मामले की पृष्ठभूमि
विवाद 1980 में शुरू हुआ, जब याचिकाकर्ता की माता ने आवासीय प्लॉट के आवंटन के लिए बिहार राज्य आवास बोर्ड में पंजीकरण कराया। उन्होंने 1981 में आवश्यक दस्तावेजों के साथ 5,000 रुपये अग्रिम के रूप में जमा किए। पात्र पाए जाने के बाद, आवास बोर्ड ने उन्हें 16.01.1982 के पत्र द्वारा श्री कृष्ण नगर, पटना स्थित प्लॉट संख्या CH/27, क्षेत्रफल 2.91 खट्टा, आवंटित किया। उनसे 31.01.1982 तक 1,840 रुपये जमा करने को कहा गया, जो उन्होंने 29.01.1982 को जमा कर दिए, जिससे आवंटन की पुष्टि हो गई।
इसके बावजूद, आवास बोर्ड ने औपचारिक अनुबंध विलेख निष्पादित नहीं किया। मूल आवंटी के पति ने 08.07.1982 को अध्यक्ष को पत्र लिखकर औपचारिकताएं पूरी करने का अनुरोध किया। बोर्ड ने उत्तर दिया कि आवंटन स्थगित हैं और केवल अगस्त 1982 के बाद ही आगे की प्रक्रिया होगी।
16.09.1982 को बोर्ड ने अखबार “सर्च लाइट” में एक सूचना प्रकाशित की, जिसमें आवेदकों से फाइलों के अद्यतन हेतु पुनः सूचना देने को कहा गया। याचिकाकर्ता की माता ने अनुपालन किया और 28.09.1982 की रसीद द्वारा उनके दस्तावेजों की प्राप्ति की पुष्टि की गई। फिर भी कोई विलेख निष्पादित नहीं हुआ।
फिर 17.04.1986 को बोर्ड ने “इंडियन नेशन” अखबार में एक और सूचना जारी की, जिसमें फरवरी 1981 से जनवरी 1982 के बीच अध्यक्ष के कोटे के अंतर्गत आवेदकों से 15 दिनों के भीतर विवरण देने को कहा गया। मूल आवंटी ने पुनः सभी जानकारी उपलब्ध कराई, परंतु कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
बाद में, 13.09.1988 को हुई अपनी 121वीं बैठक में, बोर्ड ने तत्कालीन आवास मंत्री श्री अवध बिहारी सिंह के अनुरोध पर विचार किया, जिसमें उन्होंने अपने आवंटित प्लॉट CH/22 को बदलकर CH/27 करने को कहा था, जो वही प्लॉट था जो पूर्व में याचिकाकर्ता की माता को आवंटित हुआ था। विलेख निष्पादित न होने, कब्जा न दिए जाने तथा मंत्री को आवंटन बदले जाने से आहत होकर, उन्होंने C.W.J.C. No.458 of 1989 दाखिल की। 15.12.1989 को उच्च न्यायालय ने उस प्लॉट के आवंटन पर अंतरिम स्थगनादेश पारित किया।
स्थगनादेश के बावजूद, आवास बोर्ड ने प्लॉट CH/27 डाक सहकारी गृह निर्माण समिति को हस्तांतरित कर दिया। इससे मूल आवंटी ने अवमानना याचिका M.J.C. No.72 of 2001 दायर की। 30.07.2001 को उच्च न्यायालय ने आवास बोर्ड को निर्देश दिया कि श्री कृष्ण नगर में एक उपयुक्त वैकल्पिक प्लॉट ढूंढकर चार सप्ताह के भीतर आवंटित करे, और यदि उपलब्ध न हो तो समान कॉलोनी में उपयुक्त प्लॉट आवंटित करे। महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने निर्देश दिया कि लागू दर 15.12.1989 की होगी।
अनुपालन में, बोर्ड ने पत्र संख्या 623/AA दिनांक 02.03.2002 द्वारा पटना के बहादुरपुर स्थित प्लॉट संख्या 6H/65 आवंटित किया। 01.10.2002 को कब्जा सौंप दिया गया। दुर्भाग्यवश, याचिकाकर्ता की माता की मृत्यु 12.07.2003 को, कब्जा मिलने के दस माह के भीतर और कोई निर्माण प्रारंभ होने से पहले हो गई।
20.11.2003 को याचिकाकर्ता ने आवास बोर्ड को अपनी माता की मृत्यु की सूचना दी और 50,000 रुपये की अस्थायी राशि जमा की। 22.11.2003 को कानूनी वारिसों ने आवंटन पत्र में उल्लिखित 1,04,360 रुपये की अनुमानित लागत के विरुद्ध 1,02,535 रुपये जमा किए।
बाद में, 13.06.2008 के पत्र द्वारा, जिसके साथ 29.02.2008 का पत्र संलग्न था, बोर्ड ने 35,089 रुपये या 35,410 रुपये की मांग की। याचिकाकर्ता ने 16.09.2008 को 35,410 रुपये जमा कर दिए। उन्होंने अपने नाम पर प्लॉट के प्रतिस्थापन के लिए बार-बार प्रयास किया, जिसे अन्य कानूनी वारिसों की अनापत्ति से समर्थन प्राप्त था।
