मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बराचट्टी थाना कांड संख्या 155/2015, गया से उत्पन्न होता है। 30.04.2015 को एक डॉक्टर, डॉ. पंकज कुमार गुप्ता (पीडब्ल्यू‑16) और उनकी पत्नी शुभ्रा गुप्ता (पीडब्ल्यू‑20) अपनी काली ऑडी कार (पंजीयन संख्या JH01AB-7698) से गिरिडीह में एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिए गया से निकले।
01.05.2015 को वे गिरिडीह से लगभग 10:00 बजे पूर्वाह्न वापसी यात्रा पर निकले। गया स्थित उनके परिजन मोबाइल फोन के माध्यम से लगभग 12:30 बजे तक उनसे संपर्क में रहे, जब उन्हें बताया गया कि दंपति एक घंटे के भीतर गया पहुंच जाएंगे।
लगभग 4:00 बजे अपराह्न, जब डॉक्टर के भाई नीरज कुमार गुप्ता (पीडब्ल्यू‑3) ने डॉक्टर और उनकी पत्नी दोनों को कॉल करने की कोशिश की, तो उनके फोन बंद मिले। यह आशंका करते हुए कि उसके भाई, भाभी और ऑडी कार का बराचट्टी क्षेत्र में जी.टी. रोड पर अपहरण कर लिया गया है, उसने 01.05.2015 को बराचट्टी थाना प्रभारी के समक्ष एक लिखित आवेदन दिया।
इस लिखित आवेदन पर 01.05.2015 को धारा 364 आईपीसी के तहत बराचट्टी थाना कांड संख्या 155/2015 दर्ज किया गया। इसके बाद जांच प्रारंभ हुई, जिसमें कॉल डिटेल रिकॉर्ड का विश्लेषण और कई टोल प्लाजा एवं स्थानों पर तलाशी अभियान शामिल थे।
जांच पूर्ण होने पर पुलिस ने आरोपितों के विरुद्ध 10.08.2015 को आरोपपत्र संख्या 168/2015 समर्पित किया। 31.03.2016 को धारा 364क, 395 और 412 आईपीसी के अंतर्गत अपराधों के लिए संज्ञान लिया गया। मामला सत्र न्यायालय को समर्पित हुआ, और 03.11.2016 को अपीलकर्ताओं के विरुद्ध धारा 364क, 395 और 412 आईपीसी के तहत आरोप तय किए गए, जिन पर उन्होंने दोष स्वीकार नहीं किया।
विचारण न्यायालय (अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश‑I, गया, सत्र वाद संख्या 190/2016 (एस.जे.)/419/2016) ने 20.02.2018 को सभी अभियुक्तों को दोषी ठहराया और 27.02.2018 को सजा सुनाई। दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द करने के लिए पटना उच्च न्यायालय में अनेक आपराधिक अपीलें दायर की गईं।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय (खंडपीठ) ने यह जांचा कि क्या अपीलकर्ताओं की फिरौती के लिए अपहरण (धारा 364क आईपीसी), डकैती (धारा 395 आईपीसी) और डकैती से प्राप्त संपत्ति को बेईमानी से रखने (धारा 412 आईपीसी) की दोषसिद्धि साक्ष्यों के आधार पर न्यायोचित थी।
न्यायालय ने अभियोजन की मूल कहानी से आरंभ किया: डॉक्टर दंपति 01.05.2015 को अपनी ऑडी से गिरिडीह से निकले; लगभग 4:00 बजे संपर्क टूट गया; और परिजनों को बराचट्टी के पास जी.टी. रोड पर अपहरण का संदेह हुआ।
