निर्णय की सरल व्याख्या
पृष्ठभूमि:
एक सरकारी कंपनी (याचिकाकर्ता) ने पटना उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की, जिसमें उसने जिला न्यायाधीश, पटना द्वारा पारित आदेश दिनांक 26.04.2022 को चुनौती दी। उस आदेश में जिला न्यायाधीश ने मध्यस्थ (Arbitrator) के अधिकार समाप्त करने से इनकार कर दिया था। यह याचिका Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 14 के तहत दायर की गई थी, जिसमें यह कहा गया कि मध्यस्थ अब अपने कार्य करने में “de jure और de facto” रूप से अक्षम हो गए हैं।
मामले की शुरुआत:
2017 में पटना उच्च न्यायालय ने धारा 11 के तहत एक विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया था — एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को। यह विवाद एक सरकारी कंपनी और एक निजी ठेकेदार (प्रतिवादी) के बीच अनुबंध से जुड़ा था। कार्यवाही के दौरान फीस को लेकर विवाद हुआ। सरकारी कंपनी का कहना था कि फीस चौथी अनुसूची (Fourth Schedule) के अनुसार तय होनी चाहिए, जबकि मध्यस्थ का मानना था कि दावे की राशि अधिक होने के कारण अधिक फीस वाजिब है।
इस पर मतभेद बढ़ा, और सरकारी कंपनी ने जिला न्यायालय में आवेदन दायर कर मध्यस्थ के अधिकार समाप्त करने की मांग की। उसने कहा कि मध्यस्थ के आचरण से पक्षपात (bias) झलकता है और उन्होंने निष्पक्षता खो दी है। जिला न्यायाधीश ने यह आवेदन खारिज कर दिया। उसके बाद यह मामला उच्च न्यायालय में रिट के रूप में आया।
याचिकाकर्ता का पक्ष:
सरकारी कंपनी ने कहा कि –
- मध्यस्थ ने चौथी अनुसूची के विपरीत अधिक फीस तय की।
- फीस जमा न करने पर उन्होंने प्रतिवादी पक्ष को नुकसान पहुँचाने की धमकी दी।
- जब उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फीस चौथी अनुसूची के अनुसार ही तय होगी, तब भी उन्होंने तुरंत पुनर्निर्धारण नहीं किया।
- मध्यस्थ खुद अदालत में पेश हुए जब अदालत ने उनके सचिव को नोटिस जारी किया था — इससे उनके प्रति पक्षपात की भावना और मजबूत हुई।
इन सब तथ्यों के आधार पर कंपनी का कहना था कि मध्यस्थ अब निष्पक्ष नहीं रहे और “de jure तथा de facto रूप से कार्य करने में असमर्थ” हैं, इसलिए उनका अधिकार समाप्त किया जाना चाहिए।
प्रतिवादी (निजी कंपनी) का जवाब:
प्रतिवादी ने कहा कि फीस को लेकर मतभेद पूर्वाग्रह या पक्षपात का प्रमाण नहीं है। यदि किसी पक्ष को न्यायधीश या मध्यस्थ के आचरण पर संदेह है, तो उसे धारा 13 और धारा 12 के तहत प्रक्रिया अपनानी चाहिए। धारा 14 का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब मध्यस्थ कानूनी रूप से अयोग्य (ineligible) हो जाए, जैसा कि धारा 12(5) और Seventh Schedule में बताया गया है।
प्रतिवादी ने यह भी बताया कि मध्यस्थता की कार्यवाही काफी आगे बढ़ चुकी है और साक्ष्य लगभग पूरे हो चुके हैं। केवल फीस के मुद्दे को लेकर पूरे प्रक्रिया को रोकना उचित नहीं होगा।
उच्च न्यायालय का विचार:
न्यायालय ने सबसे पहले यह देखा कि धारा 12, 13, 14 और 29A का ढांचा क्या कहता है।
- धारा 12 बताती है कि कौन-सी परिस्थितियाँ मध्यस्थ को अयोग्य बनाती हैं।
- धारा 13 कहती है कि यदि किसी पक्ष को निष्पक्षता पर “वाजिब संदेह” है, तो वह आवेदन मध्यस्थ स्वयं तय करेगा।
- धारा 14 केवल तब लागू होती है जब मध्यस्थ “वास्तव में” या “कानूनी रूप से” काम करने में असमर्थ हो जाए।
इसलिए न्यायालय ने माना कि धारा 14 का दायरा सीमित है, लेकिन यदि किसी कार्यवाही के बीच में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए जिससे मध्यस्थ de jure या de facto रूप से अक्षम हो जाए, तब अदालत इस पर विचार कर सकती है।
पटना हाईकोर्ट का दृष्टिकोण:
न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कार्यवाही के दौरान किसी कारण से मध्यस्थ पर पक्षपात का संदेह मजबूत हो जाए, तो धारा 14 के तहत उसकी नियुक्ति समाप्त की जा सकती है। हालांकि यह निर्णय “उच्च स्तर की सावधानी” के साथ लिया जाना चाहिए।
तथ्यों पर लागू करना:
न्यायालय ने पाया कि इस मामले में पक्षपात या पूर्वाग्रह के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। फीस को लेकर मतभेद या अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होना निष्पक्षता की कमी का प्रमाण नहीं है।
