मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला फूलपरास थाना, जिला मधुबनी में दर्ज फूलपरास पी.एस. केस नं. 200/2021 की प्राथमिकी से प्रारंभ हुआ।
प्राथमिकी के अनुसार, सूचक ने आरोप लगाया कि वर्तमान याचिकाकर्ता तथा पाँच अन्य अभियुक्तों ने मिलकर उस पर हमला किया। कहा गया कि चोटें शरीर के महत्त्वपूर्ण अंगों पर थीं, जिनमें सिर पर चोट भी शामिल थी। यह विशिष्ट आरोप भी लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने सूचक की जेब से ₹20,000 छीन लिए।
इन आरोपों के आधार पर प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 323, 308, 379 तथा 504/34 के अंतर्गत दर्ज की गई।
जांच के बाद, पुलिस ने 31.08.2021 को आरोप पत्र दाख़िल किया, परन्तु केवल धारा 341, 323, 308 और 504/34 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत। सुपरविजन नोट एवं अंतिम प्रतिवेदन में यह दर्शाया गया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध धारा 379 IPC के अंतर्गत चोरी का आरोप असत्य पाया गया, अतः वह धारा हटा दी गई।
फिर भी, मजिस्ट्रेट ने धारा 341, 323, 308 और 504/34 IPC के अंतर्गत अपराधों पर संज्ञान लिया और मामला सत्रवाद (सेशंस केस) के रूप में अग्रेषित किया गया।
विचारण से पूर्व की अवस्था में, याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 के अंतर्गत एक आवेदन दाखिल कर अपने विरुद्ध पर्याप्त सामग्री के अभाव का हवाला देते हुए मुक़दमे से डिस्चार्ज (मुक्ति) की मांग की।
19.12.2024 को वादपत्र संख्या अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-IV, झंझारपुर ने इस डिस्चार्ज आवेदन को ख़ारिज कर दिया और आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को अन्य अभियुक्तों के साथ मुक़दमे का सामना करना पड़ेगा।
डिस्चार्ज से इंकार करने वाले इस आदेश से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने धारा 528, भारतीया नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अंतर्गत आपराधिक मिश्र याचिका संख्या 18402/2025 दाख़िल कर पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और दिनांक 19.12.2024 के आदेश को निरस्त करने की प्रार्थना की।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
मौखिक निर्णय माननीय श्री न्यायमूर्ति पुर्नेंदु सिंह द्वारा 20.11.2025 को, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता और राज्य की ओर से माननीय अपर लोक अभियोजक (A.P.P.) की दलीलें सुनने के बाद सुनाया गया।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलील उसके विरुद्ध सामग्री के अभाव पर केन्द्रित थी।
उसने इंगित किया कि प्राथमिकी में यह बहुत विशिष्ट आरोप था कि उसने सूचक की जेब से ₹20,000 छीने। परन्तु पुलिस सुपरविजन और जांच के दौरान यह आरोप असत्य पाया गया। परिणामस्वरूप, पुलिस ने धारा 379 IPC के अंतर्गत कोई आरोप पत्र दाख़िल नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने रेखांकित किया कि इस पक्ष का स्पष्ट उल्लेख उसके उच्च न्यायालय में दाख़िल आवेदन के पैराग्राफ 12 में किया गया है। उसका कहना था कि जब उसके विरुद्ध लगाया गया यही विशिष्ट और गंभीर आरोप किसी सामग्री से समर्थित नहीं है और स्वयं अन्वेषण एजेंसी ने इसे झूठा पाया है, तो उसे पूर्ण आपराधिक मुक़दमे का सामना करने के लिए बाध्य करने का कोई पर्याप्त आधार शेष नहीं रह जाता।
उसने न्यायालय का ध्यान इस तथ्य की ओर भी आकर्षित किया कि वह भारतीय रेल का कर्मचारी है। उसके अनुसार द्वेषपूर्ण और उत्पीड़क आरोपों के कारण यदि बिना पर्याप्त सामग्री के मुक़दमे को आगे बढ़ने दिया गया, तो उसे अनावश्यक रूप से प्रताड़ित होना पड़ेगा और उसकी सेवा-नौकरी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अपने पक्ष के समर्थन में, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के वे निर्णय उद्धृत किए, जिनमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 के अंतर्गत डिस्चार्ज के चरण पर न्यायालयों की शक्ति के प्रयोग के मानदंडों को स्पष्ट किया गया है। उन्होंने निम्नलिखित निर्णयों पर भरोसा किया:
State of Karnataka vs. L. Muniswamy & Ors., AIR 1977 SC 1489 तथा Dilawar Balu Kurane vs. State of Maharashtra, (2002) 2 SCC 135।
इन निर्णयों में बल देकर कहा गया है कि यदि मुक़दमे को आगे बढ़ाने के लिए कोई पर्याप्त आधार न हो और उपलब्ध सामग्री अभियुक्त के विरुद्ध गंभीर संदेह (grave suspicion) भी उत्पन्न न करे, तो न्यायालय को अभियुक्त को डिस्चार्ज कर देना चाहिए, न कि पूर्ण विचारण की ओर बढ़ना चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से उपस्थित A.P.P. ने दलील दी कि जिला न्यायालय ने अभिलेख पर उपलब्ध समस्त सामग्री पर विचार कर याचिकाकर्ता को डिस्चार्ज करने से उचित रूप से इंकार किया है। उनका कहना था कि इस चरण पर उच्च न्यायालय का दख़ल उचित नहीं है और मुक़दमे को आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने अपने समक्ष मूल प्रश्न निर्धारित किया: क्या याचिकाकर्ता के विरुद्ध अभियोजन आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है?
