प्रमाण के अभाव में Arms Act में दोषसिद्धि रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2025

पटना उच्च न्यायालय ने नालंदा से Arms Act में हुई एक दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार किया। न्यायालय ने पाया कि पिस्तौल और कारतूस की जब्ती तथा अभियोजन की स्वीकृति को विधिवत सिद्ध नहीं किया गया था। इन कमियों के कारण न्यायालय ने अभियुक्त को संदेह का लाभ दिया और बरी कर दिया। पूर्व की दोषसिद्धि और सज़ा अब प्रभावहीन हो गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला थाना अस्थावां, थाना कांड संख्या 62/2004, जिला नालंदा से शुरू हुआ। यह कांड 17.03.2004 को अस्थावां थाना प्रभारी के लिखित प्रतिवेदन पर दर्ज किया गया।

एफआईआर Arms Act की धारा 25(1-B)(a) एवं 26(ii) के अंतर्गत एक अभियुक्त के विरुद्ध दर्ज की गई, जो बाद में पटना उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता बना। अनुसंधान के उपरांत पुलिस ने आरोप पत्र समर्पित किया।

Magistrate ने संज्ञान लिया, Arms Act के अंतर्गत आरोप तय किए और मामला विचारण हेतु भेजा गया। विचारण के दौरान अभियोजन ने पाँच गवाहों की जिरह करवाई, जिनमें सूचनाकर्ता, दो स्वतंत्र जब्ती गवाह, एक ASI और एक Seargent Major शामिल थे। कई दस्तावेज प्रदर्शित किए गए, जिनमें जब्ती सूची, एफआईआर, स्वीकृति आदेश, शस्त्रों की यांत्रिक जाँच रिपोर्ट और संबंधित अग्रेषण पत्र शामिल थे।

Trial Court ने अंततः याचिकाकर्ता को Arms Act की धारा 25(1-B)(a) एवं 26(i) के अंतर्गत दोषी ठहराया। उसे धारा 25(1-B)(a) के अंतर्गत दो वर्ष साधारण कारावास एवं 2,000/- रुपये जुर्माना तथा धारा 26(i) के अंतर्गत एक वर्ष साधारण कारावास एवं 1,000/- रुपये जुर्माना की सज़ा सुनाई गई।

याचिकाकर्ता ने Fast Track Court सं. 1, नालंदा@बिहारशरीफ के समक्ष Criminal Appeal No. 91 of 2011 दायर की। Appellate Court ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, परंतु कारावास की अवधि को भुगते हुए अवधि तक घटा दिया। हालांकि, Trial Court द्वारा लगाए गए जुर्माने की राशि में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

फिर भी असंतुष्ट होकर, दोषसिद्ध व्यक्ति ने पटना उच्च न्यायालय में Criminal Revision No. 178 of 2019 दायर की, जिसमें उसने मुख्यतः जब्ती एवं स्वीकृति के अनुचित प्रमाणन और साक्ष्य के गलत मूल्यांकन के आधार पर 6.10.2018 के Appellate Court के निर्णय को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

Criminal Revision माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार के समक्ष मौखिक सुनवाई हेतु प्रस्तुत हुई। निर्णय 25.03.2025 को सुनाया गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता निर्दोष है और उसे झूठा फँसाया गया है। उनका आग्रह था कि Trial Court और Appellate Court दोनों ने अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों की समुचित सराहना नहीं की, जिसके कारण दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं है।

रक्षा पक्ष की मुख्य दलीलें दो बिन्दुओं पर केंद्रित थीं। पहला, कि याचिकाकर्ता से शस्त्र एवं कारतूस की कथित जब्ती संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुई। दूसरा, कि Arms Act की धारा 39 के तहत आवश्यक स्वीकृति विधिवत सिद्ध नहीं की गई।

जब्ती के संदर्भ में, रक्षा पक्ष ने इंगित किया कि दो स्वतंत्र गवाह P.W.-1 और P.W.-2, जिन्हें जब्ती गवाह के रूप में उद्धृत किया गया था, उन्होंने अभियोजन के संस्करण का समर्थन नहीं किया। दोनों ने न्यायालय में कहा कि उन्हें जब्ती के बारे में कुछ पता नहीं है।

