क्लास चतुर्थ पद प्रकरण में करुणामूलक नौकरी से इनकार निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2025

एक दिवंगत क्लास चतुर्थ न्यायालय कर्मचारी के परिवार ने करुणामूलक नियुक्ति से इनकार को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि बाद में लगाया गया 3% की सीमा का प्रावधान, पहले से वैध रूप से उत्पन्न दावे को निष्फल नहीं कर सकता। न्यायालय ने रिट स्वीकार करते हुए क्लास चतुर्थ पद पर नियुक्ति का आदेश दिया। अब प्राधिकारियों को तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता की नियुक्ति करनी होगी।

प्रकरण की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सिविल कोर्ट, औरंगाबाद के एक दिवंगत क्लास चतुर्थ कर्मचारी के पुत्र हैं। उनके पिता, जो दफ्तरी के पद पर कार्यरत थे, 8.2.2014 को सेवाकाल के दौरान ही निधन हो गया।

दिवंगत कर्मचारी अपने पीछे याचिकाकर्ता (पुत्र) और एक पुत्री को छोड़ गए। उनकी पत्नी, अर्थात् याचिकाकर्ता की माता, उनसे पहले ही गुजर चुकी थीं। चूंकि विधवा, कर्मचारी से पहले ही दिवंगत हो चुकी थीं, इसलिए पारिवारिक पेंशन दिये जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था।

निर्णय के अनुसार, पिता की मृत्यु के बाद परिवार के पास आय का कोई स्रोत नहीं बचा था। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता ने करुणामूलक नियुक्ति योजना के अंतर्गत नौकरी के लिए आवेदन किया।

9.7.2014 को याचिकाकर्ता ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, औरंगाबाद (प्रतिवादी संख्या 3) के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें सिविल कोर्ट, औरंगाबाद में करुणामूलक नियुक्ति की मांग की गई। मामला सिविल कोर्ट की करुणामूलक नियुक्ति समिति के समक्ष रखा गया।

निर्धारित तिथि पर याचिकाकर्ता समिति के समक्ष उपस्थित हुए और सत्यापन हेतु अपने सभी मूल प्रमाण-पत्र साथ लेकर गए। समिति ने उनके मामले पर अन्य मामलों के साथ विचार किया।

9.2.2015 को आयोजित बैठक में सिविल कोर्ट, औरंगाबाद की नियुक्ति समिति ने याचिकाकर्ता को क्लास चतुर्थ श्रेणी में दफ्तरी के पद पर करुणामूलक आधार पर नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया। हालांकि, यह निर्णय स्पष्ट रूप से “पटना उच्च न्यायालय की स्वीकृति के अधीन” किया गया था।

यह अनुशंसा 19.2.2015 के पत्र द्वारा रजिस्ट्रार (प्रशासन), पटना उच्च न्यायालय (प्रतिवादी संख्या 2) को स्वीकृति हेतु प्रेषित की गई।

समय बीतने पर भी नियुक्ति-पत्र जारी न होने के कारण, याचिकाकर्ता ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश (प्रतिवादी संख्या 3) के समक्ष अभ्यावेदन दिया और अपनी नियुक्ति के संबंध में सूचना एवं कार्रवाई की मांग की।

इसके उत्तर में 16.6.2016 के पत्र द्वारा याचिकाकर्ता को सूचित किया गया कि पटना उच्च न्यायालय ने उनकी नियुक्ति को स्वीकृति नहीं दी है और 15.12.2015 को उक्त अनुशंसा पुनर्विचार के लिए वापस भेज दी गई है।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने विस्तार से यह परखा कि याचिकाकर्ता की करुणामूलक नियुक्ति पहले कैसे अनुशंसित हुई और बाद में वस्तुतः कैसे नकार दी गई।

न्यायालय ने उल्लेख किया कि 15.12.2015 के पत्र द्वारा उच्च न्यायालय के प्रशासन ने नियुक्ति समिति की अनुशंसा वापस भेजते हुए याचिकाकर्ता तथा दो अन्य के मामलों पर पुनर्विचार का अनुरोध किया था। यह पुनर्विचार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Umesh Kumar Nagpal vs. State of Haryana & Ors.; (1994) 4 SCC 138 के आलोक में तथा प्रत्येक आवेदक की आर्थिक स्थिति का समुचित आकलन करने के बाद किया जाना था।

इसी बीच एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया गया। 4.1.2016 के पत्र द्वारा रजिस्ट्रार (प्रशासन), पटना उच्च न्यायालय ने बिहार के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों, जिनमें औरंगाबाद भी शामिल है, को लिखा। इस पत्र में कहा गया कि विचार के उपरांत पटना उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि करुणामूलक आधार पर की जाने वाली नियुक्तियां इस प्रकार सीमित रहें कि संबंधित संवर्ग की स्वीकृत पद-शक्ति के 3% से अधिक करुणामूलक नियुक्तियां न हों।

