सीटेट अंकों के आधार पर शिक्षक की सेवा समाप्ति निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2025

यह मामला बिहार में एक सरकारी विद्यालय की शिक्षिका की नियुक्ति रद्द किए जाने को चुनौती से संबंधित था, जिसे सीटेट में 60% से कम अंक होने और अन्य राज्य की निवासी होने के कारण अयोग्य ठहराया गया था। पटना उच्च न्यायालय ने नोटिस कारण बताओ एवं सेवा समाप्ति, दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। न्यायालय ने माना कि प्राधिकारियों ने सक्षम अनुशासनिक नियमों का पालन किए बिना और बिना क्षेत्राधिकार के कार्य किया। राज्य सरकार को विधि के अनुसार सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्त्री उत्तर प्रदेश की निवासी हैं और बिहार के पूर्वी चंपारण जिला स्थित एक सरकारी मध्य विद्यालय में कक्षा 6 से 8 के लिए गणित एवं विज्ञान की शिक्षिका (TRE-2) के रूप में कार्यरत थीं। उनकी नियुक्ति बिहार राज्य विद्यालय शिक्षक (नियुक्ति, स्थानांतरण, अनुशासनिक कार्यवाही एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 2023 के अंतर्गत विद्यालय शिक्षकों के लिए जारी विज्ञापन सं. 27/2023 दिनांक 04.11.2023 के अनुपालन में हुई थी।

यह निर्विवाद है कि उन्होंने संबंधित पात्रता परीक्षाएं उत्तीर्ण की थीं और उन्हें कक्षा 6 से 8 के लिए शिक्षण हेतु एक अस्थायी नियुक्ति स्मरण–पत्र (मेमो सं. 8440001 दिनांक 23.01.2024) जारी किया गया था। उन्होंने पदभार ग्रहण किया और कार्य जारी रखा, तथा 16.02.2024 से 2025 के प्रारंभ तक उन्हें नियमित रूप से वेतन प्राप्त होता रहा।

बाद में, अन्य पक्षकारों द्वारा दायर एक पृथक रिट याचिका (CWJC सं. 3270/2024) में, पटना उच्च न्यायालय ने 01.04.2024 को माध्यमिक शिक्षा निदेशक को एक अभ्यावेदन का निस्तारण करने का निर्देश दिया। अनुपालन में, निदेशक ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को संबोधित मेमो सं. 1341 दिनांक 15.05.2024 जारी किया, जिसमें कहा गया कि बिहार के बाहर के अभ्यर्थियों को सीटेट अंकों में कोई छूट नहीं मिलेगी। ऐसे बाह्य–राज्य महिला अभ्यर्थियों के लिए सीटेट/स्टेट में 60% अंक न्यूनतम पात्रता के रूप में निर्धारित किए गए।

इस मेमो तथा बाद की विभागीय संचार–पत्र (पत्र सं. 1928 दिनांक 04.11.2024) पर भरोसा करते हुए, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना), पूर्वी चंपारण ने याचिकाकर्त्री को मेमो सं. 547 दिनांक 31.01.2025 के माध्यम से नोटिस कारण बताओ जारी किया। उन्हें बताया गया कि बाह्य–राज्य की महिला अभ्यर्थी होने और 60% से कम सीटेट अंक होने के कारण वे अयोग्य हैं और उनकी नियुक्ति रद्द किए जाने योग्य है।

जबकि उनकी रिट याचिका (CWJC सं. 3887/2025), जिसमें मेमो सं. 1341 और नोटिस कारण बताओ को चुनौती दी गई थी, लंबित थी, जिला शिक्षा पदाधिकारी तथा जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना), मोतिहारी ने संयुक्त रूप से मेमो सं. 661 दिनांक 07.02.2025 पारित किया। इस आदेश द्वारा आठ विद्यालय शिक्षकों की सेवाएं, जिनमें याचिकाकर्त्री (क्रम सं. 8 पर नामित) भी शामिल थीं, तत्काल प्रभाव से बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (सीसीए नियम, 2005) के अंतर्गत कथित रूप से समाप्त कर दी गईं।