ड्राइवर (पीडब्ल्यू‑1) और कम्पाउन्डर (पीडब्ल्यू‑2) ने पृष्ठभूमि का समर्थन किया। पीडब्ल्यू‑1, जो सामान्यतः डॉक्टर के साथ रहते थे, ने गवाही दी कि 01.05.2015 को डॉक्टर स्वयं गाड़ी चला रहे थे। लगभग 12:00 बजे दोपहर, पीडब्ल्यू‑1 को डॉक्टर की पत्नी का फोन आया, जिन्होंने कहा कि वे एक घंटे में पहुंच जाएंगे। बाद में संपर्क न होने पर पीडब्ल्यू‑1 और पीडब्ल्यू‑2 बरही बॉर्डर तक खोजते हुए गए और फिर पीडब्ल्यू‑3 के साथ बराचट्टी थाना पहुंचे, जहां एफआईआर दर्ज हुई। बाद में पीडब्ल्यू‑1 को पता चला कि डॉक्टर को लाल बत्ती लगी फॉर्च्यूनर और वर्दी पहने व्यक्तियों द्वारा अगवा कर लिया गया था।
पीडब्ल्यू‑3, जो सूचक और डॉक्टर के भाई हैं, ने पुष्टि की कि उन्होंने अंतिम बार लगभग 11:30 बजे पूर्वाह्न अपने भाई से और लगभग 12:30 बजे दोपहर भाभी से बात की थी। फोन बंद हो जाने के बाद उन्होंने जिला अधिकारियों और पुलिस को सूचना दी, और लगभग 7:00 बजे शाम एफआईआर दर्ज हुई। उसी रात वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एस.एस.पी.) बराचट्टी थाना पहुंचे और पीडब्ल्यू‑1, पीडब्ल्यू‑2 और पीडब्ल्यू‑3 के बयान दर्ज किए।
मामले का केंद्र बिंदु स्वयं पीड़ितों की गवाही में निहित था। डॉ. पंकज कुमार गुप्ता (पीडब्ल्यू‑16) ने बताया कि बराचट्टी से पहले जी.टी. रोड पर गाड़ी चलाते समय “गवर्नमेंट ऑफ इंडिया” लिखा हुआ एक सफेद फॉर्च्यूनर, जिस पर दिल्ली का पंजीयन नंबर था, सायरन बजाते हुए पास आया। उसे वीआईपी गाड़ी समझकर उन्होंने अपनी ऑडी किनारे रोक दी।
फॉर्च्यूनर से कमांडो‑प्रकार की वर्दी पहने चार‑पांच व्यक्ति उतरे, उनकी गाड़ी के पास आए और “तलाशी” के लिए शीशा नीचे करने को कहा। जैसे ही उन्होंने कांच नीचे किया, उन्होंने डॉक्टर और उनकी पत्नी को बाहर घसीट लिया, उनके सिर पर काला कपड़े का कैप डाल दिया, हथकड़ी लगा दी और पीछे की सीट पर बैठा दिया। पहले कहा गया कि उन्हें “हेडक्वार्टर” ले जाया जा रहा है, फिर साफ‑साफ बता दिया गया कि उनका अपहरण कर लिया गया है और पैसा दिए बिना उन्हें रिहा नहीं किया जाएगा।
पीडब्ल्यू‑16 ने बताया कि उन्हें घंटों तक गाड़ी में घुमाया गया, फिर दूसरी गाड़ी में शिफ्ट किया गया, लिफ्ट से ऊपर ले जाया गया और एक कमरे में बंद कर दिया गया, जहां वे 05.05.2015 और 06.05.2015 की दरमियानी रात तक रहे। कैद के दौरान उन्हें भोजन दिया जाता था, परंतु जब भी खाना दिया जाता, उन्हें कैप पहनाकर दीवार की ओर मुंह करवा दिया जाता। उनकी व्यक्तिगत वस्तुएं – ऑडी कार, फोन, गहने, कपड़े, शेविंग किट तथा उनकी पत्नी के मेक‑अप के सामान – वापस नहीं किए गए।
05/06.05.2015 की रात उन्हें बताया गया कि अब उन्हें छोड़ दिया जाएगा। चेहरा ढका हुआ ही उन्हें कुछ दूरी तक ले जाकर उतारा गया और पीछे न देखने की हिदायत दी गई। आगे बढ़ने पर उन्हें एहसास हुआ कि वे इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हैं। उन्होंने गया जाने वाली ट्रेन पकड़ी, डेहरी‑ऑन‑सोन पहुंचे, एक यात्री का फोन उधार लेकर डॉक्टर के साले को कॉल किया। अंततः उन्हें गया में रिसीव किया गया और ससुराल लाया गया, जहां पुलिस शीघ्र ही पहुंची और उनकी आपबीती दर्ज की।
