पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: विभागीय कार्यवाही लंबित रहने पर ग्रेच्युटी रोकने का अधिकार (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी की ग्रेच्युटी (सेवानिवृत्ति उपरांत देय राशि) को कब रोका या जब्त किया जा सकता है। यह फैसला 6 दिसंबर 2022 को माननीय न्यायमूर्ति हरिश कुमार द्वारा दिया गया। मामला एक सार्वजनिक उपक्रम (सरकारी संस्था) से जुड़ा था, जिसमें कर्मचारी पर गोदाम में अनाज की कमी का आरोप लगा और उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति (compulsory retirement) की सजा दी गई थी।

कर्मचारी के खिलाफ 2011 में गोदाम में माल की कमी पाई गई थी। विभाग ने जांच बैठाई और आरोप सही पाए जाने पर सजा दी। साथ ही ग्रेच्युटी की राशि को भी जब्त (forfeit) कर लिया गया। कर्मचारी ने इस फैसले को केंद्रीय सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण (CGIT), धनबाद में चुनौती दी। इस दौरान उसने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत नियंत्रक प्राधिकरण (Controlling Authority) के समक्ष भी आवेदन दे दिया।

नियंत्रक प्राधिकरण ने आदेश दिया कि विभाग कर्मचारी को 10% ब्याज सहित ग्रेच्युटी का भुगतान करे। विभाग ने इस आदेश को अपील प्राधिकरण (Appellate Authority) में चुनौती दी, लेकिन अपील भी खारिज कर दी गई। तब विभाग ने पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

उच्च न्यायालय में विभाग की ओर से यह दलील दी गई कि धारा 4(6) ग्रेच्युटी अधिनियम के तहत, यदि किसी कर्मचारी को अनैतिक आचरण (moral turpitude) या नुकसान पहुँचाने वाले कृत्य के कारण सेवा से हटाया जाता है, तो उसकी ग्रेच्युटी को रोका या जब्त किया जा सकता है। इसलिए जब विभागीय जांच में दोष सिद्ध हो चुका है और अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा दी जा चुकी है, तो ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं किया जा सकता।

विभाग ने सर्वोच्च न्यायालय के दो प्रमुख फैसलों — State Bank of India v. Ramlal Bhaskar (2011) 10 SCC 249 और Mahanadi Coalfields Ltd. v. Sri Rabindranath Choubey (2020) — का हवाला दिया। इन फैसलों में यह सिद्धांत स्थापित किया गया था कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा गंभीर अनुशासनहीनता या अपराध के कारण समाप्त की जाती है, तो ग्रेच्युटी जब्त की जा सकती है।

कर्मचारी की ओर से यह तर्क रखा गया कि उसे बरखास्त (dismiss) नहीं किया गया, बल्कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई है, इसलिए उसकी ग्रेच्युटी रोकी नहीं जा सकती। साथ ही ग्रेच्युटी अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है।

न्यायालय ने सभी दलीलों पर विचार करते हुए Mahanadi Coalfields Ltd. बनाम Rabindranath Choubey (तीन जजों की पीठ) के निर्णय को आधार माना। सर्वोच्च न्यायालय ने उस मामले में यह स्पष्ट किया था कि –

  • ग्रेच्युटी अधिनियम की धारा 4(6), जो धारा 4(1) से ऊपर है, यह कहती है कि यदि कर्मचारी की सेवा गंभीर दुराचार के कारण समाप्त की जाती है, तो ग्रेच्युटी को आंशिक या पूर्ण रूप से जब्त किया जा सकता है।
  • यदि विभागीय कार्यवाही लंबित है, तो नियोक्ता ग्रेच्युटी रोक सकता है।
  • अगर कार्यवाही के बाद कर्मचारी दोषी पाया जाता है, तो ग्रेच्युटी जब्त की जा सकती है।
  • और यदि कर्मचारी दोषमुक्त पाया जाता है, तो पूरी ग्रेच्युटी ब्याज सहित दी जानी चाहिए।

इन सिद्धांतों को अपनाते हुए पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक विभागीय या औद्योगिक न्यायाधिकरण (CGIT) में मामला लंबित है, तब तक ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं किया जा सकता। नियंत्रक और अपील प्राधिकरण ने जल्दबाजी में आदेश पारित किया, इसलिए वे आदेश न्यायिक रूप से सही नहीं थे।

अतः न्यायालय ने दोनों आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि कर्मचारी की ग्रेच्युटी का निर्णय CGIT के अंतिम फैसले के अनुसार होगा।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला सरकारी कर्मचारियों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और निजी संस्थानों, सभी के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है।

  • अब यह स्पष्ट हो गया है कि यदि किसी कर्मचारी पर गंभीर आरोप हैं और विभागीय जांच या औद्योगिक विवाद लंबित है, तो नियोक्ता ग्रेच्युटी का भुगतान रोक सकता है।
  • लेकिन यदि बाद में कर्मचारी निर्दोष साबित होता है, तो उसे पूरी ग्रेच्युटी ब्याज सहित दी जाएगी।
  • यह फैसला न्यायसंगत संतुलन बनाता है — नियोक्ता को अनुशासन बनाए रखने का अधिकार देता है, और कर्मचारी के वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी करता है।
  • सरकारी विभागों के लिए यह दिशा-निर्देश है कि ग्रेच्युटी अधिनियम की धारा 4(6) को केवल वैध मामलों में लागू किया जाए और हर मामले में उचित प्रक्रिया (due process) का पालन हो।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • प्रश्न: क्या नियंत्रक और अपील प्राधिकरण कर्मचारी को ग्रेच्युटी भुगतान का आदेश दे सकते हैं, जबकि विभागीय कार्यवाही और CGIT में मामला लंबित है?
    निर्णय: नहीं। उच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक मामला लंबित है, तब तक ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं किया जा सकता।
  • प्रश्न: क्या धारा 4(6), धारा 4(1) से ऊपर है?
    निर्णय: हाँ। धारा 4(6) में non obstante clause है, इसलिए यह प्रमुख है। गंभीर दुराचार के मामलों में ग्रेच्युटी रोकी या जब्त की जा सकती है।
  • प्रश्न: क्या नियोक्ता कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद भी विभागीय कार्यवाही जारी रख सकता है?
    निर्णय: हाँ। यदि नियमों में अनुमति है, तो नियोक्ता जांच पूरी कर सकता है और परिणाम के आधार पर ग्रेच्युटी रोक या जारी कर सकता है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • State Bank of India v. Ramlal Bhaskar, (2011) 10 SCC 249
  • Chairman-cum-Managing Director, Mahanadi Coalfields Ltd. v. Sri Rabindranath Choubey, 2020 (3) PLJR (SC) 438

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Chairman-cum-Managing Director, Mahanadi Coalfields Ltd. v. Sri Rabindranath Choubey (तीन न्यायाधीशों की पीठ) — जिसमें कहा गया कि धारा 4(6) के तहत नियोक्ता को ग्रेच्युटी रोकने का अधिकार है जब तक अनुशासनिक जांच पूरी न हो जाए।

मामले का शीर्षक

Food Corporation of India बनाम Union of India एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 11529 of 2019

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 354

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति हरिश कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री साकेत तिवारी, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से: श्री उदय प्रकाश शर्मा, अधिवक्ता
  • भारत सरकार की ओर से: श्रीमती कनक वर्मा, केंद्रीय सरकारी अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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