इसके पश्चात, याचिकाकर्त्री ने अंतरिम प्रार्थना पत्र सं. 1/2025 दायर किया, जिसमें सेवा समाप्ति मेमो को चुनौती जोड़ने तथा पुनर्नियोजन एवं परवर्ती लाभों की मांग करने की अनुमति मांगी गई। न्यायालय ने अंतरिम प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर उन राहतों को मुख्य रिट याचिका का हिस्सा मान लिया।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने पहले याचिका में मांगी गई राहतों पर ध्यान दिया। याचिकाकर्त्री ने निम्न की निरस्तीकरण की मांग की थी:

  • माध्यमिक शिक्षा निदेशक का पत्र सं. 1341 दिनांक 15.05.2024, जिसके द्वारा बाह्य–राज्य महिलाओं और दिव्यांग अभ्यर्थियों को सीटेट में आरक्षण/छूट से वंचित किया गया, तथा
  • नोटिस कारण बताओ मेमो सं. 547 दिनांक 31.01.2025, और बाद में,
  • सेवा समाप्ति मेमो सं. 661 दिनांक 07.02.2025, जो जिला शिक्षा पदाधिकारी एवं जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) द्वारा जारी किया गया था।

उन्होंने यह भी प्रार्थना की थी कि उनके कार्य में किसी प्रकार की बाधा न डाली जाए तथा उनके स्थान पर किसी अन्य की नियुक्ति न की जाए।

तथ्यों के स्तर पर, निम्न बातों पर विवाद नहीं था:

  • याचिकाकर्त्री उत्तर प्रदेश की निवासी हैं।
  • उन्हें विज्ञापन सं. 27/2023 के अंतर्गत कक्षा 6 से 8 (गणित एवं विज्ञान) की शिक्षिका के रूप में नियुक्त किया गया था।
  • नियुक्ति को “अस्थायी” (provisional) कहा गया था, परंतु उन्होंने ज्वाइन कर लिया था, पढ़ा रही थीं और लगभग एक वर्ष तक वेतन प्राप्त कर रही थीं।

विज्ञापन तथा पत्र सं. 582 दिनांक 17.06.2023 में उल्लेखित पात्रता शर्तें अभिलेख पर ली गईं। सीटेट अभ्यर्थियों के लिए विभाग ने पूर्व में न्यूनतम उत्तीर्णांक निर्धारित किए थे:

  • सामान्य वर्ग के लिए 60%,
  • अति पिछड़ा/पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए 55%, और
  • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति एवं दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए 50%।

याचिकाकर्त्री का तर्क था कि विज्ञापन तथा प्राथमिक शिक्षा निदेशक के पूर्व स्पष्टीकरण पत्र सं. 666 दिनांक 13.07.2021 के अनुसार, बिहार या अन्य राज्यों की महिला अभ्यर्थियों को समान वर्ग में रखा जाना था तथा महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण को निवास–राज्य के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि उन्होंने सभी तथ्यों का खुलासा किया था और उस समय निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी की थीं, और नियुक्ति के पश्चात उनकी सेवा केवल नियम, 2023 तथा सीसीए नियम, 2005 के अधीन ही विनियमित की जा सकती थी।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब कोई व्यक्ति प्रचलित मानदंडों के आधार पर नियुक्त हो चुका हो, तो प्राधिकरण बाद के परिपत्र के द्वारा पात्रता में परिवर्तन कर उसे प्रतिगामी रूप से लागू कर सेवा समाप्त नहीं कर सकते। इस संदर्भ में उन्होंने उच्चतम न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें शामिल हैं:

  • Kailash Chand Sharma v. State of Rajasthan (2002) 6 SCC 562,
  • Dr. Tanvi Behl v. Shrey Goel & Ors. (Civil Appeal No.9289 of 2019), तथा
  • Dr. Pradeep Jain v. Union of India (1984) 3 SCC 654।

राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्त्री को अन्य राज्य की सामान्य वर्ग की महिला अभ्यर्थी के रूप में माना गया। निदेशक के स्पष्टीकरण मेमो सं. 1341 दिनांक 15.05.2024, को पत्र सं. 582 दिनांक 17.06.2023 एवं विनियम सं. 3, 1992 के साथ पढ़ने पर यह आवश्यक था कि बाह्य–राज्य महिला अभ्यर्थी को न्यूनतम 60% सीटेट अंक प्राप्त करने हों। याचिकाकर्त्री के 86 अंक थे, जबकि न्यूनतम 90 अंक अपेक्षित थे (जो 60% से कम है)। अत: राज्य के अनुसार वे कभी भी पात्र नहीं थीं और उनकी सेवा समाप्ति न्यायोचित थी।

इसके बाद न्यायालय ने संवैधानिक ढांचे की ओर रुख किया। उसने भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 पर विचार किया। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, वंश, लिंग अथवा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है, परंतु अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत महिलाओं एवं बच्चों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है। अनुच्छेद 16 विशेष रूप से लोक सेवाओं में नियुक्ति से संबंधित है और जन्मस्थान, निवास आदि के आधार पर भेदभाव पर निषेध लगाता है, सिवाय उन परिस्थितियों के जहाँ संसद, अनुच्छेद 16(3) के तहत विधि बनाए।

न्यायालय ने निम्न निर्णयों का संदर्भ दिया:

  • Dr. Tanvi Behl v. Shrey Goel & Ors.,
  • Pradeep Jain v. Union of India (1984) 3 SCC 654,
  • Indra Sawhney v. Union of India (1992 Supp (3) SCC 217),
  • Government of A.P. v. P.B. Vijayakumar (1995) 4 SCC 520,
  • State of U.P. v. Pradip Tandon (1975) 1 SCC 267,
  • Kailash Chand Sharma v. State of Rajasthan (2002) 6 SCC 562, तथा
  • पटना उच्च न्यायालय के खंडपीठ के निर्णय, जैसे Khichri Ram v. State of Bihar तथा Karnika Shekhar v. State of Bihar (CWJC No.22609 of 2019, निर्णय दिनांक 26.02.2024)।

इनसे न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण भेद रेखांकित किया: निवास–आधारित आरक्षण को शिक्षा के क्षेत्र में (विशेषकर एम.बी.बी.एस. स्तर पर) Pradeep Jain और Tanvi Behl के अनुसार सीमित हद तक स्वीकार किया गया है, परंतु लोक सेवाओं में नियुक्ति हेतु अनुच्छेद 16, निवास–आधारित भेदभाव पर कठोर अंकुश लगाता है। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि रोजगार में ऐसे किसी भी शर्त को अनुच्छेद 14 और 16 की कसौटी पर खरा उतरना होगा और सामान्यत: इसके लिए अनुच्छेद 16(3) के अंतर्गत संसदीय कानून की आवश्यकता होती है।

हालाँकि, माननीय न्यायाधीश ने यह स्पष्ट किया कि वे बिहार की नौकरियों में समग्र आरक्षण व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर प्रत्यक्ष निर्णय नहीं दे रहे हैं। संकल्प सं. 963 दिनांक 20.01.2016 तथा बिहार आरक्षण अधिनियम में धारा 4 के संशोधन (संशोधन अधिनियम, 2003) को इस मामले में विशेष रूप से चुनौती नहीं दी गई थी। अत: न्यायालय ने इस व्यापक प्रश्न को किसी उपयुक्त मामले के लिए लंबित छोड़ दिया।

