मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला औरंगाबाद जिले में चतुर्थ श्रेणी पदों पर भर्ती से संबंधित है, जो विज्ञापन संख्या 1, वर्ष 2009 के आधार पर की जा रही थी। इसके तहत अभ्यर्थियों का एक पैनल तैयार किया गया, जिसका उपयोग समय‑समय पर नियुक्तियों के लिए किया गया।
राज्य के अनुसार, पहला पैनल सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार सरकार के 29.06.2011 दिनांकित पत्र के आलोक में तैयार किया गया। इस पैनल की अवधि 05.07.2011 से 04.07.2012 तक निर्धारित की गई थी। इस पहले पैनल से विभिन्न चरणों में 103 नियुक्तियाँ की गईं।
बाद में, CWJC No. 11798 of 2011 (DDT Chhirkao Kramchari Sangh & Anr. vs. The State of Bihar & Ors.) तथा CWJC No. 1409 of 2012 में पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के परिणामस्वरूप, पुनः विज्ञापन संख्या 1, वर्ष 2009 से ही एक दूसरा पैनल तैयार किया गया। इस दूसरे पैनल की अवधि 27.04.2013 से 27.04.2014 तक निर्धारित की गई।
इस दूसरे पैनल से 03.01.2015 को 220 योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति कर दी गई, जबकि पैनल की अवधि 27.04.2014 को ही समाप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद, औरंगाबाद कलेक्टरेट के अंतर्गत कुछ चतुर्थ श्रेणी पद रिक्त रह गए।
इन शेष रिक्तियों को भरने के लिए CWJC No. 8879 of 2014 सहित अन्य समरूप वाद दायर किए गए। इन वादों पर विचार करते हुए पटना उच्च न्यायालय के एक माननीय एकल न्यायाधीश ने जिला पदाधिकारी, औरंगाबाद को निर्देश दिया कि वे उन याचिकाकर्ताओं की शिकायतों पर विचार करें और उपयुक्त कदम उठाएँ।
इन निर्देशों के अनुपालन में, जिला पदाधिकारी ने चतुर्थ श्रेणी नियुक्ति अपील संख्या 29, वर्ष 2015 शीर्षक से एक वाद शुरू किया। विषय की जाँच‑परख के बाद, जिला पदाधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि पैनल की अवधि 27.04.2014 को समाप्त हो चुकी है और इसे बढ़ाया नहीं जा सकता। इसलिए, उस पैनल से और कोई नियुक्ति संभव नहीं है। फलतः, अपील वाद संख्या 29, वर्ष 2015 को 20.11.2015 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया।
इसके उपरांत, CWJC No. 14866 of 2016 (Sanjay Kumar vs. State of Bihar & Ors.) दायर की गई। इस वाद में पटना उच्च न्यायालय के एक माननीय एकल न्यायाधीश ने 20.07.2017 के आदेश से चतुर्थ श्रेणी पदों के संबंध में जिला स्तरीय प्राधिकार के निर्णय को रद्द कर दिया।
उस आदेश के अनुपालन में 31.03.2018 को चयन समिति की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में समिति ने तत्काल उपलब्ध रिक्तियों के आधार पर चतुर्थ श्रेणी पदों पर नियुक्ति के लिए 178 योग्य अभ्यर्थियों की अनुशंसा की। साथ ही, समिति ने स्पष्ट रूप से यह भी निर्णय लिया कि भविष्य में इस पैनल से कोई और नियुक्ति नहीं की जाएगी।
वर्तमान अपीलकर्ता वे अभ्यर्थी थे जिनके नाम अपनी‑अपनी श्रेणियों में पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों के नीचे स्थित थे। इनका दावा था कि अब भी 62 रिक्तियाँ उपलब्ध हैं, अतः उन्हें भी उसी पैनल से नियुक्ति दी जानी चाहिए। उनकी रिट याचिका CWJC No. 23083 of 2018 को माननीय एकल न्यायाधीश ने 15.03.2021 को खारिज कर दिया। इसी आदेश के विरुद्ध उन्होंने यह लेटर्स पेटेंट अपील (LPA No. 332 of 2021) दायर की।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय की द्वैसदस्यीय पीठ, जिसमें माननीय श्री न्यायमूर्ति रंजन गुप्ता तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह शामिल थे, ने इस अपील की सुनवाई की। निर्णय 08.12.2021 को माननीय श्री न्यायमूर्ति रंजन गुप्ता द्वारा सुनाया गया।
अपीलकर्ताओं की ओर से माननीय वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह दलील दी कि औरंगाबाद जिले में चतुर्थ श्रेणी के 62 पद अब भी रिक्त हैं। मुख्य शिकायत यह थी कि इन रिक्तियों के बावजूद प्राधिकारियों ने अपीलकर्ताओं के मामलों पर विचार नहीं किया, जबकि वे पहले से ही पैनल में शामिल थे, इसलिए उन्हें नियुक्त किया जाना चाहिए।
