मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार के सरकारी स्कूलों के शिक्षक थे। उन्हें प्रारंभ में 1991 से 1995 के बीच निम्न अधीनस्थ शिक्षा सेवा संवर्ग में सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था।
नियुक्ति के समय वे 1200-1800 रुपये के प्रशिक्षित वेतनमान पर कार्य कर रहे थे। बाद में बिहार राज्य ने आश्वस्त पदोन्नति वेतन प्रगति योजना नियम, 2003 लागू किए, जिसे आम तौर पर 2003 एसीपी योजना कहा जाता है।
2003 एसीपी योजना के तहत, कोई कर्मचारी यदि बिना पदोन्नति 12 वर्ष तक किसी पद पर सेवा पूरी करता है, तो उसे उच्च पद के वेतनमान का अधिकार हो जाता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं को 5500-9000 रुपये का उच्च वेतनमान प्रदान किया गया।
इसके बाद राज्य ने इस नीति में संशोधन करते हुए संशोधित आश्वस्त पदोन्नति वेतन प्रगति योजना, 2010 (MACP) लागू की। MACP के तहत 10, 20 और 30 वर्ष की सेवा पूर्ण होने पर वित्तीय उन्नति दी जानी थी।
जब याचिकाकर्ताओं ने 20 वर्ष की सेवा पूर्ण की, तब उन्हें MACP के तहत दूसरी समयबद्ध पदोन्नति का वेतनमान मिला। उनका वेतन 9300-34800 रुपये के वेतनमान में 4800 रुपये ग्रेड वेतन के साथ निर्धारित किया गया। यह लाभ याचिकाकर्ता संख्या 1 से 6 के लिए 2011 से और याचिकाकर्ता संख्या 7 के लिए 2015 से दिया गया।
बाद में, सभी याचिकाकर्ताओं को नियमित पदोन्नति मिली। उन्हें सहायक शिक्षक से व्याख्याता के पद पर 20 नवम्बर 2015 और 30 जून 2016 के आदेशों द्वारा पदोन्नत किया गया। व्याख्याता के पद पर 9300-34800 रुपये के वेतनमान के साथ 4200 रुपये ग्रेड वेतन देय था।
इन नियमित पदोन्नतियों के बाद प्राधिकारियों ने पुनः याचिकाकर्ताओं का वेतन निर्धारण किया और उन्हें मौलिक नियम 22(1)(a)(1) के तहत पदोन्नति लाभ के रूप में 3% की वेतन-वृद्धि दी। इस प्रकार याचिकाकर्ताओं को व्यावहारिक रूप से एक वेतन-वृद्धि MACP वेतनमान मिलने पर और दूसरी वेतन-वृद्धि पदोन्नति के समय मिल गई, जबकि दोनों ही वेतनमान एक ही पे बैंड में थे।
इसके बाद, कुछ अन्य समान रूप से स्थित शिक्षकों ने समान मौद्रिक लाभ के लिए पटना उच्च न्यायालय का रुख किया। उनकी याचिका पर न्यायालय ने शिक्षा विभाग को प्रश्न की जांच करने का निर्देश दिया।
जांच के बाद बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने 3 फरवरी 2020 को एक आदेश पारित किया। राज्य ने निष्कर्ष निकाला कि जिन कर्मचारियों को MACP का लाभ मिल चुका है और बाद में उन्हें उसी पे बैंड में पदोन्नति दी जाती है, उन्हें 3% वेतन-वृद्धि (जिसे एक वेतन-वृद्धि माना जाता है) दो बार नहीं दी जा सकती। विभाग ने सभी ऐसे कर्मचारियों, जिनमें वर्तमान याचिकाकर्ता भी शामिल थे, का वेतन पुनः निर्धारित करने और अतिरिक्त भुगतान की वसूली का आदेश दिया।
इस आदेश से आहत होकर याचिकाकर्ताओं ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत सीडब्ल्यूजेसि संख्या 4791/2020 में याचिका दायर की।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने माननीय न्यायमूर्ति श्री संजीव प्रकाश शर्मा के माध्यम से मूल प्रश्न चिह्नित किया: उस स्थिति में मौलिक नियम 22(1) तथा वेतन-वृद्धि अनुदान से संबंधित राज्य सरकार के परिपत्र की व्याख्या कैसे की जाए, जब किसी कर्मचारी को पहले ही MACP का लाभ मिल चुका हो और बाद में उसे पदोन्नति मिले।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि नियम F.R. 22(1) हर उस स्थिति में लागू होता है जब किसी व्यक्ति को उच्च पद पर पदोन्नत किया जाता है। उनके अनुसार, नियमित पदोन्नति पर उच्च पद के समयमान में प्रारंभिक वेतन, निम्न पद के वेतन में एक वेतन-वृद्धि जोड़कर प्राप्त कल्पित वेतन से अगले चरण पर निर्धारित किया जाना चाहिए।