उच्च न्यायालय ने NHAI v. Gayatri Jhansi Roadways Ltd. (2020) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि फीस के संबंध में लिए गए निर्णय से मध्यस्थ “de jure unable” नहीं बनता। इसलिए फीस विवाद के आधार पर उसके अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
अंतिम निर्णय:
पटना उच्च न्यायालय ने रिट याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही यह निर्देश दिया कि अब मध्यस्थता की प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जाए — अधिमानतः चार महीने के भीतर।
निष्कर्ष:
यह फैसला बताता है कि फीस को लेकर मतभेद या मामूली विवाद को आधार बनाकर मध्यस्थ को बदलना उचित नहीं। केवल वही परिस्थितियाँ पर्याप्त हैं जो यह साबित करें कि मध्यस्थ वास्तव में कार्य करने में असमर्थ है या कानूनी रूप से अयोग्य है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव
- मध्यस्थता की स्थिरता: यह फैसला सुनिश्चित करता है कि फीस विवाद जैसे मुद्दों से कार्यवाही बीच में बाधित न हो।
- प्रक्रिया की स्पष्टता: यदि निष्पक्षता पर संदेह है, तो पहले धारा 13 की प्रक्रिया अपनानी चाहिए; धारा 14 केवल “कानूनी अक्षमता” के मामलों में लागू होगी।
- सरकारी संस्थाओं के लिए संदेश: यह फैसला सरकारी कंपनियों को आश्वस्त करता है कि फीस तय करने में ईमानदारी और नियमों का पालन करने पर उन्हें नुकसान नहीं होगा।
- समयसीमा पर जोर: न्यायालय ने चार महीने की समयसीमा तय कर यह दिखाया कि अब न्यायिक प्रणाली मध्यस्थता के विलंब को बर्दाश्त नहीं करेगी।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या धारा 14 के तहत मध्यस्थ का अधिकार पक्षपात के आधार पर समाप्त किया जा सकता है?
✔ हाँ, लेकिन केवल तभी जब पक्षपात इतना गंभीर हो कि मध्यस्थ “de jure या de facto” रूप से कार्य करने में अक्षम हो जाए। - क्या फीस विवाद से पक्षपात साबित होता है?
❌ नहीं। केवल फीस तय करने के तरीके से यह नहीं माना जा सकता कि मध्यस्थ पक्षपाती है। - निष्पक्षता पर संदेह की स्थिति में क्या रास्ता है?
✔ पहले धारा 13 के तहत आवेदन और बाद में धारा 34 के तहत चुनौती। - अंतिम आदेश:
याचिका खारिज; मध्यस्थता की प्रक्रिया चार महीने में पूरी करने का निर्देश।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- P.D. Dinakaran v. Judges Inquiry Committee (2011) 8 SCC 380
- Union of India v. Singh Builders Syndicate (2009) 4 SCC 523
- Doshion Pvt. Ltd. v. Hindustan Zinc Ltd. (Raj HC, 2019)
- NHAI v. Gayatri Jhansi Roadways Ltd. (2020) 17 SCC 626
- Delhi Tourism & Transport Dev. Corp. v. Swadeshi Civil Infrastructure Pvt. Ltd. (Delhi HC, 2021)
- Clarke Energy India Pvt. Ltd. v. SAS EPC Solution Pvt. Ltd. (Madras HC, 2022)
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- HRD Corporation (Marcus Oil) v. GAIL (India) Ltd. (2018) 12 SCC 471
- Swadesh Kumar (2022 SCC OnLine SC 556)
- Ranjeet Thakur v. Union of India (1987) 4 SCC 611
- NHAI v. Gayatri Jhansi Roadways Ltd. (2020) 17 SCC 626
- Doshion Pvt. Ltd. v. Hindustan Zinc Ltd. (Raj HC)
मामले का शीर्षक
Bihar State Electronics Development Corporation Ltd. & Anr. बनाम State of Bihar & Ors.
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 7337 of 2022
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 421
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा (Hon’ble Mr. Justice Sanjeev Prakash Sharma)
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री पी.के. शाही (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री गिरिजीश कुमार, श्री विकास कुमार
- प्रतिवादी (निजी कंपनी) की ओर से: श्री कुँवर शशांक, श्री अंकित कटियार
- राज्य की ओर से: श्री सुनील कुमार मंडल (SC-3) और श्री अर्जुन प्रसाद (AC to SC-3)
निर्णय का लिंक
MTUjNzMzNyMyMDIyIzEjTg==-kQ33q–ak1–kS–am1–qc=
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