हालांकि, 26.05.2009 को बोर्ड ने कारण बताओ नोटिस जारी किया कि प्लॉट पर निर्माण न करने को अनुबंध की धारा 13 के तहत चूक क्यों न माना जाए। याचिकाकर्ता ने 06.07.2009 को उत्तर दिया कि अभी तक प्लॉट का हस्तांतरण उनके नाम पर लंबित है, और जब तक यह न हो, भवन मानचित्र स्वीकृत नहीं हो सकता और निर्माण शुरू नहीं हो सकता।
10.09.2013 को बोर्ड ने भूमि एस्टेट अधिकारी से दस्तावेज मांगे, जिन्होंने 28.09.2013 को याचिकाकर्ता को आवश्यक कागजात के लिए लिखा। याचिकाकर्ता ने पुनः सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए। इसके बाद, 12.12.2013 को याचिकाकर्ता को सूचित किया गया कि उनका हस्तांतरण का अनुरोध इस आधार पर नहीं माना जा सकता कि कार्यालय आदेश संख्या 9754 दिनांक 11.11.2011 द्वारा आवंटन पहले ही रद्द किया जा चुका है। याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें यह रद्दीकरण पत्र कभी प्राप्त नहीं हुआ और इसकी जानकारी केवल 2013 में हुई।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष C.W.J.C. No.2314 of 2016 में मूल विवाद यह था कि जब कानूनी वारिस अभी भी प्रतिस्थापन की मांग कर रहा था और बकाया राशि चुका चुका था, तो क्या बिहार राज्य आवास बोर्ड प्लॉट 6H/65 का आवंटन निर्माण न होने के आधार पर रद्द कर सकता था।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 11.11.2011 की विवादित आदेश उच्च न्यायालय के C.W.J.C. No.12376 of 2007 तथा M.J.C. No.999 of 2011 के पूर्व निर्देशों के अनुपालन में पारित की गई, जिसमें ऐसे डिफॉल्टर आवंटियों के विरुद्ध कार्रवाई का निर्देश दिया गया था जिन्होंने निर्धारित समय के भीतर मकान का निर्माण नहीं किया था। उनका कहना था कि उनका मामला उस श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि प्लॉट कभी भी उनके नाम पर हस्तांतरित नहीं हुआ, और ऐसे हस्तांतरण के बिना भवन मानचित्र स्वीकृत नहीं हो सकता था।
उन्होंने जोर देकर कहा कि निर्माण न होने के कारण उनके नियंत्रण के बाहर थे। न तो वे और न ही उनकी माता उन पूर्व कार्यवाहियों में पक्षकार थे, जिनमें ये निर्देश पारित हुए थे। उन्हें प्रस्तावित रद्दीकरण का कोई नोटिस नहीं दिया गया। अतः बिना सुने उन निर्देशों को उनके मामले पर लागू करना अवैध था।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उनकी ओर से कोई चूक नहीं थी। किसी भी देरी के लिए आवास बोर्ड जिम्मेदार था, जिसने प्रतिस्थापन पूरा नहीं किया और अनुबंध की धारा 11 के तहत आवश्यक अनुमति प्रदान नहीं की। उस धारा के अनुसार निर्माण शुरू करने से पहले आवास बोर्ड तथा बिहार प्रतिबंधित उपयोग भूमि अधिनियम या अन्य कानून के तहत संबंधित प्राधिकारी से स्वीकृति आवश्यक थी।
याचिकाकर्ता ने इंगित किया कि प्लॉट 6H/65 का कब्जा 01.10.2002 को दिया गया, उनकी माता की मृत्यु दस माह के भीतर हो गई और उन्होंने 20.11.2003 को तुरंत बोर्ड को सूचना दी। कानूनी वारिसों ने चंद दिनों के भीतर लगभग पूरी अनुमानित लागत जमा कर दी। उनके मत में यह उनकी bona fide आचरण को दर्शाता है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आवंटन रद्द करना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 300A का उल्लंघन है। यद्यपि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी यह अनुच्छेद 300A के तहत एक संवैधानिक अधिकार है, जिसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति को विधि द्वारा प्राधिकरण के अतिरिक्त उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of West Bengal vs. Haresh C. Banerjee, (2006) 7 SCC 651 पर भरोसा किया, जिसमें इस सिद्धांत की पुष्टि की गई थी।