राज्य का पक्ष इससे एकदम विपरीत था। प्रतिवादी‑राज्य के अधिवक्ता ने विज्ञापन संख्या 1, वर्ष 2009 से उत्पन्न पैनल के इतिहास तथा उसकी अवधि के शुरू होने और समाप्त होने की तिथियों को क्रमबद्ध तरीके से समझाया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पैनल की एक निश्चित वैधता अवधि थी तथा इस अवधि के भीतर और यहाँ तक कि उसके बाद भी अनेक नियुक्तियाँ की जा चुकी हैं।
पहले, उन्होंने बताया कि सामान्य प्रशासन विभाग के 29.06.2011 दिनांकित पत्र के अनुसार पहला पैनल 05.07.2011 से 04.07.2012 तक वैध था। इस अवधि में 103 नियुक्तियाँ की गईं। इस प्रकार पैनल का व्यापक उपयोग उसकी निश्चित अवधि के भीतर ही हो चुका था।
दूसरे, उच्च न्यायालय के CWJC No. 11798 of 2011 तथा CWJC No. 1409 of 2012 में पारित आदेशों के अनुपालन में, उसी विज्ञापन से दूसरा पैनल तैयार किया गया। इस दूसरे पैनल की वैधता 27.04.2013 से 27.04.2014 तक थी। इस दूसरे पैनल से 220 अभ्यर्थियों को 03.01.2015 को नियुक्त किया गया, जबकि पैनल की अवधि तकनीकी रूप से 27.04.2014 को ही समाप्त हो चुकी थी।
तीसरे, जब आगे चलकर CWJC No. 8879 of 2014 जैसे अन्य रिट वाद दायर हुए, तो जिला पदाधिकारी, औरंगाबाद ने चतुर्थ श्रेणी नियुक्ति अपील संख्या 29, वर्ष 2015 के रूप में मामले की जाँच की। जिला पदाधिकारी ने स्पष्ट रूप से यह निर्णय दिया कि पैनल की अवधि 27.04.2014 को समाप्त हो चुकी है और इसे बढ़ाया नहीं जा सकता, अतः और कोई नियुक्ति संभव नहीं है। इसी आधार पर 20.11.2015 को उस अपील को खारिज कर दिया गया।
इसके बाद CWJC No. 14866 of 2016 (Sanjay Kumar vs. State of Bihar & Ors.) आया। माननीय एकल न्यायाधीश ने 20.07.2017 के आदेश से जिला स्तरीय निर्णय को रद्द कर दिया, जिससे आगे विचार‑विमर्श के लिए रास्ता खुला।
फलस्वरूप, 31.03.2018 को चयन समिति की बैठक हुई। इस बैठक में उस समय उपलब्ध चतुर्थ श्रेणी रिक्तियों पर नियुक्ति के लिए 178 योग्य अभ्यर्थियों की अनुशंसा की गई। किंतु समिति ने एक सतर्क और स्पष्ट निर्णय भी लिया कि भविष्य में इस पैनल से कोई और नियुक्ति नहीं की जाएगी।
राज्य के अधिवक्ता ने आगे यह भी प्रस्तुत किया कि अपीलकर्ताओं के नाम अपनी‑अपनी श्रेणियों में पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों के नीचे थे। अतः, जब पैनल के उपयोग की अनुमेय अवधि समाप्त हो चुकी थी, तब अपीलकर्ता नियुक्ति का कोई वैध अधिकार दावा नहीं कर सकते।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों की जाँच करने के बाद, द्वैसदस्यीय पीठ ने कुछ मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया।
पहला, न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि वर्ष 2009 की चयन प्रक्रिया “अनिश्चित काल तक जारी नहीं रह सकती”। इसका अर्थ यह है कि किसी विशेष वर्ष और विज्ञापन से जुड़ी भर्ती प्रक्रिया को वर्षों तक अनवरत रूप से जारी नहीं रखा जा सकता।
दूसरा, न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पैनल की अवधि “अनंत नहीं हो सकती”। चयन पैनल की एक निश्चित समयावधि होती है। एक बार यह अवधि समाप्त हो जाने के बाद, पैनल स्वयं अपनी विधिक प्रभावशीलता खो देता है। न्यायालय ने इस संदर्भ में राज्य के निरंतर रुख को स्वीकार किया कि पैनल की अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी थी।
तीसरा, पीठ ने एक सुप्रतिष्ठित विधिक सिद्धांत का हवाला दिया कि बाद में उत्पन्न होने वाली रिक्तियों को पुरानी चयन प्रक्रिया के हिस्से के रूप में नहीं जोड़ा जा सकता। पैनल की अवधि समाप्त होने के बाद जो नई रिक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें उसी पुराने पैनल से भरना विधिसंगत नहीं है। सामान्यतः, ऐसी रिक्तियों को भरने के लिए अद्यतन नियमों और कसौटियों के अनुरूप नई भर्ती प्रक्रिया आवश्यक होती है।
चौथा, न्यायालय ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि “नियुक्ति के लिए चयन मानदंड एवं अन्य मापदंडों में पर्याप्त परिवर्तन हो चुका है।” समय के साथ‑साथ पात्रता, आरक्षण, चयन प्रक्रिया एवं अन्य मानकों से संबंधित नियम बदल सकते हैं। पुराने पैनल का उपयोग नई रूपरेखा के साथ टकरा सकता है और उन अन्य संभावित अभ्यर्थियों के प्रति अन्यायपूर्ण हो सकता है, जो संशोधित मानदंडों के तहत पात्र हो जाते हैं।
