मामले की पृष्ठभूमि
विवाद बिहार राज्य द्वारा बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 के तहत बिहटा नगर परिषद के गठन के निर्णय से संबंधित है।
पूर्व में, वर्ष 2008 में, प्रखंड विकास पदाधिकारी, बिहटा ने जिला पदाधिकारी, पटना को बिहटा नगर पंचायत के गठन की अनुशंसा की थी। प्रस्ताव में कई गांव शामिल थे, जिनमें बिहटा, ओल्हनपुरा, श्री रामपुर, पतसा, खेड़ालपुरा, अमहरा, राघोपुर, बनवारीपुर, बिशंभरपुर, गोखुलपुर कोरहर और महादेओपुर फुलवारी शामिल थे, जिनकी जनसंख्या 2011 की जनगणना के आधार पर 37,058 थी।
जिला पदाधिकारी, पटना ने 21.10.2008 को यह अनुशंसा राज्य सरकार को अग्रसारित की। उसी आधार पर, नगर विकास एवं आवास विभाग ने बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 6 के तहत अधिसूचना जारी कर बिहटा नगर परिषद का गठन किया।
20.05.2009 की वह पूर्व अधिसूचना CWJC संख्या 14585 वर्ष 2009 में पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। 14.02.2011 के निर्णय द्वारा न्यायालय ने अधिसूचना को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 4 की वैधानिक आवश्यकताओं का पालन नहीं किया गया था।
उस समय न्यायालय ने पाया था कि अंतिम अधिसूचना में यह उल्लेख नहीं था कि कोई आपत्ति प्राप्त हुई या नहीं, प्राप्त हुई तो उन पर विचार किया गया या नहीं, और यदि किया गया तो कैसे। इस अनुपालन के अभाव के कारण, बिहटा नगर परिषद का पूर्व गठन रद्द कर दिया गया।
इसके पश्चात, 12.05.2020 को राज्य सरकार ने बिहार नगर पालिका (संशोधन) अध्यादेश, 2020 जारी किया, जिसे बाद में अधिनियमित कर 10.08.2020 को अधिसूचित किया गया। बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 3 में संशोधन किया गया। संशोधित धारा 3(1) में नए दूसरे प्रावधान के द्वारा यह व्यवस्था की गई कि ऐसे क्षेत्रों में मुख्य कृषक कर्मियों एवं सीमांत कृषक कर्मियों की कुल संख्या, सभी मामलों में, कुल कर्मकारों की संख्या के 50% से कम होगी।
इस परिवर्तन का परिणाम यह हुआ कि किसी क्षेत्र को नगरपालिका क्षेत्र घोषित करने के लिए गैर-कृषि जनसंख्या के उच्च प्रतिशत से संबंधित पूर्व शर्त समाप्त हो गई। इस संशोधन के आलोक में, राज्य सरकार ने पुनः शहरी स्थानीय निकायों के निर्माण या उन्नयन की प्रक्रिया प्रारंभ की।
नगर विकास एवं आवास विभाग के सचिव ने 14.05.2020 के पत्र द्वारा सभी जिला पदाधिकारियों से अनुरोध किया कि वे संशोधित धारा 3 के आधार पर अपने-अपने जिलों के अंतर्गत नए नगर निकायों के गठन या विद्यमान निकायों के उन्नयन के प्रस्ताव भेजें। पुनः, जिलाधिकारियों को शहरी स्थानीय निकायों के पुनर्गठन और उन्नयन के प्रस्ताव भेजने के लिए स्मरण-पत्र भेजे गए।
विभिन्न जिलों, जिनमें पटना भी शामिल था, से प्रस्ताव प्राप्त हुए। उन्हीं के आधार पर नगर विकास एवं आवास विभाग ने मसौदा अधिसूचनाएँ जारी कीं, जिनमें बिहटा से संबंधित 26.12.2020 की मसौदा अधिसूचना भी शामिल थी, जो नए शहरी स्थानीय निकायों के गठन और विद्यमान निकायों के उन्नयन की मंशा दर्शाती थी।
बिहटा के मामले में 19.12.2020 की संयुक्त प्रतिवेदन प्रखंड सांख्यिकी पदाधिकारी, बिहटा, अंचल पदाधिकारी, बिहटा एवं प्रखंड विकास पदाधिकारी, बिहटा द्वारा तैयार की गई। इस प्रतिवेदन में नक्शों एवं संबंधित आँकड़ों के साथ, पंचायतों में बढ़ती शहरीकरण की प्रवृत्ति और बेहतर विकास की आवश्यकता के दृष्टिकोण से बिहटा नगर परिषद के गठन का समर्थन किया गया।
26.12.2020 को नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव द्वारा मसौदा अधिसूचना जारी की गई, जिसमें बिहटा नगर परिषद के गठन के प्रस्ताव पर आपत्तियाँ आमंत्रित की गईं। यह मसौदा 27.12.2020 को हिंदी दैनिक ‘दैनिक जागरण’ में सार्वजनिक सूचना के रूप में प्रकाशित किया गया।