पीडब्ल्यू‑16 ने साफ‑साफ स्वीकार किया कि वे अदालत में अभियुक्तों की पहचान नहीं कर सके, क्योंकि घटनाएं बहुत तेजी से हुईं और अधिकांश समय उनकी आंखों पर पट्टी बंधी रही या उन्हें दीवार की ओर मुंह करके रखा गया। उनकी पत्नी पीडब्ल्यू‑20 ने अपहरण, बंधक बनाकर रखने और रिहाई की समान रूप से सुसंगत कहानी बताई, और इसी प्रकार अदालत में किसी अभियुक्त की पहचान करने में अपनी असमर्थता समझाई, हालांकि उन्होंने जोड़ा कि शुरुआत में आरोपितों ने अपना चेहरा नहीं छिपाया था। उच्च न्यायालय ने माना कि प्रारंभिक मुठभेड़ की अल्प अवधि, तथा उसके बाद का मानसिक आघात और लगातार चेहरा ढके रहने की स्थिति को देखते हुए, अदालत में अभियुक्तों की पहचान न कर पाना, तब जब अन्य मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हों, अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करता।
अभियुक्तों से जोड़ने की मुख्य कड़ी बिहार और उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा लखनऊ के गोमती नगर स्थित शारदा अपार्टमेंट में की गई संयुक्त कार्रवाई से आई। तकनीकी प्रकोष्ठ के अधिकारी राम चंद भानु (पीडब्ल्यू‑4) और अन्य अधिकारी गौरव सिंधु (पीडब्ल्यू‑5), जो दोनों एस.एस.पी., गया के साथ तैनात थे, ने बताया कि कॉल रिकॉर्ड और जीपीएस से जांच लखनऊ तक पहुंची। उत्तर प्रदेश एसटीएफ तथा वरिष्ठ अधिकारियों (डी.जी., आई.जी., डी.आई.जी., एस.एस.पी.) की सहायता से कई छापेमारी दल गठित किए गए।
पीडब्ल्यू‑4 और पीडब्ल्यू‑5 दोनों ने गवाही दी कि 06.05.2015 को शारदा अपार्टमेंट में छापा मारा गया। उन्होंने बताया कि पार्किंग क्षेत्र में एक काली ऑडी, एक सफेद फॉर्च्यूनर और एक इनोवा खड़ी मिली। ऑडी में चार, फॉर्च्यूनर में तीन और इनोवा में दो व्यक्ति थे। उनके द्वारा अदालत में पहचाने गए अजय सिंह ऑडी में थे; पीडब्ल्यू‑4 के अनुसार उन्होंने ऑडी से फायर करने की कोशिश की, किंतु आई.जी. द्वारा काबू कर लिए गए। वाहनों से हथियार बरामद हुए और सभी नौ अभियुक्तों को वहीं गिरफ्तार कर लिया गया।
पूछताछ में अजय सिंह ने बताया कि वह शारदा अपार्टमेंट की नौवीं मंजिल पर रहता है और डॉक्टर दंपति की वस्तुएं वहीं के एक फ्लैट में रखी हैं। उसने फ्लैट संख्या 906 के दरवाजे के पास गमले में छुपाई गई चाबी निकाली, फ्लैट खोला, जहां लाल और सफेद बैग तथा सूटकेस मिले जिनमें वे सामान थे जो उसके अनुसार डॉक्टर की पत्नी के थे: महिलाओं के कपड़े, अंतःवस्त्र, आभूषण, पर्सनल केयर और मेक‑अप के उत्पाद; इसके साथ‑साथ पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की तरह की वर्दियां, बेल्ट, जूते, बत्ती, नंबर प्लेटें और सरकारी प्रतीकों से मिलते‑जुलते मोनोग्राम भी पाए गए।
