बुलाई थी।

पीडब्ल्यू-7, सूचक तथा पीड़िता के पिता, ने कहा कि उसकी बेटी शौच के लिए गई थी और लौटने पर अभियुक्त ने उसे ज़बरदस्ती ज़मीन पर फेंक दिया और उसकी सलवार की नाड़ खोल दी। उसकी चीख सुनकर वह और अन्य लोग पहुंचे और उन्होंने अभियुक्त को भागते हुए और लड़की को घास/झाड़ पर गिरी हुई तथा उसकी सलवार की नाड़ खुली हुई देखी। उसने कहा कि उस समय उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष थी। जिरह में उसने स्वीकार किया कि उसने लिखित रिपोर्ट अपनी बेटी के बताए अनुसार दी और उसके शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं था।

पीडब्ल्यू-8, डॉक्टर, ने पीड़िता का 25.04.2002 को, घटना के लगभग एक महीने बाद, परीक्षण किया। उसने उसके शरीर पर कोई बाह्य चोट नहीं पाई। जननांग परीक्षण में उसने योनि को अक्षत पाया; योनि द्वार में केवल छोटी उंगली के अग्र भाग को भी कठिनाई से प्रवेश मिलता था। शुक्राणु नहीं पाए गए। रेडियोलॉजिकल परीक्षण के आधार पर उसने राय दी कि लड़की की उम्र 14-15 वर्ष के बीच है। उसने स्पष्ट कहा कि ज़बरदस्ती यौन संबंध स्थापित किए जाने का कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला।

बचाव पक्ष के साक्ष्य और दलीलें

बचाव पक्ष ने छह गवाहों की गवाही कराई, जिनमें डी डब्ल्यू-1, जो सूचक का भाई है, और डी डब्ल्यू-2, एक स्वतंत्र गवाह शामिल हैं। बचाव का मुख्य आधार पूर्व शत्रुता और असफल विवाह प्रस्ताव पर केंद्रित था। डी डब्ल्यू-1 और डी डब्ल्यू-2 ने कहा कि सूचक अपनी बेटी का विवाह अभियुक्त से करना चाहता था, पर अभियुक्त के माता-पिता ने इनकार कर दिया, जिसके बाद यह झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया।

अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि:

• अधिकांश अभियोजन गवाह या तो सुनी-सुनाई बात कह रहे हैं या निकट संबंधी हैं।

• अन्वेषण अधिकारी की गवाही नहीं हुई, जो उनके अनुसार घातक है।

• चिकित्सीय साक्ष्य से कोई चोट, बल प्रयोग के चिन्ह, हाइमन फटा होना, या बलात्कार या बलात्कार के प्रयास का कोई संकेत नहीं मिलता।

• अधिक से अधिक, अभियुक्त का कृत्य केवल बलात्कार की “तैयारी” है, “प्रयास” नहीं; इस अंतर को रेखांकित करने के लिए उन्होंने Madanlal v. State of J&K, (1997) 7 SCC 677 पर भरोसा किया।

इसलिए उन्होंने न्यायालय से धारा 376/511 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को रद्द करने का आग्रह किया।

राज्य का प्रत्युत्तर

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता की गवाही से स्पष्ट रूप से अभियुक्त द्वारा बलात्कार करने के प्रत्यक्ष प्रयास का संकेत मिलता है। उन्होंने पीडब्ल्यू-3 की गवाही की ओर भी इशारा किया, जिसमें उसने अपनी बहन के ऊपर अभियुक्त को देखा और उसकी सलवार की नाड़ खुली होने की बात कही। उन्होंने प्रस्तुत किया कि विचारण न्यायालय ने उचित रूप से अपीलकर्ता को बलात्कार के प्रयास के लिए दोषी ठहराया और अभियोजन ने संदेह से परे अपराध सिद्ध किया है।

उच्च न्यायालय का विधिक विश्लेषण

उच्च न्यायालय ने पहले केंद्रीय प्रश्न निर्धारित किया: क्या सिद्ध आचरण दंड संहिता की धारा 376(2)(f) सहपठित धारा 511 के तहत “बलात्कार करने के प्रयास” की श्रेणी में आता है, या केवल ऐसी “तैयारी” है जो पीड़िता के शीलभंग तक सीमित है।

न्यायालय ने State of M.P. v. Mahendra, (2022) 12 SCC 442 तथा Koppula Venkat Rao v. State of A.P., (2004) 3 SCC 602 का संदर्भ लेते हुए “तैयारी” और “प्रयास” के अंतर पर चर्चा की। उसने नोट किया कि “प्रयास” वहीं से शुरू होता है जहां “तैयारी” समाप्त होती है और इसमें अपराध के प्रत्यक्ष संपादन की दिशा में उठाया गया प्रत्यक्ष कदम शामिल होता है।