न्यायालय ने पहले अभिलेख से निर्विवाद स्थिति दर्ज की।
प्राथमिकी में धारा 341, 323, 308, 379 तथा 504/34 IPC के अंतर्गत आरोप थे। परन्तु जांच के बाद पुलिस ने केवल धारा 341, 323, 308 और 504/34 IPC के तहत ही आरोप पत्र दाख़िल किया, क्योंकि याचिकाकर्ता के संदर्भ में धारा 379 IPC के अंतर्गत आरोप असत्य पाया गया।
इसके पश्चात् मजिस्ट्रेट ने केवल आरोप पत्र में उल्लिखित अपराधों पर ही संज्ञान लिया। इस पृष्ठभूमि में उच्च न्यायालय ने स्वयं से यह प्रश्न किया कि क्या न्यायहित में, मजिस्ट्रेट एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा, बिना किसी सहायक सामग्री के, याचिकाकर्ता को मुक़दमे का सामना करने के लिए बाध्य करना न्यायोचित था?
इसके बाद न्यायालय ने क्वैशिंग (quashing) एवं डिस्चार्ज से सम्बंधित व्यापक कानूनी परिप्रेक्ष्य की ओर रुख किया।
न्यायालय ने Asian Resurfacing of Road Agency Private Ltd. v. CBI, (2018) 16 SCC 299, विशेषतः पैरा 21 एवं 22 पर चर्चा की। इस निर्णय में धारा 482 Cr.P.C., धारा 397(2) Cr.P.C. तथा संविधान के अनुच्छेद 226 एवं 227 के अंतर्गत शक्तियों के परस्पर संबंध को स्पष्ट किया गया है। यह उच्च न्यायालयों को स्मरण कराता है कि आपराधिक कार्यवाही में, विशेषकर आरोप तय करने के चरण पर, हस्तक्षेप संयमपूर्वक और सामान्यतः अत्यन्त अपवादात्मक (rarest of rare) मामलों में ही किया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके या न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।
Asian Resurfacing यह भी स्पष्ट करता है कि यद्यपि आरोप तय करने के आदेश को प्रायः अंतरिम (interlocutory) माना जाता है, फिर भी अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शक्तियाँ व्यापक हैं; परंतु उनका उपयोग “उच्च स्तर की न्यायिक संयम” के साथ और न कि तुच्छ या मामूली मामलों के लिए किया जाना चाहिए।
इस पृष्ठभूमि को रेखांकित करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने State of Karnataka vs. L. Muniswamy & Ors. में सर्वोच्च न्यायालय की तर्क-पद्धति का निकटता से परीक्षण किया और उस निर्णय के पैरा 7 से 11 तक के अंश उद्धृत किए।
इन अनुच्छेदों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 227 Cr.P.C. के तहत सत्र न्यायालय को यह अधिकार है कि यदि अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री और दोनों पक्षों को सुनने के पश्चात् उसे मुक़दमे को आगे बढ़ाने हेतु कोई पर्याप्त आधार न मिले, तो वह अभियुक्त को डिस्चार्ज कर सकता है। कारण लिखने की अनिवार्यता इसी उद्देश्य से है कि उच्च न्यायालय यह परख सके कि अभियुक्त को मुक़दमे का सामना कराने या डिस्चार्ज करने का निर्णय न्यायोचित था या नहीं।
L. Muniswamy में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 482 Cr.P.C. के अंतर्गत निहित (inherent) शक्तियों का उपयोग करते हुए उच्च न्यायालय ऐसी आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर सकता है, जिन्हें जारी रहने देना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process) होगा या जिनसे न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होगी। न्यायालय ने सावधान किया कि न्यायिक कार्यवाही को किसी के उत्पीड़न या प्रताड़ना का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता।
इन अंशों में बल दिया गया कि आरोप तय करने के चरण पर न्यायालय मात्र अभियोजन का मुखपत्र (mouthpiece) नहीं है। उसे अपना न्यायिक मस्तिष्क लगाकर यह देखना होता है कि यदि उपलब्ध सामग्री को अपरिवर्तित और अप्रतिखंडित माना जाए, तो क्या दोषसिद्धि की संभावना यथोचित रूप से कही जा सकती है या नहीं। यदि ऐसा न हो, तो अभियोजन को जारी रखना सार्वजनिक समय एवं धन की अनावश्यक बर्बादी होगी।
