मामले की पृष्ठभूमि
ज़ेड.ए. इस्लामिया कॉलेज, सीवान, संविधान के अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था है और जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा से स्थायी रूप से सम्बद्ध घाटा अनुदान महाविद्यालय है।
याचिकाकर्ता, डॉ. शौकत अली खान, को पहली बार 04.04.1988 को इतिहास के अस्थायी व्याख्याता के रूप में नियुक्त किया गया। बाद में कॉलेज ने 31.08.1988 को उर्दू दैनिक “कौमी तंजीम” में स्थायी व्याख्याता पदों, जिनमें इतिहास भी शामिल था, के लिए विज्ञापन निकाला, जिसमें मौजूदा अस्थायी शिक्षकों को आवेदन करने की अनुमति दी गई।
10.09.1988 को साक्षात्कार आयोजित किया गया। याचिकाकर्ता सहित पाँच उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया गया। चयन समिति ने याचिकाकर्ता की अनुशंसा की और गवर्निंग बॉडी ने 20.09.1988 की संकल्प संख्या 4 के द्वारा उनकी सेवा को इतिहास के स्थायी व्याख्याता के रूप में 04.04.1988 से प्रभावी रूप से नियमित कर दिया।
प्रतिवादी संख्या 10, डॉ. अब्दुल वसीम खान, को बाद में 24.04.1990 के आदेश से, 13.12.1989 को The Times of India में प्रकाशित पृथक विज्ञापन के आधार पर, इतिहास के व्याख्याता के रूप में नियुक्त किया गया।
13.12.1990 को गवर्निंग बॉडी के सचिव ने बिहार कॉलेज सेवा आयोग को कई व्याख्याताओं की नियुक्ति, जिनमें याचिकाकर्ता और प्रत्यर्थी संख्या 10 शामिल थे, पर सहमति देने के लिए पत्र लिखा। आयोग ने, 02.09.1994 के पत्र से, कॉलेज के 52 व्याख्याताओं को साक्षात्कार के लिए बुलाया। इसमें याचिकाकर्ता को 5वें इतिहास पद के विरुद्ध और प्रत्यर्थी संख्या 10 को 7वें पद के विरुद्ध साक्षात्कार हेतु दर्शाया गया।
हालाँकि, 31.03.1995 की अपनी सहमति पत्र में आयोग ने प्रत्यर्थी संख्या 10 को 6वें इतिहास पद पर स्वीकृति दे दी और याचिकाकर्ता का नाम छोड़ दिया। जब कॉलेज ने इस त्रुटि की ओर ध्यान दिलाया, तो आयोग ने 06.05.1995 को ज्ञापन संख्या 7155 जारी किया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता को 6वें पद के विरुद्ध सहमति दी गई, और 08.05.1995 को ज्ञापन संख्या 7158 जारी कर पूर्ववर्ती पत्र को आंशिक रूप से संशोधित किया। याचिकाकर्ता को 6वें पद पर स्वीकृत किया गया और प्रत्यर्थी संख्या 10 को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि के आधार पर 7वें पद पर नीचे कर दिया गया।
30.04.2004 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष श्री डी.डी. शर्मा के सेवानिवृत्त होने पर 5वें इतिहास पद पर रिक्ति उत्पन्न हुई। गवर्निंग बॉडी ने 02.01.2005 की बैठक में निर्णय लिया कि याचिकाकर्ता को 6वें पद से 5वें पद पर 01.05.2004 से प्रभावी रूप से स्थानांतरित कर दिया जाए। राज्य सरकार ने 10.03.2006 के पत्र से इसे स्वीकृत किया और 5वें (घाटा अनुदान) पद के विरुद्ध याचिकाकर्ता को वेतन भुगतान करने का निर्देश दिया।
प्रत्यर्थी संख्या 10 ने 10.03.2006 के आदेश को CWJC संख्या 5712 ऑफ 2006 में चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय की समन्वय पीठ ने, 09.09.2011 के आदेश द्वारा, उस आदेश के साथ-साथ 06.05.1995 और 08.05.1995 की आयोग की उन संस्तुतियों को, जो याचिकाकर्ता और प्रत्यर्थी संख्या 10 से संबंधित थीं, निरस्त कर दिया। चूँकि कॉलेज सेवा आयोग भंग हो चुका था, न्यायालय ने प्रतिद्वंदी दावों की जांच के लिए तीन-सदस्यीय समिति गठित की।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
