GST में इनपुट टैक्स क्रेडिट की समय-सीमा वैध: पटना हाई कोर्ट ने धारा 16(4) को सही ठहराया (2023)

2. निर्णय की सरल व्याख्या

इस फैसले में पटना हाई कोर्ट ने जीएसटी कानून के एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रावधान, यानी धारा 16(4) CGST/BGST अधिनियम, 2017, की वैधता पर फैसला दिया। यह मामला उन व्यापारियों (GST पंजीकृत डीलरों) से जुड़ा था जिन्हें केवल देर से रिटर्न दाखिल करने के कारण इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) से वंचित कर दिया गया था।

सरल शब्दों में समझें तो इनपुट टैक्स क्रेडिट का मतलब होता है कि व्यापारी ने जो टैक्स अपने माल या सेवा की खरीद पर दिया है, उसे वह आगे सरकार को देने वाले टैक्स से घटा सकता है। GST प्रणाली इसी सिद्धांत पर काम करती है ताकि “टैक्स पर टैक्स” न लगे।

इस मामले में कई व्यापारियों ने पटना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सभी याचिकाओं में एक जैसी कानूनी समस्या थी, इसलिए अदालत ने एक याचिका को मुख्य मामला मानकर बाकी सभी मामलों का निपटारा उसी के आधार पर किया।

मुख्य याचिका में यह तथ्य सामने आया कि संबंधित व्यापारी ने अपने GSTR-1 रिटर्न (बिक्री विवरण) समय पर दाखिल कर दिए थे, लेकिन GSTR-3B रिटर्न (जिसके जरिए टैक्स का भुगतान और ITC का दावा होता है) फरवरी और मार्च 2019 के लिए काफी देर से, यानी अक्टूबर और नवंबर 2019 में दाखिल किए।

GST कानून के अनुसार, उस समय धारा 16(4) यह कहती थी कि किसी भी वित्तीय वर्ष का ITC, अगले वर्ष के सितंबर महीने की तय तारीख (या वार्षिक रिटर्न, जो पहले हो) तक ही लिया जा सकता है। चूंकि व्यापारी ने इस समय-सीमा के बाद GSTR-3B दाखिल किया, इसलिए विभाग ने धारा 73 के तहत नोटिस जारी कर दिया।

विभाग का कहना था कि भले ही खरीद वास्तविक हो और सप्लायर ने टैक्स भरा हो, लेकिन अगर कानून में तय समय-सीमा के भीतर ITC का दावा नहीं किया गया, तो क्रेडिट नहीं मिल सकता। इसके आधार पर टैक्स, ब्याज और पेनल्टी मिलाकर करीब ₹1.34 करोड़ की मांग बनाई गई।

व्यापारी ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन अपीलीय प्राधिकरण ने भी विभाग के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद व्यापारी ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की।

हाई कोर्ट के सामने व्यापारियों की मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:

  • ITC उनका अर्जित अधिकार (vested right) है, जिसे केवल देरी के कारण छीना नहीं जा सकता।
  • ITC को संपत्ति का अधिकार (Article 300A) माना जाना चाहिए।
  • धारा 16(4) बहुत कठोर और अन्यायपूर्ण है, इसलिए या तो इसे असंवैधानिक घोषित किया जाए या फिर “रीड डाउन” किया जाए, यानी सीमित रूप में लागू किया जाए।
  • GSTR-3B को धारा 39(1) की रिटर्न मानना ही गलत है, इसलिए उस पर आधारित समय-सीमा भी गलत है।

सरकार की ओर से केंद्र और राज्य दोनों ने इन दलीलों का विरोध किया। उनका कहना था कि GST में ITC कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं है, बल्कि कानून द्वारा दी गई एक शर्तों वाली सुविधा है। जब कानून साफ तौर पर कहता है कि तय तारीख के बाद ITC नहीं मिलेगा, तो अदालत उसमें ढील नहीं दे सकती।

