विभाजन अपील प्रतिस्थापन में विलंब के कारण खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2023

यह मामला पटना उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित एक पुरानी विभाजन अपील से संबंधित था।
न्यायालय ने माना कि कई पक्षकारों की मृत्यु हो जाने और उनके उत्तराधिकारियों को समय पर अभिलेख पर नहीं लाने के कारण अपील पूर्णतः अवमृत (पूरी तरह से समाप्त) हो चुकी है।
न्यायाधीशों ने अधिकतम 20 वर्ष तक की देरी को अनुचित ठहराया और उसे क्षम्य करने से इनकार कर दिया।
परिणामस्वरूप, अपील को अवमृत मानकर खारिज कर दिया गया और सभी अन्य अर्ज़ियां बंद कर दी गईं।

प्रकरण की पृष्ठभूमि

यह मामला मूल रूप से परीक्षण न्यायालय के समक्ष एक विभाजन वाद के रूप में दायर हुआ था। वहां एक डिक्री पारित की गई, जिसमें संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में सह-स्वामियों के हिस्सों का निर्धारण किया गया।
उस डिक्री के विरुद्ध वर्तमान प्रथम अपील संख्या 408/1973 पटना उच्च न्यायालय में दायर की गई।

अपील में दोनों पक्षों की ओर से बड़ी संख्या में पारिवारिक सदस्यों को पक्षकार बनाया गया था।
समय के साथ‑साथ कई अपीलकर्ता तथा प्रतिवादी मृत हो गए।
क़ानून के अनुसार, जब भी किसी वाद के लंबित रहने के दौरान कोई पक्षकार मर जाता है, तो उसके विधिक उत्तराधिकारियों को एक निश्चित अवधि (सामान्यतः 90 दिन) के भीतर प्रतिस्थापित करना अनिवार्य होता है; ऐसा न होने पर उस पक्षकार के संबंध में अपील अवमृत हो जाती है।

इस अपील में वर्षों के दौरान ऐसे कई मृत्युएँ हुईं।
कभी‑कभार दायर अंतरिम अर्ज़ियों के माध्यम से कुछ विधिक उत्तराधिकारियों को अभिलेख पर लाने और अवमृतता को निरस्त करने का प्रयास किया गया।
किन्तु ये क़दम समय पर नहीं उठाए गए और न ही सभी मृत पक्षकारों के संबंध में उठाए गए।

जब 18.01.2023 को यह मामला पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आया, तब मुख्य प्रश्न अब विभाजन डिक्री के गुण‑दोष का नहीं रह गया था।
मुख्य मुद्दा यह बन गया था कि अनेक पक्षकारों की मृत्यु तथा प्रतिस्थापन में लम्बे, अस्पष्ट विलंब के परिप्रेक्ष्य में क्या प्रथम अपील स्वयं विधि की दृष्टि से जीवित रह पाई है या नहीं।

न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह के माध्यम से अनेक अंतरिम अर्ज़ियों पर बहस सुनी।
इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतिवादी संख्या 9 की ओर से दायर अंतरिम आवेदन (I.A.) संख्या 4138/2018 तथा I.A. संख्या 24/2021 थे।

इन अंतरिम आवेदनों में प्रतिवादी संख्या 9 ने यह घोषणा करने की मांग की कि संपूर्ण प्रथम अपील अवमृत हो चुकी है।
आधार यह था कि कई प्रतिवादियों और कुछ अपीलकर्ताओं की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी और उन्हें विधि द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रतिस्थापित नहीं किया गया था।

प्रतिवादियों संख्या 9 और 19 की ओर से किए गए निवेदन के अनुसार, निम्नलिखित पक्षकारों की मृत्यु हो चुकी थी: प्रतिवादी संख्या 8(i), 8(iii), 9, 23, 24, 29(c), 33 और 34, तथा बाद में प्रतिवादी संख्या 11, 26, 30(d), 32(ii), साथ ही अपीलकर्ता संख्या 9 और 11।
न्यायालय को सूचित किया गया कि इन में से कई मृत्यु वर्ष 1999, 2005, 2006, 2010, 2015, 2016, 2017, 2020 और 2021 के बीच हुईं।

इन मृत्यु‑घटनाओं के प्रत्युत्तर में, अपीलकर्ताओं द्वारा विभिन्न प्रतिस्थापन अर्ज़ियां दायर की गईं:

