त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया के कारण पुनरीक्षण आदेश निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2025

इस मामले में, एक सूचक ने अभियुक्त के बरी होने को आपराधिक पुनरीक्षण के माध्यम से चुनौती दी थी। पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि बरी किए जाने के विरुद्ध पुनरीक्षण सही उपाय नहीं था और सत्र न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया। अब सूचक को विधि सम्मत आपराधिक अपील दायर करने की स्वतंत्रता दी गई है। सत्र न्यायालय को सीमा-निर्धारण (लिमिटेशन) पर विचार करते समय गलत वाद में व्यतीत समय को भी ध्यान में रखना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत सूचक, संतोष कुमार सिंह द्वारा मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, पूर्णिया के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 156(3) के तहत एक शिकायत दर्ज कराने से हुई।

इस शिकायत के आधार पर, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने वर्तमान अभियाचक (याचिकाकर्ता) के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया।

इस आदेश के अनुपालन में, खजांची हाट थाना कांड संख्या 300/1997 वर्तमान याचिकाकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 420, 406 एवं 409 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया।

पुलिस ने मामले की जाँच की और वाद, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी, पूर्णिया के समक्ष, जी.आर. केस नंबर 1477/1997 के रूप में विचारण हेतु अग्रसर हुआ।

विचारण के दौरान, अंततः अभियुक्त (वर्तमान याचिकाकर्ता) के विरुद्ध केवल आईपीसी की धाराओं 420 और 406 के अंतर्गत आरोप तय किए गए।

विचारण के उपरांत, दिनांक 31.07.2013 के निर्णय द्वारा, विचारण न्यायालय (न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी, पूर्णिया, श्री अजय कुमार) ने याचिकाकर्ता को आरोपों से बरी कर दिया।

इस बरी किए जाने से आहत होकर, सूचक संतोष कुमार सिंह (उच्च न्यायालय में विपक्षी पक्ष संख्या 2) ने अपील दायर नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने सत्र न्यायालय, पूर्णिया के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 473/2013 दाखिल किया। इस पुनरीक्षण को CIS संख्या 647/2013 के रूप में पंजीकृत किया गया और बाद में निपटान हेतु अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V, पूर्णिया की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया।

दिनांक 13.12.2021 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V, पूर्णिया ने पुनरीक्षण में अंतिम आदेश पारित किया। सत्र न्यायालय ने विचारण न्यायालय के बरी करने वाले निर्णय को निरस्त कर दिया और प्रकरण को नए सिरे से निर्णय हेतु विचारण न्यायालय को पुनः भेज दिया।

इसी 13.12.2021 के पुनरीक्षण आदेश को अभियुक्त (याचिकाकर्ता) ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 135/2022 दाखिल कर चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की पीठ के माध्यम से, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता, राज्य के लिए माननीय APP तथा विपक्षी पक्ष संख्या 2 (सूचक) के अधिवक्ता की दलीलें सुनीं।

उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह नहीं था कि मूल बरी किया जाना तथ्यों के आधार पर सही था या नहीं, बल्कि यह था कि सूचक द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण को सुनकर और बरी के आदेश को हटाते समय सत्र न्यायालय ने सही विधिक प्रक्रिया का पालन किया था या नहीं।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने विधिक ग्राह्यता (maintainability) पर जोर दिया। उनका तर्क था कि जब विचारण न्यायालय ने 31.07.2013 को अभियुक्त को बरी कर दिया था, तब कानून सूचक/पीड़ित को उस आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण दाखिल करने की अनुमति नहीं देता था।

उन्होंने Cr.P.C. की धारा 372 के प्रावधान (Proviso) की ओर संकेत किया, जो पीड़ित को बरी के आदेश के विरुद्ध अपील का अधिकार देता है। उनके अनुसार, एक बार जब कानून अपील का उपाय प्रदान करता है, तो उसी उपाय का उपयोग किया जाना चाहिए।

उन्होंने आगे Cr.P.C. की धारा 401(4) पर भरोसा किया, जो स्पष्ट रूप से कहती है कि जब किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध अपील का प्रावधान है, तो जिस पक्षकार को अपील करनी चाहिए थी, उसके द्वारा पुनरीक्षण की कार्यवाही ग्रहण नहीं की जाएगी।

