गांव में की गई हत्या की सजा बरकरार — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

दो संबद्ध आपराधिक अपीलों में बक्सर सत्र न्यायालय द्वारा दी गई हत्या की सजा को चुनौती दी गई थी। पटना उच्च न्यायालय ने पारिवारिक गवाहों के सबूत, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस जांच की समीक्षा की। न्यायालय ने अभियोजन पक्ष का विवरण विश्वसनीय पाया और इस बचाव पक्ष की कहानी को खारिज कर दिया कि परिवार ने ही मृतक की हत्या की थी। आजीवन कारावास और अन्य दंडों की पुष्टि की गई तथा जमानत पर रिहा अपीलकर्ताओं को वापस जेल भेजने का आदेश दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नवानगर थाना कांड सं. 41 of 2016, जिला बक्सर से उत्पन्न होता है। अभियोजन पक्ष का मामला मृतक के पुत्र, सूचक, के फर्दबयान से शुरू हुआ, जो 31.03.2016 को लगभग सुबह 8:30 बजे गांव की सड़क पर कटिकनार में दर्ज किया गया था।

फर्दबयान के अनुसार, उसी सुबह लगभग 8:05 बजे सूचक, उसके पिता (मृतक), उसकी मां और उसकी भाभी, ननहकू सिंह के खेत से मसूर की फसल काटकर लौट रहे थे। जब वे गांव में निर्मल सिंह के दरवाजे के पास पहुंचे, तो कई आरोपी रिश्तेदारों ने कथित रूप से उन्हें घेर लिया। उनमें से एक, जो “कट्टा” नामक नुकीले धारदार हथियार से लैस था, ने मृतक पर बार-बार वार किया। जब परिवार के सदस्यों ने उसे बचाने की कोशिश की, तो उन्हें भी पीटा गया। मृतक की मौके पर ही मृत्यु हो गई।

सूचक ने यह भी कहा कि, इस सड़क किनारे हमले के ठीक पहले, आरोपी पक्ष उनके घर पर पुरुष सदस्यों की तलाश में गया था और वहां सूचक के भतीजे–भतीजियों को पीटा था।

इस बयान के आधार पर, नवानगर थाना कांड सं. 41 of 2016, भारतीय दंड संहिता की धारा 447, 341, 323, 302, 120B/34 के अंतर्गत, उसी सुबह दर्ज किया गया। जांच नवानगर के थाना प्रभारी द्वारा की गई। गवाहों के बयान दर्ज करने और दस्तावेज एकत्र करने के बाद, उन्होंने सात आरोपित व्यक्तियों के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया।

चूंकि यह मामला विशेष रूप से सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय था, इसलिए मजिस्ट्रेट ने इसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 209 के तहत प्रतिबद्ध किया और इसे सत्र वाद सं. 256 of 2016 के रूप में, सत्र न्यायाधीश, बक्सर के समक्ष दर्ज किया गया। सत्र वाद के दौरान, एक आरोपी, जो किशोर था, को 05.01.2017 को पृथक कर दिया गया और उसे किशोर न्याय बोर्ड, बक्सर भेज दिया गया। इसके बाद छह वयस्क आरोपियों के विरुद्ध विचारण आगे बढ़ा।

