पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: एक ही घटना पर दो एफआईआर और जांच के विलय का आदेश — 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

यह फैसला पटना उच्च न्यायालय का है, जिसमें एक ही आपराधिक घटना से जुड़ी दो अलग-अलग एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) पर सुनवाई की गई। यह घटना 01 मई 2019 को पूर्णिया जिले में हुई थी। अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या दूसरी एफआईआर (जो अगले दिन यानी 02 मई 2019 को दर्ज हुई) को रद्द किया जाए या नहीं, और जब एक ही घटना पर दो एफआईआर दर्ज हो जाएं तो जांच को कैसे आगे बढ़ाया जाए।

पहली एफआईआर (के. हाट सहायक थाना कांड संख्या 292/2019) 01 मई 2019 को दर्ज हुई थी। दूसरी एफआईआर (कांड संख्या 294/2019) 02 मई 2019 को उसी घटना के संबंध में दर्ज की गई। दोनों में तारीख, स्थान और घटना का तरीका लगभग एक जैसा था। बाद में जब पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो गई, तो दूसरी एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) जोड़ दी गई। जबकि पहली एफआईआर में यह संशोधन समय पर नहीं हुआ। इस वजह से जांच और साक्ष्य इकट्ठा करने की प्रक्रिया मुख्य रूप से दूसरी एफआईआर में चल रही थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दूसरी एफआईआर अवैध है, क्योंकि कानून एक ही घटना पर दूसरी एफआईआर की अनुमति नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह सिद्धांत तय है कि एक ही घटना पर केवल एक एफआईआर दर्ज हो सकती है, और यदि कोई विरोधी पक्ष अपनी बात रखना चाहता है, तो उसे “क्रॉस केस” के रूप में लिया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, राज्य और जांच एजेंसी (CID) ने यह दलील दी कि दोनों मामलों की जांच पहले से सीआईडी के पास है और दूसरी एफआईआर में काफी साक्ष्य इकट्ठा हो चुके हैं। यदि इस दूसरी एफआईआर को तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया गया, तो अब तक की पूरी जांच बेकार हो जाएगी और न्याय में देरी होगी।

सीआईडी ने हलफनामा देकर एक व्यावहारिक समाधान सुझाया — दोनों एफआईआर की जांच को “अमलगमेट” (विलय) किया जाए। यानी दूसरी एफआईआर की पूरी फाइल, जांच रिपोर्ट और साक्ष्य को पहली एफआईआर में मिला दिया जाए, ताकि दोहरी जांच खत्म हो और पूरा मामला एक ही केस नंबर में आगे बढ़े।

अदालत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उसने कहा कि दूसरी एफआईआर को रद्द करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसकी पूरी जांच और दस्तावेज पहली एफआईआर (कांड संख्या 292/2019) में जोड़ दिए जाएं। इससे न्यायिक प्रक्रिया भी सुचारू रहेगी और साक्ष्य भी सुरक्षित रहेंगे।

अदालत ने यह भी पाया कि सीआईडी ने जांच संभालने के बाद दो वर्षों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की थी। 10 जनवरी 2020 के बाद केस डायरी में कोई अद्यतन प्रविष्टि नहीं थी। यह गंभीर लापरवाही मानी गई। अदालत ने सीआईडी को चेतावनी दी कि यह उसका “क्रेडिबिलिटी रिस्टोर करने” का मौका है। उसे तुरंत गिरफ्तारी वारंट लागू करने और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 82 और 83 के तहत कार्रवाई करनी होगी।

दूसरी याचिका (सूचना देने वाले पक्ष द्वारा दायर) में शिकायत थी कि हालांकि मामला सही पाया गया और कई आरोपियों के खिलाफ सबूत हैं, परंतु केवल एक आरोपी पर चार्जशीट दाखिल की गई है और बाकी के खिलाफ वारंट निष्पादन लंबित है। अदालत ने इस पर भी सख्त टिप्पणी की और तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।