याचिकाकर्ता ने Hire-Purchase Agreement की धारा 13 पर भरोसा किया, जो बोर्ड की पूर्व लिखित अनुमति और नगरपालिका या अन्य प्राधिकरणों की स्वीकृति के बिना किसी प्रकार के परिवर्तन या अतिरिक्त निर्माण को प्रतिबंधित करती है। उन्होंने आवंटन पत्र की धारा 15 का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि कब्जा और भुगतान के बाद आवंटी की मृत्यु हो जाती है, तो कानूनी वारिसों के पक्ष में हस्तांतरण के संबंध में निर्णय बोर्ड अपने विवेक से करेगा। आवंटन पत्र की धारा 10 में केवल स्वीकृत मानचित्रों के अनुसार निर्माण की आवश्यकता बताई गई थी। उनका तर्क था कि चूंकि बोर्ड ने धारा 15 के तहत अपने विवेक का समुचित उपयोग नहीं किया और हस्तांतरण पूरा नहीं किया, वे स्वीकृतियां प्राप्त कर सकते थे और न ही निर्माण शुरू कर सकते थे। अतः उन्हें डिफॉल्टर नहीं माना जा सकता।
आवास बोर्ड ने अपने प्रत्युत्तर हलफनामे में मूल घटनाक्रम पर विवाद नहीं किया। उसने 02.03.2002 के आवंटन पत्र की धारा 10 तथा 20.05.2002 के Hire-Purchase Agreement की धारा 12 पर जोर दिया, जिनमें आवंटी को कब्जा मिलने के दो वर्ष के भीतर निर्माण प्रारंभ करने और तीन वर्ष के भीतर भूतल का निर्माण पूरा करने का दायित्व डाला गया था। बोर्ड ने कहा कि मूल आवंटी की 12.07.2003 को मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता ने तुरंत प्रतिस्थापन के लिए कदम नहीं उठाए और न ही इन धाराओं का अनुपालन किया।
बोर्ड ने दावा किया कि उसने बकाया राशि के संबंध में पत्र भेजे, जिनमें 22.03.2006 का पत्र, उसके बाद 29.02.2008 का पत्र और 04.07.2008 का अनुस्मारक शामिल हैं। उसका कहना था कि केवल अनुस्मारकों के बाद ही याचिकाकर्ता ने बकाया राशि चुकाई। आगे यह भी कहा गया कि 26.05.2009 को धारा 12 के उल्लंघन के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और याचिकाकर्ता ने 06.07.2009 को उत्तर दिया।
महत्वपूर्ण रूप से, बोर्ड ने स्पष्ट किया कि C.W.J.C. No.12376 of 2007 (Krishna Murari Prasad Singh vs. State of Bihar & Ors.) में उच्च न्यायालय के 02.09.2008 के आदेश तथा उसके आलोक में M.J.C. No.999 of 2011 में अवमानना कार्यवाही के अनुपालन में, उसने 11.11.2011 को 17 डिफॉल्टर आवंटियों, जिनमें याचिकाकर्ता का मामला भी शामिल था, के विरुद्ध सामूहिक रद्दीकरण आदेश पारित किया। उसने स्वीकार किया कि प्लॉट 6H/65 की मुख्य फाइल उपलब्ध नहीं थी, अतः एक भाग फाइल खोली गई। क्योंकि रद्दीकरण आदेश भाग फाइल में नहीं था, बोर्ड ने अनजाने में दस्तावेजों की मांग करते हुए तथा हस्तांतरण प्रक्रिया आगे बढ़ाते हुए पत्र जारी किए, जब तक कि मुख्य फाइल से यह स्पष्ट न हो गया कि रद्दीकरण पहले ही किया जा चुका था।
प्रत्युत्तर में, याचिकाकर्ता ने रेखांकित किया कि कब्जा मिलने के दस माह के भीतर उनकी माता की मृत्यु और उनका लंबित प्रतिस्थापन अनुरोध, कृष्णा मुरारी प्रसाद सिंह के मामले में न्यायालय के समक्ष कभी प्रस्तुत नहीं किया गया। उन्होंने 22.03.2006 के कथित पत्र पर विवाद किया, यह बताते हुए कि बोर्ड ने उसे प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने यह कायम रखा कि 13.06.2008/29.02.2008 के वास्तविक मांग पत्र का उन्होंने 16.09.2008 को 35,410 रुपये जमा कर शीघ्र अनुपालन किया।
न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने तर्कों और अभिलेखों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। न्यायालय ने ध्यान दिया कि यह निर्विवाद था कि मूल आवंटी की प्लॉट के आवंटन के दस माह के भीतर मृत्यु हो गई थी और याचिकाकर्ता ने प्रतिस्थापन के लिए सभी कदम उठाए तथा बोर्ड के निर्देशानुसार समस्त राशि जमा कर दी।
इसके बाद न्यायालय ने कृष्णा मुरारी प्रसाद सिंह के मामले में दिए गए अपने पूर्व निर्देशों का संदर्भ लिया। उसने देखा कि उस निर्णय में कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि बोर्ड उचित अवसर दिए बिना या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी करते हुए आवंटन रद्द कर सकता है।