इसके स्थान पर, न्यायालय ने यह केंद्रित प्रश्न लिया कि क्या सेवा–विधि एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की दृष्टि से याचिकाकर्त्री की सेवा समाप्ति विधिसम्मत थी। नियम, 2023 में स्पष्ट रूप से अनुशासनिक कार्रवाई को सीसीए नियम, 2005 से जोड़ा गया है। अस्थायी नियुक्ति पत्र में भी यह उल्लेख था कि यदि कोई सूचना असत्य पाई जाती है, तो उन नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी।

सीसीए नियम, 2005 के अंतर्गत:

  • नियम 14(II) दंडों से संबंधित है,
  • नियम 16 अनुशासनिक कार्यवाही आरंभ करने से पूर्व सरकार की पूर्वानुमति अनिवार्य करता है, और
  • नियम 17, अनुच्छेद 311 के अनुरूप विभागीय जाँच की प्रक्रिया निर्धारित करता है।

न्यायालय को ऐसा कोई अभिलेखीय सामग्री नहीं मिली जिससे यह प्रदर्शित हो कि:

  • सीसीए नियम, 2005 के अधीन कोई विधिवत विभागीय कार्यवाही आरंभ की गई,
  • सरकार की कोई पूर्व स्वीकृति प्राप्त की गई, या
  • अनुच्छेद 311(2) के अनुसार सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए कोई पूर्ण विभागीय जाँच की गई।

इसके बाद न्यायालय ने A.K. Kraipak v. Union of India, Tulsiram Patel, Delhi Transport Corporation v. DTC Mazdoor Congress, Kranti Associates v. Masood Ahmed Khan, State of Punjab v. Sukhwinder Singh तथा Swati Priyadarshini v. State of Madhya Pradesh आदि निर्णयों पर भरोसा करते हुए यह दोहराया कि:

  • अधिकारों को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक निर्णयों में भी, जब तक स्पष्ट रूप से अपवाद न बनाया गया हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है।
  • सेवा अधिकारों को प्रभावित करने वाले आदेश कारण–संगत एवं गैर–मनमाने होने चाहिए।
  • ऐसा सेवा–समापन जो कलंक लगाता हो या कथित अयोग्यता/दुर्व्यवहार के आधार पर हो, उसके लिए अनुच्छेद 311 तथा विधिसम्मत विभागीय जाँच का पालन अनिवार्य है।

तथ्यों पर, सेवा समाप्ति मेमो जिला शिक्षा पदाधिकारी एवं जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) द्वारा पारित किया गया। न्यायालय ने माना कि:

  • नियम, 2023 तथा सीसीए नियम, 2005 के तहत जिला शिक्षा पदाधिकारी को ऐसा नोटिस कारण बताओ जारी करने तथा सेवा समाप्ति जैसे मुख्य दंड देने का अधिकार–क्षेत्र प्राप्त नहीं था।
  • इस बात का कोई संकेत नहीं था कि अनुच्छेद 311(2) के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया हो।
  • अत:, यह कार्रवाई क्षेत्राधिकार के अभाव तथा अनिवार्य प्रक्रिया के उल्लंघन, दोनों कारणों से शून्य (void) है।

न्यायालय ने यह भी देखा कि यद्यपि याचिकाकर्त्री की नियुक्ति को “अस्थायी” (provisional) कहा गया था, फिर भी वे लगभग एक वर्ष तक कार्यरत रहीं और वेतन लेती रहीं। यहाँ तक कि अस्थायी कर्मचारी की सेवाएं भी, जब मुख्य दंड के रूप में सेवा समाप्ति की जाती है, तो बाध्यकारी वैधानिक प्रक्रिया की उपेक्षा करके समाप्त नहीं की जा सकतीं।

अंत में, राज्य की व्यापक आरक्षण व्यवस्था या 2016 के संकल्पों को निरस्त किए बिना, न्यायालय ने स्वयं को केवल इस व्यक्तिगत शिक्षिका के विरुद्ध की गई कार्यवाही की वैधता तक सीमित रखा। उसने निष्कर्ष निकाला कि नोटिस कारण बताओ तथा सेवा समाप्ति, दोनों आदेश विधि की दृष्टि से टिक नहीं सकते।

