मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार के नवादा जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत एक लाइसेंसधारी डीलर था। 28.12.2018 को उसका लाइसेंस निलंबित कर दिया गया। कारण यह दिया गया कि उसे Essential Commodities Act, 1955 के उल्लंघन के आरोप में दर्ज एक आपराधिक मामले में अभियुक्त बनाया गया है।
लाइसेंस निलंबित करने के बाद, प्राधिकारियों ने 31.12.2018 को याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इस नोटिस के माध्यम से उससे उसके आचरण के संबंध में स्पष्टीकरण देने और यह बताने को कहा गया कि उसके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए।
याचिकाकर्ता ने 03.01.2019 को अपना उत्तर प्रस्तुत कर दिया। उस तारीख के बाद से, जैसा कि पटना उच्च न्यायालय द्वारा अभिलेख में दर्ज किया गया, लाइसेंसिंग प्राधिकारी द्वारा कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। लाइसेंस लगातार निलंबन की स्थिति में ही बना रहा।
इस लम्बी देरी और अंतिम आदेश के बिना निरंतर निलंबन के कारण, याचिकाकर्ता ने Civil Writ Jurisdiction Case No. 2444 of 2022 दाखिल कर पटना उच्च न्यायालय की शरण ली। उसने Bihar Targeted Public Distribution System (Control) Order, 2016 के अंतर्गत प्राधिकारियों की निष्क्रियता के विरुद्ध न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय की द्वैसीपीठ, जिसमें माननीय श्री न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार और माननीय श्री न्यायमूर्ति अंजनि कुमार शरण शामिल थे, ने 09.03.2022 को इस मामले की सुनवाई की। मौखिक निर्णय माननीय श्री न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार द्वारा दिया गया।
न्यायालय ने सबसे पहले वे मूल तथ्य दर्ज किए जो विवादित नहीं थे। याचिकाकर्ता का लाइसेंस 28.12.2018 को Essential Commodities Act, 1955 के तहत दर्ज आपराधिक मामले में उसकी संलिप्तता के मद्देनज़र निलंबित किया गया था। इसके तुरंत बाद, 31.12.2018 को उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उसने उस नोटिस का उत्तर 03.01.2019 को दे दिया।
निर्णायक बिंदु, जिस पर न्यायालय के समक्ष जोर दिया गया, यह था कि लाइसेंसिंग प्राधिकारी ने इसके बाद कुछ नहीं किया। याचिकाकर्ता का उत्तर अभिलेख पर होने के बावजूद कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया। कार्यवाही का निष्कर्ष निकाले बिना ही निलंबन जारी रहा।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री एन.के. अग्रवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता ने न्यायालय का ध्यान Bihar Targeted Public Distribution System (Control) Order, 2016 की धारा 28 की ओर आकर्षित किया। निर्णय में उल्लेख के अनुसार, इस प्रावधान के तहत, जहाँ तक संभव हो, कारण बताओ नोटिस जारी होने की तारीख से 180 दिनों के भीतर अंतिम आदेश पारित किया जाना आवश्यक है।
यह समय-सीमा इस उद्देश्य से निर्धारित की गई है कि किसी लाइसेंसधारक के विरुद्ध कार्यवाही अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे। यद्यपि “जहाँ तक संभव हो” जैसी भाषा कुछ लचीलापन देती है, परन्तु यह प्राधिकारियों को यह अनुमति नहीं देती कि वे वर्षों तक बिना किसी स्पष्टीकरण के मामले की अनदेखी करते रहें।
न्यायालय ने इस वैधानिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में स्थिति की समीक्षा की। अभिलेख पर उपलब्ध तथ्यों से यह प्रतीत हुआ कि 31.12.2018 के कारण बताओ नोटिस और 03.01.2019 के उत्तर के बाद से तीन वर्ष से अधिक समय बीत चुका था, लेकिन लाइसेंसिंग प्राधिकारी ने कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया था। इस पूरे अवधि में लाइसेंस निलंबित ही रहा।