प्रतिवादी संख्या 8(i), 8(iii), 9, 23, 24, 29(c), 33 और 34 के लिए I.A. संख्या 16/2019 दिनांक 06.02.2019 को दायर की गई।
प्रतिवादी संख्या 11, 26 और 30(d) के लिए I.A. संख्या 22/2021 दायर की गई।
प्रतिवादी संख्या 30(d) और 32(ii) के लिए I.A. संख्या 20/2021 दायर की गई।

हालाँकि न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कमी नोट की: प्रतिवादी संख्या 26 और अपीलकर्ता संख्या 9 तथा 11 के संबंध में, जबकि उनकी मृत्यु की सूचना दी गई थी, कोई भी आवेदन बिल्कुल दायर ही नहीं किया गया।

प्रतिवादी संख्या 9 और 19 के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इन प्रतिस्थापन आवेदनों के दायर करने में हुई देरी एक वर्ष से लेकर 20 वर्ष तक की अवधि की है।
उनका कहना था कि इतनी असाधारण देरी अपीलकर्ताओं की “पूर्ण लापरवाही” और “जानबूझकर विलंब एवं प्रमाद” को दर्शाती है।

उन्होंने आगे कहा कि विलंब के लिए दिया गया स्पष्टीकरण अस्पष्ट और अपर्याप्त है।
केवल यही बहाना लिया गया कि अपीलकर्ताओं को मृत्यु की जानकारी नहीं थी।
यह तर्क, उन्होंने कहा, स्वीकार करना कठिन है, क्योंकि विवाद एक विभाजन वाद से संबंधित है और पक्षकार परस्पर अग्नात (एक ही वंश की निकट संबंधी) हैं।
ऐसी स्थिति में लगभग दो दशकों तक निकट पारिवारिक सदस्यों की मृत्यु से अनभिज्ञ रहने का दावा अव्यावहारिक है।

विधिक पक्ष पर, प्रतिवादियों ने सर्वोच्च न्यायालय के दो महत्वपूर्ण निर्णयों पर भरोसा किया।
पहला, Majji Sannemma alias Sanyasirao बनाम Reddy Sirdevi and others, 2021 SCC Online SC 1260, जिसका हवाला इस लिए दिया गया कि:

विलंब को माफ करने का विवेकाधिकार न्यायिक रूप से प्रयोग किया जाना चाहिए;
“यथोचित कारण” की अवधारणा को वहाँ तक नहीं खींचा जा सकता जहाँ लापरवाही, निष्क्रियता या bona fide की कमी स्पष्ट हो; और
भले ही परिणाम किसी पक्ष के लिए कठोर प्रतीत हो, सीमा‑क़ानून को सख़्ती से लागू किया जाना चाहिए।

दूसरे, Budh Ram बनाम Bansi, (2010) 11 SCC 476 पर भरोसा किया गया।
उस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जहाँ एक संयुक्त और अविभाज्य डिक्री हो, वहाँ किसी एक आवश्यक पक्ष के विरुद्ध अपील के अवमृत हो जाने से अन्य पक्षों के विरुद्ध भी अपील अवमृत हो सकती है।
विभाजन संबंधी मामलों में, वास्तविक विभाजन होने तक सभी सह‑स्वामी संपूर्ण संपत्ति में संयुक्त और अविभाज्य अधिकार रखते हैं।
अतः यदि कुछ आवश्यक सह‑स्वामी अवमृतता के कारण अब अपील के पक्षकार नहीं रहे, तो स्वयं अपील ही अवैध और अनुपालन के अयोग्य हो जाती है।

अधिवक्ता ने अपील में पहले पारित आदेशों का भी उल्लेख किया।
दिनांक 24.11.1994 के आदेश से स्पष्ट था कि मृत प्रतिवादी संख्या 3(i) के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अपील पहले ही अवमृत हो चुकी थी।
दिनांक 12.02.2009 के एक अन्य आदेश द्वारा यह निर्देश दिया गया कि I.A. संख्या 193/2007 की प्रति नाबालिग प्रतिवादी संख्या 11 से 21 तथा 23 से 25 के अभिभावक अधिवक्ता को दो सप्ताह के भीतर सौंपी जाए।
यह आदेश “परिम्प्टरी” (अनिवार्य) था और यह स्पष्ट रूप से कहता था कि अनुपालन न होने पर आवेदन निरस्त हो जाएगा।
अनुपालन न होने के कारण, मृत अपीलकर्ता संख्या 2 तथा प्रतिवादी संख्या 9 के विरुद्ध अपील स्वतः निरस्त मानी गई।