पटना हाई कोर्ट ने सरकार की बात से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि धारा 16 को पूरा पढ़ने पर साफ हो जाता है कि ITC “शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन” है। धारा 16(4) उन्हीं शर्तों में से एक है। अगर व्यापारी इस शर्त का पालन नहीं करता, तो उसे यह नहीं कहा जा सकता कि उसका कोई मौलिक या संपत्ति का अधिकार छिन गया है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ITC तब तक “अधिकार” नहीं बनता, जब तक कानून की सभी शर्तें पूरी न हों। इसलिए Article 300A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन नहीं होता।

अदालत ने यह भी कहा कि टैक्स कानूनों में कट-ऑफ डेट (समय-सीमा) रखना कोई असंवैधानिक बात नहीं है। सभी व्यापारियों पर एक जैसा नियम लागू होता है, इसलिए Article 14 (समानता का अधिकार) का भी उल्लंघन नहीं होता।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए पटना हाई कोर्ट ने कहा कि ITC एक प्रकार की रियायत (concession) है, जिसे सख्ती से कानून के अनुसार ही लिया जा सकता है। इस आधार पर सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

3. निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  1. व्यापारियों के लिए चेतावनी:
    यह फैसला साफ संदेश देता है कि GST में रिटर्न देर से दाखिल करने का नुकसान स्थायी हो सकता है। एक बार धारा 16(4) की समय-सीमा निकल गई, तो ITC वापस नहीं मिलेगा।
  2. GST व्यवस्था में अनुशासन:
    सरकार के लिए यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे GST सिस्टम में समय पर अनुपालन (compliance) को बढ़ावा मिलता है।
  3. कानूनी स्पष्टता:
    इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि ITC को अदालतें “मौलिक अधिकार” या “संपत्ति का अधिकार” नहीं मानेंगी, जब तक कानून की शर्तें पूरी न हों।
  4. भविष्य के मुकदमों पर असर:
    अब इसी मुद्दे पर आगे चुनौती देना कठिन होगा, क्योंकि पटना हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से धारा 16(4) को वैध ठहरा दिया है।

4. कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • मुद्दा 1: क्या धारा 16(4) संविधान के अनुच्छेद 14 और 300A का उल्लंघन करती है?
    • निर्णय: नहीं, धारा 16(4) पूरी तरह वैध है।
    • कारण: ITC तभी अधिकार बनता है जब सभी शर्तें पूरी हों।
  • मुद्दा 2: क्या धारा 16(4) को “रीड डाउन” किया जाना चाहिए?
    • निर्णय: नहीं।
    • कारण: कानून की भाषा स्पष्ट है, इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है।
  • मुद्दा 3: क्या देर से रिटर्न भरने पर ITC रोकना व्यापार करने के अधिकार पर अनुचित रोक है?
    • निर्णय: नहीं।
    • कारण: यह सभी पर समान रूप से लागू होने वाला टैक्स कानून है।
  • मुद्दा 4: क्या याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत राहत दी जा सकती थी?
    • निर्णय: नहीं।
    • कारण: जब कानून वैध है, तो विभागीय आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं है।

5. पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Vinoy Viswam v. Union of India, (2017) 7 SCC 59
  • Modern Dental College v. State of M.P., (2016) 7 SCC 353
  • K.T. Moopil Nair v. State of Kerala, AIR 1961 SC 552
  • Apfert Technologies Pvt. Ltd. v. Union of India (P&H High Court)

6. न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Jilubhai Nanbhai Khachar v. State of Gujarat, 1995 Supp (1) SCC 596
  • ALD Automotive Pvt. Ltd. v. CTO, (2019) 13 SCC 225
  • Jayam and Company v. Assistant Commissioner, (2016) 15 SCC 125

7. मामले का शीर्षक

पंजीकृत व्यापारी बनाम भारत संघ एवं बिहार राज्य

8. केस नंबर

CWJC No. 9108 of 2021

9. न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह
  • माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

10. वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अन्य अधिवक्ता
  • भारत संघ की ओर से: अपर सॉलिसिटर जनरल
  • बिहार राज्य की ओर से: महाधिवक्ता, बिहार

11. निर्णय का लिंक

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