मामले की पृष्ठभूमि
मुख्य मामला एक सिविल रिट था, जो एक परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स कंपनी द्वारा दायर किया गया था। यह कंपनी विभिन्न राज्यों के बीच सामान ले जाने के लिए ट्रक संचालित करती है। इस प्रकरण में, उसने Wiscof Cough Syrup का एक खेप ढोया था, जिसमें Codeine Phosphate सम्मिलित था।
यह खांसी की दवा M/s Windlas Biotech Pvt. Ltd., देहरादून द्वारा निर्मित थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस निर्माता के पास Drugs and Cosmetics Rules, 1945 के Rule 70 के अंतर्गत प्रिस्क्रिप्शन दवाओं, जिनमें Schedule H में सूचीबद्ध Codeine भी शामिल है, के निर्माण का वैध लाइसेंस था।
सामान Jharkhand के Ranchi स्थित M/s Maa Durga Enterprises से उठाया गया था। बताया गया कि यह कंसाइनर निर्माता का अधिकृत वितरक था और उसके पास Drugs and Cosmetics Rules, 1945 के तहत Form 20B और 21B में थोक दवा लाइसेंस थे। खेप Bihar के Madhepura स्थित दो लाइसेंसी फार्मेसियों — M/s Bimal Medical Agency और M/s Yash Enterprises — के लिए भेजी गई थी, जिन दोनों के बारे में कहा गया कि उनके पास वैध Form 20B और 21B लाइसेंस हैं।
जब ट्रक Madhepura पहुँचा, तो उसे रोका गया और खेप जब्त कर ली गई। Singheshwar P.S. Case No. 228 of 2020 दर्ज किया गया। प्राथमिकी में Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 की कई धाराएँ (धारा 8(c), 21(c), 22(c), 23, 24, 25, 27A और 29) तथा Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 की धारा 30(a) ट्रक चालक, कंसाइनर, कंसीनी तथा कंपनी के मालिक के विरुद्ध लगाई गईं।
अलग से, जब्ती की कार्यवाही शुरू की गई। Excise Confiscation Case No. 32 of 2021 में 06.09.2021 दिनांकित आदेश द्वारा, Madhepura के Additional Collector-cum-Additional District Magistrate ने ट्रक की जब्ती का आदेश दिया और उसके नीलामी की दिशा-निर्देश दिए।
सिविल रिट में, परिवहन कंपनी ने तीन मुख्य राहतें मांगीं: Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 की धारा 3 के अंतर्गत जारी राज्य सरकार की Notification No. 11 दिनांक 18.10.2016 को रद्द करना; 06.09.2021 दिनांकित जब्ती आदेश को रद्द करना; तथा ट्रक और जब्त की गई खांसी की दवा की खेप को मुक्त कराना।
इसके साथ ही, उसी पुलिस मामले से संबंधित एक आपराधिक रिट (Criminal Writ Jurisdiction Case No. 558 of 2021), जो Singheshwar P.S. Case No. 228 of 2020 से उत्पन्न हुआ था, भी सुना गया। दोनों मामलों की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एक साथ की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
सिविल रिट में मुख्य हमला Notification No. 11 दिनांक 18.10.2016 की वैधता और संवैधानिकता पर था। इस अधिसूचना द्वारा, Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 की धारा 3 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए बिहार राज्य ने Codeine और Dextropropoxyphene युक्त सभी दवाओं और औषधीय तैयारियों को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए “intoxicants” घोषित कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह अधिसूचना राज्य की विधायी क्षमता से परे है और Drugs and Cosmetics Act, 1940 तथा Drugs and Cosmetics Rules, 1945, विशेष रूप से 1940 अधिनियम की धाराएँ 26A और 26B तथा 1945 नियमों के Schedule H की Entry 132 तथा Rules 65, 75 और 97 से असंगत (repugnant) है। कहा गया कि केंद्रीय विधायन, NDPS Act के साथ मिलकर, मादक और मन:प्रभावी दवाओं, जिनमें Codeine भी शामिल है, के विनियमन के क्षेत्र को पूरी तरह घेर लेते हैं।