दूसरी ओर, अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने न्यायालय से उदार दृष्टिकोण अपनाने का अनुरोध किया।
उन्होंने तर्क दिया कि यह एक विभाजन वाद है, अतः पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण गुण‑दोष के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल प्रक्रमिक (procedural) आधारों पर वाद समाप्त कर दिया जाए।
परंतु जब न्यायालय ने प्रतिस्थापन में लंबे विलंब के लिए ठोस और विशिष्ट स्पष्टीकरण माँगा, तो अधिवक्ता कोई ठोस उत्तर देने में असमर्थ रहे।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के पश्चात पटना उच्च न्यायालय ने विधिक स्थिति और मामले के तथ्यात्मक इतिहास पर विचार किया।
न्यायालय ने पहले यह नोट किया कि पक्षकारों के अधिकारों का निर्णय पहले ही मूल परीक्षण न्यायालय द्वारा कर दिया गया था, जिसने विभाजन डिक्री पारित की थी।
इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि पक्षकारों के अधिकारों का कभी भी निर्णय ही नहीं हुआ।

इसके बाद न्यायालय ने सीमा‑क़ानून (law of limitation) पर ध्यान दिया।
प्रासंगिक क़ानून के अनुसार, किसी पक्षकार की मृत्यु के बाद उसके विधिक उत्तराधिकारियों का प्रतिस्थापन 90 दिनों के भीतर किया जाना आवश्यक है।
इस मामले में, कई पक्षकारों को वर्षों तक प्रतिस्थापित नहीं किया गया, कुछ मामलों में यह अवधि 20 वर्ष तक पहुँची।

ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि पहले से हो चुकी अवमृतता में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।
न्यायालय ने यह स्थिति स्वीकार की कि जब समय पर प्रतिस्थापन नहीं किया जाता, तो अवमृतता “स्वचालित” (automatic) होती है और उसे केवल एक औपचारिक आदेश द्वारा ही निरस्त किया जा सकता है — जो कि कई पक्षकारों के संबंध में 2023 तक भी प्राप्त नहीं किया गया था।

यह प्रश्न कि क्या केवल अपील का एक भाग अवमृत हुआ है या पूरी अपील, तय करने के लिए न्यायालय ने वाद के स्वरूप को देखा।
उसने यह अवलोकन किया कि विभाजन वाद में अंतिम डिक्री और वास्तविक विभाजन से पूर्व “समस्त संपत्ति में अविभाज्य और अविछिन्न संयुक्तता” बनी रहती है।
अर्थात प्रत्येक सह‑स्वामी की रुचि पूरी संपत्ति में होती है, न कि केवल किसी निश्चित भौतिक हिस्से में।

इसी कारण, जिन सह‑स्वामियों के हिस्से वादित संपत्ति की मूल निधि (corpus) में निहित थे, उनके अनुपस्थित रहने से स्वयं अपील ही आगे बढ़ने के लिए अयोग्य हो गई।
न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि Majji Sannemma alias Sanyasirao तथा Budh Ram के निर्णयों का ratio इस मामले के तथ्यों पर पूर्णतः लागू होता है और प्रतिवादी संख्या 9 तथा 19 द्वारा उठाए गए आपत्तियों का समर्थन करता है।

इसी आधार पर न्यायालय ने अंतरिम आवेदन संख्या 4138/2018 और 24/2021 को स्वीकार कर लिया।
इसके प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप, पूरी प्रथम अपील को अवमृत मानकर खारिज कर दिया गया।

अंत में, न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि जब स्वयं अपील ही अवमृत हो चुकी है, तो सभी अन्य लंबित अंतरिम अर्ज़ियाँ निष्फल (infructuous) हो गई हैं और उन्हें तदनुसार निपटा दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है जो लम्बे समय तक चलने वाले दीवानी विवादों, विशेष रूप से पारिवारिक सदस्यों के बीच विभाजन वादों में पक्षकार हैं।
यह इस बात पर बल देता है कि किसी पक्षकार की मृत्यु के बाद उसके विधिक उत्तराधिकारियों को अभिलेख पर लाने में हुई गंभीर देरी को न्यायालय नज़रअंदाज नहीं कर सकते।