इसके उपरांत पटना उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Dilawar Balu Kurane का उल्लेख किया। इस निर्णय के पैरा 12 को उद्धृत करते हुए उच्च न्यायालय ने बताया कि धारा 227 के अंतर्गत डिस्चार्ज पर विचार करते समय न्यायाधीश साक्ष्यों को छाँट (sift) और तौल (weigh) सकता है, ताकि यह देख सके कि क्या अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्टया मामला या गंभीर संदेह (grave suspicion) उत्पन्न होता है। यदि मात्र साधारण संदेह (suspicion) ही उत्पन्न होता हो और दो दृष्टिकोण समान रूप से संभव हों, तो अभियुक्त को डिस्चार्ज कर दिया जाना चाहिए।
विशेष रूप से, Dilawar Balu Kurane में कहा गया है कि न्यायाधीश अभियोजन का मात्र पोस्ट ऑफिस बनकर कार्य नहीं कर सकता; उसे व्यापक संभावनाओं, साक्ष्यों के समग्र प्रभाव और परिस्थिति को ध्यान में रखना चाहिए, यद्यपि इस चरण पर पूर्ण विचारण जैसा गहन मूल्यांकन नहीं किया जाना होता।
इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने यह परीक्षण किया कि क्या याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई भी ठोस सामग्री उपलब्ध थी।
न्यायालय ने पाया कि प्राथमिकी में याचिकाकर्ता के विरुद्ध मूल एवं विशिष्ट आरोप ₹20,000 की छीना-झपटी का था। यह आरोप पुलिस सुपरविजन और अंतिम प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से असत्य पाया गया। परिणामस्वरूप, आरोप पत्र में याचिकाकर्ता के विरुद्ध धारा 379 IPC शामिल ही नहीं की गई।
निर्णय में यह उल्लेख नहीं मिला कि जांच के दौरान याचिकाकर्ता को आरोपित अपराधों से सीधे जोड़ने वाली कोई अन्य स्वतंत्र सामग्री एकत्र की गई थी।
ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय ने माना कि यदि निचली अदालत को याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुक़दमे को आगे बढ़ाने दिया जाए, तो यह धारा 227 Cr.P.C. के तहत अपेक्षित स्वतंत्र न्यायिक मन के प्रयोग के बजाय मात्र अभियोजन के निर्णय को आँख मूँदकर स्वीकार करने के समान होगा।
तथ्यों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि के आलोक में न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध किसी भी सामग्री के अभाव में उसके ख़िलाफ़ मुक़दमे को आगे बढ़ाने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं है।
अतः पटना उच्च न्यायालय ने 19.12.2024 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-IV, झंझारपुर द्वारा पारित impugned (आपत्तिजनक) आदेश को निरस्त और रद्द (quash and set aside) कर दिया।
इसके साथ ही आपराधिक मिश्र याचिका का निपटारा कर दिया गया, जिससे याचिकाकर्ता को व्यर्थ आपराधिक विचारण से राहत मिल गई और फूलपरास पी.एस. केस नं. 200/2021 में उसके विरुद्ध विचारण की संभावना समाप्त हो गई।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो केवल प्राथमिकी में लगाए गए नंगे आरोपों के आधार पर आपराधिक मुक़दमों का सामना कर रहे हों, जबकि जांच के बाद उनके विरुद्ध कोई सहायक साक्ष्य न हो।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल प्राथमिकी दर्ज हो जाने मात्र से हर अभियुक्त को विचारण तक धकेला नहीं जा सकता। न्यायालय को यह देखना होगा कि वास्तव में कोई ऐसी सामग्री है या नहीं, जो यदि अप्रतिखंडित रहे, तो यथोचित रूप से दोषसिद्धि तक ले जा सके।