सत्र न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के 11 गवाहों की जांच की और चार बचाव गवाहों को भी स्वीकार किया। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत आरोपियों के बयान दर्ज करने के बाद, सत्र न्यायाधीश ने 27.03.2017 को सभी छह आरोपियों को धारा 302/34, 448/34 और 323/34 आईपीसी के अपराधों के लिए दोषी ठहराया, और 29.03.2017 को उन्हें हत्या के लिए प्रत्येक को आजीवन कारावास और 10,000/- रुपये अर्थदंड, साथ ही घर में अतिक्रमण और चोट के लिए प्रत्येक को एक वर्ष का साधारण कारावास, तथा सभी सजाओं को साथ-साथ चलने का आदेश दिया।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374(2) के तहत दो पृथक आपराधिक अपीलें पटना उच्च न्यायालय में दाखिल की गईं – एक एकल आरोपी द्वारा और दूसरी उसके सह–आरोपी रिश्तेदारों द्वारा – जिनमें दोषसिद्धि और सजा, दोनों को चुनौती दी गई।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय की द्वैपीठ, माननीय न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली और माननीय न्यायमूर्ति रमेश चंद्र मालवीय की पीठ ने दोनों अपीलों को साथ–साथ सुना। बचाव पक्ष का मुख्य आक्रमण फर्दबयान और प्राथमिकी के समय तथा प्रामाणिकता, संबंधित (रिश्तेदार) गवाहों की विश्वसनीयता, और चिकित्सकीय एवं मौखिक साक्ष्य के बीच कथित विरोधाभास पर था।

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि फर्दबयान को सुबह 8:30 बजे दर्ज दिखाया गया है, जबकि घटना के मात्र 25 मिनट बाद, और पुलिस थाना को 8:10 बजे सूचना प्राप्त होने का उल्लेख है। परन्तु, उन्होंने इंगित किया कि अभियोजन ने यह नहीं बताया कि पुलिस को किसने, क्या और कैसे सूचना दी। कोई स्टेशन डायरी प्रविष्टि प्रस्तुत नहीं की गई। उनके अनुसार, इससे फर्दबयान के वास्तविक समय पर संदेह उत्पन्न होता है और यह संकेत मिलता है कि प्राथमिकी संभवतः बाद में, पोस्टमार्टम के बाद दर्ज की गई होगी।

उन्होंने आगे बताया कि 8:45 बजे तैयार किए गए पंचनामा (इनक्वेस्ट) में थाना कांड संख्या अंकित नहीं है और दो पंच गवाहों (बाद में पीडब्ल्यू 10 और पीडब्ल्यू 11 के रूप में परीक्षित) ने स्वीकार किया कि उनके हस्ताक्षर खाली कागज पर लिए गए थे। अतः यह तर्क दिया गया कि पंचनामा की कोई साक्ष्यगत महत्ता नहीं है।

बचाव पक्ष ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भी भरोसा किया। पीडब्ल्यू 1, सदर अस्पताल, बक्सर के डॉक्टर, ने दोपहर 2:30 बजे पोस्टमार्टम किया। उन्हें पाँच तेज धार वाले कटे हुए घाव मिले:

(i) गर्दन के ऊपरी भाग पर 6” x 2” का चीरा, जो गले की गुहा तक गहरा था; (ii) बाएं गाल पर कान के पास 4” x 1” का चीरा, जिससे कान कट गया; (iii) दाहिने माथे पर 5” x 1” का हड्डी तक गहरा चीरा, जिससे खोपड़ी की हड्डी में फ्रैक्चर; (iv) बायां हथेली पूरी तरह अलग, कलाई से लगभग 4” ऊपर से; और (v) दाहिने तर्जनी अंगुली पर चीरा। आंतरिक अंग फीके थे और बड़ी आंत में बदबूदार गैस थी। उन्होंने मृत्यु का कारण इन तेज धार वाले, मृत्यु–पूर्व घावों से उत्पन्न शॉक और अत्यधिक रक्तस्राव बताया, और मृत्यु के समयांतराल का अनुमान 6 से 24 घंटे के भीतर लगाया।

जिरह में उन्होंने कहा कि बड़ी आंत में बदबूदार गैस मृत्यु के 12 घंटे बाद तक रह सकती है। बचाव अधिवक्ता ने इसका उपयोग यह सुझाव देने के लिए किया कि मृत्यु बहुत पहले हुई थी, जो अभियोजन के समय–वृत्तांत के विपरीत है, और यह भी रेखांकित किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में थाना कांड संख्या का उल्लेख नहीं है।

