पटना हाईकोर्ट का खेल कोटा नियुक्ति पर महत्वपूर्ण फैसला (2025)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला बिहार सरकार द्वारा खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी देने की विशेष योजना (Outstanding Sportspersons Quota) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एक ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने शतरंज (Chess) के क्षेत्र में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भाग लिया था। उनका कहना था कि वे मेरिट (योग्यता) में ऊपर होने के बावजूद सरकारी नौकरी से वंचित कर दिए गए, जबकि उनसे कम योग्यता वाले कुछ अन्य खिलाड़ियों को नियुक्ति दे दी गई।

राज्य सरकार ने वर्ष 2009 में खिलाड़ियों के लिए एक विशेष नियम बनाया था, जिसके तहत उत्कृष्ट खिलाड़ियों को ग्रुप-सी और ग्रुप-डी की सरकारी नौकरियों में नियुक्ति दी जानी थी। इसके लिए विज्ञापन जारी हुआ और शतरंज सहित कई खेलों के खिलाड़ियों ने आवेदन किया।

याचिकाकर्ता ने भी शतरंज खेल के अंतर्गत आवेदन किया। प्रारंभिक (प्रोविजनल) मेरिट सूची में उनका स्थान काफी अच्छा था। बाद में जब अंतिम मेरिट सूची प्रकाशित हुई, तब भी वे कई चयनित उम्मीदवारों से ऊपर थे। इसके बावजूद उन्हें न तो साक्षात्कार के लिए बुलाया गया और न ही नियुक्ति दी गई।

जांच करने पर याचिकाकर्ता को पता चला कि सरकार और चयन समिति के बीच इस बात को लेकर भ्रम था कि National-A और National-B Chess Championship में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में किसे ज्यादा वरीयता (priority) दी जाए। इसी भ्रम को दूर करने के लिए सरकार ने All India Chess Federation से स्पष्टीकरण मांगा।

फेडरेशन ने बताया कि National-B Championship भी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता है, लेकिन इसमें कुछ खिलाड़ी “विशेष प्रवेश” (donor/special entry) के रूप में भी भाग लेते हैं, जो सीधे राज्य की टीम से चयनित नहीं होते। इस आधार पर चयन समिति ने यह निर्णय लिया कि केवल National-A Championship या शीर्ष स्थान पाने वाले खिलाड़ियों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

इसके बाद एक संशोधित मेरिट सूची बनाई गई, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम काफी नीचे चला गया और वे चयन के दायरे से बाहर हो गए। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि:

  • चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों की व्याख्या बदल दी गई
  • टीम इवेंट्स (Team Events) को नजरअंदाज किया गया
  • National-B Championship को गलत तरीके से कम महत्व दिया गया

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया के बीच में नियम बदलना असंवैधानिक है।

राज्य सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि यह नियम बदलना नहीं था, बल्कि विशेषज्ञ संस्था से स्पष्टीकरण लेकर नीति निर्णय लिया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता ने लगभग 7 साल की देरी से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जबकि इस बीच नियुक्तियां हो चुकी थीं।

पटना हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुना और नियमों का अध्ययन किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि:

  • केवल मेरिट सूची में नाम आ जाने से नौकरी पाने का अधिकार नहीं बनता
  • सरकार को यह अधिकार है कि वह विशेषज्ञ संस्था से यह स्पष्ट कराए कि कौन-सी खेल उपलब्धि किस स्तर की है
  • लेकिन ऐसा स्पष्टीकरण चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण में होना चाहिए

हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने बहुत देर से मामला दायर किया और इस बीच अन्य लोगों की नियुक्ति हो चुकी थी। इसलिए अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अंततः, याचिका को खारिज कर दिया गया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • यह फैसला बताता है कि सरकारी नौकरी में केवल मेरिट सूची पर्याप्त नहीं होती, अंतिम निर्णय सरकार का होता है
  • खिलाड़ियों को चाहिए कि यदि उनके साथ अन्याय हो, तो समय पर अदालत जाएँ
  • सरकार को चयन प्रक्रिया में स्पष्ट और पारदर्शी नियम पहले से तय करने चाहिए
  • विशेषज्ञ संस्थाओं की राय को अदालत ने महत्वपूर्ण माना है

यह निर्णय भविष्य में खेल कोटा से जुड़े मामलों में मार्गदर्शक साबित होगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या चयन प्रक्रिया के बीच नियम बदले गए?
    → अदालत ने कहा: नियम नहीं बदले गए, केवल विशेषज्ञ स्पष्टीकरण लिया गया
  • क्या National-B Championship को मान्यता मिलनी चाहिए थी?
    → अदालत ने माना कि यह विशेष श्रेणी है, पूर्ण समानता नहीं
  • क्या मेरिट सूची में नाम होने से नौकरी का अधिकार बनता है?
    → नहीं, यह केवल पात्रता दर्शाता है
  • क्या याचिका देरी से दायर हुई थी?
    → हाँ, 7 साल की देरी के कारण याचिका खारिज

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Tej Prakash Pathak बनाम Rajasthan High Court
  • K. Manjusree बनाम State of Andhra Pradesh
  • Anil Kishore Pandit बनाम State of Bihar

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Tej Prakash Pathak बनाम Rajasthan High Court
  • Shiv Dass बनाम Union of India
  • Union of India बनाम Tarsem Singh

मामले का शीर्षक


Abhay Kumar Sinha Vs. The State of Bihar and Ors

केस नंबर

CWJC No. 1315 of 2019

उद्धरण (Citation)

2025 (2) PLJR 334

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति हरिश कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: याचिकाकर्ता के अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: सरकारी अधिवक्ता
  • निजी प्रतिवादी की ओर से: चयनित उम्मीदवार के अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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