अंततः अदालत ने दोनों याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा — दूसरी एफआईआर रद्द नहीं की जाएगी; उसकी पूरी जांच और साक्ष्य पहली एफआईआर में जोड़ दिए जाएंगे; सीआईडी को लंबित वारंट तुरंत निष्पादित करने और जांच को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया जाता है।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि जब एक ही घटना पर कई एफआईआर दर्ज हो जाएं, तो अदालत तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय व्यावहारिक और न्यायपूर्ण समाधान तलाश सकती है। यहाँ अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि “एक घटना — एक एफआईआर” के सिद्धांत का पालन भी हो और साथ ही पहले से की गई जांच व्यर्थ भी न जाए।

आम जनता के लिए यह संदेश है कि यदि पुलिस या प्रशासनिक चूक से एक ही मामले में दो एफआईआर दर्ज हो जाती हैं, तो भी न्यायालय दोनों को मिलाकर सही दिशा में जांच करा सकता है। सरकार और पुलिस के लिए यह फैसला एक चेतावनी है कि किसी मामले को सीआईडी या किसी विशेष एजेंसी को सौंपने के बाद उसे वर्षों तक ठंडे बस्ते में नहीं छोड़ा जा सकता।

इस निर्णय से यह भी संकेत मिलता है कि अदालतें केवल कागजी कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हैं — वे वास्तविक कार्रवाई और जिम्मेदारी की अपेक्षा करती हैं। यह फैसला प्रशासनिक पारदर्शिता और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करता है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या दूसरी एफआईआर रद्द की जानी चाहिए?
    निर्णय: नहीं। अदालत ने कहा कि चूंकि जांच एजेंसी ने स्वयं दूसरी एफआईआर की जांच और रिकॉर्ड को पहली एफआईआर में मिलाने का प्रस्ताव दिया है, इसलिए रद्द करने की आवश्यकता नहीं है।
  • एक ही घटना पर दो एफआईआर होने पर क्या कदम उठाया जाए?
    निर्णय: जांच और साक्ष्य का विलय। दूसरी एफआईआर (कांड संख्या 294/2019) को पहली एफआईआर (कांड संख्या 292/2019) में जोड़ा जाएगा, जिससे सभी साक्ष्य एक ही रिकॉर्ड में रहेंगे।
  • सीआईडी की देरी और निष्क्रियता पर क्या निर्देश दिए गए?
    निर्णय: अदालत ने दो साल की निष्क्रियता पर नाराजगी जताई और निर्देश दिया कि सभी लंबित वारंट तुरंत निष्पादित किए जाएं और धारा 82–83 CrPC के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाए।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • T.T. Antony v. State of Kerala (2001) 6 SCC 181
  • Upkar Singh v. Ved Prakash (2004) 13 SCC 292
  • Babubhai v. State of Gujarat (2010) 12 SCC 254
  • Surender Kaushik v. State of U.P. (2013) 5 SCC 148
  • Awaqdesh Kumar Jha @ Akhilesh Kumar Jha v. State of Bihar (2016) 3 SCC 8
  • Sreekumar v. State of Kerala (2018) 4 SCC 579
  • Anil Singh @ Anil Kumar Singh v. State of Bihar (2018 SCC OnLine Pat 1526)
  • Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. v. State of Maharashtra (2021 SCC OnLine SC 315)
  • Amish Devgan v. Union of India (2021) 1 SCC 1

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
(विशेष रूप से कोई नया निर्णय नहीं, बल्कि सीआईडी के हलफनामे और व्यावहारिक समाधान को स्वीकार किया गया।)

मामले का शीर्षक
Petitioners v. State of Bihar & Ors. (संयुक्त रूप से सुना गया मामला)

केस नंबर
Criminal Writ Jurisdiction Case No. 1850 of 2019 with Criminal Writ Jurisdiction Case No. 14 of 2021 (कांड संख्या 292/2019 और 294/2019, जिला पूर्णिया से संबंधित)।

उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 473

न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद (CAV Judgment दिनांक 23.12.2022)

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • Cr.W.J.C. No. 1850/2019 में:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और सहायक वकील
    • राज्य की ओर से राज्य अधिवक्ता (State Counsel-1)
    • सूचनाकर्ता की ओर से अधिवक्ता
  • Cr.W.J.C. No. 14/2021 में:
    • याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता
    • राज्य की ओर से सहायक ए.ए.जी.-III

(वास्तविक नाम सार्वजनिक रूप से नहीं दर्शाए गए हैं।)

निर्णय का लिंक
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