तीन-सदस्यीय समिति में उच्च शिक्षा निदेशक; जय प्रकाश विश्वविद्यालय के कुलसचिव; और ज़ेड.ए. इस्लामिया कॉलेज की गवर्निंग बॉडी के सचिव शामिल थे। समिति को सभी अभिलेखों का निरीक्षण करने, दोनों पक्षों को सुनने और उपकुलपति को प्रतिवेदन भेजने का निर्देश दिया गया, जो उसे अपनी अनुशंसा सहित मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव को अंतिम वेतन-प्राप्ति संबंधी निर्णय के लिए अग्रेषित करेंगे।
समिति ने 12.03.2013 को अपनी रिपोर्ट दाखिल की। उसने पाया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति प्रत्यर्थी संख्या 10 से पहले विज्ञापन और साक्षात्कार के आधार पर इतिहास के व्याख्याता के रूप में हुई थी और वे अपनी प्रारंभिक नियुक्ति से लगातार कार्यरत रहे हैं। उसने यह भी दर्ज किया कि प्रत्यर्थी संख्या 10, यद्यपि 24.04.1990 को नियुक्त हुए थे, 1998 से 2006 के बीच कॉलेज से लगातार अनुपस्थित रहे और 09.09.2009 से पूर्व उनकी सेवा में निरंतरता का अभाव था।
इन निष्कर्षों के बावजूद, जब रिपोर्ट उपकुलपति के पास गई, तो उन्होंने 15.04.2013 को एक अनुशंसा भेजी, जिसमें उन्होंने न तो याचिकाकर्ता और न ही प्रत्यर्थी संख्या 10 में से किसी को भी वेतन हेतु अनुशंसित किया। इसके आधार पर, शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव ने, प्रधान सचिव की स्वीकृति से, 07.06.2013 को ज्ञापन संख्या 1044 जारी कर दोनों व्याख्याताओं के वेतन दावों को खारिज कर दिया।
इसके बाद अवमानना याचिका (MJC संख्या 4003 ऑफ 2012) दाखिल की गई, जिसमें पूर्व उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन न होने का आरोप लगाया गया। 03.07.2013 को न्यायालय ने उपकुलपति और प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि वे CWJC संख्या 5712 ऑफ 2006 के आदेश का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश पारित करें।
इसके प्रत्युत्तर में, उपकुलपति ने 16.07.2013 को एक और अनुशंसा भेजी। उनका मत था कि, चूँकि याचिकाकर्ता की स्वीकृति और प्रत्यर्थी संख्या 10 के पद को नीचे करने वाले आदेश (दिनांक 06.05.1995 और 08.05.1995) तथा 10.03.2006 का सरकारी आदेश CWJC संख्या 5712 ऑफ 2006 में निरस्त हो चुके हैं, इसलिए बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 57A के अंतर्गत केवल प्रत्यर्थी संख्या 10 की नियुक्ति ही वैध और कानूनी रूप से शेष रह जाती है। अतः उन्होंने प्रत्यर्थी संख्या 10 को वेतन भुगतान की अनुशंसा की।
इस अनुशंसा को प्राप्त करने पर शिक्षा विभाग ने, 10.08.2013 के पत्र से, तीन-सदस्यीय समिति से कहा कि वह इसके आलोक में अपनी पूर्व रिपोर्ट की समीक्षा करे। समिति 22.08.2013 को पुनः मिली और 12.03.2013 की अपनी याचिकाकर्ता के पक्ष में की गई निष्कर्षों की पुनरावृत्ति की।
अंततः शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने 04.09.2013 को ज्ञापन संख्या 1624 पारित किया, जो CWJC संख्या 22400 ऑफ 2013 में चुनौती दिया गया आदेश है। उन्होंने मुख्यतः दो आधारों पर याचिकाकर्ता का वेतन दावा अस्वीकार कर दिया:
पहला, उन्होंने यह माना कि याचिकाकर्ता की 04.04.1988 की नियुक्ति-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले, मो. एम.एन. अहमद ग़नी, उस समय गवर्निंग बॉडी के सचिव नहीं थे, जिससे नियुक्ति की वैधता संदिग्ध हो जाती है।
दूसरा, उन्होंने यह उल्लेख किया कि 09.09.1988 की सांविधिक अधिसूचना के अंतर्गत व्याख्याता की नियुक्ति के लिए न्यूनतम पात्रता मास्टर डिग्री में कम से कम 55% अंक थी। याचिकाकर्ता के 54.2% अंक थे और इस आधार पर प्रधान सचिव ने शंका प्रकट की कि संभवतः नई आवश्यकता से बचने के लिए नियुक्ति को 04.04.1988 की पूर्व-तिथि दी गई होगी।