उत्तर प्रदेश की जांच (गोमती नगर थाना कांड संख्या 299–302/2015) पीडब्ल्यू‑12, एक वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक, ने की, जिन्होंने पुष्टि की कि नौ अभियुक्त शारदा अपार्टमेंट से गिरफ्तार हुए और ऑडी, फॉर्च्यूनर, इनोवा के साथ डॉक्टर दंपति की वस्तुएं पार्किंग तथा फ्लैट संख्या 906 से जब्त की गईं। एसटीएफ लखनऊ द्वारा तैयार विस्तृत जब्ती‑cum‑गिरफ्तारी मेमो (फर्द‑गिरफ्तारी) प्रदर्श‑33 के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिस पर दोनों राज्यों के छापामार अधिकारियों तथा सभी नौ अभियुक्तों के हस्ताक्षर थे।
पीडब्ल्यू‑9, प्रखंड विकास पदाधिकारी, बराचट्टी ने मजिस्ट्रेट के आदेश पर 05.06.2015 को जब्त वस्तुओं की पहचान परेड (टीआईपी) की। उन्होंने कहा कि 46 वस्तुएं – जिनमें लाल लेडीज बैग, लेडीज पर्स, पीले धातु की चेन, कान के टॉप्स, हैंडबैग, परफ्यूम की बोतल, शेविंग किट, कपड़े और निजी सामान शामिल थे – समान वस्तुओं के साथ मिलाकर पीडब्ल्यू‑16 और पीडब्ल्यू‑20 को दिखाई गईं, जिन्होंने उन्हें अपनी वस्तुएं बताया। उन्होंने टीआईपी चार्ट (प्रदर्श‑11) तैयार किया और सिद्ध किया। न्यायालय ने उनकी गवाही को विश्वसनीय माना और यह रेखांकित किया कि, भले ही दो स्वतंत्र टीआईपी गवाहों की जांच नहीं हुई हो, जिरह में कोई ऐसी विरोधाभास नहीं दिखी जो टीआईपी को अविश्वसनीय बना सके।
लखनऊ के मकान मालिकों ने भी अजय सिंह को परिसरों से जोड़ा। पीडब्ल्यू‑10, मकान मालिक, 3/210 विश्वास खंड, ने कहा कि अजय सिंह ने नवंबर 2012 से मई 2015 तक “नीरज प्रताप सिंह” नाम से उनका घर किराए पर लिया था, जो एक विज्ञापन देखकर लिया गया था, और बाद में पुलिस ने उन्हें बताया कि यह किरायेदार वास्तव में डॉक्टर के अपहरण में शामिल अजय सिंह है। पीडब्ल्यू‑22, शारदा अपार्टमेंट के फ्लैट संख्या 906 के स्वामी की मां, ने गवाही दी कि दिसंबर 2014 में यह फ्लैट “राजीव शेखर” के नाम से किराए पर दिया गया था, जिसे बाद में डीजीपी/आईजी एसटीएफ ने अजय सिंह बताया। उन्होंने टीवी पर अपहरण की खबर देखने के बाद स्वयं वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया था।
पीडब्ल्यू‑6 ने अनेक बैंक खाते के विवरण और पहचान दस्तावेज (प्रदर्श‑3 श्रृंखला और 4 श्रृंखला) सिद्ध किए, जिनसे यह स्पष्ट हुआ कि अजय सिंह ने अलग‑अलग नाम – नीरज प्रताप सिंह, नरेंद्र प्रताप सिंह और राजीव प्रताप सिंह – के साथ वही फोटो प्रयोग की। सीआईडी के पीडब्ल्यू‑7 और पीडब्ल्यू‑8 ने इस मामले की कार्यप्रणाली को एक पूर्व बराचट्टी कांड (कांड संख्या 37/2015) से जोड़ा, जिसमें एक व्यवसायी के अपहरण और फॉर्च्यूनर के प्रयोग की बात थी। पीडब्ल्यू‑8 ने यह भी कहा कि राजस्थान पुलिस ने उन्हें सूचित किया कि अजय सिंह जयपुर के एक अपहरण मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए हुए दोषी हैं, जो पैरोल पर छूटने के बाद फरार हो गए; हालांकि उच्च न्यायालय ने इसे अधिकतर पृष्ठभूमि के रूप में लिया और नोट किया कि बचाव पक्ष ने जिरह में इसे गंभीरता से विवादित नहीं किया।
