पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: फरार आरोपी को अग्रिम जमानत का अधिकार नहीं – 2022 का फैसला

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने वर्ष 2022 में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि यदि किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा “फरार” (Absconder) घोषित किया गया है, तो उसे अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) का लाभ नहीं दिया जा सकता। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति नवनीत कुमार पांडेय द्वारा पारित किया गया।

यह मामला महिला थाना, मुजफ्फरपुर से जुड़ा था, जिसमें प्राथमिकी दर्ज की गई थी भारतीय दंड संहिता की धाराओं 341, 493, 376, 323, 506/34 के तहत — यानी गलत तरीके से रोकना, झूठे विवाह के वादे से यौन शोषण, बलात्कार, मारपीट और धमकी देना।

पीड़िता ने शिकायत में कहा कि आरोपी ने विवाह का झूठा वादा कर दस वर्षों तक उसका शारीरिक शोषण किया और इस संबंध से एक पुत्र भी जन्मा। बाद में उसे पता चला कि आरोपी ने किसी और से गुप्त रूप से विवाह कर लिया। जब उसने विरोध किया, तो आरोपी ने उसकी पिटाई की और जान से मारने की धमकी दी।

जांच के दौरान आरोपी पुलिस से बचता रहा और फरार घोषित कर दिया गया। इस कारण मजिस्ट्रेट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 और 83 के तहत उसकी संपत्ति जब्त करने और फरार घोषित करने का आदेश दिया।

जब आरोपी ने अग्रिम जमानत के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, तो अभियोजन पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Prem Shankar Prasad v. State of Bihar (AIR 2021 SC 5125) का हवाला देते हुए कहा कि फरार व्यक्ति को अग्रिम जमानत का अधिकार नहीं है।

आरोपी के वकील ने यह तर्क दिया कि केवल धारा 82 या 83 के तहत आदेश जारी हो जाने से अग्रिम जमानत का अधिकार स्वतः खत्म नहीं होता, खासकर यदि ऐसा आदेश बिना पर्याप्त कारण लिखे जारी हुआ हो।

लेकिन न्यायालय ने विभिन्न फैसलों का अध्ययन करने के बाद यह निर्णय दिया कि —
जब तक कोई व्यक्ति न्यायालय द्वारा घोषित फरार है, तब तक वह अग्रिम जमानत पाने का अधिकारी नहीं हो सकता।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह फैसला न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा देता है।

  1. कानूनी व्यवस्था को मजबूत बनाता है: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि यदि कोई व्यक्ति न्याय से भाग रहा है, तो उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती।
  2. जांच प्रक्रिया में सहयोग अनिवार्य: यदि कोई आरोपी जांच में सहयोग नहीं करता, तो उसे कानूनी सुरक्षा नहीं दी जाएगी।
  3. न्यायिक आदेशों की पवित्रता को बनाए रखना: धारा 82 के तहत जारी आदेश तब तक वैध माना जाएगा जब तक उसे उच्च न्यायालय द्वारा रद्द न किया जाए।
  4. कानूनी जिम्मेदारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन: यह निर्णय बताता है कि संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का लाभ केवल उसी व्यक्ति को मिलेगा जो कानून का पालन करता है।
  5. अदालतों पर बोझ कम करने का संकेत: फरार रहने से एक ही मामले के कई हिस्सों में सुनवाई होती है, जिससे न्यायालय का समय और संसाधन नष्ट होते हैं। इस निर्णय से ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • मुद्दा 1: क्या फरार घोषित व्यक्ति अग्रिम जमानत का हकदार है?
    🔹 निर्णय: नहीं। जब तक अदालत द्वारा फरारी का आदेश रद्द न हो, तब तक अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
  • मुद्दा 2: क्या मजिस्ट्रेट को धारा 82 CrPC के तहत कारण लिखना आवश्यक है?
    🔹 निर्णय: नहीं। मजिस्ट्रेट को केवल यह विश्वास होना चाहिए कि आरोपी फरार है, लेकिन उसे कारण लिखने की बाध्यता नहीं है।
  • मुद्दा 3: यदि अग्रिम जमानत की याचिका धारा 82 के आदेश से पहले दाखिल की गई हो तो क्या अंतर पड़ता है?
    🔹 निर्णय: कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि बाद में आरोपी फरार घोषित हुआ है तो उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
  • मुद्दा 4: क्या धारा 82 CrPC का आदेश व्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 21) का उल्लंघन है?
    🔹 निर्णय: नहीं। जो व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया से भागता है, उसे अनुच्छेद 21 का संरक्षण नहीं मिल सकता।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Prem Shankar Prasad v. State of Bihar, AIR 2021 SC 5125
  • Lavesh v. State (NCT of Delhi), (2012) 8 SCC 730
  • Krishna Mohan Lal v. State of Bihar, Cr. Misc. No. 1118 of 2021 (Patna HC)
  • Santosh Yadav @ Santosh Kumar Yadav v. State of Bihar, Cr. Misc. No. 38750 of 2021 (Patna HC)
  • Cr. Misc. No. 75288 of 2018, Order dated 16.01.2019 (Patna HC)

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Gurbaksh Singh Sibbia v. State of Punjab, AIR 1980 SC 1632
  • Sushila Aggarwal v. State (NCT of Delhi), (2020) 5 SCC 1
  • Bharat Petroleum Corp. Ltd. v. N.R. Vairamani, (2004) 8 SCC 579
  • Gagan Thakur v. State of Jharkhand, 2004 (2) Cr.L.J. 1910
  • Sanatan Pandey v. State of Uttar Pradesh, SLP (Criminal) No. 7358 of 2021

मामले का शीर्षक

Arjun Kumar v. The State of Bihar

केस नंबर

Criminal Miscellaneous No. 12922 of 2022
(Arising out of Mahila P.S. Case No. 61 of 2020, Muzaffarpur)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 628

न्यायमूर्ति गण

माननीय श्री न्यायमूर्ति नवनीत कुमार पांडेय

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री इंदु भूषण, अधिवक्ता; सुश्री प्रियंका कुमारी, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री संजय कुमार तिवारी, अधिवक्ता
  • सूचक की ओर से: श्री प्रणव कुमार, श्री राजीव रंजन, एवं श्रीमती अंजना गुप्ता, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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