उन्होंने राज्य के अपने परिपत्र में वर्णित पद्धति पर भरोसा किया और प्रस्तुत किया कि 2015 में पदोन्नति की तिथि पर याचिकाकर्ता MACP के अंतर्गत 9300-34800 रुपये के पे बैंड में 4800 रुपये ग्रेड वेतन पर वेतन पा रहे थे।
उस तिथि को पदोन्नति सहायक शिक्षक से व्याख्याता के पद पर हुई थी। याचिकाकर्ताओं का मत था कि चूंकि उन्हें उच्च पद पर पदोन्नत किया जा रहा था, इसलिए नियम 22(1)(a)(1) के तहत उन्हें 20 वर्ष की सेवा पूर्ण होने पर पहले से प्राप्त MACP लाभ के अतिरिक्त 3% (एक वेतन-वृद्धि) और मिलनी चाहिए थी।
उन्होंने तर्क दिया कि 3 फरवरी 2020 का राज्य का निर्णय, जिसके द्वारा यह अतिरिक्त वेतन-वृद्धि वापस ले ली गई और वसूली का आदेश दिया गया, नियम 22(1)(a)(1) के प्रतिकूल है और इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए। यह भी कहा कि जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से सरकार के समक्ष अर्जी नहीं दी थी, उनके विरुद्ध “सामान्य वसूली आदेश” पारित करने का कोई अवसर ही नहीं था।
दूसरी ओर, राज्य के वकीलों ने न्यायालय को MACP प्रावधानों से अवगत कराया। निर्णय में हिंदी में उद्धृत प्रासंगिक अंश में यह स्पष्ट किया गया था कि MACP के तहत वेतन-वृद्धि कैसे दी जानी है और MACP मिलने के बाद जब किसी व्यक्ति को नियमित पदोन्नति मिलती है तो उसकी स्थिति क्या होगी।
निर्णय में उद्धृत MACP पाठ का सार यह है कि वित्तीय उन्नति के समय वही वेतन निर्धारण लाभ दिया जाएगा जो नियमित पदोन्नति में दिया जाता है—पे बैंड और ग्रेड वेतन के योग पर 3% की वेतन-वृद्धि। परन्तु यदि MACP के समय स्वीकृत ग्रेड वेतन नियमित पदोन्नति वाले पद के ग्रेड वेतन के समान हो, तो नियमित पदोन्नति के समय कोई नया वेतन निर्धारण नहीं होगा।
प्रावधान आगे स्पष्ट करता है कि ऐसी स्थिति में नियमित पदोन्नति पर कर्मचारी को केवल तभी ग्रेड वेतन का अंतर मिलेगा जब पदोन्नत पद का ग्रेड वेतन अधिक हो। यदि MACP और पदोन्नति दोनों में समान ग्रेड वेतन हो, तो कर्मचारी को अतिरिक्त वेतन वृद्धि नहीं मिलेगी, केवल जहाँ लागू हो वहीं ग्रेड वेतन का अंतर मिलेगा।
इसी आधार पर राज्य ने तर्क दिया कि चूंकि नियमित पदोन्नति पहले नहीं दी गई थी, इसलिए MACP के समय ही पदोन्नति के बदले ठहराव की स्थिति में वेतन-वृद्धि और उच्च वेतनमान दे दिया गया। जब बाद में नियमित पदोन्नति उसी वेतनमान में दी गई, तो पहले से दिया गया लाभ जारी रहता है और अतिरिक्त पदोन्नति वेतन-वृद्धि का अधिकार नहीं बनता।
राज्य की स्थिति सरल थी: जब MACP के माध्यम से कर्मचारी को पहले ही पदोन्नति के वेतन लाभ का आर्थिक लाभ मिल गया है, तो उसे पदोन्नति वेतन लाभ दो बार लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
न्यायालय ने इसके बाद नियम 22(1)(a)(1) की जांच की। न्यायालय ने कहा कि इस नियम की भाषा “स्पष्ट और निर्विवाद” है। मुख्य शब्द हैं “by increasing his pay in respect of the lower post held by him regularly by increment at the stage at which such pay has accrued.”