पीठ ने विशेष रूप से यह दर्ज किया कि 2016 के Control Order की धारा 28 के तहत लाइसेंसधारी के विरुद्ध कार्यवाही के निष्कर्ष में इतनी देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण दिखाई नहीं देता। न्यायालय के समक्ष इतने लम्बे समय तक की निष्क्रियता के लिए कोई औचित्य नहीं रखा गया।
न्यायालय ने प्राधिकारियों के आचरण पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया। उसने यह दर्ज किया कि वह संबंधित अधिकारियों के आलसी रवैये पर “strong exception” लेता है। दूसरे शब्दों में, न्यायालय ने इस देरी को केवल एक मामूली चूक नहीं, बल्कि समय पर वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में गंभीर विफलता माना।
लाइसेंस को पुनर्स्थापित या रद्द करने के बारे में स्वयं निर्णय करने के बजाय, न्यायालय ने सक्षम प्राधिकारी को उसका वैधानिक दायित्व शीघ्र और निष्पक्ष रूप से पूरा करने का निर्देश देना उचित समझा। उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि Control Order की रूपरेखा के तहत आरोपों और उत्तर पर विचार कर तर्कसंगत निष्कर्ष तक पहुँचना लाइसेंसिंग प्राधिकारी का ही कर्तव्य है।
तदनुसार, न्यायालय ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए। लाइसेंसिंग प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता द्वारा पहले से दायर उत्तर पर विचार करे और उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तारीख से 90 दिनों के भीतर अंतिम निर्णय ले।
न्यायालय ने यह भी जोर देकर कहा कि प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। उसने कहा कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले याचिकाकर्ता को अपने पक्ष को स्पष्ट करने के लिए दोबारा अवसर दिया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि, भले ही याचिकाकर्ता ने 2019 में लिखित उत्तर प्रस्तुत कर दिया था, अब प्राधिकारी को सक्रिय रूप से उसकी पुनः सुनवाई करनी होगी और उसे अपना बचाव प्रस्तुत करने की पूरी अनुमति देनी होगी।
इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने आदेश दिया कि लाइसेंसिंग प्राधिकारी का अंतिम आदेश “reasoned one” होना चाहिए। विधिक दृष्टि से इसका मतलब यह है कि प्राधिकारी केवल कुछ पंक्तियाँ लिखकर निलंबन या निरस्तीकरण की पुष्टि नहीं कर सकता। उसे अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री, याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण और उसके पक्ष को स्वीकार या अस्वीकार करने के कारणों पर चर्चा करनी होगी।
कारण-सहित आदेश पर बल देकर पटना उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक कानून के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को सुदृढ़ किया: जिन निर्णयों से अधिकारों और आजीविका पर प्रभाव पड़ता है, वे पारदर्शी होने चाहिए और यह दिखाना चाहिए कि प्राधिकारी ने अपनी सोच-विचार कैसे लागू की। यह विशेष रूप से राशन डीलरों और अन्य लाइसेंसधारकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके लिए लाइसेंस का निलंबन उनकी मुख्य आय के स्रोत को बंद कर सकता है।
इन निर्देशों को जारी करने के बाद, न्यायालय ने रिट याचिका का निपटारा कर दिया। इस स्तर पर उसने कोई अतिरिक्त राहत नहीं दी और न ही Essential Commodities Act या Control Order के तहत लगाए गए आरोपों के गुण-दोष पर कोई निर्णय दिया। ये मुद्दे उच्च न्यायालय के आदेशानुसार, नई, समयबद्ध कार्यवाही में लाइसेंसिंग प्राधिकारी द्वारा ही परखे जाने हैं।