सरकारी कर्मचारियों और उन अन्य व्यक्तियों के लिए, जिनके कॅरियर और प्रतिष्ठा दाँव पर होते हैं, यह निर्णय यह सिद्ध करता है कि जब निचली अदालतें साक्ष्य के अभाव की अनदेखी कर बिना ठोस कारण डिस्चार्ज से इंकार करती हैं, तो उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
यह निर्णय आम नागरिकों के बीच भी यह जागरूकता फैलाता है कि जहाँ स्वयं जांच में गंभीर आरोप झूठे पाए गए हों और आरोप पत्र उन आरोपों का समर्थन न करता हो, वहाँ अभियुक्त धारा 227 Cr.P.C. के तहत विधिवत रूप से डिस्चार्ज की मांग कर सकता है और यदि निचली अदालत गलत रूप से इंकार करे, तो उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।
कानूनी मुद्दे और उनके उत्तर
- मुद्दा: जब जांच में याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुख्य आरोप असत्य पाए गए और उसके संलिप्त होने का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुआ, तो क्या उसके विरुद्ध आपराधिक विचारण जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार था?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध किसी भी सामग्री के अभाव में उसे विचारण का सामना करने के लिए बाध्य करना अभियोजन के पक्ष को आँख मूँदकर स्वीकार करने के बराबर होगा। डिस्चार्ज आवेदन को स्वीकार किया जाना चाहिए था और उसे ख़ारिज करने वाला आदेश निरस्त कर दिया गया। - मुद्दा: क्या सत्र न्यायालय ने धारा 227 Cr.P.C. के अंतर्गत अपने अधिकारों का विधिवत एवं सही प्रयोग करते हुए याचिकाकर्ता का डिस्चार्ज आवेदन ख़ारिज किया?
उत्तर: नहीं। L. Muniswamy और Dilawar Balu Kurane जैसे सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर भरोसा करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि निचली अदालत यह जाँच करने में असफल रही कि अभिलेख पर पर्याप्त आधार या गंभीर संदेह प्रकट होता है या नहीं। सामग्री के अभाव के बावजूद डिस्चार्ज से इंकार करना विधिसम्मत नहीं था।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Asian Resurfacing of Road Agency Private Ltd. v. CBI, (2018) 16 SCC 299
- State of Karnataka v. L. Muniswamy & Ors., AIR 1977 SC 1489
- Dilawar Balu Kurane v. State of Maharashtra, (2002) 2 SCC 135
- Union of India v. Prafulla Kumar Samal, (1979) 3 SCC 4 (उद्धृत अंश के भीतर संदर्भित)
- अन्य पूर्ववर्ती सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (R.P. Kapur, Vadilal Panchal, Century Spinning & Manufacturing Co.) का भी L. Muniswamy में उद्धृत अंश में उल्लेख है।
मामले का विवरण
केस नंबर: Criminal Miscellaneous No. 18402 of 2025, arising out of Phulparas P.S. Case No. 200 of 2021, District Madhubani.
मामले का शीर्षक: Nikesh Jha v. The State of Bihar & Anr.
पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Purnendu Singh
निर्णय की तिथि: 20.11.2025 (24.11.2025 को अपलोड)
उद्धरण (Citation): 2026(1) PLJR 76
मामले का स्वरूप: धारा 528 BNSS के अंतर्गत आपराधिक मिश्र याचिका, जिसमें धारा 227 Cr.P.C. के अंतर्गत डिस्चार्ज से इंकार करने वाले आदेश को निरस्त करने की मांग की गई थी; यह याचिका धारा 341, 323, 308, 379 तथा 504/34 IPC के तहत दर्ज प्राथमिकी से उत्पन्न सत्रवाद से सम्बंधित थी।
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Rajesh Sinha, Advocate; Mr. Aarsh Kumar, Advocate; Mr. Chandan Kumar Singh, Advocate; Mr. Ravi Kant Tiwari, Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. Ajit Kumar, A.P.P.
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
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