न्यायालय के अनुसार, यह शब्दावली दर्शाती है कि नियम उस वेतन को देखता है जो नियमित रूप से धारण किए गए निम्न पद से जुड़ा है, न कि उस उच्च वेतन को जो केवल ठहराव से निपटने के लिए दिया गया हो। MACP के अंतर्गत दिया गया उच्च वेतन वास्तव में पदोन्नत पद का वेतनमान है जो पदोन्नति के स्थान पर दिया गया है।
न्यायालय ने समझाया कि MACP पदोन्नति के स्थान पर दी जाती है और MACP के बाद यदि वास्तविक पदोन्नति बाद में दी जाती है, तो कर्मचारी उसी वेतनमान में कार्य करता रहता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अतिरिक्त लाभ केवल उसी स्थिति में मिल सकता है जब MACP वेतनमान, पदोन्नति के उच्च पद के वेतनमान से अभी भी कम हो; ऐसे में कर्मचारी को आगे की उन्नति का अधिकार होगा।
लेकिन यदि MACP के तहत प्राप्त वेतनमान और पदोन्नत पद का वेतनमान एक समान हैं, तो दूसरी वेतन-वृद्धि देने का कोई औचित्य नहीं है। वास्तव में, MACP दिए जाने के बाद कर्मचारी पहले से ही वह वेतन पाने लगता है जो सामान्यतः पदोन्नति वाले पद से जुड़ा होता। बाद की पदोन्नति केवल पदनाम और कार्य-प्रकृति में परिवर्तन लाती है, वेतनमान में नहीं।
ऐसी स्थितियों में, पदोन्नति पर कर्मचारी को उसी वेतनमान में सामान्य वार्षिक वेतन-वृद्धि मिलती है, पर MACP लाभ के ऊपर अतिरिक्त 3% पदोन्नति वेतन-वृद्धि नहीं दी जाती। न्यायालय ने उल्लेख किया कि बिहार सरकार के आदेश और परिपत्र में दी गई व्याख्या इसी तर्क से मेल खाती है और महत्वपूर्ण रूप से, यह प्रतिबंध स्वयं MACP योजना में स्पष्ट रूप से निहित है।
अतः न्यायालय ने माना कि जिस कर्मचारी को पहले ही MACP दे दी गई हो और जहाँ MACP तथा पदोन्नति दोनों का वेतनमान समान हो, उसे नियमित पदोन्नति पर अतिरिक्त वेतन-वृद्धि नहीं दी जा सकती। इसी तर्क के आधार पर 3 फरवरी 2020 का विवादित आदेश, जिसमें दूसरी वेतन-वृद्धि रोकी गई और वसूली का निर्देश दिया गया, किसी भी कानूनी दोष से ग्रस्त नहीं पाया गया।
तदनुसार न्यायालय ने हस्तक्षेप का कोई आधार न पाते हुए कहा कि रिट याचिका निराधार है और इसे खारिज कर दिया।
इसके बाद न्यायालय ने वसूली के प्रश्न से निपटा। याचिका लंबित रहने के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं से किए गए अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर रोक लगा रखी थी। राज्य के आदेश को बरकरार रखते हुए न्यायालय ने विचार किया कि क्या यह अंतरिम रोक जारी रहनी चाहिए।
न्यायालय ने ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता चतुर्थ श्रेणी और तृतीय श्रेणी से ऊपर के पदों पर कार्यरत थे और इस प्रकार वे निम्नतम आय वर्ग में नहीं आते। न्यायालय ने माना कि ऐसी स्थिति में राज्य को अधिक भुगतान की वसूली से रोके रखने का कोई कारण नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of Punjab v. Rafiq Masih, (2014) 8 SCC 883 का हवाला दिया, जिसमें कुछ वर्गों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर प्रतिबंध लगाया गया है। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि Rafiq Masih का कानून इस मामले पर लागू नहीं होता।
हालाँकि, कोविड-19 महामारी के दौरान आर्थिक कठिनाइयों को देखते हुए न्यायालय ने वसूली के तरीके पर सीमित राहत दी। न्यायालय ने निर्देश दिया कि वसूल की जाने वाली राशि दस समान किस्तों में वसूल की जाए, ताकि याचिकाकर्ताओं पर अत्यधिक आर्थिक बोझ न पड़े।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर शिक्षकों और उन अन्य कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें MACP लाभ मिलता है और बाद में नियमित पदोन्नति प्राप्त होती है।
निर्णय यह स्पष्ट करता है कि यदि MACP के तहत दिया गया वेतनमान और बाद के पदोन्नत पद का वेतनमान समान है, तो केवल पदोन्नति के कारण दूसरी 3% वेतन-वृद्धि का दावा नहीं किया जा सकता। MACP स्वयं पदोन्नति के वित्तीय विकल्प के रूप में काम करता है।