तथ्यों के स्तर पर, याचिकाकर्ता ने जोर दिया कि चिकित्सीय खुराक में Codeine को अवैध मादक पदार्थ नहीं माना जाता। केन्द्रीय सरकार ने NDPS Act की धारा 2(xi)(b) के तहत 14.11.1985 की S.O. No. 826(E) द्वारा Codeine (Methyl Morphine) और उसके लवणों, जिनमें Codeine Phosphate शामिल है, को, यदि प्रति डोज इकाई में 100 mg से अधिक न हो और अविभाजित तैयारियों में उसकी सांद्रता 2.5% से अधिक न हो, तथा जो चिकित्सीय प्रैक्टिस में स्थापित हों, “manufactured drugs” घोषित किया है।
याचिकाकर्ता ने इंगित किया कि Wiscof Cough Syrup में Codeine, केंद्र सरकार द्वारा अनुमति दी गई सीमा के भीतर था। न्यायालय ने विशेष रूप से नोट किया कि अभियोजन का यह मामला नहीं था कि उक्त खांसी की दवा में Codeine की मात्रा केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सीमा से अधिक थी, ताकि वह psychotropic substance बन जाए।
इस आधार पर, याचिकाकर्ता ने पहले ही प्राधिकारियों के समक्ष यह तर्क दिया था कि इस प्रकार की खांसी की दवा का परिवहन एक लाइसेंसी और वैध गतिविधि है और यह कि जब खांसी की दवा Drugs and Cosmetics Act और Rules के विनियामक ढांचे के भीतर ही निर्मित और परिवहन की जाती है, तब वह “intoxicant” या “psychotropic substance” नहीं होती।
वर्तमान रिट में, याचिकाकर्ता ने एक व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाया। उसने कहा कि समवर्ती सूची की Entry 19, जो “drugs and poisons” से संबंधित है, पहले ही केन्द्रीय कानूनों, अर्थात NDPS Act, 1985 और Drugs and Cosmetics Act, 1940 द्वारा विस्तार से आच्छादित है। 1940 अधिनियम की धाराएँ 18, 27, 26A और 26B तथा नियम, निर्माण, वितरण, बिक्री, भंडारण, परिवहन एवं निषेध या प्रतिबंध को कवर करते हैं, जिससे राज्य को राज्य सूची की Entry 8 के अंतर्गत पृथक रूप से कोई अवकाश नहीं बचता कि वह केंद्र से लाइसेंस प्राप्त दवाओं को निषेध के प्रयोजन से पुनः वर्गीकृत कर “intoxicants” घोषित कर सके।
इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि यह अधिसूचना स्वयं Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 से ही परे (ultra vires) है। धारा 2(40) “intoxicant” और धारा 2(41) “intoxicating drug” की परिभाषा देती हैं। धारा 2(41)(iv) के तहत राज्य अधिसूचना द्वारा किसी अन्य intoxicating या narcotic substance को “intoxicating drug” घोषित कर सकता है, परन्तु स्पष्ट रूप से “opium, coca leaf या NDPS Act, 1985 की धारा 2 में परिभाषित manufactured drug” को इससे बाहर रखता है। चूँकि केंद्र सरकार ने Codeine को “manufactured drug” के रूप में माना है, याचिकाकर्ता का तर्क था कि इसे intoxicating drug घोषित नहीं किया जा सकता या धारा 3 के माध्यम से intoxicant के रूप में नहीं लाया जा सकता।