रक्षा पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि स्वयं अभियोजन के साक्ष्य के अनुसार, जब्त शस्त्र एवं कारतूस को सील कर पुलिस थाना के मालखाना में सही पहचान चिह्नों के साथ सुरक्षित अभिरक्षा में जमा किए जाने का कोई प्रमाण नहीं है। परिणामस्वरूप, जब विचारण के दौरान शस्त्र एवं कारतूस न्यायालय में प्रस्तुत किए गए, तो यह स्पष्ट नहीं किया जा सका कि ये वही वस्तुएँ थीं जो कथित रूप से याचिकाकर्ता से बरामद हुई थीं।

स्वीकृति के संबंध में, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि Arms Act की धारा 39 के तहत अभियोजन की स्वीकृति अनिवार्य है। उनका कहना था कि अभियोजन वैध स्वीकृति आदेश को सिद्ध करने में विफल रहा। अतः उनके अनुसार संपूर्ण अभियोजन एवं दोषसिद्धि अवैध हो गई।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से उपस्थित APP ने Trial Court और Appellate Court के निर्णयों का समर्थन किया। उनका तर्क था कि दोनों न्यायालयों ने साक्ष्यों की समुचित सराहना की है और दोषसिद्धि न्यायसंगत है। अतः Criminal Revision को ख़ारिज किया जाना चाहिए।

पटना उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों के तर्कों पर सावधानीपूर्वक विचार किया और अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की।

अभियोजन के अनुसार, घटना उस समय की है जब पुलिस की एक टीम आपराधिक मामलों के फरार अभियुक्तों को पकड़ने के लिए क्षेत्र में निकली हुई थी। कथित रूप से उन्हें गुप्त सूचना मिली कि ग्राम दुमरावां, टोला बलवा में कुछ असामाजिक तत्व एकत्रित हुए हैं। इस सूचना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस वहाँ पहुँची।

अभियोजन का आगे का मामला यह था कि पुलिस दल को देखकर याचिकाकर्ता भागने लगा। कथित रूप से उसका पीछा कर उसे पकड़ा गया। उसकी तलाशी के दौरान उसके कब्जे से एक भरी हुई पिस्तौल तथा चार कारतूस बरामद होने का दावा किया गया।

किन्तु जब उच्च न्यायालय ने गवाहों के बयान परखा तो गंभीर संदेह उभरे। P.W.-1 और P.W.-2, जो स्वतंत्र जब्ती गवाह थे, दोनों ने न्यायालय में कहा कि उन्हें जब्ती के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। इससे कथित बरामदगी के संबंध में अभियोजन का मामला सीधे तौर पर कमज़ोर हो गया।

P.W.-3, सूचनाकर्ता, वह अधिकारी था जिसने दावा किया कि उसने ही याचिकाकर्ता से शस्त्र और गोला-बारूद जब्त किए। न्यायालय ने नोट किया कि अपने बयान में उसने घटना स्थल पर जब्त वस्तुओं को सील करने या उन्हें पहचान चिह्नों सहित मालखाना में जमा करने के बारे में कुछ नहीं कहा।

यह चूक महत्वपूर्ण थी। शस्त्र एवं गोला-बारूद जैसी भौतिक वस्तुओं से जुड़े आपराधिक मामलों में, न्यायालय सामान्यतः अपेक्षा करता है कि अभियोजन यह दिखाए कि जब्त वस्तुओं को विधिवत सील किया गया और सुरक्षित अभिरक्षा में रखा गया, ताकि न्यायालय में पेश करने या विशेषज्ञ परीक्षण हेतु भेजने से पहले छेड़छाड़ या अदला-बदली की कोई आशंका न रहे।

