द्वितीय कारण बताओ नोटिस के बिना अनुशासनात्मक दंड निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2023

पटना उच्च न्यायालय ने एक गांव के चौकीदार के विरुद्ध पारित दंड आदेश की जांच की। न्यायालय ने पाया कि कलेक्टर ने जांच पदाधिकारी से असहमति जताने के बाद दूसरी कारण बताओ सूचना दिए बिना उसे दंडित किया था। दंड आदेश को रद्द कर दिया गया और मामला पुनः अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास भेज दिया गया। अब कर्मचारी को विधिवत सुनवाई देकर नया निर्णय लिया जाना आवश्यक है।

प्रकरण की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता नालंदा जिले के बिंद थाना के अंतर्गत एक चौकीदार के रूप में कार्य कर रहे थे।

सेवा में रहते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया। आरोप यह था कि उनका एक हत्या के मामले में मिलीभगत थी, वे एक कंप्यूटर की चोरी में संलिप्त थे तथा उन्होंने बिंद थाना कांड संख्या 127 वर्ष 2009 के एक अभियुक्त के पोते को संरक्षण प्रदान किया था।

इन गंभीर आरोपों के कारण उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही आरम्भ की गई। विभागीय कार्यवाही में उन पर यह आरोप लगाया गया कि वे एक आपराधिक मामले में संलिप्त थे।

एक पूरी तरह से विधिवत विभागीय जांच की गई। इस जांच के बाद जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं पाया और जांच प्रतिवेदन में याचिकाकर्ता को आरोपों से निर्दोष ठहराया गया।

हालाँकि, इस निर्दोषीकरण के बावजूद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अर्थात कलेक्टर, नालंदा, बिहारशरीफ ने जांच प्रतिवेदन से सहमति नहीं जताई। कलेक्टर ने यह माना कि याचिकाकर्ता का आचरण एक सरकारी कर्मचारी के अनुरूप नहीं था और उस पर दंड आरोपित कर दिया।

दिनांक 16.11.2011 के आदेश द्वारा कलेक्टर ने निंदा (Censure) एवं दो वार्षिक वेतन वृद्धियों की गैर-संचयी प्रभाव के साथ रोक की सज़ा दी।

इसके पश्चात याचिकाकर्ता ने इस दंड आदेश को चुनौती देते हुए पटना उच्च न्यायालय में Civil Writ Jurisdiction Case No. 9263 of 2012 दायर किया।

न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया

रिट याचिका की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह द्वारा 09.01.2023 को की गई। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता तथा राज्य के अधिवक्ता की दलीलें सुनीं।

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मूल प्रश्न यह था कि क्या कलेक्टर, जो अनुशासनात्मक प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहे थे, जांच अधिकारी की निर्दोषीकरण संबंधी निष्कर्ष से भिन्न मत रखते हुए, याचिकाकर्ता को जांच प्रतिवेदन की प्रति एवं दूसरी कारण बताओ सूचना दिए बिना, विधिसम्मत ढंग से दंड दे सकते थे।

याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि विभागीय जांच में उन्हें निर्दोष पाया गया था। इसके बावजूद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने जांच प्रतिवेदन से असहमति जताते हुए उन पर दंड आरोपित कर दिया।

मुख्य grievance यह था कि याचिकाकर्ता को न तो जांच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराई गई और न ही अंतिम दंडादेश पारित होने से पूर्व कोई दूसरी कारण बताओ सूचना जारी की गई। याचिकाकर्ता के अनुसार, इससे उन्हें निष्कर्षों एवं प्रस्तावित दंड के विषय में अपनी बात रखने के अधिकार से वंचित कर दिया गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि ऐसा कृत्य विधि तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। इस संबंध में समर्थन हेतु Hon’ble Supreme Court के निर्णय Punjab National Bank and others vs. Kunj Bihari Mishra, (1998) 7 SCC 84 पर भरोसा किया गया।

दूसरी ओर, राज्य ने कलेक्टर के आदेश का समर्थन किया। राज्य के अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि विवादित आदेश किसी प्रकार की अवैधानिकता से ग्रस्त नहीं है।