तद्नुसार, पटना उच्च न्यायालय ने:

  • मेमो सं. 547 दिनांक 31.01.2025 (नोटिस कारण बताओ) को रद्द कर दिया, तथा
  • मेमो सं. 661 दिनांक 07.02.2025 (सेवा समाप्ति आदेश) को भी रद्द कर दिया।

न्यायालय ने शिक्षा विभाग, बिहार सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव को “विधि के अनुसार सुधारात्मक कार्रवाई” करने का निर्देश दिया। रिट याचिका का निस्तारण बिना व्यय–आदेश (no order as to costs) के कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार में प्रतिस्पर्धी भर्ती के माध्यम से नियुक्त शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों, विशेषकर बाह्य–राज्य के अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।

पहला, यह स्पष्ट करता है कि एक बार किसी व्यक्ति की नियुक्ति हो जाने एवं उसके कार्यरत होने के बाद, प्राधिकारी केवल बाद के परिपत्र या व्याख्या के आधार पर, बिना विधिवत अनुशासनिक नियमों का पालन किए, उसकी सेवा समाप्त नहीं कर सकते। यहाँ तक कि जब नियुक्ति “अस्थायी” कही जाए, तब भी यदि सेवा समाप्ति जैसा मुख्य दंड दिया जा रहा हो, तो नियोक्ता को सीसीए नियम, 2005 तथा अनुच्छेद 311 का पालन करना अनिवार्य है।

दूसरा, न्यायालय ने रेखांकित किया कि जिला शिक्षा पदाधिकारी जैसे स्थानीय अधिकारी विधिक प्रक्रिया एवं अधिकार–क्षेत्र की सीमाओं को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। कोई भी कार्रवाई जो मुख्य दंड की श्रेणी में आती है, उसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा, विधि द्वारा निर्धारित तरीके से ही किया जा सकता है।

तीसरा, यह निर्णय लोक सेवाओं में बाह्य–राज्य अभ्यर्थियों के साथ भिन्न व्यवहार के संवैधानिक संवेदी (sensitive) स्वरूप को परोक्ष रूप से उजागर करता है। यद्यपि न्यायालय ने राज्य की आरक्षण व्यवस्था की वैधता पर प्रत्यक्ष निर्णय नहीं दिया, पर उसने इंगित किया कि अनुच्छेद 14, 15 और 16, निवास एवं जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव पर वास्तविक सीमाएँ लगाते हैं।

साधारण अभ्यर्थियों एवं कार्यरत शिक्षकों के लिए, पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि:

  • सरकार, पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों को हटाने के लिए, पात्रता शर्तों को प्रतिगामी प्रभाव से एकतरफा रूप से नहीं बदल सकती, और
  • किसी भी सेवा समाप्ति में विधिसम्मत प्रक्रिया — सूचना, कारण, एवं निष्पक्ष सुनवाई — का पालन आवश्यक है, जब तक कि कोई स्पष्ट संवैधानिक अपवाद लागू न हो।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या जिला शिक्षा पदाधिकारी एवं जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, विभाग के बाद के स्पष्टीकरण के आधार पर यह कहते हुए कि याचिकाकर्त्री बाह्य–राज्य की महिला अभ्यर्थी हैं और उनके सीटेट में 60% से कम अंक हैं, उनकी सेवाएं समाप्त कर सकते थे?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि नोटिस कारण बताओ तथा सेवा समाप्ति, दोनों आदेश नियम, 2023 तथा सीसीए नियम, 2005 के अनिवार्य प्रावधानों के प्रतिकूल एवं बिना अधिकार–क्षेत्र के पारित किए गए थे, अत: उन्हें निरस्त कर दिया गया।
  • प्रश्न: क्या कार्यरत शिक्षिका पर अनुच्छेद 311(2) में निहित सुरक्षा उपायों एवं अनुशासनिक जाँच को अपनाए बिना, सेवा समाप्ति जैसा मुख्य दंड लगाया जाना विधिसम्मत था?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि अस्थायी नियुक्ति–धारक के लिए भी, सेवा समाप्ति जैसा मुख्य दंड लगाने हेतु, अनुच्छेद 311(2) तथा सीसीए नियम, 2005 का पालन अनिवार्य है। चूँकि ऐसा नहीं किया गया, अत: आदेश टिकाऊ नहीं हैं।
  • प्रश्न: क्या न्यायालय ने राज्य की निवास–आधारित आरक्षण व्यवस्था तथा संबंधित संकल्पों की संवैधानिक वैधता पर कोई निर्णय दिया?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि संकल्प सं. 963 दिनांक 20.01.2016 तथा 2003 संशोधन अधिनियम की वैधता इस मामले में चुनौती के अधीन नहीं है और उन्हें किसी उपयुक्त मामले में स्वतंत्र रूप से परखा जाना होगा; अत: उसने इस पर हस्तक्षेप करने से परहेज किया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रमुख मामले