निर्णय यह भी पुष्टि करता है कि राज्य सरकार वेतन निर्धारण में हुई गलती सुधारने और अतिरिक्त दी गई वेतन-राशि की वसूली करने के लिए सक्षम है, भले ही कर्मचारी कुछ समय से वह वेतन ले रहे हों, बशर्ते कि मामला Rafiq Masih में पहचानी गई संरक्षित श्रेणियों के अंतर्गत न आता हो।
कर्मचारियों के लिए यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है: एक ही वेतनमान पर पहले MACP और फिर पदोन्नति के नाम पर दोहरा लाभ स्वीकार्य नहीं होगा। वेतन निर्धारण MACP नियमों और मौलिक नियमों के अनुसार, न्यायालय की व्याख्या के अनुरूप किया जाएगा।
प्रशासन, विशेषकर शिक्षा विभाग, के लिए यह निर्णय 3 फरवरी 2020 के नीतिगत निर्णय को समर्थन देता है और समान रूप से स्थित सभी कर्मचारियों पर उसके एकरूप अनुप्रयोग की अनुमति देता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
-
प्रश्न: क्या वह सरकारी कर्मचारी, जिसे पहले ही MACP के तहत 3% वेतन-वृद्धि और उच्च वेतनमान मिल चुका है, नियमित पदोन्नति पर तब दूसरी 3% वेतन-वृद्धि का दावा कर सकता है जब MACP और पदोन्नत पद दोनों का वेतनमान समान हो?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जब MACP वेतनमान और पदोन्नति वेतनमान समान हों, तो नियम F.R. 22(1)(a)(1) दूसरी पदोन्नति वेतन-वृद्धि की अनुमति नहीं देता। MACP पदोन्नति के स्थान पर दी जाती है और कर्मचारी पदोन्नति वेतन लाभ दो बार नहीं ले सकता। -
प्रश्न: 3 फरवरी 2020 की राज्य सरकार की वह अधिसूचना, जिसमें दूसरी वेतन-वृद्धि वापस लेने और अतिरिक्त भुगतान की वसूली का निर्देश दिया गया, क्या वैध थी?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने उस आदेश को बरकरार रखा और माना कि वह नियम 22(1)(a)(1) तथा MACP योजना के अनुरूप है। न्यायालय ने हस्तक्षेप से इनकार किया और रिट याचिका खारिज कर दी। -
प्रश्न: क्या अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of Punjab v. Rafiq Masih (2014) 8 SCC 883 के आधार पर रोक लगनी चाहिए थी?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि Rafiq Masih का निर्णय इस मामले पर लागू नहीं होता, क्योंकि याचिकाकर्ता तृतीय और चतुर्थ श्रेणी से ऊपर के पदों पर थे और वसूली रोकने का कोई आधार नहीं था, यद्यपि कोविड-19 की परिस्थितियों को देखते हुए वसूली दस किस्तों में करने की अनुमति दी गई।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- State of Punjab v. Rafiq Masih, (2014) 8 SCC 883 – यह स्पष्ट करने के लिए उद्धृत कि इसमें उल्लिखित संरक्षण के सिद्धांत इस मामले में वसूली रोकने के लिए लागू नहीं होते।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट क्षेत्राधिकार मामला संख्या 4791/2020
मामले का शीर्षक: किशोर कुमार एवं अन्य बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य
उल्लेख (साइटेशन): 2022(2) PLJR 166
न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय
पीठ (कोरम): माननीय श्री न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा
निर्णय की तिथि: 21-03-2022
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री निखिल कुमार अग्रवाल, अधिवक्ता; सुश्री अदिति हंसरिया, अधिवक्ता
- प्रतिवादी (राज्य बिहार) की ओर से: सुश्री बिनिता सिंह, SC 28; श्री निशांत कुमार झा, AC to SC 28
मामले का स्वरूप: MACP संबंधी वेतन निर्धारण, पदोन्नति वेतन-वृद्धि और अतिरिक्त वेतन की वसूली से संबंधित राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका।
विवादित आदेश: शिक्षा विभाग, बिहार सरकार का 03-02-2020 दिनांकित आदेश, जिसके द्वारा अतिरिक्त 3% वेतन-वृद्धि वापस ली गई और वसूली का निर्देश दिया गया।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि
बिहार में कानूनी परिवर्तनों का आपके अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है,
तो आप आगे के अद्यतनों के लिए Samvida Law Associates को फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।