इस मामले में, चूंकि याचिकाकर्ता के बरी होने के विरुद्ध सूचक को धारा 372 Cr.P.C. के प्रावधान के तहत अपील का उपाय उपलब्ध था, इसलिए सूचक विधिसम्मत रूप से पुनरीक्षण याचिका कायम नहीं रख सकता था। अतः सत्र न्यायालय के समक्ष संपूर्ण पुनरीक्षण कार्यवाही स्वयं में ही त्रुटिपूर्ण और अवैध थी।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने एक अन्य विधिक त्रुटि की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने उच्च न्यायालय को अवगत कराया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 13.12.2021 के अंतिम आदेश में यह उल्लेख किया कि आपराधिक पुनरीक्षण को “अपील के रूप में माना जा रहा है”। किंतु यह रूपांतरण केवल अंतिम निर्णय में किया गया, और सुनवाई के पूर्व किसी भी चरण पर पुनरीक्षण को अपील में परिवर्तित करने का कोई पूर्व आदेश पारित नहीं किया गया था।

Cr.P.C. की धारा 401(5) के तहत, पुनरीक्षण न्यायालय के पास कुछ परिस्थितियों में पुनरीक्षण को अपील के रूप में मानने का अधिकार है, बशर्ते कि अपील दायर की जा सकती थी किंतु की नहीं गई। हालांकि, विधि की अपेक्षा है कि ऐसा रूपांतरण उपयुक्त चरण पर एक स्पष्ट आदेश द्वारा किया जाए, और उसके बाद वाद को आपराधिक अपीलों पर लागू प्रक्रिया के अनुसार निपटाया जाए।

याचिकाकर्ता के अनुसार, ऐसा नहीं हुआ। रूपांतरण का कोई पूर्व आदेश नहीं था और पूरा मामला पुनरीक्षण के रूप में ही चलता रहा। केवल अंतिम आदेश में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इसे अपील कहा, जो, याचिकाकर्ता के अनुसार, विधिसम्मत नहीं था।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V इस प्रकार रूपांतरण करने के लिए उपयुक्त प्राधिकारी नहीं थे, जैसा कि किया गया। पहले सत्र न्यायाधीश को रूपांतरण की अनुमति देनी चाहिए थी, प्रकरण को आपराधिक अपील के रूप में पंजीकृत और स्वीकृत किया जाना चाहिए था, और उसके बाद ही कोई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश इसे अपील के रूप में सुन और निर्णय कर सकता था।

इन आधारों पर, याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया कि सत्र न्यायालय के समक्ष सम्पूर्ण पुनरीक्षण कार्यवाही “गंभीर अवैधता” से ग्रस्त थी और दिनांक 13.12.2021 के विवादित आदेश को निरस्त किया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय में सुनवाई के इस चरण पर, विपक्षी पक्ष संख्या 2 (सूचक) के अधिवक्ता ने बरी के विरुद्ध सत्र न्यायालय में विधि सम्मत आपराधिक अपील दायर करने की स्वतंत्रता मांगी।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस प्रकार की स्वतंत्रता दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं की, बशर्ते कि अवैध पुनरीक्षण आदेश को निरस्त कर दिया जाए।

दलीलों पर विचार करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई विधिक आपत्ति को स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने माना कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V का आदेश ऐसे आपराधिक पुनरीक्षण में पारित किया गया था जो स्वयं में ही ग्राह्य नहीं था, क्योंकि धारा 372 Cr.P.C. के प्रावधान के तहत अपील ही सही उपाय थी और धारा 401(4) Cr.P.C. अपील उपलब्ध होने पर पुनरीक्षण ग्रहण करने पर रोक लगाती है।

उच्च न्यायालय ने यह भी नोट किया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने बिना पूर्व रूपांतरण और Cr.P.C. की धारा 401(5) के तहत आपराधिक अपीलों की सुनवाई के लिए निर्धारित विधि-सम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना, केवल अंतिम आदेश में पुनरीक्षण को अपील के रूप में “मान” लिया, जो अनुचित था।