न्यायालय ने C.W.J.C. No.23195 of 2011 (Anil Kumar vs. Meghan Yadav & Ors.) का भी उल्लेख किया, जिसमें इसी 11.11.2011 की रद्दीकरण आदेश को चुनौती दी गई थी। एकल पीठ ने उस याचिकाकर्ता के संबंध में रद्दीकरण को निरस्त कर दिया था और खंडपीठ ने L.P.A. No.556 of 2015 में उस निर्णय को बरकरार रखा था।
खंडपीठ ने दर्ज किया था कि आवास बोर्ड ने अनुचित जल्दबाजी तथा अनुपयुक्त मनोवृत्ति से काम किया। M.J.C. No.999 of 2011 में अवमानना कार्यवाही का सामना करने के बाद, बोर्ड ने 11.11.2011 को हड़बड़ी में रद्दीकरण आदेश पारित कर दिया ताकि 15.11.2011 को न्यायालय के समक्ष “सार्थक अनुपालन” दर्शा सके। खंडपीठ ने माना कि कृष्णा मुरारी प्रसाद सिंह के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में किसी भी आवंटन को रद्द करने से पहले, बोर्ड को प्रत्येक मामले में जांच करनी होगी, सुनिश्चित करना होगा कि आवंटी वास्तव में डिफॉल्टर है और निर्देशों को यांत्रिक रूप से लागू नहीं करना होगा।
उक्त तर्क का अनुसरण करते हुए, वर्तमान मामले में एकल पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपने मामले को पूरी लगन से आगे बढ़ाया, अपने नाम पर हस्तांतरण का अनुरोध किया और अन्य वारिसों की ओर से कोई आपत्ति नहीं थी। रद्दीकरण से पूर्व उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया। अतः निर्माण में देरी bona fide थी।
न्यायालय ने ठहराया कि बोर्ड के लिए यह आवश्यक था कि वह नोटिस जारी करे, जांच करे और फिर यह निर्णय ले कि याचिकाकर्ता डिफॉल्टर है या नहीं। केवल देरी को आधार बनाकर, बिना विशेष परिस्थितियों — मूल आवंटी की मृत्यु, लंबित प्रतिस्थापन और किए गए भुगतान — पर विचार किए, रद्दीकरण उचित नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने एक गंभीर खामी भी पाई: रद्दीकरण आदेश एक मृत व्यक्ति, अर्थात मूल आवंटी, जिनकी 12.07.2003 को मृत्यु हो चुकी थी, के विरुद्ध पारित किया गया था। ऐसे आदेश, जो कानूनी वारिस के अधिकारों पर विचार किए बिना पारित किया गया हो, टिकाऊ नहीं हो सकता।
निष्कर्षतः, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि 11.11.2011 का रद्दीकरण आदेश विधि की दृष्टि से स्थायी नहीं है। उसने आदेश को निरस्त कर दिया, आवास बोर्ड को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को उसकी माता के स्थान पर प्रतिस्थापित करे और दो माह के भीतर उसके पक्ष में प्लॉट संख्या 6H/65 आवंटित करे। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को Hire-Purchase Agreement की शर्तों के अनुसार प्लॉट पर भवन निर्माण के लिए दो वर्ष का समय भी प्रदान किया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के सभी आवास बोर्ड आवंटियों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से जहां मूल आवंटी की मृत्यु हो चुकी है। यह स्पष्ट करता है कि बिहार राज्य आवास बोर्ड केवल इस आधार पर कि निर्धारित समय में मकान का निर्माण नहीं हुआ है, सामूहिक और यांत्रिक ढंग से आवंटन रद्द नहीं कर सकता।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि रद्दीकरण से पहले बोर्ड को नोटिस जारी करना होगा, उचित जांच करनी होगी और मूल आवंटी की मृत्यु, कानूनी वारिसों के पक्ष में लंबित हस्तांतरण तथा किए गए भुगतानों जैसी विशेष परिस्थितियों पर विचार करना होगा।
न्यायालय ने कानूनी वारिसों के अधिकारों की भी रक्षा की। उसने माना कि एक मृत व्यक्ति के विरुद्ध पारित आदेश, उस वारिस की अनदेखी करते हुए जो सक्रिय रूप से हस्तांतरण का प्रयास कर रहा है, विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण है। जिन परिवारों ने आवंटी को खो दिया है और जो कागजी कार्यवाही से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह निर्णय यह भरोसा देता है कि विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना उनके अधिकार नहीं छीने जा सकते।