संयुक्त रिट (CWJC संख्या 7292 ऑफ 2014) में, प्रत्यर्थी संख्या 10 ने 24.04.1990 से वेतन बकाया, वर्तमान वेतन, तथा मानसिक उत्पीड़न और आर्थिक क्षति के लिए क्षतिपूर्ति की मांग की, यह कहते हुए कि उनकी नियुक्ति वैध और सतत है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनकी नियुक्ति विज्ञापन और साक्षात्कार के बाद गवर्निंग बॉडी द्वारा विधिवत की गई थी और वे निरंतर कॉलेज में कार्यरत रहे। उन्होंने यह इंगित किया कि 31.08.1988 के विज्ञापन के समय लागू 1983 की सांविधिक अधिसूचना के अंतर्गत आवश्यक योग्यता सेकंड क्लास मास्टर डिग्री थी, जो उनके पास 54.2% अंकों सहित थी। 55% अंकों की आवश्यकता बाद की 09.09.1988 की अधिसूचना से आई और उसे चलते हुए चयन प्रक्रिया पर लागू नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी दलील दी कि पक्षकारों की सहमति से गठित तीन-सदस्यीय समिति पहले ही उनकी नियुक्ति को वैध, समय की दृष्टि से पूर्ववर्ती पाया है और 1998 से 2006 के बीच प्रत्यर्थी संख्या 10 की सेवा में पर्याप्त अंतराल पाए हैं। उनके अनुसार, न तो उपकुलपति और न ही प्रधान सचिव को उच्च न्यायालय के 2011 के आदेश के तहत समिति की रिपोर्ट को दरकिनार करने का अधिकार था।
समर्थन में, उन्होंने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित कई निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें शामिल हैं:
- The State of Bihar v. Syed Asad Raza (AIR 1997 SC 2425)
- Board of Secondary Education and Teachers Training v. Jt. Director of Public Instructions, Sagar ((1998) 8 SCC 555)
- Milli Trust v. State of Bihar (2016 SCC Online Pat 5242)
- Governing Body of Karim City College v. State of Bihar (1984 PLJR 86)
- State of Kerala v. Very Rev. Mother Provincial ((1970) 2 SCC 417)
- The Ahmedabad St. Xavier’s College Society v. State of Gujarat ((1974) 1 SCC 717)
- Mohd. Abbas @ Hassan Abbas v. A.G.M. Trust (1990 BLJR 1229)
इन मामलों में व्यापक रूप से यह स्वीकार किया गया है कि अल्पसंख्यक संस्थाओं को अपने स्टाफ का प्रबंधन और नियुक्ति करने का संरक्षित अधिकार है और राज्य का नियंत्रण ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह इस मूल अधिकार को ही छीन ले, यद्यपि शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने के लिए युक्तिसंगत विनियमन स्वीकार्य है।
इसके विपरीत, प्रत्यर्थी संख्या 10 ने याचिकाकर्ता की नियुक्ति को अवैध बताया, यह दोहराते हुए कि याचिकापत्र पर हस्ताक्षर के समय मो. एम.एन. अहमद ग़नी कथित रूप से सचिव नहीं थे और याचिकाकर्ता के पास 55% अंक नहीं थे। उनका कहना था कि स्वयं उनकी नियुक्ति 24.04.1990 को विधिवत हुई और वे लगातार कॉलेज में काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि तीन-सदस्यीय समिति ने प्रासंगिक दस्तावेजों पर विचार नहीं किया और उपकुलपति की उनके पक्ष में की गई अनुशंसा को वरीयता मिलनी चाहिए।
राज्य ने प्रधान सचिव के आदेश का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि तीन-सदस्यीय समिति ने किसी का भी नाम अनुशंसित नहीं किया था और याचिकाकर्ता संशोधित योग्यता आवश्यकता के अंतर्गत अपात्र थे तथा अयोग्य प्राधिकारी द्वारा नियुक्त किए गए थे।
