उप कुलसचिव की सेवा समाप्ति आधारहीन पाई गई — पटना उच्च न्यायालय, 2025

आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय में एक उप कुलसचिव की नियुक्ति जुड़ने के लगभग 10 वर्ष बाद रद्द कर दी गई। पटना उच्च न्यायालय ने यह जांचा कि क्या वह नियुक्ति के लिए पात्र थीं और क्या कुलाधिपति का आदेश विधिसंगत था। न्यायालय ने सेवा समाप्ति को अवैध ठहराते हुए आदेशों को रद्द कर दिया और पूर्ण लाभों के साथ पुनर्नियुक्ति का निर्देश दिया। साथ ही, उसने कुलाधिपति सचिवालय में गंभीर चूक और संभावित पूर्व दिनांकित (एंटीडेटिंग) आदेशों पर भी चिंता व्यक्त की।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मूल रूप से समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) के रूप में कार्यरत थीं। उनका चयन BPSC के माध्यम से हुआ, वे अंतिम मेधा सूची में प्रथम स्थान पर रहीं और 11.10.2000 के परिपत्र सं. 1689 द्वारा CDPO के रूप में नियुक्त की गईं। उन्होंने 24.10.2000 को रु. 6500-10500 के वेतनमान पर ज्वाइन किया और 2013 तक 13 वर्ष से अधिक की निष्कलंक सेवा पूर्ण की।

10 वर्ष की सेवा के बाद उन्हें PB-2 में प्रथम आश्वस्त प्रगति (ACP) रु. 5400 ग्रेड पे के साथ प्रदान की गई। CDPO के रूप में कार्यरत रहते हुए, आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (AKU), पटना ने 19.08.2011 को कई शैक्षणिक, प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक पदों, जिनमें उप कुलसचिव भी शामिल था, के लिए विज्ञापन जारी किया।

विज्ञापन में न्यूनतम 55% अंकों के साथ स्नातकोत्तर उपाधि और या तो शैक्षिक प्रशासन अनुभव सहित सहायक प्राध्यापक के रूप में नौ वर्ष का अनुभव, या शोध/उच्च शिक्षा संस्थानों में तुल्य अनुभव, या सहायक कुलसचिव अथवा समकक्ष पद पर पाँच वर्ष का प्रशासनिक अनुभव अनिवार्य बताया गया। सामान्य शर्तों में (खंड A की धारा 8(i)) विश्वविद्यालय को स्क्रीनिंग/चयन समिति की संस्तुति पर न्यूनतम योग्यता और/या अनुभव में शिथिलता देने का अधिकार प्रदान किया गया था।

याचिकाकर्ता, जिनके पास प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर उपाधि, साथ ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से M.Phil. और Ph.D. थी, और जिन्हें सहायक कुलसचिव से उच्चतर वेतनमान में 11 वर्ष से अधिक का प्रशासनिक अनुभव था, ने उप कुलसचिव के पद के लिए आवेदन किया। उनका आवेदन राज्य सरकार द्वारा 13.12.2012 को अग्रसारित किया गया।

विश्वविद्यालय की विधिवत गठित चयन समिति ने अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लिया। याचिकाकर्ता को सर्वाधिक अंक प्राप्त हुए और उन्हें मेधा सूची में प्रथम स्थान दिया गया। राज्य सरकार द्वारा गठित कार्यकारी परिषद ने संस्तुति को अनुमोदित किया और याचिकाकर्ता को स्वीकृत पद पर पे बैंड-3 में रु. 7600 ग्रेड पे के साथ 08.10.2013 के पत्र द्वारा उप कुलसचिव नियुक्त किया गया। राज्य सरकार ने 18.10.2013 के परिपत्र सं. 5152 द्वारा उन्हें CDPO पद पर लियन सुरक्षित रखते हुए प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन करने की अनुमति दी। उन्होंने 19.10.2013 को उप कुलसचिव के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।