इसी संदर्भ में 5.4.2016 का एक अन्य पत्र भी पटना उच्च न्यायालय से जारी हुआ, जिसमें 3% की इस सीमा पर बल दिया गया।

उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती पुनर्विचार संबंधी निर्देश के अनुपालन में सिविल कोर्ट, औरंगाबाद की नियुक्ति समिति की बैठक पुनः 3.8.2016 को हुई। इस बैठक की कार्यवाही का पटना उच्च न्यायालय ने रिट कार्यवाही में विशेष रूप से परीक्षण किया।

याचिकाकर्ता के संबंध में समिति ने दर्ज किया कि वे दिवंगत बैजनाथ प्रजापति, दफ्तरी, के पुत्र हैं और दिवंगत कर्मचारी अपने पीछे याचिकाकर्ता और एक विवाहित पुत्री को छोड़ गए। यह भी दर्ज किया गया कि याचिकाकर्ता की माता पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो चुकी थीं।

समिति ने आगे दर्ज किया कि याचिकाकर्ता की बहन ने भी अपने पिता के मृत्यु-पर्यंत/सेवानिवृत्ति लाभों में अपने हिस्से का दावा किया है। चूंकि अब तक किसी सक्षम प्राधिकारी ने उनके हिस्सों का निर्धारण नहीं किया था, इसलिए याचिकाकर्ता को कोई सेवानिवृत्ति लाभ अदा नहीं किया गया।

कार्यवृत्त में याचिकाकर्ता की स्थिति को “हाथ से मुँह चलने वाली” और बेरोजगार बताया गया है तथा कहा गया है कि उनका परिवार “अत्यंत दयनीय स्थिति” में है। समिति ने यह स्वीकार किया कि उन्हें पहले दफ्तरी के रूप में नियुक्ति हेतु अनुशंसित किया जा चुका है और “माननीय न्यायालय के निर्देश” के अनुसार यह सुझाव दिया कि उन्हें न्यूनतम क्लास चतुर्थ पद पर अनुशंसित किया जा सकता है।

इन टिप्पणियों के बावजूद, समिति ने, उच्च न्यायालय द्वारा 4.1.2016 एवं 5.4.2016 के पत्रों से संप्रेषित नई 3% सीमा का सामना करते हुए, पुनः पटना उच्च न्यायालय से और दिशा-निर्देश मांगे।

19.9.2016 के पत्र द्वारा रजिस्ट्रार (प्रशासन), पटना उच्च न्यायालय (प्रतिवादी संख्या 2) ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, औरंगाबाद (प्रतिवादी संख्या 3) को सूचित किया कि याचिकाकर्ता एवं अन्य के मामलों को “अनुकूल रूप से विचारित नहीं किया गया”।

निर्णय में दर्ज कारण यह था कि औरंगाबाद न्यायाधीश-शिप में क्लास चतुर्थ संवर्ग में पहले से ही दस कर्मचारी करुणामूलक आधार पर नियुक्त किए जा चुके थे, जो उस संवर्ग की स्वीकृत पद-शक्ति के 3% से कहीं अधिक था। अतः 4.1.2016 के निर्णय के आलोक में अब और कोई करुणामूलक नियुक्ति नहीं दी जा सकती थी।

न्यायालय में प्रतिवादियों ने इसी 3% सीमा और औरंगाबाद में पूर्व में की गई करुणामूलक नियुक्तियों पर भरोसा करते हुए याचिकाकर्ता की नियुक्ति से इनकार को उचित ठहराया। उनका तर्क था कि उच्च न्यायालय का नीतिगत निर्णय उन पर बाध्यकारी है और इन परिस्थितियों में रिट याचिका खारिज कर दी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से यह रेखांकित किया गया कि उनके पिता की सेवा अवधि में मृत्यु हुई, जिससे परिवार आय-विहीन हो गया, और उन्होंने समय पर आवेदन प्रस्तुत किया। नियुक्ति समिति ने उनकी आर्थिक स्थिति को अत्यंत विपन्न पाया और प्रारंभ में ही उन्हें क्लास चतुर्थ पद के लिए अनुशंसित किया था। उनकी grievance यह थी कि बाद में लगाया गया प्रशासनिक सीमा-प्रावधान उनकी पहले से संसाधित मांग को विफल करने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है।

पटना उच्च न्यायालय ने इसके बाद करुणामूलक नियुक्ति के संबंध में लागू कानून पर विचार किया, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Indian Bank & Ors. vs. Promila & Anr; (2020) 2 SCC 729 के संदर्भ में।