याचिकाकर्ता, जो बिहटा के अमहरा गांव के निवासी हैं, ने उक्त मसौदा प्रकाशन के विरुद्ध आपत्तियाँ दाखिल कीं। प्रस्ताव में 11 राजस्व गांव शामिल थे: बिहटा, राघोपुर, अल्हनपुरा, बनवारीपुर, श्रीरामपुर, बिशंभरपुर, पतसा, गोखुलपुर-कोरहर, खेड़ालपुरा, महादेओपुर फुलवारी और अमहरा।
इन आपत्तियों के बावजूद, राज्य सरकार ने नगर विकास एवं आवास विभाग के संयुक्त सचिव द्वारा हस्ताक्षरित, बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 6 के तहत, मेमो संख्या 960 दिनांक 03.03.2021 के माध्यम से अंतिम अधिसूचना जारी कर दी। इस अधिसूचना द्वारा औपचारिक रूप से बिहटा नगर परिषद का गठन किया गया और बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 के प्रावधानों को उक्त क्षेत्र और उसके निवासियों पर लागू कर दिया गया।
इसके पश्चात याचिकाकर्ताओं ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट अधिकार क्षेत्र मामला संख्या 5068 वर्ष 2021 दायर किया, जिसमें प्रारंभिक रूप से प्रखंड विकास पदाधिकारी एवं अंचल पदाधिकारी की अनुशंसाओं तथा 26.12.2020 की मसौदा अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। कार्यवाही के दौरान, 03.03.2021 की अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद, याचिकाकर्ताओं ने अपनी रिट याचिका में संशोधन कर इस अंतिम अधिसूचना को भी चुनौती दी। यह संशोधन 16.07.2021 के आदेश द्वारा स्वीकार कर लिया गया।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ताओं की मूल शिकायत यह थी कि 26.12.2020 की मसौदा अधिसूचना के विरुद्ध उनकी विस्तृत लिखित आपत्तियों पर, 03.03.2021 की अंतिम अधिसूचना जारी करने से पहले, राज्य सरकार द्वारा विचार नहीं किया गया।
उनके अनुसार, धारा 6 के तहत जारी अंतिम अधिसूचना को सरसरी तौर पर पढ़ने से भी यह नहीं दिखता कि आपत्तियों पर किसी प्रकार की चर्चा या उनका उल्लेख किया गया हो। उनका तर्क था कि इससे यह स्पष्ट होता है कि बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 5 का अनुपालन नहीं हुआ, जो राज्य सरकार को आपत्तियों पर विचार करने का दायित्व देती है।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय M/s Kranti Asso. Pvt. Ltd. & Anr. बनाम मसूद अहमद खान एवं अन्य, (2010) 9 SCC 496 पर भरोसा किया, यह तर्क देने के लिए कि आपत्तियों के निपटान के समय कारण दर्ज किए जाने चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से उपस्थित माननीय स्थायी अधिवक्ता ने बिहार नगर पालिका अधिनियम में 2020 के संशोधन के बाद अपनाई गई प्रक्रिया का विस्तार से विवरण दिया।
राज्य ने इंगित किया कि बिहार के राज्यपाल ने संविधान के अनुच्छेद 213(1) के तहत 12.05.2020 को बिहार नगर पालिका (संशोधन) अध्यादेश, 2020 अधिरोपित किया। बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 3 में संशोधन कर नए प्रावधान के द्वारा ऐसे क्षेत्रों में कृषक कर्मियों की अधिकतम सीमा कुल कर्मकारों की संख्या के 50% से कम निर्धारित की गई।
इस परिवर्तन के बाद, नगर विकास एवं आवास विभाग के सचिव ने 14.05.2020 को सभी जिला पदाधिकारियों को पत्र लिख कर नए नगर निकायों के गठन एवं पुराने निकायों के उन्नयन के प्रस्ताव मांगे। बाद में, शहरी स्थानीय निकायों के पुनर्गठन एवं उन्नयन हेतु एक अन्य अनुरोध भी भेजा गया।
इन निदेशों के अनुपालन में, बिहटा सहित विभिन्न स्थानों के प्रस्ताव विभाग को भेजे गए। बिहटा के मामले में, 19.12.2020 की स्थानीय अधिकारियों की संयुक्त प्रतिवेदन ने बिहटा नगर परिषद के गठन का समर्थन किया। प्रतिवेदन में प्रदर्शित किया गया कि विभिन्न पंचायतों में शहरीकरण बढ़ रहा है और समुचित विकास के लिए नगर का दर्जा आवश्यक है।