2017 में, संतोषजनक परिवीक्षा अवधि पूर्ण होने पर, विश्वविद्यालय ने 31.01.2017 के आदेशों द्वारा उन्हें 18.10.2014 से उप कुलसचिव पद पर स्थाई रूप से पुष्टि कर दी और जटिलताओं से बचने हेतु CDPO पद से त्यागपत्र देने को कहा। उन्होंने 02.02.2017 को त्यागपत्र दे दिया और राज्य सरकार ने 31.05.2017 के परिपत्र सं. 2328 द्वारा इसे 18.10.2013, यानी उप कुलसचिव के रूप में प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से प्रभावी स्वीकार कर लिया।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

उनकी पुष्टि के बाद, लेखा परीक्षा और शिकायतों के माध्यम से उनकी नियुक्ति पर आपत्तियाँ उठाई गईं।

पहले, 18.08.2017 की एक लेखा परीक्षा आपत्ति में उनकी नियुक्ति पर प्रश्न उठाया गया। विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने 19.08.2017 को उत्तर दिया कि वे 10 वर्ष से अधिक समय तक सहायक कुलसचिव के वेतनमान से उच्चतर वेतनमान प्राप्त कर चुकी थीं और UGC मानकों के अनुसार सभी पात्रता शर्तें पूरी करती थीं। यह बात नियुक्ति के समय चयन समिति और कार्यकारी परिषद ने परखी थी। महानिरीक्षक लेखा (लेखा परीक्षा), बिहार के वरिष्ठ लेखा अधिकारी ने इसे जांचा और अंतिम लेखा रिपोर्ट में कोई और आपत्ति नहीं उठाई।

दूसरे, राज्यपाल सचिवालय/कुलाधिपति के पास एक शिकायत पहुँची। 25.01.2018 को कुलसचिव ने विस्तृत प्रतिवेदन देकर उनकी शैक्षणिक योग्यता, प्रशासनिक अनुभव और विधिसम्मत नियुक्ति की पुष्टि की। इसमें यह भी दर्ज था कि उन्हें उप कुलसचिव के रूप में पुष्टि प्रदान की जा चुकी है और उन्होंने सरकारी पद से त्यागपत्र दे दिया है। उस समय कुलाधिपति ने कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की।

बाद में, सार्वजनिक हित याचिका CWJC सं. 5406/2020 दायर की गई, जिसमें याचिकाकर्ता को प्रतिवादी बनाया गया। विश्वविद्यालय के प्रति-शपथपत्र और अनुपूरक प्रति-शपथपत्रों में फिर से उनके नियुक्ति को विज्ञापन और विनियमों के आधार पर वैध बताया गया। एक अन्य रिट याचिका CWJC सं. 334/2022 में उनकी नियुक्ति को चुनौती दी गई। इसे न्यायालय ने 13.01.2022 को गुण-दोष में गए बिना निपटा दिया और उस याचिकाकर्ता को कुलाधिपति या किसी वैधानिक प्राधिकार के समक्ष प्रतिवेदन देने की स्वतंत्रता दी।

उक्त स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए 28.01.2022 को कुलाधिपति के समक्ष प्रतिवेदन दाखिल किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस प्रतिवेदन में पूर्ववर्ती जांचों और अनुकूल प्रतिवेदनों को दबा लिया गया।

राज्यपाल सचिवालय ने 25.03.2022 के पत्र द्वारा AKU से विस्तृत प्रतिवेदन मांगा। विश्वविद्यालय ने 08.04.2022 को याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया। उन्होंने 18.04.2022 को अपना उत्तर दायर किया। तथापि, विश्वविद्यालय ने 26.08.2022 की अपनी रिपोर्ट में यह राय दी कि याचिकाकर्ता के पास उप कुलसचिव के पद के लिए आवश्यक न्यूनतम अनुभव नहीं था और यह कहा कि CDPO का अनुभव सहायक कुलसचिव के समकक्ष अनुभव नहीं माना जा सकता।