याचिकाकर्ता ने अधिसूचना की कार्यसाध्यता (workability) पर भी हमला किया। Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 की धाराएँ 14, 15, 16 और 27 intoxicants की आवाजाही, वाहनों पर प्रतिबंध, intoxicants के परिवहन को विनियमित करने की शक्ति, तथा लाइसेंस, परमिट एवं पास के लिए शुल्क और शर्तों से संबंधित हैं। धारा 27, लाइसेंस और परमिट के स्वरूप, विवरण और शर्तों को नियमों द्वारा निर्धारित करने की अपेक्षा करती है।
तर्क दिया गया कि प्रासंगिक समय पर, अधिनियम की धारा 95 के तहत ऐसे कोई नियम बनाए ही नहीं गए थे, जो धारा 27 को प्रभावी बना सकें; परिणामतः, बिहार के भीतर इस प्रकार अधिसूचित intoxicants जैसे कोडीन-आधारित दवाओं के परिवहन के लिए कोई वैध परमिट या लाइसेंस प्रारूप अस्तित्व में ही नहीं था। पटना उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने CTI Infrastructure Private Limited v. State of Bihar, 2019 SCC OnLine Pat 710 में पहले ही यह माना था कि नियमों के अभाव में धारा 14 अव्यवहार्य (unworkable) है। अतः, याचिकाकर्ता के अनुसार, 2016 की अधिसूचना व्यावहारिक रूप से अनुपयोगी थी और केंद्रीय कानून के तहत अन्यथा लाइसेंस प्राप्त गतिविधि को विधिसम्मत रूप से अपराध नहीं बना सकती थी।
दूसरी ओर, राज्य ने, Advocate General के माध्यम से, 21.12.2015 को घोषित अपनी निषेध नीति तथा संविधान के अनुच्छेद 47 में निहित उस निर्देशात्मक सिद्धांत पर बल दिया, जो राज्य को मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के सेवन (चिकित्सीय प्रयोजनों को छोड़कर) पर निषेध लगाने का दायित्व देता है।
राज्य ने सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की Entry 8 पर भरोसा किया, जो “intoxicating liquors, अर्थात intoxicating liquors का उत्पादन, निर्माण, कब्जा, परिवहन, क्रय एवं विक्रय” को आच्छादित करती है। राज्य ने सर्वोच्च न्यायालय के नौ-न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय State of U.P. v. Lalta Prasad Vaish, 2024 SCC OnLine SC 3029 पर विशेष रूप से निर्भर करते हुए तर्क दिया कि Entry 8 को व्यापक और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या दी जानी चाहिए। Alcohol तथा intoxicants को res extra commercium माना गया है, जिसका अर्थ है कि राज्य जनहित में, विशेषतः स्वास्थ्य और नैतिकता के लिए, इनके उपयोग को कड़ाई से विनियमित या प्रतिबंधित कर सकता है।
राज्य का कहना था कि यह अधिसूचना केंद्रीय दवा कानूनों से टकराती नहीं है, क्योंकि इसका लक्ष्य कोडीन-आधारित और dextropropoxyphene-आधारित औषधीय उत्पादों का दुरुपयोग और गैर-चिकित्सीय दुरुपयोग रोकना है। इसने इंगित किया कि अधिसूचना स्वयं लाइसेंसी फार्मेसियों और पंजीकृत चिकित्सकों के लिए अपवाद रखती है तथा Bihar Prohibition and Excise Rules, 2021 (27.09.2021 को प्रकाशित) ने Rules 22 और 24(2) के माध्यम से विशेषतः उन औषधीय एवं औषधि-निर्माण तैयारियों के लिए, जो दुरुपयोग पर intoxicants के रूप में योग्य हो सकती हैं, एक संरचित लाइसेंसिंग व्यवस्था स्थापित कर दी है।
