निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने दिनांक 22 दिसंबर 2022 को माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद की एकलपीठ के समक्ष दो याचिकाओं को एक साथ सुनते हुए यह स्पष्ट किया कि बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) द्वारा आयोजित 67वीं संयुक्त प्रारंभिक प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम में कोई कानूनी खामी नहीं थी।
मामला इस प्रकार था कि अभ्यर्थियों ने बीपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा 30 सितंबर 2022 को दी थी। इसके अगले दिन आयोग ने अस्थायी उत्तर कुंजी (provisional answer key) जारी की और उम्मीदवारों को 12 अक्टूबर 2022 तक अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराने का अवसर दिया। परंतु, याचिकाकर्ताओं ने इस निर्धारित अवधि में कोई आपत्ति नहीं दी।
आयोग ने प्राप्त आपत्तियों की समीक्षा कर अंतिम उत्तर कुंजी जारी की और 17 नवंबर 2022 को परिणाम घोषित किया। इसके बाद एक प्रश्न के अंग्रेज़ी और हिंदी संस्करण में अंतर होने के कारण आयोग ने 26 नवंबर 2022 को एक अतिरिक्त परिणाम (additional result) जारी किया, जिसमें 15 उम्मीदवारों को एक अतिरिक्त अंक दिया गया और वे सफल घोषित किए गए।
जो उम्मीदवार असफल रहे, उन्होंने इस परिणाम को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनका कहना था कि प्रश्नपत्र के D-सीरीज़ के 10 प्रश्नों के उत्तर गलत हैं, जिससे परिणाम प्रभावित हुआ। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उत्तर कुंजी की दोबारा जाँच एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति से कराई जाए और परिणाम संशोधित किया जाए।
बीपीएससी और राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित समय में कोई आपत्ति दर्ज नहीं की, इसलिए अब वे परिणाम पर सवाल नहीं उठा सकते। आयोग ने यह भी कहा कि परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप थी।
अदालत ने पाया कि 21 में से केवल 5 याचिकाकर्ताओं ने परिणाम आने के बाद आपत्ति दी थी, जबकि यह अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी थी। अदालत ने कहा कि जो उम्मीदवार परीक्षा प्रक्रिया में भाग लेते हैं और असफल हो जाते हैं, वे बाद में यह नहीं कह सकते कि प्रक्रिया गलत थी। यह सिद्धांत पहले से सुप्रीम कोर्ट के Ran Vijay Singh vs. State of Uttar Pradesh (2018) 2 SCC 357 के फैसले में स्पष्ट किया जा चुका है।
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायालय को परीक्षा के प्रश्नों या उत्तर कुंजियों में दखल नहीं देना चाहिए, जब तक कि कोई बहुत स्पष्ट और गंभीर गलती साबित न हो। ऐसे मामलों में न्यायालय विशेषज्ञ नहीं होता, इसलिए उत्तर कुंजी को सही माना जाएगा जब तक विपरीत प्रमाण न मिले।
15 अतिरिक्त उम्मीदवारों को शामिल करने के मामले में भी अदालत ने कहा कि इसमें कोई अनियमितता नहीं थी। विज्ञापन की धारा 7(ii) के अनुसार, जितने पद हैं उनके दस गुना अभ्यर्थी और सभी जो “कट-ऑफ मार्क्स” तक पहुँचते हैं, उन्हें मुख्य परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जा सकती है। इसलिए अतिरिक्त उम्मीदवारों के शामिल होने से किसी का नुकसान नहीं हुआ और कट-ऑफ में कोई बदलाव आवश्यक नहीं था।
संबद्ध याचिका (CWJC No. 17806/2022) में एक अभ्यर्थी ने समय पर आपत्ति दी थी, लेकिन उसने अपनी आपत्तियों के समर्थन में कोई प्रमाणित या आधिकारिक स्रोत नहीं बताया। उसने केवल “Google” और “reference books” का हवाला दिया था। अदालत ने इसे अपर्याप्त माना और कहा कि बिना प्रमाणित स्रोत के दी गई आपत्तियाँ स्वीकार नहीं की जा सकतीं।