P.W.-5, Seargent Major, ने जब्त शस्त्र और गोला-बारूद की यांत्रिक जाँच की। उसने स्पष्ट रूप से कहा कि उसे यह नहीं मालूम था कि परीक्षण हेतु मिलने से पहले ये भौतिक प्रदर्श (material exhibits) कहाँ रखे गए थे। ऐसा कोई अन्य गवाह भी नहीं था जो अभिरक्षा की श्रृंखला (chain of custody) स्पष्ट कर सके — अर्थात जब्ती स्थल से कौन वस्तुएँ लेकर गया, उन्हें कहाँ रखा गया, और वे किस प्रकार Seargent Major तक जाँच हेतु पहुँचीं।

ऐसे साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने पाया कि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि न्यायालय में भौतिक प्रदर्श के रूप में प्रस्तुत शस्त्र और गोला-बारूद वही थे जो कथित रूप से याचिकाकर्ता से बरामद हुए थे। इससे स्वयं जब्ती के संबंध में वाजिब संदेह उत्पन्न हुआ।

स्वीकृति के मुद्दे पर, P.W.-4 (ASI) अभियोजन की स्वीकृति आदेश के गवाह के रूप में पेश हुआ। उसने कहा कि स्वीकृति आदेश का प्रारूप तथा जिलाधिकारी का हस्ताक्षर फोटोकॉपी पर था और प्रकरण से संबंधित विवरण स्याही से भरकर जोड़े गए थे।

उच्च न्यायालय ने इस गवाही पर विचार करते हुए पाया कि इससे यह संकेत मिलता है कि स्वीकृति आदेश विधिवत रूप से निर्गत नहीं हुआ। यह तथ्य कि जिलाधिकारी के हस्ताक्षर फोटोकॉपी रूप में थे और बाद में मामले के विवरण स्याही से भरे गए, इस बात की ओर इशारा करता है कि जिलाधिकारी ने मामले से संबंधित अभिलेख एवं भरे हुए विवरण को स्वयं देखकर और मनन कर स्वीकृति पर हस्ताक्षर नहीं किए।

इन तथ्यों पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि Arms Act की धारा 39 के अंतर्गत स्वीकृति विधिपूर्वक सिद्ध नहीं हुई। विधिसम्मत स्वीकृति के बिना अभियोजन की शुरुआत ही कानूनन संदेहास्पद हो जाती है।

इन दोनों पहलुओं को मिलाकर, न्यायालय ने माना कि न तो शस्त्र एवं गोला-बारूद की जब्ती और न ही अभियोजन हेतु स्वीकृति आदेश संदेह से परे सिद्ध हो सका। चूँकि आपराधिक दोषसिद्धि के लिए संदेह से परे प्रमाण आवश्यक है, ये कमियाँ अभियोजन के लिए घातक सिद्ध हुईं।

ऐसी स्थिति में संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया जाना आवश्यक है। अतः पटना उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता सभी आरोपों से बरी होने का अधिकारी है।

तदनुसार Criminal Revision स्वीकार की गई। न्यायालय ने Arms Act की धारा 25(1-B)(a) एवं 26(i) के अंतर्गत दोषसिद्धि और सज़ा को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

Patna High Court का यह निर्णय Arms Act के तहत मामला झेल रहे व्यक्तियों, विशेषकर बिहार में, के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायालय ढीली-ढाली या लापरवाह जाँच को स्वीकार नहीं करेगा।

पहला, यह निर्णय रेखांकित करता है कि अभियोजन को स्पष्ट रूप से सिद्ध करना होगा कि शस्त्र और गोला-बारूद किस प्रकार जब्त किए गए। स्वतंत्र जब्ती गवाहों को बरामदगी का समर्थन करना चाहिए, अन्यथा अभियुक्त को जब्त वस्तुओं से जोड़ने वाला अन्य मजबूत साक्ष्य होना चाहिए।

दूसरा, यह इस बात पर ज़ोर देता है कि जब्त वस्तुओं को सील कर पुलिस मालखाना में स्पष्ट पहचान चिह्नों के साथ सुरक्षित रखा जाना चाहिए। यदि अभिरक्षा की यह श्रृंखला सिद्ध नहीं होती, तो न्यायालय इस बात पर संदेह कर सकता है कि जो वस्तुएँ न्यायालय में दिखाई गईं, वे वही हैं या नहीं जो कथित रूप से जब्त की गई थीं।