इसके अतिरिक्त, यह निर्णय पुनः पुष्टि करता है कि संपत्ति का अधिकार यद्यपि अब मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी अनुच्छेद 300A के तहत एक संरक्षित संवैधानिक अधिकार है। आवास बोर्ड जैसे सरकारी निकायों को किसी के मकान या प्लॉट के संबंध में कार्य करते समय निष्पक्ष और विधि के अनुरूप कार्य करना होगा।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: क्या बिहार राज्य आवास बोर्ड पूर्व उच्च न्यायालयी निर्देशों का सहारा लेकर, बिना नोटिस, बिना जांच और मूल आवंटी की मृत्यु तथा कानूनी वारिस के लंबित प्रतिस्थापन पर विचार किए बिना, निर्माण न होने के आधार पर प्लॉट का आवंटन रद्द कर सकता था?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि बोर्ड ने यांत्रिक ढंग से और अनुचित जल्दबाजी में कार्य किया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया और यहां तक कि एक मृत व्यक्ति के विरुद्ध रद्दीकरण पारित किया। 11.11.2011 की रद्दीकरण आदेश को निरस्त कर दिया गया। - प्रश्न: क्या Hire-Purchase Agreement और आवंटन शर्तों के अंतर्गत मकान निर्माण के संबंध में याचिकाकर्ता डिफॉल्टर था?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि इस मामले के तथ्यों में निर्माण में हुई देरी bona fide थी और मुख्यतः बोर्ड द्वारा प्रतिस्थापन पूरा न करने तथा आवश्यक स्वीकृतियां न देने के कारण हुई। याचिकाकर्ता को डिफॉल्टर मानना अनुचित था। - प्रश्न: प्लॉट के अवैध रद्दीकरण के बाद याचिकाकर्ता किस राहत का हकदार था?
उत्तर: न्यायालय ने आवास बोर्ड को निर्देश दिया कि वह मूल आवंटी के स्थान पर याचिकाकर्ता का प्रतिस्थापन पूरा करे, दो माह के भीतर प्लॉट संख्या 6H/65 उसके पक्ष में आवंटित करे और Hire-Purchase Agreement के अनुसार उस पर निर्माण करने के लिए उसे दो वर्ष का समय दे।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- State of West Bengal vs. Haresh C. Banerjee, (2006) 7 SCC 651.
- Krishna Murari Prasad Singh vs. State of Bihar & Ors., C.W.J.C. No.12376 of 2007, आदेश दिनांक 02.09.2008।
- M.J.C. No.999 of 2011 (Krishna Murari Prasad Singh vs. State of Bihar & Ors.).
- C.W.J.C. No.23195 of 2011, Anil Kumar vs. Meghan Yadav & Ors., निर्णय दिनांक 11.09.2013।
- L.P.A. No.556 of 2015, जिसमें C.W.J.C. No.23195 of 2011 के निर्णय की पुष्टि की गई।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.2314 of 2016
मामले का शीर्षक: Sanjay Mishra vs. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2024 (4) PLJR 161
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Sandeep Kumar
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Bidhanesh Misra, Advocate
- राज्य की ओर से: Md. Khurshid Alam, AAG-13
- आवास बोर्ड की ओर से: Ms. Binita Singh, Advocate
मामले का स्वरूप: आवास बोर्ड के आवंटन रद्दीकरण को चुनौती देते हुए तथा प्रतिस्थापन और प्लॉट की बहाली के लिए दायर दीवानी रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत रिट याचिका।
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
निर्णय की तिथि: 28.08.2024
विवादित आदेश: बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा प्लॉट संख्या 6H/65, बहादुरपुर, पटना सेक्टर-06 के संबंध में 11.11.2011 को पारित रद्दीकरण आदेश संख्या 9754।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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