उन्होंने यह दलील दी कि यह स्थापित विधि है कि विभागीय कार्यवाही तथा आपराधिक मामला स्वतंत्र रूप से चल सकते हैं और लंबित आपराधिक मामले के बावजूद विभागीय कार्यवाही में आदेश पारित किया जा सकता है।

इस मामले में यह तर्क दिया गया कि आदेश साक्ष्यों के प्रबलता के आधार पर तथा सरकारी सेवक के रूप में याचिकाकर्ता के आचरण को देखते हुए पारित किया गया था।

राज्य के अधिवक्ता ने यह भी इंगित किया कि याचिकाकर्ता के पास पटना प्रमंडलीय आयुक्त के समक्ष वैधानिक अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था, जिसका उपयोग किए बिना उन्होंने सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने पहले स्वीकृत तथ्यात्मक स्थिति पर ध्यान दिया। यह निर्विवाद था कि विभागीय जांच में याचिकाकर्ता को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था।

इस निर्दोषीकरण के बावजूद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने जांच प्रतिवेदन से असहमति व्यक्त की और सीधे दंड का आदेश पारित कर दिया। याचिकाकर्ता को असहमति की कोई सूचना नहीं दी गई। कोई दूसरी कारण बताओ सूचना जारी नहीं की गई और दंड आरोपित किए जाने से पहले उन्हें अपना स्पष्टीकरण देने का अवसर प्रदान नहीं किया गया।

इसके बाद न्यायालय ने Kunj Bihari Mishra प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधिक स्थिति पर विचार किया। निर्णय में उद्धृत प्रासंगिक सिद्धांत यह था कि यदि आरोपित कर्मचारी जांच अधिकारी के समक्ष सफल हो गया हो, तो यह “अत्यंत अनुचित और अन्यायपूर्ण” होगा कि उसे यह अवसर न दिया जाए कि वह अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा जांच प्रतिवेदन से असहमति व्यक्त कर अपराध सिद्ध मानने एवं दंड देने से पूर्व, अपना पक्ष रख सके।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ऐसी स्थिति में आरोपित अधिकारी को यह अवसर अवश्य मिलना चाहिए कि वह अंतिम निष्कर्ष दर्ज किए जाने और दंड आरोपित होने से पहले अनुशासनात्मक प्राधिकारी के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व कर सके। इसे जांच की प्रथम अवस्था का ही हिस्सा माना जाता है।

इस सिद्धांत को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि जब एक बार जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता को निर्दोष ठहरा दिया, तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी वैध रूप से उस प्रतिवेदन से भिन्न मत रखकर बिना (प्रथम) याचिकाकर्ता को असहमति की सूचना दिए और (द्वितीय) उसे दूसरी कारण बताओ सूचना देकर उत्तर देने का अवसर दिए बिना, दंड आरोपित नहीं कर सकता था।

न्यायालय ने यह भी अवलोकन किया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि तथा लागू अनुशासनात्मक नियमों का उल्लंघन करते हुए दंड आदेश पारित किया।

इन आधारों पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि Collector, Nalanda at Biharsharif द्वारा दिनांक 16.11.2011 को पारित विवादित दंड आदेश विधि की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है।

तदनुसार, न्यायालय ने दंड आदेश को निरस्त कर दिया।

हालाँकि, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि वह दंड आदेश को केवल प्राकृतिक न्याय एवं वैधानिक प्रक्रिया के उल्लंघन, विशेष रूप से जांच प्रतिवेदन से असहमति तथा दंड आरोपित करने से पूर्व याचिकाकर्ता को अवसर न दिए जाने के आधार पर ही रद्द कर रहा है।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की। इसके बजाय, उसने प्रकरण को जांच की अवस्था से ही पुनः अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास भेज दिया।

न्यायालय ने प्रतिवादियों को विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए नया आदेश पारित करने की स्वतंत्रता प्रदान की। विशेष रूप से, अनुशासनात्मक प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को दूसरी कारण बताओ सूचना जारी करे और उसके उत्तर पर विचार करने के उपरांत नया आदेश पारित करे।

इस प्रक्रिया के लिए न्यायालय ने एक समय सीमा भी निर्धारित की। निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता के दूसरी कारण बताओ सूचना के उत्तर की प्राप्ति की तिथि से दो माह के भीतर अनुशासनात्मक प्राधिकारी को नया आदेश पारित करना होगा।