जनसंख्या के आंकड़ों पर, राज्य की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि प्रस्तावित नगर परिषद की जनसंख्या नवीनतम जनगणना के अनुसार 47,549 है। कुल कर्मकारों की संख्या 13,638 है, जिनमें 1,054 मुख्य कृषक कर्मी और 324 सीमांत कृषक कर्मी हैं। इस प्रकार, कृषक कर्मियों का अनुपात कुल कर्मकारों का मात्र 10.10% है, जो संशोधित धारा 3 के तहत निर्धारित 50% की सीमा से काफी कम है।
राज्य ने आगे कहा कि सार्वजनिक सूचना 27.12.2020 को जारी एवं प्रकाशित होने के बाद आपत्तियाँ प्राप्त हुईं। इन आपत्तियों पर राज्य सरकार द्वारा 20.05.2020 के पत्र से जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार विचार किया गया।
उप-मंडल पदाधिकारी, दानापुर, अंचल पदाधिकारी, बिहटा एवं प्रखंड विकास पदाधिकारी, बिहटा की तीन सदस्यीय समिति ने बिहटा नगर परिषद से संबंधित आपत्तियों की जांच की। उन्होंने 30.01.2021 को जिला योजना पदाधिकारी, पटना को विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
इसके बाद, जिला पदाधिकारी, पटना ने 02.02.2021 को नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने विभिन्न जांच प्रतिवेदनों के आलोक में यह समझाया कि आपत्तियों का निपटारा कैसे किया गया, और बिहटा नगर परिषद के गठन की अंतिम अधिसूचना जारी करने की अनुशंसा की।
कानूनी प्रश्न पर, न्यायालय ने पहचाना कि याचिकाकर्ता मूलतः केवल एक ही बिंदु उठा रहे हैं: कि बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 5 का अनुपालन नहीं हुआ, क्योंकि अंतिम अधिसूचना में आपत्तियों पर विचार का कोई उल्लेख नहीं है।
न्यायालय द्वारा उद्धृत अधिनियम की धारा 5 कहती है कि संबंधित नगर, कस्बे या नगर पंचायत का कोई भी निवासी, धारा 4 के तहत अधिसूचना के प्रकाशन की तिथि से एक माह के भीतर आपत्तियाँ दाखिल कर सकता है और “राज्य सरकार ऐसी आपत्तियों पर विचार करेगी।”
याचिकाकर्ताओं के दावे की सच्चाई जांचने हेतु, न्यायालय ने 10.08.2021 के आदेश द्वारा स्वयं नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव के कार्यालय से मूल अभिलेख तलब किए। यह अभिलेख स्थायी अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए।
अभिलेखों की जांच करने पर, न्यायालय ने पाया कि मसौदा अधिसूचना एवं सार्वजनिक सूचना के प्रकाशन के बाद, आपत्तियों पर वास्तव में उच्च स्तरीय टीम द्वारा विचार किया गया था। 30.01.2021 की संयुक्त जांच प्रतिवेदन अंचल पदाधिकारी, मसौढ़ी, प्रखंड विकास पदाधिकारी, मसौढ़ी, नगर परिषद, मसौढ़ी के कार्यपालक पदाधिकारी और उप-मंडल पदाधिकारी, मसौढ़ी द्वारा प्रस्तुत की गई।
इस प्रतिवेदन में सभी आपत्तियों पर विचार किया गया, प्रत्येक आपत्ति के संबंध में निरीक्षण और निरीक्षण टिप्पणियाँ दर्ज की गईं, और यह निष्कर्ष निकाला गया कि आपत्तियाँ एवं दावे निराधार हैं और अस्वीकार किए जाने योग्य हैं।
न्यायालय ने यह भी पाया कि इस बीच कुछ अन्य आपत्तियाँ भी प्राप्त हुई थीं। इनका परीक्षण एक अन्य टीम ने किया, जिसमें प्रखंड कृषि पदाधिकारी, संपतचक, अंचल पदाधिकारी, संपतचक और प्रखंड विकास पदाधिकारी, संपतचक शामिल थे। उनकी संयुक्त प्रतिवेदन दिनांक 03.01.2021 में आपत्तियों की विस्तार से समीक्षा की गई और उन्हें निराधार बताते हुए खारिज कर दिया गया।
न्यायालय के अनुसार, विभिन्न अधिकारियों की ऐसी कई प्रतिवेदन अभिलेख का हिस्सा थीं। प्रत्येक प्रतिवेदन से यह परिलक्षित होता था कि आपत्तियों एवं दावों पर विचार किया गया और उन्हें निरर्थक पाकर अस्वीकार कर दिया गया।