न्यायालय ने इसके बाद धारा 375 आईपीसी का परीक्षण किया और रेखांकित किया कि बलात्कार का अपराध सिद्ध होने के लिए प्रवेश (penetration) आवश्यक है। उसने पाया कि इस मामले में प्रवेश न होने पर कोई विवाद नहीं है।

“बलात्कार के प्रयास” के प्रश्न पर निर्णय देने के लिए, न्यायालय ने यह देखा कि क्या अभियुक्त ने तैयारी से आगे बढ़कर, जैसे स्वयं को या पीड़िता को इस प्रकार निर्वस्त्र किया कि यदि व्यवधान न होता तो बलात्कार हो जाता।

न्यायालय ने Tarkeshwar Sahu v. State of Bihar (now Jharkhand), (2006) 8 SCC 560 पर भरोसा किया, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जब प्रवेश का कोई प्रयास नहीं होता और न ही अभियुक्त या अभियुक्ता (prosecutrix) को निर्वस्त्र किया जाता है, तो धारा 376/511 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं रहती।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, न्यायालय ने नोट किया कि वर्तमान मामले में अभियुक्त ने पीड़िता को ज़बरदस्ती रामजनी शाह के घर के पास ले जाकर ज़मीन/पत्तों पर फेंक दिया और उसकी सलवार की नाड़ खोल दी। किंतु ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि उसने स्वयं को निर्वस्त्र किया हो या प्रवेश के प्रयास का कोई कृत्य किया हो। घटना उस समय बाधित हो गई जब पीड़िता ने शोर मचाया और लोग वहां आ गए।

इस आधार पर, न्यायालय ने माना कि यह मामला धारा 376/511 आईपीसी के अंतर्गत “बलात्कार के प्रयास” की विधिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता।

धारा 354 आईपीसी में रूपांतरण

जब न्यायालय ने पाया कि “बलात्कार का प्रयास” सिद्ध नहीं होता, तब उसने यह विचार किया कि क्या इन्हीं तथ्यों के आधार पर अभियुक्त को किसी कम गम्भीर, किन्तु संबंधित अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है।

इस हेतु न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 222 का सहारा लिया, जो यह अनुमति देती है कि यदि मुख्य (गंभीर) अपराध सिद्ध न हो परन्तु उसके भीतर निहित “लघु अपराध” के अवयव सिद्ध हों, तो उस लघु अपराध के लिए, भले ही पृथक रूप से आरोप न लगाया गया हो, अभियुक्त को दोषी ठहराया जा सकता है।

Shamnsaheb M. Multtani v. State of Karnataka, (2001) 2 SCC 577 पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लघु अपराध वह होता है, जिसके प्रमुख अवयव मुख्य अपराध से सामान्य (कॉमन) हों, परंतु जिसके लिए अपेक्षित दंड अपेक्षाकृत कम हो।

इसके बाद न्यायालय ने धारा 354 आईपीसी का परीक्षण किया, जो किसी स्त्री की लज्जा (शील) भंग करने के इरादे से या उस संभावना की जानकारी के साथ, उस पर प्रहार (assault) या आपराधिक बल प्रयोग को दंडित करती है। विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों (जिनमें Jai Chand v. State, Raja v. State of Rajasthan, Bisheshwar Murmu v. State of Bihar (Jharkhand), Keshab Padhan v. State of Orissa, एवं Rameshwar v. State of Haryana शामिल हैं) का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने उन स्थितियों को रेखांकित किया जिनमें ऐसे कृत्यों को धारा 354 आईपीसी के अंतर्गत अपराध माना गया, न कि बलात्कार के प्रयास के रूप में।

साक्ष्य का मूल्यांकन करते हुए न्यायालय ने माना कि संदेह से परे यह सिद्ध है कि 21.03.2002 को लगभग रात 8 बजे अभियुक्त, नशे की हालत में, नाबालिग पीड़िता को पकड़कर ज़बरदस्ती घास/झाड़ पर फेंकता है और उसकी सलवार की नाड़ उसके शीलभंग के इरादे से खोलता है। यह बात पीड़िता तथा अन्य अभियोजन गवाहों से पुष्ट होती है और, न्यायालय के अनुसार, बचाव पक्ष की मौन स्वीकारोक्ति (कम से कम उपस्थिति और घटना की सीमा तक) से भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकृत होती है।