संक्षेप में, न्यायालय का निर्णय तीन आपस में जुड़े बिंदुओं पर केंद्रित है। पहला, एक बार कारण बताओ नोटिस जारी हो जाने और उत्तर दायर हो जाने के बाद, प्राधिकारी अनिश्चितकाल तक मामले को लंबित नहीं रख सकता। दूसरा, Bihar Targeted Public Distribution System (Control) Order, 2016 की धारा 28 अंतिम आदेश पारित करने के लिए 180 दिनों की एक बाह्य मार्गदर्शक सीमा निर्धारित करती है, जिसे यद्यपि लचीले रूप में पढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना किसी कारण के नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। तीसरा, जब अंततः अंतिम निर्णय लिया जाए, तो वह निष्पक्ष सुनवाई के पश्चात् हो और अभिलेख पर उचित कारणों से समर्थित हो।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत राशन डीलरों और अन्य लाइसेंसधारकों के लिए महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट कर देता है कि सरकार किसी लाइसेंस को निलंबित करके फिर वर्षों तक मामले को अनिश्चित स्थिति में नहीं छोड़ सकती।
जब किसी व्यक्ति की आजीविका किसी लाइसेंस पर निर्भर करती है, तो लम्बा और बिना स्पष्टीकरण का निलंबन गंभीर कठिनाई के समान होता है। पटना उच्च न्यायालय ने प्राधिकारियों को याद दिलाया है कि कार्यवाही उचित समय में पूरी होनी चाहिए और धारा 28 के मार्गदर्शन के अनुसार, अधिमानतः नोटिस के 180 दिनों के भीतर।
यह निर्णय सामान्य राशन कार्डधारकों को परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाता है। डीलरों के बारे में त्वरित और विधिसम्मत निर्णय यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुचारू रूप से कार्य करे और केवल इस कारण से दुकानें बंद न रहें कि फाइलें बिना कार्रवाई के लंबित हैं।
दोबारा सुनवाई के अवसर और कारण-सहित आदेश पर ज़ोर देकर न्यायालय प्राकृतिक न्याय की मूल सुरक्षा-व्यवस्थाओं को मजबूत करता है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी डीलर पर Essential Commodities Act के उल्लंघन का आरोप भी हो, तब भी प्राधिकारी को उसका पक्ष सुनना होगा और अपने अंतिम निर्णय को लिखित रूप में समझाना होगा।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या लाइसेंसिंग प्राधिकारी Bihar Targeted Public Distribution System (Control) Order, 2016 की धारा 28 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी करने और उत्तर प्राप्त करने के बाद भी, बिना कोई अंतिम आदेश पारित किए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाइसेंस को वर्षों तक निलंबित रख सकता है?
उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी बिना स्पष्टीकरण वाली देरी अस्वीकार्य है। उसने लाइसेंसिंग प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह उत्तर पर विचार करे, ताज़ा सुनवाई दे और 90 दिनों की निश्चित अवधि के भीतर कारण-सहित अंतिम आदेश पारित करे।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- उपलब्ध निर्णय के अनुसार, न्यायालय द्वारा किसी विशिष्ट पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णय का उल्लेख या उस पर निर्भरता दर्ज नहीं है।
मामले का विवरण
केस नंबर: Civil Writ Jurisdiction Case No. 2444 of 2022
केस शीर्षक: Jay Shankar Prasad v. The State of Bihar and others
कोरम: Hon’ble Mr. Justice Ashutosh Kumar and Hon’ble Mr. Justice Anjani Kumar Sharan
Citation: 2022(2) PLJR 2
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. N.K. Agrawal, Senior Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. Upendra Pratap Singh, Advocate
मामले का स्वरूप: Bihar Targeted Public Distribution System (Control) Order, 2016 की धारा 28 के तहत कार्यवाही के निष्कर्ष में लम्बी देरी तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाइसेंस के लम्बे निलंबन और निष्क्रियता को चुनौती देने वाली सिविल रिट अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत दायर रिट याचिका।
निर्णय की तारीख: 09.03.2022
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूरा निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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