अंततः, अदालत ने दोनों याचिकाओं को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और कहा कि बीपीएससी ने परीक्षा प्रक्रिया में किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव
इस निर्णय का महत्व यह है कि अब स्पष्ट रूप से यह सिद्धांत दोहराया गया कि परीक्षा परिणामों में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक कि कोई गंभीर और प्रमाणित त्रुटि न हो।
इससे आम जनता और अभ्यर्थियों के लिए निम्न बातें स्पष्ट होती हैं—
- परीक्षा के दौरान दी गई आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
- यदि कोई उम्मीदवार निर्धारित समय में आपत्ति नहीं देता, तो बाद में वह परिणाम को चुनौती नहीं दे सकता।
- उत्तर कुंजी को विशेषज्ञों का निर्णय माना जाएगा, और अदालत उसमें दखल नहीं दे सकती।
- जो उम्मीदवार परीक्षा प्रक्रिया में भाग लेते हैं, वे परिणाम आने के बाद नियमों पर सवाल नहीं उठा सकते।
- सरकारी आयोगों को भी इस फैसले से मजबूती मिली है, क्योंकि यह निर्णय उनकी पारदर्शी और व्यवस्थित प्रक्रिया की पुष्टि करता है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- मुद्दा 1: क्या याचिकाकर्ता उत्तर कुंजी को चुनौती दे सकते हैं, जबकि उन्होंने समय पर आपत्ति नहीं की थी?
- निर्णय: नहीं, जिन्होंने समय पर आपत्ति नहीं दी, वे अब प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते।
- मुद्दा 2: क्या अदालत पुनर्मूल्यांकन या उत्तर कुंजी की दोबारा समीक्षा का आदेश दे सकती है?
- निर्णय: नहीं, जब तक कोई गंभीर और स्पष्ट गलती न हो (Ran Vijay Singh मामला लागू)।
- मुद्दा 3: क्या अतिरिक्त 15 उम्मीदवारों को शामिल करना गलत था?
- निर्णय: नहीं, यह सुधार एक वास्तविक त्रुटि को ठीक करने के लिए था और सब पर समान रूप से लागू किया गया।
- मुद्दा 4: क्या दूसरा याचिकाकर्ता, जिसने आपत्ति दी थी, राहत का हकदार था?
- निर्णय: नहीं, क्योंकि उसने प्रमाणित स्रोत नहीं बताया था; उसकी आपत्तियाँ अस्वीकृत की गईं।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Ran Vijay Singh & Ors. vs. State of Uttar Pradesh & Ors. (2018) 2 SCC 357
- Rishal & Ors. vs. Rajasthan Public Service Commission & Ors. (2018) 8 SCC 81
- Prakash Chandra vs. State of Bihar 2019 (3) PLJR 983
- Anupal Singh & Ors. vs. State of Uttar Pradesh & Ors. (2020) 2 SCC 173
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Ran Vijay Singh & Ors. vs. State of Uttar Pradesh & Ors. (2018) 2 SCC 357
- U.P. Public Service Commission vs. Rahul Singh (2018) 7 SCC 254
- Vinod Kumar & Ors. vs. State of Bihar (2022) 3 PLJR 383
- BPSC vs. Ashish Kumar Pathak & Ors. (2021) 1 BLJ 673 (PHC)
- Ravindra Kumar Singh vs. High Court of Judicature at Patna (2016) 1 PLJR 865
मामले का शीर्षक
कई याचिकाकर्ता बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 17803 of 2022
साथ में CWJC No. 17806 of 2022
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 483
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से (CWJC 17803/2022):
श्री वाई. वी. गिरी (वरिष्ठ अधिवक्ता), सुश्री सृष्टि सिंह, श्री प्रणव कुमार, और श्री सुमित कुमार - राज्य की ओर से:
श्री सुमन कुमार झा (AC to AAG-3) - बीपीएससी की ओर से:
श्री संजय पांडेय और श्री निशांत कुमार झा - याचिकाकर्ता (CWJC 17806/2022):
श्री सुरेश कुमार ईश्वर
निर्णय का लिंक
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