पटना उच्च न्यायालय का आदेश: सरकारी अपीलों में देरी पर सख्त टिप्पणी और नीति बनाने का निर्देश (2023)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 4 जनवरी 2023 को एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा अत्यधिक विलंब से दाखिल की गई अपील को खारिज कर दिया गया। यह मामला लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) संख्या 365/2021 से जुड़ा था, जिसे बिहार सरकार ने दायर किया था।

इस अपील में राज्य सरकार ने 823 दिनों की देरी माफ करने के लिए इंटरलोक्यूटरी आवेदन संख्या 1/2021 दायर किया था। सरकार का तर्क था कि यह देरी “प्रशासनिक प्रक्रियाओं” के कारण हुई। परंतु न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने देरी के पीछे कोई ठोस या स्पष्ट कारण नहीं बताया — जैसे:

  • एकल पीठ के आदेश की तारीख,
  • प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन की तारीख,
  • प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख,
  • और अपील दाखिल करने में किन-किन तिथियों पर क्या कार्रवाई हुई।

इन जानकारियों के अभाव में न्यायालय ने पाया कि 823 दिनों की देरी को माफ करने का कोई उचित कारण नहीं है। इसलिए अदालत ने देरी माफी का आवेदन अस्वीकार करते हुए अपील को समयसीमा से बाहर बताते हुए खारिज कर दिया।

न्यायालय ने यह भी गंभीर चिंता जताई कि राज्य सरकार बार-बार इसी प्रकार देर से अपील दाखिल करती है, जबकि उसे यह भलीभांति ज्ञात है कि अपील दाखिल करने की एक निश्चित अवधि होती है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल “प्रशासनिक कारण” बताकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे न्यायिक समय और सरकारी धन दोनों की बर्बादी होती है।

न्यायालय ने इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सभा नारायण (2022) 9 SCC 266 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने भी सरकारी विभागों की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों को “certificate cases” कहा — अर्थात् ऐसी अपीलें जो केवल औपचारिकता निभाने के लिए दायर की जाती हैं ताकि संबंधित अधिकारी जिम्मेदारी से बच सकें।

पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी प्रथाओं को रोकना आवश्यक है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की लापरवाही से सरकारी कोष का दुरुपयोग होता है, जो अंततः करदाताओं के पैसे की बर्बादी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए बिहार के मुख्य सचिव को एक व्यापक “विवाद प्रबंधन नीति (Litigation Monitoring Policy)” बनाने का निर्देश दिया। इस नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में सरकारी अपीलें समय पर दाखिल हों और प्रत्येक स्तर पर संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो।

न्यायालय ने ऐसे दिशानिर्देश भी सुझाए, जिनसे सरकारी मुकदमों की निगरानी और समय पर कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह फैसला केवल एक अपील की खारिजी नहीं है, बल्कि यह बिहार और अन्य राज्यों के प्रशासनिक तंत्र के लिए एक बड़ा संकेत है।

इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ कि सरकार को भी आम नागरिक की तरह कानून की समयसीमा का पालन करना होगा। केवल यह कहकर कि “प्रशासनिक देरी हुई” — अदालत अब देरी को माफ नहीं करेगी।

इस निर्णय के बाद बिहार सरकार को अब एक ऐसी नीति बनानी होगी जिसमें हर सरकारी विभाग के पास मुकदमों की निगरानी की स्पष्ट प्रणाली हो — जैसे:

  • कोर्ट से प्राप्त आदेशों का तत्काल रिकॉर्ड रखना,
  • अपील दाखिल करने के लिए निश्चित समयसीमा तय करना,
  • जिम्मेदार अधिकारी की पहचान तय करना, और
  • मासिक रिपोर्ट के माध्यम से निगरानी करना।

यह फैसला सरकारी विभागों की कार्यसंस्कृति में अनुशासन लाने में मदद कर सकता है। यह न केवल न्यायालयों का समय बचाएगा बल्कि सार्वजनिक धन की भी रक्षा करेगा।

आम जनता के लिए यह फैसला यह संदेश देता है कि न्यायालय प्रशासनिक लापरवाही को अब सहन नहीं करेगा और सरकारी विभागों को भी कानून के समान नियमों का पालन करना होगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • मुद्दा 1: क्या 823 दिनों की देरी को केवल “प्रशासनिक प्रक्रिया” के आधार पर माफ किया जा सकता है?
    निर्णय: नहीं। न्यायालय ने कहा कि कोई ठोस और विशिष्ट कारण प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए देरी माफ नहीं की जा सकती।
  • मुद्दा 2: क्या राज्य सरकार को सामान्य नागरिक से अधिक छूट दी जा सकती है?
    निर्णय: नहीं। न्यायालय ने कहा कि Limitation Act सभी पर समान रूप से लागू होता है — चाहे वह व्यक्ति हो या सरकार।
  • मुद्दा 3: क्या सरकार को ऐसी देरी रोकने के लिए कोई नीति बनानी चाहिए?
    निर्णय: हां। अदालत ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि ऐसी नीति तैयार की जाए जिससे समयसीमा के भीतर अपीलें दाखिल हों और जिम्मेदारी तय हो सके।

न्यायालय द्वारा सुझाए गए प्रमुख कदम:

  • हर प्राप्त याचिका या आदेश को एक रजिस्टर में दर्ज करना।
  • अपील या पुनर्विचार याचिका तय समय में दाखिल करना।
  • संबंधित अधिकारियों और सरकारी अधिवक्ताओं की जवाबदेही तय करना।
  • मासिक रिपोर्ट बनाकर उच्च अधिकारियों को भेजना।
  • अदालत के आदेशों का पालन न करने पर स्पष्टीकरण सहित हलफनामा दाखिल करना।
  • राज्य स्तर पर एक वेब पोर्टल और मोबाइल ऐप बनाना ताकि मुकदमों की जानकारी रीयल टाइम में साझा हो सके।
  • हर महीने कानूनी कार्यशालाएं आयोजित करना ताकि सरकारी अधिवक्ता और अधिकारी बेहतर समन्वय बना सकें।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • State of Uttar Pradesh v. Sabha Narain, (2022) 9 SCC 266
  • State of M.P. v. Bherulal, (2020) 10 SCC 654
  • State of Odisha v. Sunanda Mahakuda, (2021) 11 SCC 560
  • Postmaster General v. Living Media India Ltd., (2012) 3 SCC 563

इन सभी निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि सरकार को भी कानून की समयसीमा का पालन करना आवश्यक है।

मामले का शीर्षक

The State of Bihar vs. The Vice Chancellor, Purnea University & Others

केस नंबर

Letters Patent Appeal No. 365 of 2021
(Arising out of Civil Writ Jurisdiction Case No. 2177 of 2019)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 643

न्यायमूर्ति गण

माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री
माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार

वकीलों के नाम और पक्षकारों की ओर से पेशी

  • अपीलकर्ता की ओर से: श्री शशि शेखर तिवारी (सहायक अधिवक्ता, ए.ए.जी. 5 के सहायक)
  • प्रतिवादी की ओर से: उल्लेख नहीं।

निर्णय का लिंक

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