इस प्रकार, रिट याचिका को सीमित रूप से दंड आदेश को निरस्त करने तथा प्रकरण को पुनर्विचार हेतु विधि के अनुरूप वापस भेजने तक ही स्वीकृत किया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर चौकीदार जैसे निम्न स्तर के कर्मियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो प्रायः आपराधिक मामलों से जुड़े आरोपों के आधार पर विभागीय कार्यवाहियों का सामना करते हैं।

पटना उच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि भले ही कोई प्राधिकारी यह माने कि कर्मचारी का आचरण गलत है, वह मौलिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार नहीं कर सकता। यदि जांच अधिकारी किसी कर्मचारी को निर्दोष ठहराता है और अनुशासनात्मक प्राधिकारी इससे असहमति रखना चाहता है, तो कर्मचारी को इसकी सूचना देना और उसे अपना बचाव करने का अवसर देना अनिवार्य है।

निर्णय यह दर्शाता है कि जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराए बिना एवं दूसरी कारण बताओ सूचना दिए बिना पारित दंड आदेशों को प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के रूप में निरस्त किया जा सकता है।

साथ ही, न्यायालय ने विभाग को उचित अवस्था से प्रक्रिया पुनः आरम्भ करने की अनुमति भी दी है। इसका अर्थ यह है कि जहाँ कर्मचारी के अधिकारों की रक्षा होती है, वहीं विधिसम्मत ढंग से आगे बढ़ने का नियोक्ता का अधिकार भी सुरक्षित रहता है।

इसी प्रकार की स्थिति वाले कर्मचारियों के लिए यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वे अपने पीठ पीछे की गई अनुशासनात्मक कार्यवाहियों को, भले ही आरोप गंभीर हों, चुनौती दे सकते हैं, जब तक कि चुनौती निष्पक्ष सुनवाई से वंचित किए जाने के आधार पर हो।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या अनुशासनात्मक प्राधिकारी, जांच अधिकारी द्वारा निर्दोष ठहराए गए कर्मचारी पर, जांच प्रतिवेदन की प्रति एवं दूसरी कारण बताओ सूचना दिए बिना, उससे असहमति जताते हुए दंड आरोपित कर सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि ऐसा कृत्य सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं अनुशासनात्मक नियमों का उल्लंघन है। कर्मचारी को असहमति तथा दंड से पूर्व अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना आवश्यक है।
  • प्रश्न: जब दंड आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन में पारित पाया जाए तो उचित कार्यवाही क्या है?
    उत्तर: न्यायालय ने दंड आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को जांच की अवस्था से ही अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास यह स्वतंत्रता देते हुए वापस भेजा कि वह दूसरी कारण बताओ सूचना जारी करने और कर्मचारी के उत्तर पर विचार करने के उपरांत नया आदेश पारित करे।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामला

  • Punjab National Bank and others vs. Kunj Bihari Mishra, (1998) 7 SCC 84.

प्रकरण का विवरण

वाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 9263 of 2012

प्रकरण शीर्षक: Ishwar Paswan vs. The State of Bihar & Others

Citation: 2023 (1) PLJR 777

Coram: Hon’ble Mr. Justice Prabhat Kumar Singh

निर्णय की तिथि: 09.01.2023

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Anju Kumari @ Anju Narain
  • प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: Mr. Rajesh Kumar, GP 8

वाद का स्वरूप: रिट याचिका (सेवा/अनुशासनिक प्रकरण, दंड आदेश को चुनौती)

विवादित आदेश: Collector, Nalanda at Biharsharif द्वारा दिनांक 16.11.2011 को पारित आदेश, जिसके द्वारा निंदा (Censure) एवं दो वार्षिक वेतन वृृद्धियों की गैर-संचयी प्रभाव के साथ रोक की सजा दी गई।

परिणाम: विवादित दंड आदेश निरस्त; प्रकरण को जांच की अवस्था से अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास यह स्वतंत्रता देते हुए वापस भेजा गया कि दूसरी कारण बताओ सूचना जारी कर एवं उत्तर पर विचार कर, उत्तर प्राप्ति की तिथि से दो माह के भीतर नया आदेश पारित किया जाए।

judgement link; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjOTI2MyMyMDEyIzEjTg==-CGEpC1rwXAA=

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