02.02.2021 का जिला पदाधिकारी द्वारा प्रधान सचिव को भेजा गया पत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। इसमें 26.12.2020 की मसौदा अधिसूचना के विरुद्ध प्राप्त आपत्तियों का सार दिया गया, यह दर्ज किया गया कि जांच प्रतिवेदन प्राप्त कर उन पर विचार किया गया है, और मसौदा अधिसूचना के अनुरूप अंतिम प्रकाशन की अनुशंसा की गई।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि इस अनुशंसा पर न केवल प्रधान सचिव ने, बल्कि विभागीय मंत्री ने भी विचार किया, जिन्होंने जिला पदाधिकारी की सिफारिश से सहमति व्यक्त करते हुए अधिसूचना के अंतिम प्रकाशन की अनुशंसा की।
इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि राज्य सरकार ने मसौदा अधिसूचना के विरुद्ध प्रस्तुत आपत्तियों, दावों एवं अभ्यावेदनों पर विधिवत विचार किया था।
इसके पश्चात न्यायालय ने बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 6 पर विचार किया, जो नगर क्षेत्रों के गठन से संबंधित है। धारा 6 यह प्रावधान करती है कि धारा 4 के तहत मसौदा अधिसूचना के प्रकाशन के एक माह के पश्चात, और “प्रस्तुत की गई किसी भी या सभी आपत्तियों पर विचार करने के बाद”, राज्य सरकार नगर क्षेत्र की स्थापना की अधिसूचना जारी कर सकती है।
धाराओं 5 और 6 को संयुक्त रूप से पढ़ते हुए, न्यायालय ने यह व्याख्या की कि कानून राज्य सरकार से केवल यह अपेक्षा करता है कि वह अंतिम अधिसूचना जारी करने से पूर्व आपत्तियों पर विचार करे। यह कहीं भी अनिवार्य नहीं है कि प्रत्येक आपत्ति के निपटान के लिए विस्तृत कारण स्वयं अधिसूचना में ही दर्ज किए जाएँ।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि जब तक किसी विधि में विशिष्ट रूप से यह अपेक्षा न हो कि आपत्तियों का निपटारा कारणयुक्त आदेश द्वारा किया जाए, तब तक ऐसी आवश्यकता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इस सिद्धांत के समर्थन में न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Sharif-Ud-Din बनाम अब्दुल गनी लोन, (1980) 1 SCC 403 एवं Ram Deen Morya (Dr.) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2009) 6 SCC 735 का उल्लेख किया।
इन प्राधिकारों के आलोक में न्यायालय ने यह माना कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत निर्णय M/s Kranti Asso. Pvt. Ltd. & Anr. इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता। बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 केवल विचार करने की अपेक्षा करता है, जो अभिलेख पर निर्विवाद रूप से किया गया पाया गया।
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि एक बार जब राज्य सरकार ने आपत्तियों पर विचार कर लिया और यह तथ्य impugned अधिसूचना दिनांक 03.03.2021 में भी अंकित है, तो धारा 6 के तहत अंतिम अधिसूचना जारी करने में कोई अवैधता या अवरोध नहीं था।
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 के किसी भी उल्लंघन को प्रदर्शित करने में विफल रहे। उसने यह घोषित किया कि राज्य ने अपना वैध वैधानिक दायित्व पूरा किया है और बिहटा नगर परिषद के गठन के लिए अंतिम अधिसूचना विधिसम्मत रूप से जारी की गई है।
तदनुसार, रिट याचिका को गुण-दोष के अभाव में खारिज कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार भर के उन ग्रामीणों, स्थानीय प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो नगर निकायों के गठन या उन्नयन का विरोध करना या उस पर आपत्ति दर्ज कराना चाहते हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यद्यपि बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 5 के तहत लोगों को आपत्तियाँ दाखिल करने का अधिकार है, किंतु कानून राज्य सरकार पर केवल इतना दायित्व डालता है कि वह अंतिम निर्णय लेने से पहले उन आपत्तियों पर “विचार” करे।