इन्हीं आधारों पर उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि विवादित पुनरीक्षण आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

तदनुसार, अपने मौखिक निर्णय दिनांक 24.03.2025 द्वारा पटना उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण को स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V, पूर्णिया द्वारा आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 473/2013, CIS संख्या 647/2013 में दिनांक 13.12.2021 को पारित विवादित निर्णय/आदेश को निरस्त कर दिया।

इसी के साथ, उच्च न्यायालय ने सूचक के अधिकारों के बीच संतुलन भी स्थापित किया। न्यायालय ने विपक्षी पक्ष संख्या 2 (सूचक) को बरी के विरुद्ध सत्र न्यायालय में नई आपराधिक अपील दायर करने की स्वतंत्रता दी, जो सीमावधि अधिनियम (Limitation Act) के अधीन होगी।

न्यायालय ने विशेष रूप से निर्देश दिया कि निम्न न्यायालय, जब सीमावधि पर विचार करे, तो उसे सीमावधि अधिनियम की धारा 14 को भी ध्यान में रखना होगा। धारा 14 इस बात की अनुमति देती है कि यदि पूर्व कार्यवाही अधिकार क्षेत्र की कमी या इसी प्रकार के किसी अन्य कारण से विफल हो गई हो, और वह कार्यवाही सद्भावना में चलाई गई हो, तो उस पूर्व कार्यवाही में व्यतीत समय को वर्तमान कार्यवाही की सीमावधि से बाहर रखा जा सकता है।

यह निर्देश सूचक के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मूल बरी किए जाने की तारीख 31.07.2013 और पुनरीक्षण आदेश की तारीख 13.12.2021 से अब तक पर्याप्त समय व्यतीत हो चुका है। अब सूचक को अपील दायर करनी होगी और सत्र न्यायालय यह तय करेगा कि अपील सीमावधि के भीतर है या नहीं, अथवा धारा 14 को ध्यान में रखते हुए विलंब को माफ किया जा सकता है या नहीं।

इस प्रकार, अंतिम परिणाम यह है: विचारण न्यायालय द्वारा किया गया मूल बरी किया जाना फिलहाल पुनर्स्थापित हो गया है; बरी के आदेश को निरस्त करने वाला अवैध पुनरीक्षण आदेश रद्द कर दिया गया है; और सूचक के पास अभी भी सही विधिक उपाय — अपील — के माध्यम से बरी किए जाने को चुनौती देने का अवसर उपलब्ध है।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय उन पीड़ितों, सूचकों और अधिवक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो ऐसे आपराधिक मामलों से संबंधित हैं, जिनमें अभियुक्त को बरी कर दिया गया है।

प्रथम, यह स्पष्ट रूप से पुनर्पुष्टि करता है कि जब Cr.P.C. की धारा 372 के प्रावधान के तहत पीड़ित को बरी के विरुद्ध अपील का अधिकार दिया गया है, तो वही सही और प्राथमिक उपाय है। ऐसे मामलों में पुनरीक्षण दायर करना उपयुक्त नहीं है और ग्राह्यता के अभाव में उसे खारिज किया जा सकता है।

द्वितीय, निर्णय यह स्पष्ट करता है कि पुनरीक्षण न्यायालय अंतिम परिणाम में अनौपचारिक रूप से पुनरीक्षण को अपील के रूप में “मान” नहीं सकता। कार्यवाही को रूपांतरित करने के लिए एक स्पष्ट, पूर्व आदेश होना अनिवार्य है, और उसके बाद न्यायालय को विधि के अनुसार आपराधिक अपील की पूर्ण प्रक्रिया का पालन करना होगा।

सामान्य व्यक्तियों के लिए, यह मामला इस बात को दर्शाता है कि यदि वे किसी बरी किए जाने से असंतुष्ट हैं, तो उन्हें विशेषकर उन परिस्थितियों में, जहां Cr.P.C. स्पष्ट रूप से अपील का अधिकार देता है, पुनरीक्षण के स्थान पर अपील दायर करने के संबंध में सलाह लेनी चाहिए।