मामला यह दर्शाता है कि भले ही विवाद पारिवारिक संपत्ति का हो और पक्षकार merits पर पूर्ण सुनवाई चाहते हों, प्रक्रमिक क़ानून फिर भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि कोई पक्षकार मर जाता है और उसके उत्तराधिकारी निर्धारित अवधि में प्रतिस्थापित नहीं किए जाते, तो अपील स्वतः अवमृत हो सकती है।

निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि विभाजन मामलों में अंतिम विभाजन तक सभी सह‑स्वामी आवश्यक पक्षकार हैं।
यदि अवमृतता के कारण अनेक सह‑स्वामी अब अभिलेख पर नहीं हैं, तो केवल थोड़ा सा भाग नहीं, बल्कि पूरी अपील विफल हो सकती है।

वादकारियों के लिए यह निर्णय एक स्पष्ट चेतावनी है: सभी पक्षकारों की स्थिति पर नज़र रखें, मृत्यु की सूचना तुरंत दें और प्रतिस्थापन अर्ज़ियां समय पर तथा उचित स्पष्टीकरण के साथ दायर करें।
अन्यथा, वर्षों की मुकदमेबाज़ी और प्रयास व्यर्थ जा सकते हैं, जैसा कि यहाँ हुआ, जहाँ 1973 से लंबित प्रथम अपील का निपटारा merits पर न होकर मात्र प्रक्रमिक त्रुटियों के कारण हो गया।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या विभाजन अपील में मृत पक्षकारों के प्रतिस्थापन हेतु अत्यधिक विलंब से, तथा अपर्याप्त स्पष्टीकरण के साथ, दायर अर्ज़ियों को स्वीकार कर अवमृतता को निरस्त किया जा सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि 20 वर्ष तक की देरी और केवल अस्पष्ट स्पष्टीकरण के होते हुए विलंब को क्षम्य मानने के लिए कोई “यथोचित कारण” नहीं है। अवमृतता यथावत रही और उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया।
  • प्रश्न: क्या संयुक्त और अविभाज्य अधिकारों वाली विभाजन वाद में, अनेक सह‑स्वामियों के विरुद्ध अपील के अवमृत हो जाने से पूरी अपील अवमृत हो जाती है?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि विभाजन वाद में अंतिम विभाजन तक संपत्ति संयुक्त रूप से स्वामित्व में रहती है, इसलिए अनेक सह‑स्वामियों की पक्षकार के रूप में अनुपस्थिति से संपूर्ण अपील ही अयोग्य हो जाती है। अतः पूरी प्रथम अपील को अवमृत मानकर खारिज किया गया।
  • प्रश्न: क्या न्यायालय को केवल इस उद्देश्य से कि लंबे समय से लंबित विभाजन अपील में अधिकारों का merits पर निर्णय हो जाए, स्पष्ट सीमा‑क़ानून उल्लंघन के बावजूद उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए?
    उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि जहाँ लापरवाही और निष्क्रियता स्पष्ट हो, वहाँ सीमा‑क़ानून को उसकी पूरी कठोरता के साथ लागू करना होगा, भले ही यह कठोर प्रतीत हो; अतः उदार दृष्टिकोण अपनाने से इनकार कर दिया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Majji Sannemma alias Sanyasirao vs. Reddy Sirdevi and others, 2021 SCC Online SC 1260
  • Budh Ram v. Bansi, (2010) 11 Supreme Court Cases 476

प्रकरण का विवरण

प्रकरण संख्या: First Appeal No. 408 of 1973; along with I.A. No. 4138 of 2018 and I.A. No. 24 of 2021

प्रकरण शीर्षक: Bhawar Prasad (since deceased) & Ors. v. Jangali Devi (since deceased) & Ors.

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Ahsanuddin Amanullah

उद्धरण: 2023 (1) PLJR 739

अधिवक्ता: अपीलकर्ताओं की ओर से: Mr. Prabhu Narayan Sharma, Advocate; प्रतिवादी संख्या 9 और 19 की ओर से: Mr. Ashok Kumar and Mr. Sushil Kumar Ojha, Advocates

प्रकरण का स्वरूप: विभाजन वाद से उत्पन्न प्रथम अपील, जिसमें प्रतिस्थापन और अवमृतता संबंधी अनेक अंतरिम आवेदन शामिल थे

निर्णय दिनांक: 18-01-2023

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MyMxMTExIzIwMTgjMSNO-ZM–ak1–V2hJximE=


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