पटना उच्च न्यायालय का निर्देश : बिहार में जनजातीय अनुसंधान संस्थान (Tribal Research Institute) की स्थापना अनिवार्य — राज्य और केंद्र की संवैधानिक जिम्मेदारी दोहराई गई (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय जनजातीय समुदायों (Scheduled Tribes) के अधिकारों और उनके समग्र विकास से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला है। इस मामले में न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि बिहार सरकार और केंद्र सरकार जनजातीय कल्याण को लेकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से नहीं बच सकतीं, और वर्षों तक की गई देरी को अब और स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह मामला एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) के माध्यम से न्यायालय के समक्ष आया, जिसमें यह मुद्दा उठाया गया कि—
👉 बिहार जैसे राज्य में, जहाँ जनजातीय आबादी मौजूद है,
👉 अब तक Tribal Research Institute (TRI) की स्थापना नहीं की गई,
👉 जबकि केंद्र सरकार द्वारा इसके लिए 100% अनुदान (grant-in-aid) की व्यवस्था पहले से मौजूद है।

याचिकाकर्ता संस्था ने यह भी बताया कि 14 दिसंबर 2017 को भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, जिनके तहत प्रत्येक राज्य में जनजातीय अनुसंधान संस्थान स्थापित किया जाना था। इसके बावजूद बिहार सरकार ने कई वर्षों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लिया और राज्य व केंद्र सरकार दोनों से जवाब तलब किया।

जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI) क्यों आवश्यक है?

न्यायालय ने अपने फैसले में विस्तार से बताया कि Tribal Research Institute केवल एक सरकारी कार्यालय नहीं है, बल्कि यह—

  • जनजातीय समाज के इतिहास, संस्कृति, भाषा और परंपराओं के संरक्षण का केंद्र,
  • जनजातीय विकास से जुड़ी योजनाओं के अनुसंधान और मूल्यांकन का मंच,
  • नीति निर्माण (policy making) के लिए तथ्य-आधारित (evidence-based) सुझाव देने वाला संस्थान,
  • जनजातीय प्रतिनिधियों और अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण केंद्र,
  • और जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने का एक संवेदनशील माध्यम है।

अदालत ने कहा कि बिना ऐसे संस्थान के, जनजातीय विकास योजनाएँ अधूरी और अव्यवस्थित रह जाती हैं।

संविधान के संदर्भ में न्यायालय की टिप्पणी

पटना उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में भारतीय संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों का उल्लेख किया, जैसे—

  • अनुच्छेद 15(4) और 16(4) — सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान,
  • अनुच्छेद 46 — अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा का निर्देश,
  • नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) — जो राज्य को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपते हैं।

न्यायालय ने कहा कि—
👉 जनजातीय समुदायों का विकास दया या कृपा का विषय नहीं,
👉 बल्कि यह संवैधानिक दायित्व है।

राज्य सरकार द्वारा दी गई सफाई और आश्वासन

कार्यवाही के दौरान बिहार सरकार ने हलफनामा दाखिल कर यह बताया कि—

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थान की स्थापना के लिए अब प्रक्रिया शुरू की जा रही है,
  • पदों के सृजन, सेवा नियमों के निर्माण,
  • वित्त विभाग से बजटीय स्वीकृति,
  • और कैबिनेट स्तर पर निर्णय लेने जैसे कदम प्रस्तावित हैं।

राज्य सरकार ने एक समयबद्ध कार्य योजना (timeline) भी प्रस्तुत की और आश्वासन दिया कि प्रस्ताव जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।

केंद्र सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि—
जैसे ही राज्य सरकार से प्रस्ताव प्राप्त होगा,
उस पर तत्काल और विधि-सम्मत निर्णय लिया जाएगा।

पटना उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

न्यायालय ने राज्य सरकार के आश्वासन को स्वीकार तो किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि—

  • यह स्वीकार्यता सशर्त (conditional) है,
  • जनजातीय विकास जैसे विषय पर केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं,
  • यदि आगे भी देरी होती है तो न्यायालय का दरवाज़ा दोबारा खटखटाया जा सकता है।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि—

  • इस निर्णय की प्रति मुख्य सचिव, बिहार सरकार सहित सभी संबंधित अधिकारियों को भेजी जाए।

पटना उच्च न्यायालय का अंतिम निर्देश

अंततः पटना उच्च न्यायालय ने—

  • बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह
    👉 घोषित समय-सीमा का सख्ती से पालन करे,
    👉 Tribal Research Institute की स्थापना की प्रक्रिया पूरी करे,
  • केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि
    👉 प्रस्ताव मिलते ही उस पर शीघ्र निर्णय ले,
  • याचिकाकर्ता एवं अन्य जनहितैषियों को
    👉 भविष्य में अनुपालन न होने की स्थिति में पुनः न्यायालय आने की स्वतंत्रता दी।

इन निर्देशों के साथ जनहित याचिका का निपटारा कर दिया गया।

निर्णय का महत्व और आम जनता पर प्रभाव

यह फैसला बिहार के जनजातीय समाज के लिए आशा की किरण है—

  • यह निर्णय बताता है कि
    👉 जनजातीय कल्याण केवल कागज़ी योजना नहीं हो सकता,
  • यह राज्य और केंद्र दोनों को
    👉 जवाबदेह (accountable) बनाता है,
  • यह जनहित याचिकाओं की भूमिका को
    👉 सामाजिक न्याय के प्रभावी साधन के रूप में मजबूत करता है।

आम जनता के लिए यह फैसला यह संदेश देता है कि—
👉 संविधान में दिए गए अधिकारों की अनदेखी पर न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या बिहार सरकार TRI की स्थापना में अनिश्चितकाल तक देरी कर सकती है?
    ➤ नहीं। यह संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन है।
  • क्या न्यायालय जनहित याचिका में ऐसे निर्देश दे सकता है?
    ➤ हाँ। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना न्यायालय का दायित्व है।
  • क्या जनजातीय अनुसंधान संस्थान आवश्यक है?
    ➤ हाँ। यह समग्र और संवेदनशील विकास के लिए अनिवार्य है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Madhuri Patil बनाम Commissioner, Tribal Development, (1994) 6 SCC 241
  • Sudhakar Vithal Kumbhare बनाम State of Maharashtra, (2004) 9 SCC 481

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Samatha बनाम State of A.P., (1997) 8 SCC 191
  • Minerva Mills Ltd. बनाम Union of India, (1980) 3 SCC 625
  • D.S. Nakara बनाम Union of India, (1983) 1 SCC 305

मामले का शीर्षक

जनहित याचिका बनाम भारत संघ एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 3749 of 2022

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 594

न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय मुख्य न्यायाधीश संजय करोल
  • माननीय न्यायमूर्ति एस. कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री विकास कुमार पंकज, अधिवक्ता
  • भारत संघ की ओर से: डॉ. के.एन. सिंह, ASG; सुश्री प्रकृतिता शर्मा, अधिवक्ता
  • बिहार राज्य की ओर से: श्री प्रशांत प्रताप, GP-2; श्री तुहिन शंकर, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

MTUjMzc0OSMyMDIyIzEjTg==-HPlT–am1–luUUVs=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News