एक अन्य तर्क यह था कि मुख्य प्रत्यक्षदर्शी – मृतक की पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू (पीडब्ल्यू 6, 7 और 9), तथा घर की घटना के समय उपस्थित तीन महिला पारिवारिक सदस्य (पीडब्ल्यू 4, 5 और 8) – सभी हितग्रही (रुचि रखने वाले) गवाह हैं। स्वतंत्र ग्रामीणों को, जिनके वहां उपस्थित होने की बात कही गई, परीक्षित नहीं किया गया। बचाव पक्ष ने अन्वेषणकर्ता अधिकारी की पुनः–जांच (रिकॉल) के दौरान दी गई गवाही पर भी भरोसा किया, जिसमें उन्होंने कहा कि इन गवाहों में से कई ने पुलिस बयान में वह कई बातें नहीं बताई थीं, जो अब न्यायालय में कही जा रही हैं, जैसे हथियारों का विशिष्ट विवरण, अलग–अलग वार, घर से घसीट कर ले जाना, और 20 साल पहले की गोलीबारी की घटना। अपीलकर्ताओं के अनुसार, इससे गंभीर सुधार और विरोधाभास सिद्ध होते हैं।

बचाव पक्ष का संस्करण, जो जिरह और चार बचाव गवाहों के माध्यम से सुझाया गया, यह था कि मृतक अशक्त था, श्वेत कुष्ठ (लीयूकोडर्मा) से पीड़ित था, और दैनिक कार्यों के लिए भी परिवार पर निर्भर था। दावा किया गया कि वह घटनास्थल तक पैदल चल ही नहीं सकता था। आगे यह सुझाव दिया गया कि उसे उसके ही परिवार वालों ने मार डाला, ताकि आरोपी पक्ष पर, अभियोजन पक्ष के विरुद्ध, आरोपी परिवार की एक लड़की के अपहरण के पुराने मामले में दबाव बनाया जा सके।

दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि फर्दबयान तुरंत घटनास्थल पर ही दर्ज किया गया, जबकि थाना लगभग 8 किमी दूर था। देरी या मनगढ़ंत होने से इंकार किया गया। राज्य ने इंगित किया कि अन्वेषणकर्ता अधिकारी को मौके पर बहुत सारा खून मिला और उसने खून से सनी मिट्टी जब्त की, जो इस अभियोजन कथा से मेल खाती है कि मृतक को निर्मल सिंह के घर के पास सड़क पर मारा गया।

अभियोजन ने यह रेखांकित किया कि घटनाक्रम दो भागों में बंटा था। पहले, आरोपियों ने कथित रूप से मृतक के घर पर जाकर पुरुष सदस्यों को खोजते हुए महिलाओं और बच्चों पर हमला किया (जिसके बारे में पीडब्ल्यू 4, 5 और 8 ने गवाही दी)। दूसरे, थोड़ी ही देर बाद, जब मृतक और अन्य लोग मसूर के खेत से लौट रहे थे, तो आरोपियों ने उन्हें निर्मल सिंह के दरवाजे के पास घेर कर मृतक पर हमला किया (जिसके बारे में पीडब्ल्यू 6, 7 और 9 ने गवाही दी)। इन प्रत्यक्षदर्शियों ने निरंतर रूप से यह वर्णन किया कि मृतक को घेर कर “कट्टा” और “डब” जैसे तेज धार हथियारों से काटा–छांटा गया, जिससे गंभीर कटे हुए घाव हुए, जिनमें हाथ का अलग हो जाना और गर्दन, गाल और सिर पर घाव शामिल हैं।

उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। उसने नोट किया कि अभियोजन के अनुसार, घटना सुबह 8:05 बजे हुई, फर्दबयान 8:30 बजे, औपचारिक प्राथमिकी 1:45 बजे दोपहर, और पोस्टमार्टम 2:45 बजे दोपहर हुआ, जबकि शव लगभग 2:00 बजे अस्पताल पहुंचा। इन तथ्यों में न्यायालय ने पाया कि घड़ने–बनाने या विचार–विमर्श का व्यावहारिक रूप से कोई समय नहीं था। अकेले स्टेशन डायरी प्रविष्टि का प्रस्तुत न किया जाना, अभियोजन पक्ष का मामला अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया, विशेषकर जब थाना केवल 8 किमी दूर था और अन्वेषणकर्ता अधिकारी की घटनास्थल पर उपस्थिति खून सनी मिट्टी की बरामदगी और अन्य परिस्थितियों से समर्थित थी।

चिकित्सकीय साक्ष्य के संबंध में, न्यायालय ने माना कि डॉक्टर की मृत्यु के समयांतराल की मुख्य राय – 6 से 24 घंटे – आराम से अभियोजन के समय–वृत्तांत को समेटती है। बड़ी आंत में बदबूदार गैस के 12 घंटे बाद तक रहने की टिप्पणी, न्यायालय के विचार में, उसकी स्पष्ट राय को निष्प्रभावी नहीं करती या आवश्यक रूप से 12 घंटे की न्यूनतम अवधि तय नहीं करती। साथ ही, घावों की प्रकृति और स्थान – जिसमें हथेली का कट कर अलग हो जाना और गर्दन तथा सिर पर गहरे घाव शामिल हैं – तेज धारदार हथियार से अचानक हमले के प्रत्यक्षदर्शी वर्णन से पूर्णतः मेल खाते हैं। इस प्रकार, चिकित्सकीय साक्ष्य अभियोजन कथा का खंडन करने के बजाय, उसका समर्थन ही करता है।

न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि स्वतंत्र ग्रामीण गवाहों की जांच नहीं की गई। तथापि, उसने यह स्थापित सिद्धांत दोहराया कि मात्र संबद्ध या हितग्रही होने के आधार पर गवाहों के साक्ष्य को खारिज नहीं किया जा सकता। उनकी गवाही को उसके अपने गुणों पर परखा जाना चाहिए। यहां, पीडब्ल्यू 6, 7 और 9 स्वाभाविक गवाह थे, क्योंकि वे मसूर की फसल काटने साथ गए थे और मृतक के साथ ही लौट रहे थे। समय, स्थान, क्रम (खेत से निर्मल सिंह के दरवाजे तक) और हमले के तरीके का उनका सतत वर्णन सुसंगत और विश्वसनीय पाया गया। जैसा ऊपर उल्लेखित है, चिकित्सकीय साक्ष्य ने भी मजबूत समर्थन दिया।

उनकी न्यायालयीन गवाही और पूर्व पुलिस बयानों के बीच कथित विरोधाभास (जिसे पुनः–परीक्षित अन्वेषणकर्ता अधिकारी, पीडब्ल्यू 3, के माध्यम से इंगित किया गया) पर, उच्च न्यायालय को ऐसा कोई अंतर नहीं मिला जो अभियोजन कथा के मूल तत्व को हिला सके। जिन चूकों की ओर इशारा किया गया था, वे प्रायः विस्तार या अतिरिक्त विवरण से संबंधित थीं, न कि संस्करण के पूर्ण परिवर्तन से।

न्यायालय ने आगे यह भी नोट किया कि अभियोजन पक्ष ने प्रेरणा (मोटिव) सिद्ध की थी: दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से दुश्मनी थी, जिसमें आरोपी परिवार की एक लड़की के अपहरण का पुराना मामला, जिसमें अभियोजन पक्ष के सदस्य अभियुक्त थे, और यहां तक कि कुछ आरोपियों और मृतक से संबंधित पुरानी गोलीबारी की घटना भी शामिल थी। यद्यपि, जहां मजबूत प्रत्यक्षदर्शी एवं चिकित्सकीय साक्ष्य हों, वहां प्रेरणा आवश्यक नहीं होती, फिर भी इस मामले में उसका होना अभियोजन कथा को और पुष्ट करता है।