जब तक कानून विशेष रूप से यह न कहे कि कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए, तब तक सरकार को अंतिम अधिसूचना में प्रत्येक आपत्ति का उल्लेख करने या विस्तृत कारण देने की बाध्यता नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि क्या अभिलेख से यह सिद्ध होता है कि आपत्तियाँ सक्षम अधिकारियों के समक्ष रखी गईं, जांच कराई गईं और विचारोपरांत निर्णय लिया गया।
इस मामले में, क्योंकि अनेक जांच प्रतिवेदन तैयार किए गए, निरीक्षण किए गए, और अंतिम अधिसूचना जारी करने से पहले जिला पदाधिकारी, प्रधान सचिव और मंत्री – सभी ने विषय पर विचार किया, इसलिए न्यायालय ने माना कि कानूनी आवश्यकता का समुचित पालन हुआ है।
नगर का दर्जा दिए जाने का विरोध करने वाले निवासियों के लिए यह निर्णय इस बात का संकेत है कि जब तक आंतरिक अभिलेख यह दर्शाते हैं कि आपत्तियों पर विधिवत विचार किया गया, केवल इस आधार पर कि अधिसूचना संक्षिप्त है या आपत्तियों के विषय में मौन है, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।
कानूनी मुद्दे और उनके उत्तर
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मुद्दा: क्या 03.03.2021 की अंतिम अधिसूचना, जिसके द्वारा बिहटा नगर परिषद का गठन किया गया, बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 5 के अनुपालन न होने के कारण, विशेषकर इस आधार पर कि ग्रामीणों की आपत्तियों पर विचार नहीं किया गया या कारण दर्ज नहीं किए गए, अवैध थी?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अंतिम अधिसूचना जारी करने से पूर्व राज्य सरकार ने सभी आपत्तियों पर विधिवत विचार किया था, और अधिनियम यह अपेक्षा नहीं करता कि प्रत्येक आपत्ति पर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए या आपत्तियों का उल्लेख स्वयं अधिसूचना में किया जाए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- M/s Kranti Asso. Pvt. Ltd. & Anr. बनाम मसूद अहमद खान एवं अन्य, (2010) 9 SCC 496 – याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत; तथ्यों पर अनुपयुक्त माना गया।
- Sharif-Ud-Din बनाम अब्दुल गनी लोन, (1980) 1 SCC 403 – इस सिद्धांत पर न्यायालय द्वारा भरोसा, कि जब तक विधि में प्रावधान न हो, कारण दर्ज करना अनिवार्य नहीं।
- Ram Deen Morya (Dr.) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2009) 6 SCC 735 – उपर्युक्त समान सिद्धांत पर न्यायालय द्वारा भरोसा।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकार क्षेत्र मामला संख्या 5068 वर्ष 2021
मामला शीर्षक: कुमार अमिताभ एवं अन्य बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
उद्धरण: 2022(1) PLJR 535
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह
निर्णय की तिथि: 24.12.2021
अधिवक्ता: याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता श्री एस.बी.के. मंगलम; प्रतिवादी-राज्य की ओर से स्थायी अधिवक्ता-6 श्री अब्बास हैदर।
मामले की प्रकृति: बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 के तहत बिहटा नगर परिषद के गठन से संबंधित मसौदा एवं अंतिम अधिसूचनाओं को चुनौती देते हुए दायर सिविल रिट अधिकार क्षेत्र में याचिका।
विवादित अधिसूचना: मेमो संख्या 960 दिनांक 03.03.2021, जो बिहार नगर पालिका अधिनियम, 2007 की धारा 6 के तहत जारी की गई, जिसके द्वारा बिहटा नगर परिषद का गठन किया गया।
निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNTA2OCMyMDIxIzEjTg==-58A–am1–ByOSvlY=
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