इसके बाद खंडपीठ ने विस्तृत संवैधानिक विश्लेषण किया। उसने Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 की धाराएँ 2(40) और 2(41) तथा धारा 3 का परीक्षण किया, जो राज्य सरकार को “alcohol के प्रतिस्थापन के रूप में उपयोग किए जा सकने वाले commodities या chemical ingredients को, निर्धारित शर्तों के साथ, intoxicants के रूप में अधिसूचित करने” का अधिकार देती है।
न्यायालय ने राज्य सूची की Entry 8 से संबंधित विधि के विकास की समीक्षा की, Synthetics and Chemicals Ltd. v. State of U.P., (1990) 1 SCC 109 से शुरू करते हुए, कई पश्चातवर्ती निर्णयों और अंततः नौ-न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय Lalta Prasad Vaish तक। न्यायालय ने नोट किया कि Synthetics में “intoxicating liquor” की जो संकीर्ण व्याख्या की गई थी, जिसके अनुसार राज्य की शक्ति मुख्यतः पेय योग्य (potable) alcohol तक सीमित मानी गई थी, उसे बाद में पलट दिया गया है।
Lalta Prasad Vaish के प्रमुख निष्कर्षों का उद्धरण और अनुप्रयोग करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि राज्य सूची की Entry 8 उद्योग-आधारित भी है और उत्पाद-आधारित भी, और यह intoxicating liquor और intoxicants के कच्चे माल से लेकर उपभोग तक के विनियमन को समाहित करती है। Alcohol और इसी प्रकार के पदार्थ स्वभावतः हानिकारक होते हैं और इनके दुरुपयोग से जन-स्वास्थ्य प्रभावित होता है। Entry 8 केवल potable alcohol तक सीमित नहीं है, बल्कि rectified spirit, ENA और denatured spirit जैसे पदार्थों तक भी फैली हुई है, जब वे नशा करने के लिए उपयोग में लाए जा सकते हैं।
न्यायालय ने Southern Pharmaceuticals and Chemical v. State of Kerala, (1981) 4 SCC 391 का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि यदि औषधीय तैयारियों में प्रयुक्त rectified spirit से बने उत्पाद नशा करने योग्य हों और दुरुपयोग की आशंका हो, तो राज्य Entry 8 के तहत उनके उपयोग को विनियमित कर सकता है। वहां निर्धारित कसौटी यह थी कि क्या संबंधित वस्तु को पेय के रूप में या किसी हानिकर (noxious) उद्देश्य के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है।
उक्त कसौटी को लागू करते हुए, खंडपीठ ने यह दर्ज किया कि “Codeine is capable of being used as an intoxicant. Therein lies the justification for the State to come out with the notification which has been impugned in the present petition.”
विरोधाभास (repugnancy) और “occupied field” के प्रश्न पर, न्यायालय ने “pith and substance” के सिद्धांत, “occupied field” के सिद्धांत, अनुच्छेद 246 तथा Hoechst Pharmaceuticals Ltd. v. State of Bihar, Committee for Protection of Democratic Rights, West Bengal और M. Karunanidhi जैसे प्रमुख निर्णयों की चर्चा की। न्यायालय ने बल देकर कहा कि अनुच्छेद 246 के तहत संसद की संघीय सर्वोच्चता तभी लागू होती है, जब संघ और राज्य प्रविष्टियों के बीच वास्तविक और असंगत संघर्ष हो।
खंडपीठ ने माना कि Drugs and Cosmetics Act, 1940 और NDPS Act, 1985 दवाओं के निर्माण, गुणवत्ता, लाइसेंसिंग और दुरुपयोग के लिए दंड को विनियमित करते हैं, लेकिन राज्य सूची की Entry 8 के अंतर्गत बिहार द्वारा जारी अधिसूचना का लक्ष्य एक पृथक क्षेत्र है: राज्य के भीतर कुछ औषधीय तैयारियों के intoxicants के रूप में दुरुपयोग को रोकना, जो अनुच्छेद 47 के अनुपालन में है। राज्य Codeine को एक drug के रूप में पुनः-लाइसेंस या पुनः-परिभाषित नहीं कर रहा, बल्कि कोडीन-आधारित औषधीय तैयारियों को निषेध एवं intoxicant दुरुपयोग नियंत्रण के उद्देश्य से “intoxicants” के रूप में मान रहा है।