महाविद्यालय ने, हालांकि, याचिकाकर्ता का समर्थन किया। उसने समिति की इस निष्कर्ष पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति प्रत्यर्थी संख्या 10 से पहले विधिवत चयन के आधार पर हुई थी और प्रत्यर्थी संख्या 10 की दीर्घ अवधि तक अनुपस्थिति रही। विश्वविद्यालय के अधिवक्ता ने भी यह प्रस्तुत किया कि उपकुलपति की भिन्न रिपोर्ट उनके अधिकार-क्षेत्र से बाहर तथा उच्च न्यायालय के निर्देशों के विपरीत थी और समिति के निष्कर्षों के आलोक में 5वें पद के विरुद्ध वेतन पाने के अधिकारी याचिकाकर्ता ही हैं।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने प्रतिद्वंदी तर्कों का विश्लेषण करते हुए दो केंद्रीय प्रश्नों पर स्पष्ट रूप से ध्यान केंद्रित किया: (i) किसकी नियुक्ति और सेवा अभिलेख 5वें, घाटा-अनुदान इतिहास पद पर नियुक्ति और वेतन प्राप्ति को न्यायोचित ठहराते हैं, और (ii) क्या प्रधान सचिव और उपकुलपति तीन-सदस्यीय समिति के निष्कर्षों को हटाकर अपने विचार थोपने के अधिकारी थे।
पहले, याचिकाकर्ता की नियुक्ति की तथ्यात्मक और विधिक वैधता के संदर्भ में, न्यायालय ने नोट किया कि तीन-सदस्यीय समिति ने पूर्ण जांच के बाद उनकी नियुक्ति को नियमित, विज्ञापन और साक्षात्कार के आधार पर, तथा प्रत्यर्थी संख्या 10 की नियुक्ति से पूर्व का पाया। उसने याचिकाकर्ता की सेवा को सतत पाया, जबकि प्रत्यर्थी संख्या 10 1998 से 2006 के बीच अनुपस्थित रहे और 09.09.2009 से पूर्व उनकी सेवा में निरंतरता का अभाव था।
यह आरोप कि मो. एम.एन. अहमद ग़नी सचिव नहीं थे, के संबंध में, न्यायालय ने मोहद. अब्बास के मामले में डिवीजन बेंच के निर्णय का संदर्भ लिया। वहाँ न्यायालय ने माना था कि मो. ग़नी मुतवल्ली थे और उन्हें विधिवत नहीं हटाया गया था तथा कॉलेज का प्रबंधन करने के लिए वक्फ बोर्ड द्वारा गठित समिति अवैध थी और उसे कॉलेज का नियंत्रण लेने से रोका गया था। इससे न्यायमूर्ति सिन्हा ने निष्कर्ष निकाला कि चुनौती दिए गए आदेश में लिया गया आधार — कि नियुक्ति के समय मो. ग़नी सचिव नहीं थे — एक अस्तित्वहीन तथ्य पर आधारित है और टिक नहीं सकता।
योग्यता के मुद्दे पर, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के चयन का विज्ञापन 31.08.1988 का था, जबकि 55% न्यूनतम अंकों की आवश्यकता केवल 09.09.1988 की सांविधिक अधिसूचना से आई। विज्ञापन के समय लागू नियम 1983 की पूर्ववर्ती अधिसूचना थी, जो सेकंड क्लास मास्टर डिग्री की मांग करती थी। याचिकाकर्ता, 54.2% अंकों के साथ, इस मानक को पूरा करते थे। अतः बाद में न्यूनतम अंकों में वृद्धि उनके चयन को पूर्वलक्षी रूप से अमान्य नहीं कर सकती और इस प्रकार उनका दावा खारिज करने का यह दूसरा आधार भी अवैध ठहराया गया।
इसके बाद न्यायालय ने अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत अल्पसंख्यक संस्थाओं को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण की ओर रुख किया। Milli Trust, Karim City College, Mother Provincial, St. Xavier’s College और Board of Secondary Education and Teachers Training पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने दोहराया कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना और संचालन के अधिकार में स्टाफ की नियुक्ति और आंतरिक प्रबंधन का अधिकार भी निहित है। राज्य, शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने और दुर्भावनापूर्ण कार्यवाहियों को रोकने के लिए विनियम लगा सकता है, परंतु वह मूल प्रबंधकीय निर्णयों को अपने अधीन नहीं कर सकता और न ही गवर्निंग बॉडी की संरचना और कार्यप्रणाली में अनुचित हस्तक्षेप कर सकता है।