बचाव पक्ष ने कई आपत्तियां उठाईं: अभियुक्तों की पहचान परेड (टीआईपी) नहीं कराई गई; पीड़ितों ने अदालत में किसी की पहचान नहीं की; डी.जी., आई.जी. और एस.एस.पी. लखनऊ जैसे प्रमुख वरिष्ठ अधिकारियों की गवाही नहीं हुई; जब्ती सूची कथित रूप से सिद्ध नहीं की गई; इस बारे में विरोधाभास हैं कि अभियुक्तों को पार्किंग से गिरफ्तार किया गया या फ्लैट से; सीसीटीवी सीडी को साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत सिद्ध नहीं किया गया; कुछ गवाहों की जांच में विलंब हुआ; और धारा 313 दंड प्रक्रिया संहिता का समुचित पालन नहीं हुआ।
उच्च न्यायालय ने इन सभी दलीलों को क्रमबद्ध ढंग से खारिज कर दिया। उसने माना कि:
- पीड़ितों द्वारा अभियुक्तों की पहचान न कर पाने को युक्तिसंगत रूप से समझाया गया और इससे परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला नहीं टूटी।
- पीडब्ल्यू‑4 और पीडब्ल्यू‑5, भले ही उच्चतम पदस्थ अधिकारी न हों, छापामारी और गिरफ्तारी के विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी थे, और उनकी उपस्थिति को पीडब्ल्यू‑12 तथा प्रदर्श‑33 से पुष्ट समर्थन मिला।
- भले ही सीसीटीवी सीडी को अलग रख दिया जाए, पीड़ित की स्वयं की गवाही और अन्य साक्ष्य पर्याप्त रूप से यह सिद्ध करते हैं कि संबंधित मार्ग पर ऑडी और फॉर्च्यूनर की आवाजाही हुई।
- पीडब्ल्यू‑9 द्वारा की गई वस्तुओं की टीआईपी, तथा पीडब्ल्यू‑16 और पीडब्ल्यू‑20 द्वारा की गई सुसंगत पहचान ने जब्त वस्तुओं को पीड़ितों से मजबूती से जोड़ा।
- समय के संबंध में या सटीक गिरफ्तारी‑स्थल (पार्किंग बनाम फ्लैट) को लेकर विरोधाभास मामूली थे और अभियोजन के मूल मामले को कमजोर नहीं करते।
- अभियुक्तों ने धारा 313 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत दिए गए अपने बयानों में ऑडी, फॉर्च्यूनर, इनोवा और फ्लैट संख्या 906 में मिली पीड़ितों की वस्तुओं के अपने कब्जे के संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।
न्यायालय ने बल दिया कि अभियोजन के साक्ष्यों की समग्रता – पीड़ितों की सुसंगत कथन, लखनऊ स्थित परिसरों से डॉक्टर की ऑडी और निजी वस्तुओं की बरामदगी, यह प्रमाण कि अजय सिंह ने झूठे नामों से मकान किराए पर लिए, और बिहार व उत्तर प्रदेश पुलिस की समन्वित छापामारी – ने अपराधों को संदेह से परे सिद्ध कर दिया। गोपाल सिंह बनाम बिहार राज्य (1993 (1) पीएलजेआर 236) के सिद्धांत का हवाला देते हुए खंडपीठ ने माना कि मामूली त्रुटियां एक सुदृढ़ और सुसंगत अभियोजन पक्ष के मामले को निष्फल नहीं कर सकतीं।
परिणामस्वरूप, पटना उच्च न्यायालय ने सभी अपीलकर्ताओं की धारा 364क, 395 और 412 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा। मुख्य अभियुक्त अजय सिंह को तीनों अपराधों के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की गई तथा अन्य अपीलकर्ताओं के लिए धारा 364क के तहत आजीवन कारावास और धारा 395 एवं 412 के तहत दस‑दस वर्ष के कारावास और विचारण न्यायालय द्वारा लगाए गए अर्थदंड को यथावत रखा गया।