अतः न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि, यद्यपि अभियुक्त पर प्रारंभ में केवल धारा 376/511 आईपीसी के तहत आरोप लगाया गया था, तथापि वह धारा 354 आईपीसी के अंतर्गत अपराध का स्पष्ट रूप से दोषी है।

अन्वेषण अधिकारी की जिरह न होना

अपीलकर्ता ने दलील दी कि अन्वेषण अधिकारी (आईओ) की जिरह न होना अभियोजन के लिए घातक है। न्यायालय ने इस दलील को Behari Prasad v. State of Bihar, (1996) 2 SCC 317 पर भरोसा करते हुए अस्वीकार कर दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि स्वयं मात्र इस आधार पर कि आईओ की जिरह नहीं हुई, पूरा विचारण त्रुटिपूर्ण नहीं हो जाता; तथ्यों पर वास्तविक पूर्वाग्रह (prejudice) सिद्ध होना चाहिए।

यहां न्यायालय ने पाया कि धारा 354 आईपीसी के अपराध को सिद्ध करने के लिए आवश्यक तथ्य स्पष्ट रूप से मौखिक साक्ष्य के माध्यम से स्थापित हो चुके थे। उसने माना कि केवल आईओ की गवाही के अभाव से अभियोजन का मामला कमज़ोर नहीं होता।

दोषसिद्धि और सज़ा पर अंतिम निर्णय

उपरोक्त तर्क के आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के निर्णय में संशोधन किया। उसने अपीलकर्ता को धारा 376/511 आईपीसी के आरोप से बरी कर दिया और इसके बदले उसे धारा 354 आईपीसी के अंतर्गत दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया।

सज़ा के प्रश्न पर न्यायालय ने नोट किया कि अपीलकर्ता 2002 से ही लंबे समय तक विचारण का सामना कर रहा है और वह अभिरक्षा (कस्टडी) में रह चुका है। State of U.P. v. Tribhuwan, (2018) 1 SCC 90 तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 का संदर्भ लेते हुए, न्यायालय ने परिस्थितियों में पहले से भोगी गई अवधि को पर्याप्त कारावास माना।

न्यायालय ने यह देखते हुए कि अपीलकर्ता के आचरण के संबंध में कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं है और कार्यवाही लम्बे समय तक लंबित रही, यह माना कि उसकी सज़ा पहले से भोगी गई अवधि तक सीमित की जानी चाहिए, जिसे एक वर्ष के रूप में ग्रहण किया गया। उसने आदेश दिया कि अपीलकर्ता अपने किसी भी जमानत बांड की देनदारियों से मुक्त समझा जाए।

तदनुसार, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार तथा अन्यत्र यौन अपराध से जुड़े मामलों में पीड़ितों, परिवारों और अभियुक्त व्यक्तियों – सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है।

पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कब कोई कृत्य “बलात्कार के प्रयास” की श्रेणी में आता है और कब वह केवल “शीलभंग” तक सीमित रहता है। न्यायालय ने ज़ोर दिया कि “बलात्कार के प्रयास” के लिए तैयारी से आगे बढ़कर, जैसे निर्वस्त्र करना और प्रवेश की दिशा में कोई कदम होना आवश्यक है। केवल किसी लड़की को ज़मीन पर गिरा देना और उसकी सलवार की नाड़ खोल देना, बिना किसी आगे की यौन क्रिया के, इस मानक तक नहीं पहुंचता।

दूसरा, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे कृत्य फिर भी गंभीर आपराधिक अपराध बने रहते हैं। जब बलात्कार के प्रयास का गंभीर आरोप सिद्ध नहीं हो पाता, तब भी न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 222 का उपयोग कर शीलभंग जैसे कम, परंतु फिर भी गंभीर, अपराध (धारा 354 आईपीसी) के लिए दोषसिद्धि कर सकता है।

तीसरा, इस निर्णय से यह सिद्ध होता है कि शीलभंग के अपराध में दंड देने के लिए प्रवेश से संबंधित चिकित्सीय साक्ष्य आवश्यक नहीं है। पीड़िता की स्पष्ट गवाही और सहायक गवाहों के बयानों से, चोट या संभोग के संकेत के बिना भी, धारा 354 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि पर्याप्त रूप से की जा सकती है।