इस मामले में, अल्पसंख्यक महाविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति कॉलेज सेवा आयोग की स्वीकृति के अधीन थी, जिसका स्थान अब विश्वविद्यालय चयन समिति ने ले लिया है। चूँकि आयोग कार्यशील नहीं था, उच्च न्यायालय ने ही, पक्षकारों की सहमति से, तीन-सदस्यीय समिति गठित की थी ताकि पात्रता, अनुच्छेद 14 और 16 के पालन और नियुक्तियों की वैधता की उसी तरह जांच कर सके जैसे आयोग करता।
न्यायमूर्ति सिन्हा ने माना कि इस ढाँचे में तीन-सदस्यीय समिति वस्तुतः आयोग का स्थान लेती है। एक बार जब इस समिति ने विस्तृत जांच के बाद यह पाया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति वैध, पूर्ववर्ती और सतत है तथा प्रत्यर्थी संख्या 10 की सेवा में दीर्घ अंतराल है, तो प्रधान सचिव और उपकुलपति समिति की रिपोर्ट पर अपीलीय प्राधिकारी की तरह कार्य नहीं कर सकते थे। उन्हें समिति द्वारा सावधानीपूर्वक दर्ज निष्कर्षों के स्थान पर अपने विचार रखने का कोई अधिकार-क्षेत्र प्राप्त नहीं था।
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि 1988 में नियुक्त याचिकाकर्ता को 5वें पद — जो अकेला घाटा-अनुदान वाला पद था — पर स्थानांतरित किए जाने का वास्तविक अधिकार था। प्रत्यर्थी संख्या 10 का दावा स्वीकार करना, जबकि उनकी नियुक्ति बाद की (1990) थी, उनकी लम्बी अनुपस्थिति भी स्वीकार की गई थी, और याचिकाकर्ता के विरुद्ध त्रुटिपूर्ण आधारों पर, “न्याय का उपहास” करने के समान होता।
इस तर्क के आधार पर न्यायालय ने 04.09.2013 की चुनौती दी गई ज्ञापन संख्या 1624 को निरस्त कर दिया और राज्य तथा अन्य प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को 5वें इतिहास पद पर कार्यरत मानें और आदेश की प्राप्ति से दो माह के भीतर उन्हें बकाया तथा वर्तमान वेतन का भुगतान करें। फलस्वरूप, CWJC संख्या 22400 ऑफ 2013 स्वीकार कर ली गई और प्रत्यर्थी संख्या 10 द्वारा दायर प्रतिद्वंदी रिट, CWJC संख्या 7292 ऑफ 2014, बिना किसी लागत के खारिज कर दी गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के अल्पसंख्यक महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों और ऐसी संस्थाओं के प्रबंधकों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि जब उच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने नियुक्तियों और सेवा अभिलेखों की जांच कर ली हो, तो प्रशासनिक प्राधिकारी बिना ठोस कानूनी आधार के उसकी रिपोर्ट को अनदेखा या पलट नहीं सकते।
दूसरा, निर्णय इस बात पर जोर देता है कि पात्रता नियमों में परिवर्तन का उपयोग पूर्व नियमों के अंतर्गत शुरू की गई चयन प्रक्रियाओं को बाद में अस्थिर करने के लिए पूर्वलक्षी रूप से नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब कॉलेज ने विधिवत विज्ञापन और चयन की प्रक्रिया अपनाई हो।
तीसरा, यह अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं के संरक्षण को पुनः पुष्ट करता है, विशेष रूप से शिक्षकों की नियुक्ति और प्रबंधन के उनके अधिकार को, जो केवल मानकों और निष्पक्षता के लिए उचित नियामक नियंत्रण के अधीन है।
घाटा-अनुदान महाविद्यालयों के व्याख्याताओं और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए, यह निर्णय दिखाता है कि वास्तविक, पूर्ववर्ती नियुक्तियों को, जिनमें सेवा सतत रही हो, संदिग्ध प्रशासनिक तर्क के आधार पर बाद के नियुक्त कर्मचारियों के पक्ष में दरकिनार नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब बाद वाले की सेवा में अंतराल हो।
कानूनी मुद्दे और उत्तर
मुद्दा: दो इतिहास व्याख्याताओं में से कौन कानूनी रूप से 5वें, घाटा-अनुदान पद पर स्थानांतरित किए जाने और राज्य सरकार से वेतन पाने का अधिकारी था?