03.10.2023 को याचिकाकर्ता ने कुलाधिपति के समक्ष विस्तृत लिखित प्रतिवेदन दाखिल किया। उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि उनका CDPO पद वेतनमान और दर्जे में सहायक कुलसचिव से ऊँचा था, कि उन्होंने पाँच वर्ष की अपेक्षित अवधि से कहीं अधिक प्रशासनिक अनुभव अर्जित किया था, कि विधिवत गठित चयन समिति और कार्यकारी परिषद ने उन्हें नियुक्त किया था और स्वयं विज्ञापन ने योग्यता एवं अनुभव में शिथिलता की अनुमति दी थी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि उन्हें पुष्टि प्रदान कर दी गई और उन्हें अपने सुरक्षित सरकारी पद से त्यागपत्र देने को बाध्य किया गया, जिससे पुनर्व्यवस्था असंभव हो गई।

इसके बावजूद, कुलाधिपति ने 26.09.2023 का आदेश पारित कर यह माना कि उनकी शैक्षणिक योग्यता तो पूर्ण है, लेकिन उन्हें शैक्षिक क्षेत्र में कार्यानुभव नहीं है। कुलाधिपति ने CDPO पद को केवल आंगनबाड़ी केंद्रों पर पर्यवेक्षी प्राधिकारी बताया, जिसका उच्च शिक्षा प्रशासन से कोई सम्बंध नहीं है, और निष्कर्ष निकाला कि CDPO और सहायक कुलसचिव पद समकक्ष नहीं हैं। इसलिए कुलाधिपति ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी। यह आदेश 03.01.2024 के पत्र से AKU को भेजा गया और विश्वविद्यालय ने 05.01.2024 की 49वीं कार्यकारी परिषद बैठक में उनकी सेवा समाप्त करने का संकल्प पारित किया। परिपत्र सं. 120 दिनांक 06.01.2024 के माध्यम से उन्हें तत्काल प्रभाव से सेवा से मुक्त करने की अधिसूचना जारी हुई।

याचिकाकर्ता ने 26.09.2023 के कुलाधिपति आदेश और 06.01.2024 की सेवा समाप्ति अधिसूचना दोनों को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनका कहना था कि:

  • CDPO पद का वेतनमान सहायक कुलसचिव से अधिक था और इसलिए विज्ञापन तथा बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 के तहत प्रयुक्त “समकक्ष” अभिव्यक्ति के अर्थ में वह समकक्ष पद था।
  • विज्ञापन ने स्पष्ट रूप से न्यूनतम योग्यता और अनुभव में शिथिलता की अनुमति दी थी और उनकी चयन प्रक्रिया विशेषज्ञ चयन समिति के समुचित विचार और कार्यकारी परिषद की स्वीकृति के बाद हुई थी।
  • 2017 और 2018 की पूर्ववर्ती लेखा परीक्षा और कुलाधिपति स्तर की जांचों ने उनकी नियुक्ति को विधिसम्मत पाया था, पर बाद की कार्यवाही में अधिकारियों ने इन्हें जानबूझकर छिपा लिया।
  • शिकायत लगभग एक दशक की सेवा के बाद की गई और इसे बासी (stale) मानी जानी चाहिए।
  • उन्होंने विश्वविद्यालय के निर्देश पर अपने स्थायी सरकारी पद से विधिपूर्वक त्यागपत्र देकर अपनी स्थिति बदल ली थी, जिससे प्रॉमिसरी एसटॉपल और वैध अपेक्षा के सशक्त सिद्धांत लागू होते हैं।
  • पदों की समकक्षता तय करने और उनकी सेवा समाप्त करने का अधिकार कुलाधिपति के पास नहीं था; ये विषय विशेषज्ञ समितियों और विश्वविद्यालय के विधानों के क्षेत्राधिकार में आते हैं।
  • आदेश को 26.09.2023 की पूर्व दिनांक दी गई, जबकि उसे 06.01.2024 को ही संप्रेषित किया गया; और 03.10.2023 की उनकी लिखित दलीलों से स्पष्ट है कि 26.09.2023 तक मामला निर्णीत नहीं हुआ था, जिससे सर्वोच्च न्यायालय के Anil Rai v. State of Bihar के समयबद्ध निर्णय संबंधी निर्देशों का उल्लंघन हुआ।