Indian Bank vs. Promila में सर्वोच्च न्यायालय ने, Canara Bank v. M. Mahesh Kumar; (2015) 7 SCC 412 पर भरोसा करते हुए, यह स्पष्ट किया था कि करुणामूलक नियुक्ति के लिए लागू योजना वही होगी जो कर्मचारी की मृत्यु की तिथि को प्रभावी हो। किसी विद्यमान योजना के अंतर्गत किए गए दावे पर, बाद में लागू की गई योजना, जो मृत्यु के काफी समय बाद प्रभावी हुई हो, के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी दोहराया कि करुणामूलक नियुक्ति नियमित भर्ती का विकल्प नहीं है और ऐसा कोई निहित अधिकार नहीं है कि हर स्थिति में ऐसी नौकरी दी ही जाए। इसका उद्देश्य कर्मचारी की मृत्यु के समय परिवार को तात्कालिक राहत प्रदान करना है। हालांकि, Promila के निर्णय में न्यायालय ने यह जोर देकर कहा कि योजना लागू करने के लिए निर्णायक तिथि कर्मचारी की मृत्यु की तिथि है, और बाद में आई योजनाओं को इस प्रकार पूर्ववर्ती मृत्यु पर लागू नहीं किया जा सकता कि पहले से अर्जित या संसाधित अधिकार समाप्त हो जाएं।

Promila में यह भी उल्लेख किया गया कि पारिवारिक पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ को करुणामूलक नियुक्ति के स्थानापन्न के रूप में नहीं देखा जा सकता, और यह कि प्रासंगिक समय पर योजना की वास्तविक शर्तों की जांच आवश्यक है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले के तथ्यों की ओर ध्यान दिया। यहां दिवंगत कर्मचारी की मृत्यु 8.2.2014 को हुई। याचिकाकर्ता ने 9.7.2014 को अपना आवेदन दिया। नियुक्ति समिति ने 9.2.2015 की बैठक में उनके आवेदन पर सकारात्मक विचार किया और 19.2.2015 को अपनी अनुशंसा स्वीकृति के लिए अग्रसारित कर दी।

उच्च न्यायालय ने यह भी देखा कि करुणामूलक नियुक्तियों पर 3% की सीमा केवल 4.1.2016 को लागू की गई, जो याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु के काफी बाद तथा समिति की पहली अनुकूल अनुशंसा के भी बाद की बात है।

इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि 4.1.2016 को लागू की गई 3% सीमा याचिकाकर्ता के मामले पर लागू नहीं की जा सकती। न्यायालय ने इस बाद के प्रशासनिक प्रतिबंध को उस पूर्व दावे पर अनुप्रयोग से बाहर रखा, जिसे पहले ही उस तिथि से पहले लागू ढांचे के अंतर्गत विचारित किया जा चुका था।

न्यायालय ने यह भी गौर किया कि नियुक्ति समिति ने स्वयं याचिकाकर्ता की आर्थिक स्थिति को “अत्यंत दयनीय” और “हाथ से मुँह चलने वाली” बताया था तथा हिस्सेदारी के विवाद के कारण अब तक कोई सेवानिवृत्ति लाभ अदा नहीं किया गया था।

इन परिस्थितियों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित बाध्यकारी सिद्धांतों के आलोक में पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता की रिट याचिका स्वीकृत किए जाने योग्य है।

अतः न्यायालय ने पूर्व के अस्वीकृति-प्रभाव को निरस्त करते हुए प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट, औरंगाबाद में क्लास चतुर्थ पद पर करुणामूलक आधार पर नियुक्त करें।

न्यायालय ने अनुपालन के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की और निर्देश दिया कि नियुक्ति “यथाशीघ्र”, अधिमानतः आदेश की प्रति प्राप्त होने/तामील होने की तिथि से तीन माह के भीतर कर दी जाए।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार में सरकारी तथा न्यायालयीन कर्मचारियों के उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जो कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद करुणामूलक नियुक्ति की मांग करते हैं।

पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि प्राधिकारी किसी ऐसे नये नीति-निर्णय या प्रतिबंध का सहारा लेकर उस दावे को नकार नहीं सकते जो पहले की नीति के तहत, कर्मचारी की मृत्यु की तिथि पर, उत्पन्न हुआ हो और जिसके तहत कार्यवाही भी हो चुकी हो।

यहां 4.1.2016 को लागू की गई करुणामूलक नियुक्तियों पर 3% की सीमा, 2014 में हुई मृत्यु से उत्पन्न दावे को अवरुद्ध करने के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती थी, विशेषकर तब जब 2015 में उनके मामले की अनुशंसा पहले ही की जा चुकी थी।

दूसरा, इस निर्णय से यह रेखांकित होता है कि करुणामूलक नियुक्ति में असली कसौटी कर्मचारी की मृत्यु के समय परिवार की आर्थिक कठिनाई है। न्यायालय ने नियुक्ति समिति द्वारा स्वयं दर्ज की गई यह बात गंभीरता से ली कि याचिकाकर्ता का परिवार अत्यंत दयनीय, हाथ से मुँह चलाने वाली स्थिति में था।