अपीलें खारिज कर दी गईं। जो अपीलकर्ता जमानत पर थे, उन्हें दो सप्ताह के भीतर विचारण न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया; ऐसा न करने पर उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए बलपूर्वक कदम उठाने को कहा गया। पहले से जेल में बंद अजय सिंह और अमित सिंह को अपनी शेष सजा काटते रहने का आदेश दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह पटना उच्च न्यायालय का निर्णय व्यावहारिक रूप से कई कारणों से महत्वपूर्ण है।
पहला, यह दर्शाता है कि जब अपहृत पीड़ित अपने अपहरणकर्ताओं की अदालत में पहचान नहीं कर पाते, तब भी यदि अन्य साक्ष्य अपराध को स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं, तो दोषसिद्धि बरकरार रखी जा सकती है। यहां न्यायालय ने लखनऊ के एक विशिष्ट फ्लैट से पीड़ितों की ऑडी कार और निजी सामान की बरामदगी तथा छापेमारी व जब्ती के बारे में विश्वसनीय पुलिस गवाही पर विशेष रूप से भरोसा किया।
दूसरा, यह निर्णय यह रेखांकित करता है कि नकली सरकारी वर्दी, बत्ती और शासकीय‑शैली के नंबर प्लेटों का इस्तेमाल करके राजमार्ग पर वाहन रोकने वाले गिरोहों के विरुद्ध सफलतापूर्वक अभियोजन चलाया जा सकता है। फ्लैट से पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की वर्दियां और नकली प्रतीकों की बरामदगी को एक अहम कड़ी के रूप में देखा गया, जिससे यह साबित हुआ कि गिरोह ने पीड़ितों को फंसाने के लिए स्वयं को अधिकारी के रूप में प्रस्तुत किया।
तीसरा, यह निर्णय यह पुष्ट करता है कि तकनीकी आपत्तियां – जैसे कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की गवाही न होना, या समय संबंधी मामूली असंगतियां – स्वतः ही बरी होने का आधार नहीं बनतीं, जब समग्र कहानी सुसंगत हो और अनेक स्वतंत्र गवाहों एवं दस्तावेजों द्वारा समर्थित हो।
साधारण लोगों के लिए जो लंबी दूरी की सड़क यात्रा करते हैं, विशेष रूप से डॉक्टर, व्यवसायी या अन्य जो समृद्ध माने जाते हैं, यह मामला ऐसे गिरोहों के खतरों की याद दिलाता है जो अपने आपको अधिकारी बताकर घूमते हैं, और यह भी कि न्यायिक व्यवस्था फिरौती के लिए अपहरण करने वालों पर कड़ी सजा – यहां तक कि आजीवन कारावास – देने के लिए तत्पर है।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: क्या अभियोजन यह सिद्ध कर सका कि अपीलकर्ताओं ने डॉक्टर दंपति का फिरौती के लिए अपहरण किया और उनकी गाड़ी एवं सामान ले जाकर डकैती की?
उत्तर: हां। न्यायालय ने माना कि पीड़ितों की सुसंगत गवाही, फ्लैट संख्या 906 से ऑडी और निजी वस्तुओं की बरामदगी, छापेमारी में शामिल पुलिस अधिकारियों के साक्ष्य तथा अजय सिंह को लखनऊ के परिसरों से जोड़ने वाले किरायेदारी और पहचान संबंधी अभिलेख – ये सब मिलकर धारा 364क और 395 आईपीसी के तहत फिरौती के लिए अपहरण और डकैती को सिद्ध करते हैं। - प्रश्न: क्या अपीलकर्ताओं के विरुद्ध धारा 412 आईपीसी (डकैती से प्राप्त संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना) का अपराध सिद्ध हुआ?