अतः न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि कोई प्रत्यक्ष टकराव या repugnancy नहीं है। दोनों विधिक व्यवस्थाएँ — केन्द्रीय दवा विनियमन और राज्य का निषेध कानून — सह-अस्तित्व में रह सकती हैं। केन्द्रीय कानून ने पूरा क्षेत्र इस हद तक नहीं घेर लिया है कि राज्य की Entry 8 के तहत की गई कार्रवाई स्वतः ही समाप्त हो जाए।
कार्यसाध्यता वाले तर्क पर, न्यायालय ने स्वीकार किया कि जब Singheshwar P.S. Case No. 228 of 2020 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, तब Bihar Prohibition and Excise Rules, 2021 अभी प्रभाव में नहीं आए थे। न्यायालय ने यह भी देखा कि ऐसी परिस्थितियों में, जब आपराधिक न्यायालयों के समक्ष प्राथमिकी रद्द करने या आरोपों की जांच का प्रश्न आता है, तो उन्हें प्रासंगिक समय पर लागू नियमों के अभाव को इस बात के आकलन में शामिल करना होगा कि क्या वास्तव में कोई अपराध सिद्ध होता है या नहीं।
हालाँकि, यह बिंदु आपराधिक अभियोजन की मेरिट से संबंधित है, न कि स्वयं अधिसूचना की संवैधानिक वैधता से। इस सीमित प्रश्न पर, न्यायालय ने अधिसूचना को वैध माना।
अंततः, खंडपीठ ने यह निर्णय दिया कि:
(a) विवादित अधिसूचना, राज्य सूची की Entry 8 तथा Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 की धारा 3 के तहत प्रदत्त शक्ति का वैध उपयोग है और यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Lalta Prasad Vaish के अनुरूप है।
(b) इसका Drugs and Cosmetics Act, 1940 से कोई repugnancy नहीं है, क्योंकि राज्य की कार्रवाई का लक्ष्य कोडीन-आधारित दवाओं का दुरुपयोग एवं गैर-चिकित्सीय उपयोग रोकना है।
(c) अधिसूचना intoxicating substances के दुरुपयोग को रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत राज्य के दायित्व को आगे बढ़ाती है।
(d) intoxicants और intoxicating drugs, जब दुरुपयोग की जाती हैं, तो res extra commercium की श्रेणी में आती हैं, जिससे राज्य को उन पर कड़े नियंत्रण का अधिकार मिलता है।
ऐसा घोषित करने के बाद, न्यायालय ने सिविल रिट (C.W.J.C. No. 20522 of 2021) का निस्तारण कर दिया। संबद्ध आपराधिक रिट (Cr.W.J.C. No. 558 of 2021) को उन आपराधिक रिट याचिकाओं की सुनवाई करने वाले माननीय एकल न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया गया, ताकि एकल न्यायाधीश इस निर्णय तथा प्रासंगिक समय पर नियमों के अभाव को ध्यान में रखते हुए यह विचार कर सकें कि प्राथमिकी में लगाए गए अपराध वास्तव में सिद्ध होते हैं या नहीं और क्या FIR रद्द करने जैसी कोई राहत दी जानी चाहिए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में कार्यरत परिवहनकर्ताओं, औषधीय वितरकों और फार्मेसियों के लिए महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि केंद्रीय दवा कानूनों के तहत विधिसम्मत रूप से निर्मित और लाइसेंस प्राप्त दवाओं को भी, यदि वे नशा करने के लिए दुरुपयोग योग्य हों, तो राज्य “intoxicants” के रूप में मान सकता है।