कुलाधिपति पक्ष का तर्क था कि याचिकाकर्ता विज्ञापित अनुभव मापदंडों को पूरा नहीं करती थीं: उनके पास सहायक प्राध्यापक के रूप में अनुभव नहीं था, न ही किसी शोध संस्थान या उच्च शिक्षा संस्थान में अनुभव, और न ही सहायक कुलसचिव के रूप में पाँच वर्ष का अनुभव। उनका कहना था कि CDPO का कार्य बाल विकास और आंगनबाड़ी पर्यवेक्षण से संबंधित है, जो उच्च शिक्षा प्रशासन के समकक्ष नहीं हो सकता, और विश्वविद्यालय की बाद की रिपोर्ट ने सही रूप से उन्हें अपात्र पाया। उन्होंने महालेखा परीक्षक (लेखा परीक्षा) की एक निरीक्षण रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिससे यह संकेत मिले कि पूर्व की लेखा परीक्षा ने विश्वविद्यालय के औचित्य को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था।

वहीं विश्वविद्यालय (कुलपति और कुलसचिव) ने अपने हलफनामे में मूल चयन प्रक्रिया को सही ठहराया। बारह अभ्यर्थी AKU विधान, 2011 की धारा 22(b) एवं 22(b)(iii) के तहत गठित चयन समिति के समक्ष पेश हुए। याचिकाकर्ता को शैक्षणिक अभिलेख, अनुभव और साक्षात्कार के आधार पर प्रथम स्थान मिला। कार्यकारी परिषद ने 03.10.2013 को संस्तुति अनुमोदित की और 08.10.2013 को नियुक्ति पत्र जारी हुआ। वेतन निर्धारण के संबंध में विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि केवल पूर्व राज्य स्वीकृति के अभाव का मुद्दा था, जो बाद में प्राप्त हो गई; याचिकाकर्ता के वेतन के विरुद्ध कोई विशिष्ट आपत्ति कायम नहीं रही।

न्यायालय ने वैधानिक ढांचे का सूक्ष्म परीक्षण किया। बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 2(am) “अन्य समकक्ष पद” को ऐसे किसी भी पद के रूप में परिभाषित करती है, जिसका वेतनमान समकक्ष हो या राज्य सरकार द्वारा समकक्ष घोषित किया जा सके। वेतनमानों की तुलना करते हुए न्यायालय ने पाया कि CDPO का अवसंशोधित वेतनमान रु. 6500–10500 था, जो बाद में PB‑2 में रु. 4800 ग्रेड पे और फिर ACP के तहत रु. 5400 ग्रेड पे हो गया, जबकि सहायक कुलसचिव का अवसंशोधित वेतनमान रु. 5500–9000 था, जो बाद में PB‑2 में रु. 4200 ग्रेड पे हुआ। इस प्रकार, संशोधन के पश्चात भी CDPO पद का वेतनमान अधिक था। इससे अनुभव के उद्देश्य से CDPO पद को समकक्ष या श्रेष्ठ मानने का औचित्य मिला।

न्यायालय ने विज्ञापन की सामान्य शर्तों के खंड 8(i) का भी परीक्षण किया, जो चयन समिति की संस्तुति पर न्यूनतम योग्यता और/या अनुभव में शिथिलता की विश्वविद्यालय को स्पष्ट अनुमति देता था। चयन समिति AKU विधान के अनुसार विधिवत गठित थी; उसके गठन की वैधता या दुर्भावना का कोई आरोप नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय के Dalpat Abasaheb Solunke, M.V. Thimmaiah और Commissioner of Police v. Raj Kumar सहित पटना उच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने पुनः दोहराया कि किसी भी अवैधता, दुर्भावना या प्रक्रियागत अनियमितता के अभाव में न्यायालयों या बाहरी प्राधिकारों के लिए विशेषज्ञ चयन समितियों के निर्णयों पर अपील की भाँति बैठना या तुलनात्मक योग्यता का पुनर्मूल्यांकन करना अनुमन्य नहीं है।