उत्तर: हां। न्यायालय ने पाया कि अपहरण के कुछ ही समय बाद अपीलकर्ता ऑडी कार और डॉक्टर दंपति की चोरी की गई वस्तुओं के कब्जे में पाए गए और इसके लिए उनके पास कोई वैध स्पष्टीकरण नहीं था। इससे सिद्ध हुआ कि उन्होंने डकैती में प्राप्त संपत्ति को यह जानते हुए या यह मानने का कारण होते हुए रखा कि वह डकैती की संपत्ति है, जो धारा 412 आईपीसी की आवश्यकताओं को पूरा करता है। - प्रश्न: क्या पहचान, जब्ती और धारा 313 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत पूछताछ से संबंधित प्रक्रियागत त्रुटियों के कारण दोषसिद्धि अस्थिर हो जाती है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि अभियुक्तों की टीआईपी न होना, पीड़ितों द्वारा अभियुक्तों की पहचान न करना और कुछ अधिकारियों की गवाही न होना घातक नहीं है, क्योंकि समग्र परिस्थितिजन्य साक्ष्य मजबूत और सुसंगत थे। न्यायालय ने यह भी पाया कि धारा 313 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अभियुक्तों के सामने सभी महत्वपूर्ण आरोपित परिस्थितियां रखी गईं और उनके साथ किसी प्रकार की पूर्वाग्रह‑जनक अन्याय नहीं हुआ।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- न्यायालय ने गोपाल सिंह एवं अन्य बनाम बिहार राज्य, 1993 (1) पीएलजेआर 236 का हवाला दिया, ताकि यह रेखांकित किया जा सके कि मामूली विरोधाभासों के आधार पर अन्यथा विश्वसनीय साक्ष्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
- बचाव पक्ष ने इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के प्रमाणन पर अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीयर (2014) 10 एससीसी 473 और धारा 313 दंड प्रक्रिया संहिता पर प्रकाश बनाम कर्नाटक राज्य (2014) 12 एससीसी 133 का हवाला दिया, परंतु उच्च न्यायालय ने माना कि विवादित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के बिना भी अभियोजन का मामला सिद्ध है।
मामले का ब्यौरा
मामला संख्या:
Criminal Appeal (DB) No. 144 of 2022
Criminal Appeal (DB) No. 403 of 2018
Criminal Appeal (DB) No. 428 of 2018
Criminal Appeal (DB) No. 539 of 2018
Criminal Appeal (DB) No. 714 of 2018
Criminal Appeal (DB) No. 1010 of 2018
Criminal Appeal (DB) No. 1038 of 2018
Criminal Appeal (DB) No. 923 of 2019
विचारण न्यायालय का मामला:
Sessions Trial No. 190 of 2016 (S.J.) / 419 of 2016 arising out of Barachatti P.S. Case No. 155/2015, District Gaya
मामले का शीर्षक (रिकॉर्ड के अनुसार एक उदाहरण):
Amit Singh v. The State of Bihar
(अन्य संबद्ध अपीलों के शीर्षक क्रमशः नामित अपीलकर्ता बनाम बिहार राज्य हैं।)
उद्धरण:
2025 (4) PLJR 508
न्यायालय और पीठ:
पटना उच्च न्यायालय (खंडपीठ)
माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
माननीय श्री न्यायमूर्ति एस. बी. पीडी. सिंह
निर्णय की तिथि:
16.05.2025
वकीलगण:
अपीलकर्ताओं की ओर से (विभिन्न अपीलों में):
श्री अंसुल, वरिष्ठ अधिवक्ता (कई अपीलों में उपस्थिति)
श्री संजय कुमार, अधिवक्ता
श्री जावेद असलम, अधिवक्ता
श्री रवीन्द्र कुमार सिन्हा, अधिवक्ता
श्री अनिल सिंह, अधिवक्ता (Cr. Appeal (DB) No. 539 of 2018 में अमिकस क्यूरी)
श्री बिन्ध्याचल सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता
श्री विपिन कुमार सिंह, अधिवक्ता
श्री कुमार अवधिश अंकित, अधिवक्ता
डॉ. राजेश कुमार सिंह, अधिवक्ता
श्री अजय कुमार ठाकुर, अधिवक्ता
श्री भास्कर शंकर, अधिवक्ता
बिहार राज्य (प्रतिवादी) की ओर से:
सुश्री शशि बाला वर्मा, ए.पी.पी.
श्री अभिमन्यु शर्मा, ए.पी.पी.
श्री शिवेश चंद्र मिश्रा, ए.पी.पी.
श्री दिलीप कुमार सिन्हा, ए.पी.पी.
श्री शिवेश चंद्र मिश्रा, ए.पी.पी.
मामले का स्वरूप:
फिरौती के लिए अपहरण, डकैती और चोरी की संपत्ति रखने (धारा 364क, 395, 412 आईपीसी) संबंधी सत्र वाद में दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध आपराधिक अपीलें (खंडपीठ)।
पूर्ण निर्णय का लिंक:
Patna High Court Judgment – Criminal Appeal (DB) No. 144 of 2022 & connected matters
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कि बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
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