पटना उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि बिहार, अपने निषेध कानून और राज्य सूची की Entry 8 के तहत, कोडीन-आधारित खांसी की दवाओं और इसी प्रकार की औषधीय तैयारियों की आवाजाही और कब्जे पर शर्तें, परमिट और नियंत्रण लागू कर सकता है। केवल यह तथ्य कि कोई दवा केंद्रीय मानकों के अनुरूप है, उसे राज्य के निषेध नियंत्रण के दायरे में लाए जाने से स्वतः नहीं बचाता।
साथ ही, न्यायालय ने यह संकेत भी दिया है कि आपराधिक न्यायालयों को हर मामले में सावधानीपूर्वक यह परखना होगा कि प्रासंगिक समय पर आवश्यक नियम और लाइसेंस प्रारूप अस्तित्व में थे या नहीं। यदि नियमों का अभाव था, तो इससे किसी विशेष FIR की वैधता पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे प्रभावित व्यक्ति को, समग्र अधिसूचना के बरकरार रहने के बावजूद, व्यक्तिगत अभियोजन को चुनौती देने का मार्ग मिलता है।
सामान्य पाठकों के लिए सीधा संदेश यह है: बिहार में कोडीन-आधारित खांसी की दवा का परिवहन या कब्जा अब केवल एक सामान्य वाणिज्यिक गतिविधि नहीं रह गई है। यह अब राज्य के निषेध कानून के तहत “intoxicant” की श्रेणी में आता है। ऐसे उत्पादों से संबंधित व्यक्ति को Bihar Prohibition and Excise Rules, 2021 और उसके बाद की किसी भी परिपत्र के तहत निर्धारित परमिट या लाइसेंस प्रणाली का कठोरता से पालन करना होगा, अन्यथा उन्हें गंभीर आपराधिक आरोपों और जब्ती के जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या बिहार राज्य, अपने निषेध कानून और राज्य सूची की Entry 8 के तहत, NDPS Act और Drugs and Cosmetics Act के अंतर्गत Codeine के केन्द्रीय विनियमन के बावजूद, Codeine युक्त सभी दवाओं और औषधीय तैयारियों को “intoxicants” घोषित कर सकता है?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि Lalta Prasad Vaish और Southern Pharmaceuticals में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार राज्य सूची की Entry 8 राज्य को उन पदार्थों, जिनमें औषधीय तैयारियाँ भी शामिल हैं, को विनियमित और निषिद्ध करने का अधिकार देती है, जो intoxicants के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं। बिहार की अधिसूचना इस शक्ति का वैध उपयोग है और यह केन्द्रीय कानूनों से असंगत नहीं है। - प्रश्न: क्या Notification No. 11 दिनांक 18.10.2016 Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 से, विशेषकर धाराएँ 2(40), 2(41) और 3 तथा intoxicating drugs की परिभाषा से “manufactured drugs” को बाहर रखने के आलोक में, परे (ultra vires) है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि राज्य धारा 3 को, धारा 2(40) में intoxicants की व्यापक परिभाषा और संवैधानिक ढांचे के साथ पढ़ते हुए, कोडीन-आधारित औषधीय तैयारियों को intoxicants मान सकता है। यह तथ्य कि Codeine NDPS Act के तहत एक “manufactured drug” है, राज्य को उसकी औषधीय तैयारियों को निषेध और दुरुपयोग नियंत्रण के सीमित उद्देश्य से intoxicants घोषित करने से नहीं रोकता। - प्रश्न: क्या Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 के तहत नियमों के अभाव में, प्राथमिकी दर्ज किए जाने के समय, अधिसूचना या उसके आधार पर की जा रही अभियोजन स्वतः ही अवैध हो जाते हैं?