  • Dr. Tanvi Behl v. Shrey Goel & Ors., Civil Appeal No.9289 of 2019
  • Dr. Pradeep Jain v. Union of India, (1984) 3 SCC 654
  • Indra Sawhney & Ors. v. Union of India & Ors., 1992 Supp (3) SCC 217
  • Government of A.P. v. P.B. Vijayakumar & Anr., (1995) 4 SCC 520
  • State of Uttar Pradesh v. Pradip Tandon & Ors., (1975) 1 SCC 267
  • Kailash Chand Sharma v. State of Rajasthan & Ors., (2002) 6 SCC 562
  • A.K. Kraipak v. Union of India, (1969) 2 SCC 262
  • Union of India v. Tulsiram Patel, (1985) 3 SCC 398
  • Delhi Transport Corporation v. DTC Mazdoor Congress, (1991) Supp SCC 600
  • Kranti Associates (P) Ltd. v. Masood Ahmed Khan, (2010) 9 SCC 496
  • State of Punjab & Ors. v. Sukhwinder Singh, (2005) 5 SCC 569
  • Purushottam Lal Dhingra v. Union of India, 1957 SCC Online SC 5
  • Swati Priyadarshini v. State of Madhya Pradesh & Ors., Civil Appeal No.9758 of 2024 (arising out of SLP (C) No.11685 of 2021)
  • Khichri Ram v. State of Bihar & Ors., CWJC No.15153 of 2008 (Patna High Court, Division Bench)
  • Karnika Shekhar v. State of Bihar & Ors., CWJC No.22609 of 2019, judgment dated 26.02.2024 (Patna High Court, Division Bench)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.3887 of 2025

मामला शीर्षक: Chitra Devi @ Kumari Chitra Devi v. The State of Bihar & Ors.

उद्धरण: 2025 (2) PLJR 765

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Purnendu Singh

निर्णय की तिथि: 20-03-2025 (अपलोडिंग तिथि: 11.04.2025)

पक्षकारों के अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्त्री की ओर से: Mr. Nityanand Mishra, Advocate; Mr. Alok Abhinav, Advocate; Mr. Abhishek Mishra, Advocate
  • Bihar Public Service Commission की ओर से: Mr. Sanjay Pandey, Advocate; Mr. Nishant Kumar Jha, Advocate
  • राज्य/प्रतिवादीगण की ओर से: Mr. Sanju Kumar, AC to Advocate General

मामले का स्वरूप: एक सरकारी विद्यालय शिक्षिका की नियुक्ति से संबंधित विभागीय परिपत्र, नोटिस कारण बताओ एवं सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती देते हुए दायर दीवानी रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत रिट याचिका।

निर्णय की प्रति हेतु लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMzg4NyMyMDI1IzEjTg==-zl2M7E2iA0Y=


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