न्यायाधीश ने पाया कि इस मामले में चयन समिति को औपचारिक रूप से योग्यता में शिथिलता देने की आवश्यकता भी नहीं थी, क्योंकि उच्चतर वेतनमान और व्यापक प्रशासनिक दायित्वों वाला CDPO पद “समकक्ष पद” की शर्त पूरी करता था। मान भी लें कि नियुक्ति के समय किसी प्रकार का संदेह था, तो उप कुलसचिव के रूप में उनके लगभग दस वर्ष के वास्तविक सेवा अनुभव ने समय के प्रवाह से किसी कथित कमी को दूर कर दिया, जिससे Buddhi Nath Chaudhary और Vivek Kaisth जैसे सर्वोच्च न्यायालय के मामलों में प्रतिपादित न्यायसंगत विचारों को और बल मिला।

विलंब और तथ्य छिपाए जाने के विषय में न्यायालय ने माना कि लगभग एक दशक बाद, जबकि 2017 और 2018 की पूर्व जांचें उनके पक्ष में थीं, उनकी नियुक्ति को चुनौती देना दुर्भावनापूर्ण था। न्यायालय ने देखा कि संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर पूर्व की लेखा परीक्षा और कुलाधिपति स्तर की अनुकूल रिपोर्टें छिपाई, जिससे कुलाधिपति भ्रमित हुए और त्रुटिपूर्ण आदेश पारित कर बैठे। इस बात को, लम्बे विलंब के साथ मिलाकर, न्यायालय ने इक्विटी के सिद्धांतों के आधार पर दखल देने हेतु पर्याप्त माना।

पूर्व दिनांकित आदेश के आरोपों पर भी न्यायालय ने विस्तार से विचार किया। राजभवन के अभिलेखों से पता चला कि मामले की सुनवाई विभिन्न तिथियों पर हुई और 26.09.2023 को आदेश सुरक्षित रखा गया। याचिकाकर्ता की लिखित दलीलें 03.10.2023 को दाखिल हुईं, फिर भी आदेश पर 26.09.2023 की तिथि अंकित थी और उसे 06.01.2024 को ही संप्रेषित किया गया। जब इस पर प्रश्न उठे, तो राज्यपाल सचिवालय के विशेष कार्य पदाधिकारी (न्यायिक) और विशेष कार्य पदाधिकारी (विश्वविद्यालय) कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके और केवल मौखिक क्षमा याचना की। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आदेश को सर्वोच्च न्यायालय के Anil Rai के बाध्यकारी निर्देशों के उल्लंघन से बचने के लिए पूर्व दिनांकित किया गया था, जिसमें सुरक्षित रखे गए निर्णयों को उचित समय के भीतर सुनाए जाने की अनिवार्यता बताई गई है।

न्यायालय ने इस मामले में राज्यपाल सचिवालय की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की। उसने माना कि विशेष कार्य पदाधिकारी (न्यायिक) और (विश्वविद्यालय) ने कुलाधिपति के समक्ष सही तथ्य, विधिक प्रावधान और प्रासंगिक नज़ीरें प्रस्तुत करने के दायित्व का निर्वहन नहीं किया, महत्वपूर्ण सामग्री को छिपाया और इस प्रकार कुलाधिपति से अवैध आदेश पारित करवा दिया। न्यायालय ने उन्हें अपने पदों के लिए अनुपयुक्त पाया और उन्हें उपयुक्त प्रशिक्षण पर भेजने का निर्देश दिया। साथ ही, निर्देश दिया कि निर्णय की प्रति विशेष कार्य पदाधिकारी (न्यायिक) के संबंध में माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के समक्ष और विशेष कार्य पदाधिकारी (विश्वविद्यालय) के संबंध में माननीय कुलाधिपति के समक्ष, राज्यपाल के प्रधान सचिव के माध्यम से, उपयुक्त कार्रवाई हेतु रखी जाए।