उत्तर: 1988 में विधिवत विज्ञापन और साक्षात्कार के बाद नियुक्त और सतत सेवा करने वाले याचिकाकर्ता को 5वें पद और उससे संबद्ध वेतन का अधिकारी माना गया। प्रत्यर्थी संख्या 10 का प्रतिद्वंदी दावा खारिज कर दिया गया।
मुद्दा: क्या प्रधान सचिव और उपकुलपति उच्च न्यायालय द्वारा गठित तीन-सदस्यीय समिति की रिपोर्ट की उपेक्षा या उसे रद्द कर, नये आधारों पर याचिकाकर्ता को वेतन देने से इंकार कर सकते थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि तीन-सदस्यीय समिति ने प्रभावी रूप से कॉलेज सेवा आयोग का स्थान लिया था, और पूर्ण जांच के बाद उसकी जो निष्कर्षात्मक रिपोर्ट थी, उसे प्रशासनिक प्राधिकारी अपीलीय प्राधिकरण की भाँति पलट नहीं सकते थे।
मुद्दा: चुनौती दिए गए ज्ञापन में प्रयुक्त आधार — सचिव के अधिकार और 55% अंक की आवश्यकता संबंधी — क्या याचिकाकर्ता के दावे को अस्वीकार करने के लिए वैध थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि मो. एम.एन. अहमद ग़नी के सचिव के रूप में अधिकार को पूर्व वाद में कायम रखा गया था, और 55% अंक की आवश्यकता विज्ञापन के बाद आई थी, जिसे पूर्वलक्षी रूप से लागू नहीं किया जा सकता। दोनों आधार अस्थिर घोषित किए गए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- The State of Bihar and Others v. Syed Asad Raza and Others, AIR 1997 SC 2425
- Board of Secondary Education and Teachers Training v. Jt. Director of Public Instructions, Sagar, (1998) 8 SCC 555
- Milli Trust v. State of Bihar and Others, 2016 SCC Online Pat 5242
- Governing Body of Karim City College v. State of Bihar, 1984 PLJR 86
- State of Kerala etc. v. Very Rev. Mother Provincial, etc., (1970) 2 SCC 417
- The Ahmedabad St. Xavier’s College Society and Another v. State of Gujarat and Another, (1974) 1 SCC 717
- Mohd. Abbas @ Hassan Abbas and Another v. A.G.M. Trust and Others, 1990 BLJR 1229
मामले का विवरण
मामला संख्या: CWJC संख्या 22400 ऑफ 2013 वाद CWJC संख्या 7292 ऑफ 2014 के साथ
मामले का शीर्षक: Dr. Shaukat Ali Khan v. The State of Bihar & Others; with Dr. Abdul Washim Khan v. The State of Bihar & Others
उद्धरण: 2024 (4) PLJR 828
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा
निर्णय की तिथि: 25.10.2024
अधिवक्ता (CWJC संख्या 22400 ऑफ 2013):
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री बिनोदानंद मिश्रा
- विश्वविद्यालय की ओर से: श्री चंदन कुमार, श्री बिंध्याचल राय
- कॉलेज की ओर से: श्री अभिनव श्रीवास्तव
- प्रत्यर्थी संख्या 10 की ओर से: श्री सियाराम साही
अधिवक्ता (CWJC संख्या 7292 ऑफ 2014):
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री मो. अनीसुर रहमान, श्री जय प्रकाश सिंह
- राज्य की ओर से: श्री राघवनंद, GA 11
- विश्वविद्यालय की ओर से: श्री चंदन कुमार, श्री बिंध्याचल राय
- कॉलेज की ओर से: श्री अभिनव श्रीवास्तव
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिकाएँ, जिनमें एक अल्पसंख्यक डिग्री कॉलेज के घाटा-अनुदान पद के विरुद्ध वेतन-प्राप्ति के अधिकार और इस प्रकार के दावे को अस्वीकार करने वाले सरकारी ज्ञापन को चुनौती दी गई।
निर्णय का लिंक: Full text of Patna High Court judgment
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