पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: नाबालिग होने का लाभ देना अनिवार्य – 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने वर्ष 2022 में एक अहम फैसला सुनाया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि यदि किसी आरोपी की उम्र का निर्धारण केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है, तो न्यायालय को “एक वर्ष की छूट” (benefit of margin) अवश्य देनी चाहिए। इस नियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि उम्र के निर्धारण में थोड़ा भी संदेह हो, तो फैसला बालक (juvenile) के पक्ष में दिया जाए।

यह मामला पश्चिम चंपारण (बेतिया) जिले के मटियारिया थाना क्षेत्र का था। वर्ष 2017 में दर्ज प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, एक व्यक्ति पर धारा 341, 354A, 506 भा.दं.सं. और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 8 के तहत आरोप लगाए गए थे। शिकायत थी कि आरोपी ने एक लड़की से छेड़छाड़ की और आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया।

जब यह मामला विशेष न्यायाधीश (POCSO) के समक्ष चला, तो आरोपी ने यह दावा किया कि वह घटना के समय नाबालिग (juvenile) था। आरोपी का कहना था कि उसका जन्मदिन 14 फरवरी 2003 है, और वह 2019 में मैट्रिक परीक्षा पास कर चुका है, जिसमें यही जन्मतिथि अंकित है। लेकिन उस समय आरोपी स्कूल या नगरपालिका से कोई प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं कर सका।

इस कारण, अदालत ने उम्र निर्धारण के लिए मेडिकल बोर्ड से राय मांगी। मेडिकल बोर्ड ने मई 2019 में बताया कि आरोपी की उम्र लगभग 19 से 20 वर्ष के बीच है। इस रिपोर्ट के आधार पर निचली अदालत ने कहा कि आरोपी बालिग है और उसे किशोर नहीं माना जा सकता।

आरोपी ने इस आदेश को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

उच्च न्यायालय में सुनवाई और तर्क

अभियुक्त (याचिकाकर्ता) के वकील ने तर्क दिया कि मेडिकल रिपोर्ट में उम्र का जो अनुमान दिया गया है, वह सटीक नहीं होता, बल्कि उसमें दो वर्ष तक का अंतर संभव है। किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत बने नियम 12(3)(b) में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी व्यक्ति की सटीक उम्र निर्धारित नहीं की जा सकती, तो न्यायालय को उसकी उम्र “निचले स्तर” पर मानकर एक वर्ष की छूट देनी चाहिए।

अर्थात, यदि मेडिकल रिपोर्ट में उम्र 19–20 वर्ष बताई गई है, तो अदालत को मानना चाहिए कि वास्तविक उम्र इससे एक वर्ष कम भी हो सकती है।

राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि आरोपी ने घटना के समय कोई जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल का रिकॉर्ड नहीं दिया था, इसलिए मेडिकल राय पर भरोसा करना ही उचित था।

लेकिन न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत ने मेडिकल राय को बिना कानूनी छूट लागू किए ही अंतिम मान लिया, जो कि गलत था।

उच्च न्यायालय का निर्णय

माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि मेडिकल परीक्षण केवल एक अनुमान देता है, न कि सटीक उम्र। जब मेडिकल बोर्ड ने 19–20 वर्ष बताया था (मई 2019 में), तो अदालत को ऊपरी सीमा (20 वर्ष) लेकर दो वर्ष का अंतर मानना चाहिए, जिससे उम्र 18 वर्ष ठहरती है।

इसके बाद, नियम 12(3)(b) के अनुसार एक वर्ष की अतिरिक्त छूट दी जाती है। इस तरह घटना (9 अगस्त 2017) के दिन आरोपी की उम्र लगभग 17 वर्ष होती है।

इस आधार पर न्यायालय ने माना कि आरोपी घटना के समय नाबालिग (juvenile) था, और उसे किशोर न्याय अधिनियम के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।

इसलिए, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत का 14 नवंबर 2019 का आदेश रद्द कर दिया और आरोपी को नाबालिग घोषित किया। अदालत ने यह भी कहा कि आगे की सुनवाई किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के अनुसार की जाएगी।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह फैसला किशोर न्याय प्रणाली के सिद्धांत को मजबूत करता है — कि “संदेह की स्थिति में लाभ हमेशा बालक को दिया जाना चाहिए।”

  1. सामान्य जनता के लिए – यह निर्णय बताता है कि किसी व्यक्ति की उम्र का निर्धारण करते समय मेडिकल रिपोर्ट को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि थोड़ा भी शक है, तो अदालत को आरोपी के हित में फैसला देना चाहिए।
  2. पुलिस और अभियोजन पक्ष के लिए – यह निर्णय यह संकेत देता है कि जांच के समय जन्म तिथि से संबंधित प्रमाण (जैसे स्कूल रजिस्टर या जन्म प्रमाणपत्र) अवश्य जुटाए जाने चाहिए।
  3. न्यायालयों के लिए – यह एक मार्गदर्शक निर्णय है कि मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा करते समय “एक वर्ष की छूट” (benefit of margin) अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए।
  4. सरकारी दृष्टिकोण से – यह आदेश किशोर अपराध मामलों में राज्य और अभियोजन अधिकारियों के लिए एक नीति दिशा तय करता है ताकि नाबालिगों को अनुचित रूप से वयस्क अपराधी न माना जाए।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या आरोपी घटना के समय नाबालिग था?
    ✅ हाँ। न्यायालय ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार 2019 में उम्र 19–20 वर्ष थी, लेकिन कानूनी प्रावधानों के तहत दो वर्ष की छूट और एक वर्ष का लाभ देने पर घटना के समय उम्र 17 वर्ष बनती है।
  • क्या निचली अदालत ने नियम 12(3)(b) का पालन नहीं किया?
    ✅ हाँ। निचली अदालत ने मेडिकल राय को ही अंतिम मान लिया, जबकि उसे नाबालिग के पक्ष में एक वर्ष का लाभ देना चाहिए था।
  • आगे क्या निर्देश दिए गए?
    ✅ न्यायालय ने आरोपी को नाबालिग घोषित करते हुए कहा कि अब आगे की सुनवाई किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत ही होगी।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Darga Ram @ Gunga v. State of Rajasthan, (2015) 2 SCC 775
  • Karanvir Singh v. State of Bihar, 2020 (2) PLJR 279

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Darga Ram @ Gunga v. State of Rajasthan, (2015) 2 SCC 775 — यह निर्णय बताता है कि मेडिकल रिपोर्ट में उम्र का ऊपरी अनुमान लेकर उसमें ±2 वर्ष की छूट देनी चाहिए।
  • Karanvir Singh v. State of Bihar, 2020 (2) PLJR 279 — इस निर्णय के आधार पर उम्र की गणना पीछे की तारीख (घटना के दिन) तक की गई।

मामले का शीर्षक

XXX (juvenile) बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Criminal Revision No. 324 of 2020
(मटियारिया थाना कांड संख्या 45/2017, पश्चिम चंपारण)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 309

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • श्री बिमलेश कुमार पांडे — याचिकाकर्ता की ओर से
  • श्री अखिलेश्वर दयाल (APP) — राज्य की ओर से

निर्णय का लिंक

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