अंत में, न्यायालय ने सज़ा तय करते समय दंड और न्यायसंगतता के बीच संतुलन बनाया। उसने मामले की लम्बी अवधि को मान्यता दी और अधिकतम सज़ा यांत्रिक रूप से न देकर, पहले से काटी गई जेल अवधि का लाभ दिया।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या अभियुक्त द्वारा नाबालिग लड़की को पकड़ना, ज़मीन पर फेंकना और उसकी सलवार की नाड़ खोल देना, धारा 376/511 आईपीसी के तहत “बलात्कार करने के प्रयास” की श्रेणी में आता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि प्रवेश के किसी प्रयास या अभियुक्त द्वारा स्वयं को अथवा पीड़िता को उस स्तर तक निर्वस्त्र करने का कोई साक्ष्य नहीं है। यह आचरण तैयारी तथा शीलभंग की श्रेणी में आता है, विधिक रूप से “बलात्कार का प्रयास” नहीं।
  • प्रश्न: क्या न्यायालय, जबकि अभियुक्त पर केवल धारा 376/511 आईपीसी के तहत आरोप था, उसे धारा 354 आईपीसी के तहत दोषी ठहरा सकता था?
    उत्तर: हाँ। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 222 लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि जब मुख्य (गंभीर) अपराध सिद्ध न हो परंतु तथ्य किसी अंतर्निहित लघु अपराध को स्थापित करते हों, तो अभियुक्त को उस लघु अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है। धारा 354 आईपीसी को इस मामले के तथ्यों के भीतर निहित एक समजात, कम दंडनीय अपराध के रूप में माना गया।
  • प्रश्न: क्या अन्वेषण अधिकारी की जिरह न होना अभियोजन के मामले के लिए घातक था?
    उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि मात्र आईओ की जिरह न होना अपने आप में विचारण को त्रुटिपूर्ण नहीं बनाता। यहां पीड़िता और अन्य गवाहों की मौखिक गवाही से धारा 354 आईपीसी के अवयव पर्याप्त रूप से सिद्ध हो गए थे।

न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण

  • State of M.P. v. Mahendra, (2022) 12 SCC 442
  • Koppula Venkat Rao v. State of A.P., (2004) 3 SCC 602
  • Tarkeshwar Sahu v. State of Bihar (Now Jharkhand), (2006) 8 SCC 560
  • Shamnsaheb M. Multtani v. State of Karnataka, (2001) 2 SCC 577
  • Jai Chand v. State, 1996 Cri LJ 2039 (Delhi High Court)
  • Raja v. State of Rajasthan, 1998 Cri LJ 1608 (Rajasthan High Court)
  • Bisheshwar Murmu v. State of Bihar, 2004 Cri LJ 326 (Jharkhand High Court)
  • Keshab Padhan v. State of Orissa, 1976 Cutt LR (Cri) 236 (Orissa High Court)
  • Rameshwar v. State of Haryana, 1984 Cri LJ 786 (Punjab & Haryana High Court)
  • Behari Prasad v. State of Bihar, (1996) 2 SCC 317
  • State of U.P. v. Tribhuwan, (2018) 1 SCC 90
  • Madanlal v. State of J&K, (1997) 7 SCC 677 (अपीलकर्ता के अधिवक्ता द्वारा बहस में उद्धृत)

मामले का विवरण

वाद संख्या: Criminal Appeal (SJ) No. 153 of 2008

वाद शीर्षक: Md. Zafre Imam @ Mangla v. State of Bihar

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ / कोरम: Hon’ble Mr. Justice Ramesh Chand Malviya

निर्णय की तिथि: 29.04.2025

उद्धरण: 2025 (2) PLJR 911

अधिवक्ता:

अपीलकर्ता की ओर से: Mr. Syed Arshad Alam, Advocate; Ms. Anjum Perveen, Advocate; Mr. Kamran Fazal, Advocate

राज्य (प्रतिवादी) की ओर से: Mr. S. N. Prasad, APP

मामले की प्रकृति: दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374(2) के तहत सत्रवाद संख्या 218/2003 (सिंहवाड़ा थाना कांड संख्या 18/2002) में दी गई दोषसिद्धि एवं दंड के विरुद्ध आपराधिक अपील।

विचारण न्यायालय का परिणाम: धारा 376/511 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि; 10 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा।

उच्च न्यायालय का परिणाम: धारा 376/511 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि निरस्त; अपीलकर्ता को इसके स्थान पर धारा 354 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गया; सज़ा को पहले से भोगी गई अवधि (एक वर्ष के रूप में ग्रहण) तक सीमित किया गया; अपील आंशिक रूप से स्वीकार; जमानत बांड समाप्त।

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MjQjMTUzIzIwMDgjMSNO-RvWSmR3334o=

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