अंततः न्यायालय ने माना कि 26.09.2023 का कुलाधिपति आदेश और 06.01.2024 की विश्वविद्यालय की सेवा समाप्ति अधिसूचना अवैध, मनमानी, विधि की दृष्टि में अस्तित्वहीन (non-est) और संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन करने वाली हैं। रिट याचिका स्वीकार की गई, दोनों विवादित आदेश रद्द कर दिए गए और प्रतिवादियों को याचिकाकर्ता को समस्त परवर्ती लाभों सहित तत्काल पुनर्नियुक्त करने का निर्देश दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार ही नहीं, बल्कि अन्यत्र के सरकारी कर्मचारियों और विश्वविद्यालय अधिकारियों के लिए व्यावहारिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पहला, यह स्पष्ट करता है कि विधिवत गठित विशेषज्ञ निकायों द्वारा की गई चयन प्रक्रिया से हुई और दीर्घकालिक संतोषजनक सेवा के बाद स्थिर हो चुकी नियुक्तियों को हल्के में, एक दशक बाद, नहीं खोला जा सकता। विलंबित शिकायतें और बासी विवाद संदेह की दृष्टि से देखे जाएंगे, विशेषकर तब, जब पूर्ववर्ती जांचों ने कर्मचारी को दोषमुक्त कर दिया हो।

दूसरा, पटना उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि “समकक्ष पद” में अनुभव केवल विश्वविद्यालयीय पदनामों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मूल्यांकन वेतनमान, दायित्वों और वैधानिक परिभाषाओं जैसे वस्तुनिष्ठ मानदंडों से किया जाना चाहिए। सरकारी सेवाओं से विश्वविद्यालयों में आने वाले अधिकारियों के लिए, जब उनका वेतनमान और दर्जा विज्ञापित पद से उच्च हो, तो यह उन्हें अधिक स्पष्ट सुरक्षा प्रदान करता है।

तीसरा, यह निर्णय पुनः रेखांकित करता है कि विधानों के अंतर्गत विधिवत गठित चयन समितियाँ पात्रता और योग्यता के मूल्यांकन में प्रधान भूमिका रखती हैं। बाहरी प्राधिकार, जिनमें कुलाधिपति भी शामिल हैं, किसी स्पष्ट अवैधता, दुर्भावना या वैधानिक उल्लंघन के बिना उनके निर्णयों को सहजता से उलट नहीं सकते।

चौथा, यह सेवा विवादों में प्रॉमिसरी एसटॉपल और वैध अपेक्षा के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है। जहाँ कोई संस्था किसी कर्मचारी की पुष्टि कर देती है और उसे स्थायी सरकारी पद से त्यागपत्र देने को बाध्य करती है, वह बाद में उसी नियुक्ति के आधार को बिना ठोस विधिक औचित्य के नकार नहीं सकती।