इसके विपरीत, यह बचाव सिद्धांत कि परिवार ने ही मृतक की हत्या की, किसी प्रत्यक्ष साक्ष्य से समर्थित नहीं था। उच्च न्यायालय ने देखा कि यह सिद्धांत मुख्यतः अनुमानात्मक है और तत्काल दर्ज फर्दबयान, सुसंगत प्रत्यक्षदर्शी कथनों और चिकित्सकीय निष्कर्षों से विपरीत है। ऐसे साक्ष्य के सामने, यह वैकल्पिक कहानी अविश्वसनीय पाई गई।

अंत में, न्यायालय ने पंचनामा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में थाना कांड संख्या के अभाव से निपटा। इसने अभिलेख से उभरने वाली व्याख्या को स्वीकार किया: पंचनामा 8:45 बजे सुबह तैयार हुआ, जबकि औपचारिक प्राथमिकी 1:45 बजे दोपहर दर्ज हुई; शव को सीधे घटनास्थल से पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया; और अस्पताल को यह शव प्राथमिकी के समय के तुरंत बाद प्राप्त हुआ। इन परिस्थितियों में, कांड संख्या का उल्लेख न होना एक प्रक्रियागत त्रुटि थी, पर इससे अभियोजन साक्ष्य के मूल पर कोई आंच नहीं आई।

यह निष्कर्ष निकालते हुए कि अभियोजन ने संदेह से परे आरोप सिद्ध कर दिए हैं, पटना उच्च न्यायालय ने धारा 302/34, 448/34 और 323/34 आईपीसी के अंतर्गत दोषसिद्धि और सत्र न्यायाधीश द्वारा दी गई सजाओं को बरकरार रखा। दोनों आपराधिक अपीलें खारिज कर दी गईं। चूंकि आपराधिक अपील (डिवीजन बेंच) सं. 443 of 2017 के सभी पाँच अपीलकर्ता जमानत पर थे, न्यायालय ने उनकी जमानत–बंधपत्रों को रद्द कर दिया और अधीनस्थ न्यायालय को निर्देश दिया कि उन्हें शेष सजा भुगतने के लिए वापस जेल भेजा जाए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय हत्या पीड़ितों के परिवारों और ग्रामीण विवादों में आरोपित व्यक्तियों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

पहला, यह दिखाता है कि केवल इसलिए आपराधिक मामला असफल नहीं होगा कि मुख्य गवाह परिवार के सदस्य हैं। यदि उनका घटनास्थल पर होना स्वाभाविक हो और उनकी बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मेल खाती हो, तो न्यायालय उन पर भरोसा कर सकता है, भले ही कोई पड़ोसी गवाह न बनाया गया हो।

दूसरा, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस कागजी कार्यवाही में छोटी–मोटी चूकें, जैसे पंचनामा या पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कांड संख्या का न होना, या स्टेशन डायरी प्रविष्टि प्रस्तुत न करना, अपने आप पूरे मामले को झूठा नहीं बना देतीं। मुख्य ध्यान इस बात पर है कि क्या समग्र साक्ष्य विश्वसनीय हैं।

तीसरा, निर्णय बिना ठोस प्रमाण के वैकल्पिक कहानी घड़ने के प्रयासों को अस्वीकार करता है, खासकर तब जब वह कहानी स्वयं पीड़ित के परिवार पर ही आरोप लगाती हो। केवल जिरह में दिए गए सुझाव या गांव की अफवाहें, स्पष्ट प्रत्यक्षदर्शी और चिकित्सकीय साक्ष्य का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी गईं।