उत्तर: नहीं, नियमों का अभाव स्वयं अधिसूचना को अवैध नहीं बनाता। परन्तु आपराधिक न्यायालयों को, व्यक्तिगत प्रकरणों पर विचार करते समय, जिनमें FIR रद्द करने की याचिकाएँ भी शामिल हैं, यह देखना होगा कि, निर्धारित परमिट और प्रक्रिया के अभाव में, प्राथमिकी दर्ज किए जाने के समय कथित अपराध वस्तुतः सिद्ध होते थे या नहीं।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- State of U.P. v. Lalta Prasad Vaish, 2024 SCC OnLine SC 3029 (नौ-न्यायाधीशों की पीठ)
- Synthetics and Chemicals Ltd. v. State of U.P., (1990) 1 SCC 109 (जिसके प्रमुख पहलुओं को Lalta Prasad Vaish द्वारा पलटा गया)
- Shri Bileshwar Khand Udyog Khedut Sahakari Mandali Ltd. v. State of Gujarat, (1992) 2 SCC 42
- State of A.P. v. McDowell & Co., (1996) 3 SCC 709
- Vam Organic Chemicals Ltd. v. State of U.P., (1997) 2 SCC 715
- Bihar Distillery v. Union of India, (1997) 2 SCC 727
- Government of Haryana v. Haryana Brewery Ltd., (1997) 5 SCC 758
- State of Bombay v. R.M.D. Chamarbaugwala, 1957 AIR 699
- Khoday Distilleries Ltd. v. State of Karnataka, (1996) 10 SCC 304
- Southern Pharmaceuticals and Chemical v. State of Kerala, (1981) 4 SCC 391
- Tika Ramji & Others v. State of Uttar Pradesh & Others, 1956 AIR 676
- Deep Chand v. State of U.P., 1959 AIR 648
- M. Karunanidhi v. Union of India, 1979 AIR 898
- Zameer Ahmed Latifur Rehman Sheikh v. State of Maharashtra & Others, AIR 2010 SC 2633
- Hoechst Pharmaceuticals Ltd. & Others v. State of Bihar & Others, (1983) 4 SCC 45
- State of West Bengal & Others v. Committee for Protection of Democratic Rights, West Bengal & Others, (2010) 3 SCC 571
- CTI Infrastructure Private Limited v. State of Bihar, 2019 SCC OnLine Pat 710
मामले के विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 20522 of 2021; with Criminal Writ Jurisdiction Case No. 558 of 2021 (arising out of Singheshwar P.S. Case No. 228 of 2020, District Madhepura)
मामले का शीर्षक: Om Logistics Limited v. The State of Bihar & Others; with Sooryamani Prasad Pandey @ Sooryamani Pandey @ Suryamani Pandey v. The State of Bihar & Others
कोरम: माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश Ashutosh Kumar तथा माननीय श्री न्यायाधीश Partha Sarthy
उद्धरण: 2025(3) PLJR 187
वकील:
Civil Writ Jurisdiction Case No. 20522 of 2021 में:
- याचिकाकर्ता (परिवहन कंपनी) की ओर से: Mr. Jitendra Kumar Singh, Senior Advocate; Mr. Harsh Singh, Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. P.K. Shahi, Advocate General; Mrs. Shama Sinha, AC to SC 5
- प्रतिवादीगण (अन्य राज्य पदाधिकारियों) की ओर से: Mr. Nadim Seraj, G.P. 5; Mr. Asif Iqbal Niazi, AC to G.P. 5; Mr. Kumar Manish (SC 5)
Criminal Writ Jurisdiction Case No. 558 of 2021 में:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Harsh Singh, Advocate
- प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: Mr. Md. Nadim Seraj, G.P. 5
मामले का स्वरूप: Bihar Prohibition and Excise Act, 2016 के तहत जारी राज्य अधिसूचना और उससे उत्पन्न जब्ती आदेश की वैधता को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका, जिसे NDPS और निषेध अधिनियम के अंतर्गत दर्ज FIR से उत्पन्न एक संबद्ध आपराधिक रिट के साथ सुना गया।
निर्णय की तिथि: 16.05.2025 (CAV judgment; CAV date 23.04.2025)
परिणाम: सिविल रिट (C.W.J.C. No. 20522 of 2021) का निस्तारण, Notification No. 11 दिनांक 18.10.2016 की वैधता और संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए; संबद्ध आपराधिक रिट (Cr.W.J.C. No. 558 of 2021) को आपराधिक मामले की मेरिट पर विचार हेतु एकल न्यायाधीश के पास भेजा गया।
Link to judgement; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMjA1MjIjMjAyMSMxI04=-z0QIeA54PwA=
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने में रुचि रखते हों कि बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, तो आप Samvida Law Associates को आगे की जानकारी के लिए फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।



Bahut achaj ankari milta hai