अंततः, यह निर्णय राज्यपाल सचिवालय और सभी अर्ध-न्यायिक प्राधिकारों को कठोर संदेश देता है: आदेशों को पूर्व दिनांकित करना और महत्वपूर्ण अभिलेखों को छिपाना गंभीर चूक है। कुलाधिपति की सहायता करने वाले अधिकारियों को सत्यनिष्ठा और दक्षता के साथ कार्य करना होगा, अन्यथा उन्हें परिणाम और सुधारात्मक कदमों का सामना करना पड़ेगा। जिन कर्मचारियों की नियुक्तियों को लम्बे समय बाद चुनौती दी जा रही है, उनके लिए पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय एक स्पष्ट उदाहरण और भरोसे का आधार प्रदान करता है।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता की पूर्व सेवा CDPO के रूप में 2011 के विज्ञापन के तहत उप कुलसचिव पद के लिए पात्रता हेतु सहायक कुलसचिव के “समकक्ष पद” पर अनुभव मानी जा सकती थी?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम की “समकक्ष पद” की परिभाषा के अंतर्गत CDPO पद का वेतनमान सहायक कुलसचिव से अधिक था और उनका प्रशासनिक अनुभव विज्ञापित शर्तों को पूरा करता था।
  • प्रश्न: क्या कुलाधिपति और विश्वविद्यालय लगभग 10 वर्ष बाद प्रारंभिक अनुभव के अभाव के आधार पर याचिकाकर्ता की नियुक्ति रद्द कर और सेवा समाप्त कर सकते थे?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने नियुक्ति रद्द करने और सेवा समाप्ति के आदेशों को अवैध, मनमाना, विधि की दृष्टि में अस्तित्वहीन, विलंब, तथ्य छिपाए जाने और चयन समिति के निर्णयों में अनुचित हस्तक्षेप से दूषित तथा अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करने वाला ठहराया।
  • प्रश्न: क्या कुलाधिपति के आदेश के कथित पूर्व दिनांकन और राज्यपाल सचिवालय के अधिकारियों के आचरण पर न्यायालयीय भर्त्सना और निर्देश अपेक्षित थे?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने पाया कि सर्वोच्च न्यायालय के Anil Rai में दिए गए निर्देशों से बचने के लिए आदेश को पूर्व दिनांकित किया गया और विशेष कार्य पदाधिकारियों ने कुलाधिपति को गुमराह किया। न्यायालय ने उनके प्रशिक्षण का निर्देश दिया और मामले को माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एवं माननीय कुलाधिपति के समक्ष उपयुक्त कार्रवाई हेतु प्रेषित किया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Anil Rai v. State of Bihar, 2001 (7) SCC 318
  • Maitreyee Chakraborty v. Tripura University and Others, (2024) INSC 616
  • Ram Pravesh Singh v. State of Bihar, (2006) 8 SCC 381 (referred through Maitreyee Chakraborty)
  • Sivanandan C.T. v. High Court of Kerala, (2024) 3 SCC 799
  • Dalpat Abasaheb Solunke and Others v. Dr. B.S. Mahajan and Others, (1990) 1 SCC 305
  • M.V. Thimmaiah and Others v. UPSC and Others, (2008) 2 SCC 119
  • Commissioner of Police v. Raj Kumar, (2021) 8 SCC 347
  • B.C. Mylarappa @ Dr. Chikkamylarappa v. Dr. R. Venkatasubbaiah and Others, (2008) 14 SCC 306
  • Basavaiah (Dr.) v. Dr. H.L. Ramesh and Others, (2010) 8 SCC 372
  • Dr. Triloki Nath Singh v. Dr. Bhagwan Din Misra and Others, (1990) 4 SCC 510
  • G.N. Nayak v. Goa University and Others, (2002) 2 SCC 712
  • Tariq Islam v. Aligarh Muslim University and Others, (2001) 8 SCC 546
  • Buddhi Nath Chaudhary and Others v. Abahi Kumar and Others, (2001) 3 SCC 328
  • Vivek Kaisth and Another v. State of Himachal Pradesh and Others, (2024) 2 SCC 269
  • Manoranjan Priyadarshi v. The Vice Chancellor, Aryabhatta Knowledge University, CWJC No. 4503 of 2015 (Patna High Court)
  • Dr. Raj Kishore Prasad v. The Patna University and Others, L.P.A. No. 1106 of 2011 (Patna High Court)

मामले का विवरण

मामला संख्या: सिविल रिट क्षेत्राधिकार मामला सं. 2965/2024

मामले का शीर्षक: Kumari Anjana v. The State of Bihar & Others

उद्धरण: 2025 (2) PLJR 359

न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण

निर्णय की तिथि: 05.03.2025

मामले का स्वरूप: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के उप कुलसचिव पद से नियुक्ति रद्द एवं सेवा समाप्ति को चुनौती देने वाली रिट याचिका।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: श्री आदित्य प्रकाश सहाय, अधि.; सुश्री अंकिता कुमारी, अधि.; श्री संजय सिन्हा, अधि.; श्री फ़ज़ले करीम, अधि.

राज्य की ओर से अधिवक्ता: श्री गवर्नमेंट प्लीडर (17)

कुलाधिपति की ओर से अधिवक्ता: माननीय डॉ. K.N. Singh, Sr. Adv.; श्री Rajiv Kumar Pandey, Adv.

आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से अधिवक्ता: श्री Nadim Seraj, Adv.; श्री Sanjiv Kumar, Adv.; श्री Bindyachal Rai, Adv.

निर्णय का लिंक: बाद में मैन्युअली जोड़ा जाएगा

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