साथ ही, उच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया है कि सूचक निरूपाय न रह जाए। अपील दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान कर और सत्र न्यायालय से सीमावधि अधिनियम की धारा 14 पर विचार करने को कहकर, न्यायालय ने यह मान्यता दी है कि समय गलत मंच पर व्यतीत हुआ और यह समय स्वतः ही सूचक के अधिकारों को समाप्त नहीं कर देना चाहिए।

विचारण एवं अपीलीय न्यायालयों के लिए, यह निर्णय धारा 401 Cr.P.C. के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार की सीमाओं का कड़ाई से पालन करने और वैधानिक अपील व्यवस्था को दरकिनार करने से बचने का संदेश देता है।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: जब धारा 372 Cr.P.C. के प्रावधान के तहत पीड़ित की अपील बरी के आदेश के विरुद्ध उपलब्ध हो, तो क्या सूचक द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण ग्राह्य था?
    उत्तर: नहीं। धारा 401(4) Cr.P.C. के आलोक में, जब बरी के आदेश के विरुद्ध अपील निहित हो, तो अपील करने के हकदार व्यक्ति द्वारा पुनरीक्षण ग्राह्य नहीं है।
  • प्रश्न: क्या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बिना किसी पूर्व रूपांतरण आदेश के और धारा 401(5) Cr.P.C. के तहत अपील संबंधी प्रक्रिया का पालन किए बिना, अंतिम आदेश में आपराधिक पुनरीक्षण को आपराधिक अपील के रूप में मान सकते थे?
    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने माना कि अंतिम निर्णय में, बिना पूर्व रूपांतरण एवं विधि-सम्मत प्रक्रिया के, इस प्रकार की कार्यवाही विधिसम्मत नहीं है और यह गंभीर अवैधता के समान है।
  • प्रश्न: जब बरी के आदेश को निरस्त करने वाला पुनरीक्षण आदेश अवैध पाया जाए, किंतु सूचक बरी को विधि-सम्मत रूप से चुनौती देना चाहता हो, तो क्या राहत दी जानी चाहिए?
    उत्तर: उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण आदेश को निरस्त कर, अभियुक्त की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की और सूचक को सत्र न्यायालय के समक्ष नई आपराधिक अपील दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की, साथ ही यह निर्देश दिया कि सीमावधि पर विचार करते समय सीमावधि अधिनियम की धारा 14 को यथोचित रूप से ध्यान में रखा जाए।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • प्रदत्त निर्णय-पाठ में किसी पूर्व निर्णय का उल्लेख या स्पष्ट रूप से भरोसा नहीं किया गया है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 135/2022 (पटना उच्च न्यायालय); खजांची हाट थाना कांड संख्या 300/1997; जी.आर. केस नंबर 1477/1997; आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 473/2013, CIS संख्या 647/2013 (सत्र न्यायालय, पूर्णिया) से उद्भूत।

वाद का शीर्षक: Kaku Sood @ Kukku Sood @ Cuckoo Sood @ Coocko Sood बनाम The State of Bihar एवं Santosh Kumar Singh

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार

उद्धरण: 2025 (2) PLJR 803

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री पंकज कुमार सिंह, अधिवक्ता; श्री राजीव कुमार सिंह, अधिवक्ता।
  • राज्य की ओर से: श्री चंद्र सेन प्रसाद सिंह, APP।
  • विपक्षी पक्ष संख्या 2 (सूचक) की ओर से: श्री बिजेंद्र कुमार सिंह, अधिवक्ता।

वाद का स्वरूप: पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण, जो अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V, पूर्णिया द्वारा आपराधिक पुनरीक्षण में पारित उस आदेश को चुनौती देता है, जिसके द्वारा बरी के आदेश को निरस्त कर मामले को पुनः विचारण हेतु भेजा गया था। उच्च न्यायालय का निर्णय मुख्यतः बरी के विरुद्ध पुनरीक्षण बनाम अपील की ग्राह्यता से संबंधित है।

Link to judgement; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NyMxMzUjMjAyMiMxI04=-PqGHcO3VnhM=

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