अंततः, लंबे समय से चली आ रही दुश्मनी और पुराने आपराधिक मामलों में जुड़े लोगों के लिए यह निर्णय एक चेतावनी है। पुराने झगड़े और पूर्व घटनाएं प्रेरणा (मोटिव) के रूप में देखी जा सकती हैं, और यदि हत्या जैसे गंभीर अपराध घटित हों, तो न्यायालय इसे निरंतर संघर्ष का हिस्सा मान सकता है, जिससे दोषसिद्धि की संभावना बढ़ जाती है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या अभियोजन ने यह संदेह से परे सिद्ध किया कि अपीलकर्ताओं ने मिलकर मृतक की हत्या की तथा घर में अतिक्रमण और चोट की?
    उत्तर: हाँ। संबंधित प्रत्यक्षदर्शियों की सुसंगत गवाही, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आस–पास की परिस्थितियों से समर्थित होने के आधार पर, न्यायालय ने धारा 302/34, 448/34 और 323/34 आईपीसी के अंतर्गत दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
  • प्रश्न: क्या स्टेशन डायरी प्रविष्टि प्रस्तुत न करने और पंचनामा व पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर कांड संख्या के अभाव जैसी प्रक्रियागत चूकों ने अभियोजन कथा के संबंध में घातक संदेह उत्पन्न किया?
    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने माना कि ये मामूली अनियमितताएँ थीं, जिन्होंने तत्काल दर्ज फर्दबयान, घटनास्थल के भौतिक साक्ष्य या चिकित्सकीय निष्कर्षों को कमजोर नहीं किया, और इसलिए दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का औचित्य नहीं बनता।
  • प्रश्न: क्या केवल संबंधित (रिश्तेदार) गवाहों की, बिना किसी स्वतंत्र ग्रामीण गवाह के, गवाही के आधार पर सुरक्षित दोषसिद्धि की जा सकती है?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि केवल संबंधित या हितग्रही होने के आधार पर गवाहों को खारिज नहीं किया जा सकता; चूँकि यहाँ उनकी गवाही स्वाभाविक, सुसंगत और चिकित्सकीय रूप से पुष्ट थी, इसलिए वह दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए पर्याप्त थी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद

  • उपलब्ध पाठ के अनुसार, निर्णय में किसी अन्य विशिष्ट प्रकाशित फैसले का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।

वाद का विवरण

वाद संख्या: आपराधिक अपील (डिवीजन बेंच) सं. 582 of 2017, साथ में आपराधिक अपील (डिवीजन बेंच) सं. 443 of 2017; नवानगर थाना कांड सं. 41 of 2016 से उत्पन्न; सत्र वाद सं. 256 of 2016 (बक्सर)।

वाद शीर्षक: जोनी पासी @ रविंद्र पासी बनाम बिहार राज्य; साथ में बिरेंद्र पासी एवं अन्य बनाम बिहार राज्य।

पीठ (कोरम): माननीय न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली एवं माननीय न्यायमूर्ति रमेश चंद्र मालवीय।

उद्धरण: 2024(4) PLJR 403.

अधिवक्ता: आपराधिक अपील (डिवीजन बेंच) सं. 582 of 2017 में – अपीलकर्ता की ओर से: श्री राजेंद्र नारायण, वरिष्ठ अधिवक्ता; डॉ. कमल देव शर्मा, अधिवक्ता। राज्य की ओर से: श्री सुजित कुमार सिंह, ए.पी.पी. आपराधिक अपील (डिवीजन बेंच) सं. 443 of 2017 में – अपीलकर्ताओं की ओर से: डॉ. कमल देव शर्मा, अधिवक्ता; श्री विश्व नंद उपाध्याय, अधिवक्ता; श्री तुषार वैभव, अधिवक्ता। राज्य की ओर से: श्री सुजित कुमार सिंह, ए.पी.पी.

मामले की प्रकृति: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 374(2) के अंतर्गत आपराधिक अपीलें, धारा 302/34, 448/34 और 323/34 आईपीसी के अपराधों के लिए दी गई दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध।

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – Criminal Appeal (DB) No. 582 of 2017 with 443 of 2017

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