तीसरा, यह निर्णय स्पष्ट करता है कि Arms Act की धारा 39 के अंतर्गत अभियोजन की स्वीकृति केवल औपचारिकता नहीं है। स्वीकृति प्रदान करने वाले प्राधिकारी को उपलब्ध सामग्री पर मनन कर विधिवत स्वीकृति आदेश निर्गत एवं हस्ताक्षरित करना होता है। त्रुटिपूर्ण या अप्रमाणित स्वीकृति अभियुक्त के बरी होने का आधार बन सकती है।

साधारण नागरिकों के लिए यह निर्णय यह संदेश देता है कि भले ही किसी व्यक्ति पर अवैध शस्त्र रखने का आरोप हो, राज्य को फिर भी विधि का कठोरता से पालन करना होगा और अपना मामला ठीक ढंग से सिद्ध करना होगा। वकीलों और पुलिस अधिकारियों के लिए यह Arms Act के मामलों में उचित दस्तावेज़ीकरण, साक्ष्य और प्रक्रिया की आवश्यकता की याद दिलाता है।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता से कथित रूप से जब्त शस्त्र एवं गोला-बारूद की जब्ती संदेह से परे सिद्ध हुई थी?
    उत्तर: नहीं। स्वतंत्र जब्ती गवाहों ने जब्ती का समर्थन नहीं किया और जब्त वस्तुओं के उचित सील और सुरक्षित अभिरक्षा का कोई प्रमाण नहीं था, जिससे वाजिब संदेह उत्पन्न हुआ।
  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता के अभियोजन हेतु Arms Act की धारा 39 के अंतर्गत वैध स्वीकृति सिद्ध हुई थी?
    उत्तर: नहीं। साक्ष्य से यह प्रकट हुआ कि स्वीकृति आदेश फोटोकॉपी प्रारूप पर आधारित था, जिसमें प्रकरण के विवरण बाद में स्याही से भरे गए, जो दर्शाता है कि जिलाधिकारी द्वारा यथोचित मनन के बाद विधिपूर्वक स्वीकृति नहीं दी गई।
  • प्रश्न: क्या इन परिस्थितियों में Arms Act की धारा 25(1-B)(a) और 26(i) के अंतर्गत दोषसिद्धि और सज़ा बरकरार रखी जा सकती थी?
    उत्तर: नहीं। जब्ती और स्वीकृति को संदेह से परे सिद्ध न कर पाने के कारण याचिकाकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय या नज़ीर का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Revision No. 178 of 2019 (उद्गम: Asthawan P.S. Case No. 62 of 2004, District Nalanda)

वाद शीर्षक: Saryug Singh बनाम The State of Bihar

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Jitendra Kumar

Citation: 2025 (2) PLJR 821

अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से – Mr. Rabindra Kumar, Advocate; Mr. Niraj Kumar, Advocate; राज्य की ओर से – Mr. Mohammed Arif, APP

मामले की प्रकृति: Arms Act की धारा 25(1-B)(a) एवं 26(i) के अंतर्गत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सज़ा में संशोधन करने वाले अपीलीय निर्णय के विरुद्ध Criminal Revision

उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 25.03.2025

चुनौती दिए गए अपीलीय निर्णय की तिथि: 06.10.2018 (Criminal Appeal No. 91 of 2011, Fast Track Court No. 1, Nalanda at Bihar Sharif)

Trial Court का परिणाम: Arms Act की धारा 25(1-B)(a) एवं 26(i) के अंतर्गत दोषसिद्धि, दो वर्ष एवं एक वर्ष साधारण कारावास तथा जुर्माने की सज़ा के साथ

उच्च न्यायालय का परिणाम: Criminal Revision स्वीकार; याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया

Link to judgement ; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NyMxNzgjMjAxOSMxI04=-CmAR2l6ALc4=

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