इन सभी पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए, द्वैसदस्यीय पीठ ने यह माना कि इतने विलंबित चरण में ऐसे पैनल से, जिसकी अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी है और जो 2009 जैसे पुराने विज्ञापन से संबद्ध है, नियुक्ति करने का कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।
चूँकि माननीय एकल न्यायाधीश ने भी मूल रिट याचिकाकर्ताओं को लगभग इसी तर्क के आधार पर राहत देने से इनकार कर दिया था, इसलिए द्वैसदस्यीय पीठ को उस आदेश में कोई “कानूनी त्रुटि” नहीं दिखी। परिणामस्वरूप, लेटर्स पेटेंट अपील खारिज कर दी गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन अनेक अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो विभिन्न सरकारी नौकरियों के पुराने प्रतीक्षा‑सूचियों या पैनलों में वर्षों से बने हुए हैं। यह स्पष्ट करता है कि मात्र पैनल में नाम होना आपको अनंतकाल तक नियुक्ति का अधिकार नहीं देता।
पटना उच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया है कि हर चयन पैनल की एक निश्चित अवधि होती है। यह अवधि समाप्त हो जाने के बाद, भले ही कुछ पद रिक्त रह जाएँ, अभ्यर्थी पुराने पैनल से नियुक्ति पर जोर नहीं दे सकते। बाद में उत्पन्न होने वाली रिक्तियों को सामान्यतः नई भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से भरा जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब नियम एवं मानदंड बदल चुके हों।
बिहार सहित अन्य राज्यों के उन लोगों के लिए, जो पुराने पैनलों में वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं, यह निर्णय यह समझाता है कि अदालतें अक्सर नियुक्ति के आदेश देने से क्यों इंकार करती हैं। यह सरकारी विभागों को भी यह संदेश देता है कि वे समयबद्ध तरीके से भर्ती की योजना बनाएँ तथा पैनलों की प्रारंभिक और अंतिम तिथि के बारे में स्पष्ट रहें।
वकीलों और लोकसेवकों के लिए, यह मामला कुछ स्थापित सिद्धांतों को पुष्ट करता है: चयन प्रक्रियाओं का अनवरत या अनिश्चित काल तक जारी न रहना, समाप्त हो चुके पैनलों का उपयोग न करना, और केवल पैनल में नाम हो जाने मात्र से स्वतः नियुक्ति का अधिकार न उत्पन्न होना।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या औरंगाबाद जिले में विज्ञापन संख्या 1, वर्ष 2009 से बने पैनल की अधिसूचित अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी उससे चतुर्थ श्रेणी पदों पर अभ्यर्थियों की नियुक्ति की जा सकती है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि 2009 की चयन प्रक्रिया और उससे बना पैनल अनिश्चित काल तक जारी नहीं रह सकता, पैनल की अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी थी, बाद की रिक्तियों को पुरानी चयन प्रक्रिया से नहीं भरा जा सकता, तथा इतनी देर से ऐसे समाप्त पैनल से नियुक्ति का निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- CWJC No. 11798 of 2011 (DDT Chhirkao Kramchari Sangh & Anr. vs. The State of Bihar & Ors.)
- CWJC No. 1409 of 2012
- CWJC No. 8879 of 2014 और समरूप वाद (शीर्षक निर्दिष्ट नहीं)
- CWJC No. 14866 of 2016 (Sanjay Kumar vs. State of Bihar & Ors.)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Letters Patent Appeal No. 332 of 2021 in Civil Writ Jurisdiction Case No. 23083 of 2018
मामला शीर्षक: Saroj Kumar & Anr. vs. The State of Bihar & Ors.
कोरम: Hon’ble Mr. Justice Rajan Gupta; Hon’ble Mr. Justice Mohit Kumar Shah
Citation: 2022(1) PLJR 70
अधिवक्ता: अपीलकर्ताओं की ओर से: Mr. Ramakant Sharma, Senior Advocate; Mr. Lakshmi Kant Sharma, Advocate. प्रतिवादी/राज्य की ओर से: Mr. Prabhat Kumar Verma, AAG-3.
मामले का स्वरूप: औरंगाबाद जिले के अंतर्गत चतुर्थ श्रेणी पदों पर भर्ती पैनल के आधार पर नियुक्तियों से संबंधित रिट याचिका (सिविल रिट न्यायाधिकार) की खारिजी के विरुद्ध दायर लेटर्स पेटेंट अपील।
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