तीसरा, यह निर्णय प्रशासनिक अधिकारियों और नियुक्ति समितियों को यह संदेश देता है कि उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शन को ध्यान में रखते हुए कानून और योजनाओं का निष्पक्ष अनुप्रयोग करना होगा और वे केवल बाद के परिपत्रों का सहारा लेकर वास्तविक दावों से बच नहीं सकते।

ऐसे ही अन्य स्थितियों में मृत कर्मचारियों के आश्रितों के लिए यह निर्णय इस बात का कानूनी आधार प्रदान करता है कि वे उन अस्वीकृतियों को चुनौती दे सकें जो केवल बाद की नीतिगत परिवर्तनों पर आधारित हों, न कि उस समय के नियमों पर जब उनके प्रियजन की मृत्यु हुई थी।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या करुणामूलक नियुक्ति पर 3% की सीमा लगाने वाला बाद का प्रशासनिक निर्णय, पूर्व में हुई मृत्यु से उत्पन्न, तथा पहले से अनुकूल रूप से विचारित दावे को अस्वीकार करने के लिए लागू किया जा सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि 4.1.2016 को लागू की गई 3% की पाबंदी याचिकाकर्ता के मामले पर लागू नहीं हो सकती, क्योंकि दिवंगत की मृत्यु 8.2.2014 को हुई थी और याचिकाकर्ता के आवेदन पर 2015 में नियुक्ति समिति पहले ही अनुकूल विचार कर चुकी थी, जब यह नई सीमा लागू नहीं हुई थी।
  • प्रश्न: करुणामूलक नियुक्ति की किसी योजना या नीति के लागू होने की दृष्टि से प्रासंगिक तिथि कौन-सी है?
    उत्तर: प्रासंगिक तिथि कर्मचारी की मृत्यु की तिथि है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Indian Bank & Ors. vs. Promila & Anr; (2020) 2 SCC 729 पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने यह पुष्टि की कि जिस योजना के अंतर्गत मृत्यु की तिथि को दावा उत्पन्न हुआ, उस पर बाद में लागू योजना के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
  • प्रश्न: क्या इस प्रकरण के तथ्यों पर याचिकाकर्ता करुणामूलक नियुक्ति के हकदार थे?
    उत्तर: हाँ। याचिकाकर्ता की अत्यंत दयनीय आर्थिक स्थिति, नियुक्ति समिति की पूर्ववर्ती अनुकूल अनुशंसा और बाद में लगाई गई 3% सीमा के अनुप्रयोग-अभाव को देखते हुए न्यायालय ने रिट स्वीकार की और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट, औरंगाबाद में क्लास चतुर्थ पद पर, अधिमानतः तीन माह के भीतर, नियुक्त करें।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Umesh Kumar Nagpal vs. State of Haryana & Ors.; (1994) 4 SCC 138 (जिसका उल्लेख उच्च न्यायालय के पूर्व पुनर्विचार निर्देश में हुआ)।
  • Indian Bank & Ors. vs. Promila & Anr; (2020) 2 SCC 729 (इस सिद्धांत के लिए जिस पर भरोसा किया गया कि लागू योजना वही है जो मृत्यु की तिथि को प्रभावी थी; साथ ही Canara Bank v. M. Mahesh Kumar; (2015) 7 SCC 412 का भी उल्लेख)।

प्रकरण का विवरण

प्रकरण संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 2983 of 2017

प्रकरण शीर्षक: Ramesh Prajapati vs. The State of Bihar & Ors.

उद्धरण: 2025 (4) PLJR 521

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

कोरम: Hon’ble Mr. Justice Partha Sarthy

निर्णय की तिथि: 07.10.2025

उपस्थित अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Arbind Kumar Singh, Advocate; Mr. Ranjit Kumar, Advocate
  • राज्य (प्रतिवादी संख्या 1) की ओर से: Mr. Prabhakar Jha, GP-27
  • प्रतिवादी संख्या 2 से 4 की ओर से: Ms. Anukriti Jaipuriyar, Advocate

प्रतिवादी: State of Bihar through Chief Secretary; Registrar (Administration), Patna High Court; District and Sessions Judge, Aurangabad, cum-Chairman of Compassionate Appointment Committee; Registrar, Civil Court, Aurangabad.

प्रकरण का स्वरूप: दफ्तरी की सेवाकाल में मृत्यु के उपरांत सिविल कोर्ट, औरंगाबाद में क्लास चतुर्थ पद पर करुणामूलक नियुक्ति के लिए निर्देश की मांग करते हुए दायर रिट याचिका (सिविल)।

निर्णय का लिंक: file:///C:/Users/Adity/OneDrive/Documents/Vaktrita%20Final/case%201263.pdf

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